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Reading: वर्तमान संकट में हमारा कर्तव्य · Page 28

वर्तमान संकट में हमारा कर्तव्य

विश्वव्यापी महायुद्ध से उत्पन्न हुई परिस्थितियों के कारण चारों ओर बेचैनी फैली हुई है। घबराहट, भय और आशंका से लोगों के हृदय बड़े व्याकुल हो रहे हैं। कइयों को रात भर नींद नहीं आती और सोचते रहते हैं कि क्या करें, कहाँ जावे? इस संकट के समय से उन्हें किसी महत्वपूर्ण बात का स्मरण नहीं आता वे केवल शरीर बचाने, परिवार बचाने और धन बचाने की चिन्ता करते हैं। भगदड़ ही एक मात्र उपाय दिखाई देता है। हम देखते हैं कि गाँव वाले शहरों को भाग रहे हैं और शहर वालों के माल असवाब गांवों के लिए लद रहे हैं। ग्रामीण धनवान समझते हैं कि लुटेरे उन्हें लूट लेंगे। चोर डाकू उनकी सम्पत्ति का हरण कर ले जावेंगे। शहर वालों का ख्याल है कि आक्रमण शहरों पर होने के कारण वहाँ उनकी सुरक्षा नहीं हो सकेगी। वास्तव में यह भगदड़ मृग तृष्णा के समान है जिसका परिणाम असफलता के सिवाय और कुछ न होगा। कहते हैं कि भाड़ में ठंडा कहीं नहीं। जिस बन में चारों ओर दावानल जल रहा है उसमें बचने के लिये यहाँ वहाँ ढूँढ़ना र्व्यथ है क्योंकि राष्ट्रीय विपत्ति के समय न तो शहर सुरक्षित है और न गाँव। भगदड़ में सिवाय खतरे के और कुछ नहीं है। रोगी, निर्बल और बच्चों को कम खतरे के स्थानों में रखना उचित है, परन्तु यह समझ में नहीं आता कि जवान, तंदुरुस्त और जीवित मनुष्य क्यों व्याकुल होते हैं।

विपत्ति के समय धैर्य खो देना या कर्तव्य क्षेत्र को छोड़कर घुड़दौड़ लगाना संकट को और अधिक पेचीदा कर देना है। सुविधा जनक प्रबन्ध कर लेना और पहले ही से सावधान हो जाना कोई बुरी बात नहीं है, परन्तु धैर्य गंवा कर दिन रात चिन्ता में जलना और भय एवं आशंका से बेत की तरह काँपते रहना बहुत ही अनुचित है।

शरीर और धन जैसी नश्वर वस्तुओं का असाधारण मोह करना एक प्रकार की नास्तिकता है। सत्य, धर्म ऐसे मौके पर हमें धैर्य प्रदान करता है और सलाह देता है कि उचित सुरक्षा का प्रबन्ध कर लेने के अतिरिक्त भगदड़ मचाने या दूसरों को भयभीत करने का कोई कारण नहीं है।

रोग, दुर्भिक्ष, युद्ध, देवी प्रकोप कोई भी संकट सामने आवे तो आप प्राण बचाने के भय से मत भागिए। शरीर और धन की अपेक्षा जीविका, अन्न जल, आमोद-प्रमोद मुद्दतों तक प्राप्त किया है उस पर विपत्ति आते ही आप छोड़ कर चल दें यह तो मनुष्यता को कलंकित करने वाला आचरण होगा। जिस नगरी से आपने पोषण पाया है आपत्ति के समय अपने को खतरे में डाल कर भी उसकी सेवा करना उचित है।

जिनके पास अन्यायोपार्जित धन है वे उसे शुभ कार्य में लगा दें अन्यथा तेजाब की शीशी की तरह आघात पड़ने पर वह स्वयं तो नष्ट होगा ही साथ में उसे भी ले बैठेगा जिसके पास रखा हुआ है जीवन यापन की साधारण आवश्यकताओं के अतिरिक्त जिनके पास अत्यधिक धन है उनको यह संदेश हृदयंगम कर लेना चाहिए कि उनके धन की सुरक्षा इसी में है कि अपने पड़ौसियों को संकट से बचाने में उसका सदुपयोग करें! इस प्रकार उनका पैसा नष्ट होने से बच जायेगा। पवित्र भावनाओं के साथ संकट के समय सहायता में जो धन लगाया जायेगा वह ज्यों का त्यों लौट आवेगा। इस लोक में और परलोक में उसका भुगतान पाई पाई से मिलेगा। सृष्टि के नियम इस बात के साक्षी हैं कि पवित्र भावनाओं के साथ जो त्याग किया जाता है उसका बीज सो गुना होकर लौटता है।

संकट के क्षणों में पग पग पर सहायता की पुकार होगी। धनिकों को चाहिए कि इस अवसर पर धन को जमीन में न गाड़े वरन् अपने भाइयों की सहायता के लिए थैलियों के मुँह खोल दें। हम जानते हैं कि जो धनिक इन पंक्तियों को पढ़ रहें होंगे उन्हें यह उपहासास्पद, उपेक्षणीय, व्यर्थ और मूर्खता पूर्ण प्रतीत होंगी, किन्तु हम कहें देते हैं कि एक दिन उन्हें पछताते हुए इन पंक्तियों की गम्भीरता स्वीकार करनी पड़ेगी, तब उनके हाथ से स्वर्ण अवसर निकल गया होगा। सम्पन्न व्यक्ति त्यागी, उदार पड़ौसियों के प्रति सेवा भावी बन कर अपने को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं अन्यथा अत्यन्त लोभियों को महात्मा गाँधी के शब्दों में ‘अपने चौकीदारों को ही जान का ग्राहक” होता हुआ देखने का अवसर आ सकता है हमारी धनिकों के लिये बार-बार यह सलाह है कि आपका हित इसमें है कि अनावश्यक धन को गाढ़ गाढ़ कर न रखें वरन् उसका उपयोग लोक कल्याण के निमित्त करें। फिर वे उन खतरों से सर्वथा सुरक्षित रह सकते हैं जो धन के कारण उनके सिर के ऊपर हर घड़ी मंडराते रहते हैं। जगत प्रखण्ड हैं। संसार की भौतिक वस्तुएं हमारे साथ चिपक नहीं सकती। बन्दर जब मुट्ठी को छोड़ देगा तो उसका सारा क्लेश कट जायेगा।

धन को नाश से बचाने का मार्ग ऊपर बताया गया तन तो बचाने का मार्ग यह है कि इसको ऐसे अवसर पर सार्थक करना चाहिए, दूर जंगलों में या छोटे गांवों में सम्भव है कोई अपने शरीर को बचाले पर ऐसा बचाव मानवोचित न कहा जायेगा। स्वजन बान्धवों, देशवासियों, को अकेला छोड़कर असहाय स्त्री बच्चों, घायल, पीड़ितों, दुखियों, लुटते रोते और बिलबिलाते हुये भाइयों की चीत्कारों की ओर से कान बन्द करके जो मनुष्य अपनी जान बचाने के लिए भागता है वह मनुष्यता से पतित होता है। प्लेग, इन्फ्लुऐजा, हैजा को हमने छोटे गांवों में फैलते देखा है और एक एक दिन में बीस बीस मुर्दों को मरघट में पहुँचाया है। हट्टे-कट्टे जवान बोलते चलाते मौत के मुँह में जाते देखे हैं किसे पता है कि हमें कितने दिन जीना है। हो सकता है कि लड़ाई से न सही बीमारी या अन्य दुर्घटना से ही चन्द दिन में विदा तैयारी हो जाय। हिन्दू शास्त्र की मान्यता है कि जब तक ईश्वर को हमें जीवित रखना है तब तक वज्र भी नहीं मार सकता और जब आयु पूरी हो जायेगी तो एक घड़ी भी बचना मुश्किल है। इन सब बातों पर विचार करने के उपरान्त एक स्वस्थ और जीवित मनुष्य का यही कर्तव्य होता है कि वह कर्तव्य की पुकार को खुले कानों से सुने और अपना स्थान दुखी पीड़ितों के बीच में बनावें जहाँ कि उसकी सेवाओं की आवश्यकता है। भगवान ने पुरुष को पुरुषार्थ इसलिए दिया है कि वह शूरवीर सिपाही की तरह कर्तव्य सेवा में डटा रहे चारों ओर भगदड़ मचाते हुए, प्राण रक्षा के लिए चूहे के बिलों में स्थान तलाश करते हुए लोगों को जब हम देखते हैं तो उनकी कायरता पर बड़ा दुख होता है। एक सच्चा नागरिक, एक सच्चा मनुष्य, एक सत्यधर्म का सच्चा अनुयायी अपने पड़ौसियों को विपत्ति में पड़ा हुआ छोड़कर अपनी जान बचाने के लिये नामर्द की तरह छिपने के लिए नहीं भाग सकता। सत्य का आदेश है कि हे कर्तव्य निष्ठ आत्मा! तेरा स्थान वहाँ है जहाँ से पीड़ितों की चीत्कारें सेवा सहायता के लिये तेरे पौरुष का आह्वान करती हैं। आत्मा प्रखण्ड है इसलिए आत्मा के नाश की चिन्ता मत करो, शरीर धन आदि जड़ पदार्थ भी अखंड है इसलिए उनकी नाश का भी चिन्ता मत करो। आप पवित्र अविनाशी और निलिप्त आत्मा हैं फिर घबराने, डरने और चिन्तित होने का क्या काम? निर्भय रहिए, निर्द्वन्द्व रहिए और निश्चिन्त रहिए। आज कर्तव्य आपको पुकारता है आप उसकी पुकार सुनिए और पुरुष की भाँति वहाँ पहुँचिए जहाँ आपके पौरुष को चुनौती दी जा रही है। यहाँ आपके पुरुषत्व का आह्वान किया जा रहा है।