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आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना (Aadya Shakti Gayatri Kee Samartha Saadhanaa)
महापूर्णाहुति पुस्तकमाला क्र. १४
लेखक – पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
प्रकाशक – युगचेतना प्रकाशन, शांतिकुंज, हरिद्वार
प्रथम आवृति १९८९-१९९०
महापूर्णाहुति वर्ष २०००-२००१
सार संक्षेप
चौबीस अक्षरों का गायत्री मंत्र भारतीय संस्कृति के वाङमय का नाभिक कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। यह संसार का सबसे छोटा एवं एक समग्र धर्मशास्त्र है। यदि कभी भारत जगदगुरु-चक्रवर्ती रहा है तो उसके मूल में इसी की भूमिका रही है। गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान कुछ ऐसी उत्कृष्टता अपने अंदर समाये है कि उसे हृदयंगम कर जीवनचर्या में समाविष्ट कर लेने से जीवन परिष्कृत होता चला जाता है। वेद जो हमारे आदिग्रंथ हैं उनका सारतत्व गायत्री मंत्र की व्याख्या में पाया जा सकता है।
गायत्री त्रिपदा है । उदगम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशा धाराएँ जुड़ती हैं – (१) सविता के भर्ग तेजस का वरण; परिष्कृत प्रतिभा – शौर्य व साहस । (२) देवत्व का वरण; देव व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव गरिमा को अंतराल में धारण करना । मात्र अपनी ही नहीं, सारे समूह, समाज व संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना ।
गायत्री की पूजा-उपासना और जीवन साधना यदि सच्चे अर्थों में की गयी हो तो उसकी ऋद्धि-सिद्धियाँ स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरंतर साधक के अंतराल में उभरती रहती हैं । ऐसा साधक जहाँ भी रहता है, वहाँ अपनी विशिष्टताओं के बलबूते स्वर्गीय वातावरण बना लेता है । जहाँ शिखा सूत्र का गायत्री से अविछिन्न संबंध है, वहीं गायत्री का पूरक है – यज्ञ । दोनों ही संस्कृति के आधारस्तंभ हैं । अपौरुषेय स्तर पर अवतरित गायत्री मंत्र नूतन सृष्टि निर्माण में सक्षम है । एवं उसी का सामुहिक जप-उच्चारण-प्रधान प्रयोग एक युगसंधि महापुरश्चरण के रूप में इस युग में संभव हो पाया है । गायत्री परिवार के द्वारा संचालित इस महापुरुषार्थ की पूर्णाहुति २०००-२००१ में संपन्न हो रही है । विशिष्ट उपासना हेतु शांतिकुंज का आमंत्रण है ।
आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना
भारतीय संस्कृति के बहुमूल्य निर्धारणों, प्रतिपादनों और अनुशासनों का सारतत्व खोजना हो तो उसे चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र का मंथन कर के जाना जा सकता है । भारतीय संस्कृति का इतिहास खोजने से पता लग सकता है कि प्राचीन काल में इस समुद्रमंथन से कितने बहुमूल्य रत्न निकले थे तथा भारतभूमि को ‘स्वर्गादपि गरियसि’ बनाने में उस मंथन से निकले नवनीत ने कितनी बड़ी भूमिका निबाही थी । मनुष्य में देवत्त्व का उदय कम से कम भारत भूमि का कमलपुष्प तो कहा ही जा सकता है । जब वह फलित हुआ तो उसका अमरफल इस भारतभूमि को स्वर्गादपि गरियसि बना सकने में समर्थ हुआ ।
भारत को जगदगुरु, चक्रवर्ती, व्यवस्थापक और दिव्यसंपदाओं का उदगम कहा जाता है। समस्त विश्व में इसी देश के अजस्र अनुदान अनेक रूप में बिखरे हैं । यह कहने में कोई अत्युक्ति प्रतीत नहीं होती कि संपदा, सभ्यता और सुसंस्कारिता की प्रगतिशीलता इसी नर्सरी में जमी और उसने विश्व को अनेकानेक विशेषताओं और विभूतियों से सुसंपन्न किया ।
भारतीय संस्कृति का तत्वदर्शन गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों की व्याख्या-विवेचना करते हुए सहज ही खोजा और पाया जा सकता है । गायत्रीगीता, गायत्रीस्मृति, गायत्रीसंहिता, गायत्रीरामायण, गायत्री लहरी आदि संरचनाओं को कुरेदने से अंगारे का वह मध्य भाग प्रकट होता है, जो मुद्द्तों से राख कि मोटी परत जम जाने के कारण अदृश्य-अविज्ञात स्थिति में दबा हुआ पड़ा था ।
कहना ना होगा कि गरिमामय व्यक्तित्व ही इस संसार की अगणित विशेषताओं, संपदाओं एवँ विभूतियों का मूलभूत कारण है। वह उभरे तो मनुष्य देवत्व का अधिष्ठाता और नर से नारायण बनने की संभावनाओं से भरा पूरा है। यह गौरव गरिमा मानवता के साथ किस प्रकार अविछिन्न रूप से जुड़ी रहे, इसका सारतत्व गायत्री महामंत्र के अक्षरों को महासमुद्र मानकर उसमें डुबकी लगाकर खोजा, देखा और पाया जा सकता है।
मात्र अक्षर दोहरा लेने से तो स्कूली बच्चे प्रथम कक्षा में ही बने रहते हैं। उन्हें प्रशिक्षित बनने के लिये वर्णमाला, गिनती जैसे प्रथम चरणों से आगे बढ़ना पड़ता है। इसी प्रकार गायत्री मंत्र के साथ जो विभूतियां अविच्छिन्न रूप से आबद्ध हैं, मात्र थोड़े से अक्षरों को याद कर लेने या दोहरा देने से उनमें वर्णित विशेषताओं को उपलब्ध करना नहीं माना जा सकता। उनमें सन्निहित तत्वज्ञान पर भी गहरी दृष्टि डालनी होगी। इतना ही नहीं, उसे हृदयंगम भी करना होगा और जीवनचर्या में नवनीत को इस प्रकार समाविष्ट करना होगा कि मलीनता का निराकरण तथा शालीनता का अनुभव संभव बन सके।
संसार में अनेक धर्म-संप्रदाय हैं। उनके अपने-अपने धर्म शास्त्र हैं। उनमें मनुष्य को उत्कृष्टता का मार्ग अपनाने के लिये प्रोत्साहन दिया गया है और समय के अनूरूप अनुशासन का विधान किया गया है। भारतीय धर्म में भी वेदों की प्रमुखता है। वेद चार हैं। गायत्री मंत्र के तीन चरण और एक शीर्ष मिलने से चार विभाग ही बनते हैं। एक-एक विभाग में एक वेद का सार तत्व है। आकार और विवेचना की दृष्टि से अन्यान्य धर्मकाव्यों की तुलना में वेद ही भारी पड़ते हैं। उनका सारतत्व गायत्री के चार चरणों में है, इसलिये उसे संसार का सबसे छोटा धर्मशास्त्र भी कह सकते हैं। ‘हाथी के पैर में अन्य सब प्राणियों के पदचिन्ह समा जाते हैं’ वाली उक्ति यहां भली प्रकार लागू होती है।
गायत्री और सावित्री का उद्भव
पौराणिक कथा प्रसंग में चर्चा आती है कि सृष्टि के आरंभकाल में सर्वत्र मात्र जल संपदा ही थी। उसी के मध्य विष्णु भगवान शयन कर रहे थे। विष्णु की नाभि से कमल उपजा। कमल पुष्प पर ब्रह्मा जी अवतरित हुए। वे एकाकी थे, अतः असमंजसपूर्वक अनुरोध करने लगे कि मुझे क्यों उत्पन्न किया गया है? क्या करूँ? कुछ करने के लिये साधन कहाँ से पाऊँ? इन जिज्ञासाओं का समाधान आकाशवाणी ने किया और कहा- “गायत्री के माध्यम से तप करें, आवश्यक मार्गदर्शन भीतर से ही उभरेगा।” उनने वैसा ही किया और आकाशवाणी द्वारा बताये हुए गायत्री मंत्र की तपपूर्वक साधना करने लगे।
पूर्णता की स्थिति प्राप्त हुई। गायत्री दो खंड बनकर दर्शन देने एवँ वरदान-मार्गदर्शन से निहाल करने उतरी। उन दो पक्षों में से एक को गायत्री, दूसरे को सावित्री नाम दिया गया। गायत्री अर्थात तत्वज्ञान से संबंधित पक्ष। सावित्री अर्थात भौतिक प्रयोजनों में उसका जो उपयोग हो सकता है, उसका प्रकटीकरण। जड़-सृष्टि-पदार्थ-संरचना सावित्री शक्ति के माध्यम से और विचारणा से संबंधित भाव-संवेदना, आस्था, आंकाक्षा, क्रियाशीलता जैसी विभूतियों का उदभव गायत्री के माध्यम से प्रकट हुआ। यह संसार जड़ और चेतन के – प्रकृति और परब्रह्म के समन्वय से ही दृष्टिगोचर एवँ क्रियारत दीख पड़ता है।
इस कथन का सार तत्व यह है कि गायत्री दर्शन में सामूहिक सद्बुद्धि को प्रमुखता मिली है। इसी आधार को जिस -तिस प्रकार से अपनाकर मनुष्य मेधावी प्राणवान बनता है। भौतिक पदार्थों को परिष्कृत करने एवँ उनका सदुपयोग कर सकने वाला भौतिक विज्ञान सावित्री विद्या का ही एक पक्ष है। दोनों को मिला देने पर समग्र अभ्युदय बन पड़ता है। पूर्णता के लिये दो हाथ दो पैर आवश्यक हैं। दो फेफड़े, दो गुर्दे भी अभीष्ट हैं। गाड़ी दो पहियों के सहारे ही चल पाती है; अस्तु यदि गायत्री महाशक्ति का समग्र लाभ लेना हो तो उसके दोनो ही पक्षों को समझना एवँ अपनाना आवश्यक है।
तत्वज्ञान मान्यताओं एवँ भावनाओं को प्रभावित करता है। इन्हीं का मोटा स्वरूप चिंतन, चरित्र एवँ व्यवहार है। गायत्री का तत्वज्ञान इस स्तर की उत्कृष्टता अपनाने के लिये सद्विषयक विश्वासों को अपनाने के लिये प्रेरणा देता है। उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, मर्यादा, एवँ कर्तव्यपरायणता जैसी मानवीय गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने वाली आस्थाओं को गायत्री का तत्वज्ञान कहना चाहिये।
त्रिपदा गायत्री – तीन धाराओं का संगम
गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। उसके तीन चरण हैं। उद्गम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशाधाराएं जुड़ती हैं:-
१) सविता के भर्ग – तेजस का वरण अर्थात जीवन में ऊर्जा एवँ आभा का बाहुल्य । अवांछनीयताओं से अंतः ऊर्जा का टकराव। परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य-साहस इसी का नाम है। गायत्री के नैष्ठिक साधक में यह प्रखर प्रतिभा इस स्तर की होनी चाहिये कि अनीति के आगे न सिर झुकाए और न झुककर कायरता के दबाव में कोई समझौता करे।
२) दूसरा चरण है – देवत्व का वरण अर्थात शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना; लेने की अपेक्षा देने की प्रवृत्ति का परिपोषण करना: उस स्तर के व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव गरिमा की अंतराल में अवधारणा करना। यही है ‘देवस्य धीमहि’।
३) तीसरा सोपान है- ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज व संसार में सद्बुद्धि की प्रेरणा उभारना – मेधा, प्रज्ञा, दूरदर्शी विवेकशीलता, नीर क्षीर विवेक में निरत बुद्धिमत्ता।
यही है आध्यात्मिक त्रिवेणी संगम, जिसमें अवगाहन करने पर मनुष्य असीस पुण्यफल का भागी बनता है। कौवे से कोयल एवं बगुले से हंस बन जाने की उपमा जिस त्रिवेणी संगम के स्नान से दी जाती है, वह वस्तुतः आदर्शवादी साहसिकता, देवत्व की पक्षधर शालीनता एवं आदर्शवादिता को प्रमुखता देने वाली महाप्रज्ञा है। गायत्री का तत्वज्ञान समझने और स्वीकारने वाले में ये तीनों ही विशेषताएँ न केवल पाई जानी चाहिये वरन उनका अनुपात निरंतर बढ़ते रहना चाहिये। इस आस्था को स्वीकारने के उपरांत संकीर्णता व कृपणता से अनुबंधित ऐसी स्वार्थपरता के लिये कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि उससे प्रभावित होकर कोई दूसरे के अधिकारों का हनन करके अपने लिये अनुचित स्तर का लाभ बटोर सके – अपराधी या आततायी कहलाने के पतन-पराभव अपना सके।
नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक, भौतिक और आत्मिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक, संवर्धन एवं उन्मूलनपरक – सभी विषयों पर गायत्री के चौबीस अक्षरों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है, जिनके सहारे संकटों से उबरा और सुख शांति के सरल मार्ग को उपलब्ध किया जा सकता है। जिन्हें इस संबंध में रुचि है, वे अक्षरों के वाक्यों के विवेचनात्मक प्रतिपादनों को ध्यान पूर्वक पढ़ लें और देखें कि इस छोटे से शब्द समुच्चय में प्रगतिशीलता के तथ्यों का किस प्रकार समावेश किया गया है। इस आधार पर इसे इश्वरीय निर्देश, शास्त्र वचन एवं आप्तजन-कथन के रूप में अपनाया जा सकता है। गायत्री के विषय में गीता का वाक्य है-’गायत्री छंदसामहं’ । भगवान कृष्ण ने कहा है कि ‘छंदों में गायत्री मैं स्वयं हूँ’, जो विद्या विभूति के रूप में गायत्री की व्याख्या करते हुए विभूति योग में प्रकट हुई हैं।
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