गायत्री का विराट रूप-दर्शन
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परमात्मा की आकृति चराचरमय विश्व ब्रह्माण्ड में देखना ऐसी साधना है जिसके द्वारा सर्वत्र पर आत्मा का अनुभव करने की चेतना जागृत हो जाती है। यही विश्व मानव की पूजा है, इसे ही विराट रूप दर्शन कहते है। रामायण में भगवान राम ने अपने जन्म काल में कौशल्या को विराट रूप दिखाया है। एक बार भोजन करते समय भी राम ने माता को विराट रूप दिखाया था। उत्तर काण्ड में काकभुशुंडि जी के सम्बन्ध में वर्णन है कि वे भगवान् के मुख में चले गये तो उन्होंने वहाँ सारे ब्रह्माण्डों को देखा। भगवान कृष्ण ने भी इसी प्रकार कई बार अपने विराट रूप दिखाये। मिट्टी खाने के अपराध में मुँह खुलवाते समय यशोदा को रूप दिखाया। महाभारत के उद्योग पर्व में दुर्योधन ने भी ऐसा ही रूप देखा। अर्जुन को भगवान ने युद्ध समय में विराट रूप दिखाया जिसका गीता के 11 वें अध्याय में सविस्तार वर्णन है।
इस विराट रूप को देखना हर किसी के लिये सम्भव है। अखिल विश्व ब्रह्माण्ड को परमात्मा की विशालकाय मूर्ति देखना और उसके अंतर्गत— उसके अंग-प्रत्यंगों के रूप में समस्त पदार्थों को देखने की भावना ही विराट रूप दर्शन है। सर्वत्र भगवान को देखने, प्रत्येक वस्तु को, प्रत्येक स्थान को ईश्वर से ओत-प्रोत देखने की भावना करने से भगवद् बुद्धि जागृत होती है और सर्वत्र प्रभु की सत्ता व्याप्त होने का सुदृढ़ विश्वास होने से मनुष्य पाप से छूट जाता है फिर उससे पाप कर्म नहीं बन सकते। निष्पाप होने का इतना लाभ है कि उसके फलस्वरूप सब प्रकार के दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार के अभाव का नाम है—प्रकाश, और दुःख के अभाव का नाम है—आनन्द। विराट दर्शन के फलस्वरूप निष्पाप हुआ व्यक्ति सदा अक्षय आनन्द का उपयोग करता है।
गायत्री परमात्मा की शक्ति है। परमात्मा की शक्ति सर्वत्र, अणु-अणु में, विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, जो कुछ है सब गायत्री है। गायत्री के शरीर में ही यह सब जगत है, यह भावना “गायत्री का विराट दर्शन” कहलाती है। नीचे दिये हुये “गायत्री पंजर स्तोत्र’ में यही विराट दर्शन है। पंजर कहते है। ढांचे को। गायत्री का ढांचा, विस्तार सम्पूर्ण विश्व में है। यह इन स्तोत्र में बताया गया है। इस स्तोत्र का भावना सहित ध्यान करने से अन्तः लोक ओर बाह्य जगत में विराट गायत्री के दर्शन होते है। उस दर्शन के फलस्वरूप पाप करने का किसी को उसी प्रकार साहस नहीं हो सकता जैसे कि पुलिस से घिरा हुआ व्यक्ति चोरी करने का प्रयत्न नहीं करता।
अथ गायत्री पजञ्रम्।
भूर्भूवः सुवरित्येतै निगमत्व प्रकाशिकाम्।
महर्जनरस्तण सत्य लोकोपरि संस्थिताम्॥ 1॥
भूः भुवः स्वः द्वारा निगम का प्रकाश करती है, महः, जनः, तपः, सत्यः इन लोकों से ऊपर स्थित है।
कृतगान विनोदादि कथालापन तत्पराम्।
तदित्य वां तनो गम्य तेजो रुपधराँ परम्। 2।
गान आदि से विनोद और कथा आदि में तत्पर वह वाणी और मन से अगम्य से अगम्य होने पर भी जो तेजो रूप धारण किये हुये है।
जगतः प्रसवित्रीं ताँ सवितुः सृष्टिकारणीम्।
वरेण्यं मित्यन्नमयीं पुरुषार्थफलप्रदाम्॥ 3॥
जगत का प्रसव करने वाली को सविता कहा है, वह सृष्टिकर्ता है। वरेण्यं का अर्थ अन्नमयी है वह पुरुषार्थ का फल है।
अविद्याँ वर्ण वर्ज्या च तेजोवर्द्गभ संज्ञिकाम्।
देवस्य सच्चिदानन्द परब्रह्म रसात्मिकाम्॥ 4॥
वह अविद्या है, वर्ण रहित है, तेजयुक्त है, गर्भ संज्ञा वाली है तथा सच्चिदानन्द परब्रह्म देव की रसमयी है।
घीमह्यहं स वैतद्वद्ब्रह्माद्वैतस्वरूपिणीम्।
घियो योनस्तु सविता प्रचोदयादुपासिताम्॥ 5॥
हम ध्यान करते है कि वह अद्वैत ब्रह्म स्वरूपिणी है, सविता हमारी बुद्धि को उपासना के लिए प्रेरणा देता है।
तादृगस्या विराट रूप किरीटवरराजिताम्।
व्योम केशालकाकाश रहस्यं प्रवदाम्यहम्॥ 6॥
इस प्रकार वह विराट रूप वाली है, वह सुन्दर किरीट धारणा करती है। व्योम केश हैं, आकाश अलकें हैं, इस प्रकार इसका रहस्य कहा जाता है।
मेघ भ्रुकुटिकाक्रान्त विधिविष्णुशिवार्चिताम्।
गुरुभार्गवकर्णाताँ सोमसूर्याग्निलोचनाम्॥ 7॥
भौहों से आक्रान्त मेघ है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव से जो अर्चित है, गुरु, शुक्र कान हैं, सोम, सूर्य, अग्नि जिसके नेत्र हैं।
इडापिंगलसूक्ष्माभ्याँ वायुनासा पुटान्विताम्।
संध्याद्विरोष्ठपुटिताँ लसद्वाग्भूप जिह्विकाम्॥ 8॥
इडा, पिंगला दोनों नासापुष्ट हैं। दोनों सन्ध्या दोनों ओष्ठ हैं, उपजिह्वा ही वाणी है।
सन्ध्यासौ द्य मणो कष्ठ लसद्वाहुसमन्विताम्।
पर्ज्जन्य हृदयासक्त वसुसुस्तनभण्डलाम्॥ 9॥
यह सन्ध्या द्यु है, मणि से कष्ठ शोभित है। बाहु शोभायुक्त हैं तथा पर्जन्य हृदय है और स्तन मण्डल वसु है।
आकाशोदर वित्रस्तः नाभ्यान्तरदेशकाम्
प्राजापत्याख्य जघनाँ कटींद्राणितिसंज्ञिकाम्।॥ 10॥
आकाश उदर है, अन्तर देश नाभि है। जघन प्रजापति है, कटि इन्द्राणि है।
उरु मलय मेरुभ्याँ शोभमानाऽसुरद्विषाम्।
जानुनी जन्हु कुशिक वैश्वदेवसदाभुजाम्॥ 11॥
उरु मलय मेरु है, जहाँ असुर द्वेषी देव निवास करते हैं। जानु में जन्हु कुशिक है, भुजाएँ वैश्व देव हैं।
अयनद्वय जंघाद्यं खुराद्य पितृसंज्ञिकाम्।
पदाँघ्रि नख रोमाद्य भूतलद्रु मलाँछिताम्॥ 12॥
जंघाओं के दोनों आदि स्थान अयन हैं। खुर आदि पितृ हैं। पद, अंघ्रि, नख, रोम आदि पृथ्वी तल के पेड़ आदि कहे हैं।
गृहराश्यदेवर्षि मूर्ति च पर संज्ञिकाम्।
तिथिमासस्तुवर्षाख्य सुकेतुनिमिपात्मिकाम्॥
माया कल्पित वैचित्र्य सन्ध्याच्छादन संवृताम्॥ 13॥
ग्रह, राशि, ऋक्ष, देव, ऋषि, पर संज्ञक शशि की मूर्तियाँ हैं, तिथि, मास, ऋतु, वर्ष तथा सुकेतु आदि निमेष हैं।
ज्वलत्कालानलप्रभाँ तडित्कोटिसमप्रभाम्।
कोटिसूर्यप्रतीकाशाँ चन्द्रकोटिसुशीतलम्॥ 14॥
कालाग्नि की तरह ज्वलन है, करोड़ों बिजलियों के समान प्रभा युक्त है, करोड़ों सूर्यों की तरह प्रकाशवान है और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल है।
सुधामण्डलमध्यस्थाँ सान्द्रानन्दाऽमृतात्मिकाम्।
प्रागतीताँ मनोरम्याँ वरदाँ वेद मातरम्॥ 15॥
सुधा मण्डल के मध्य में आनन्द और अमृत युक्त है, प्राक है, अतीत है, मनोरम है, वरदा है और वेदमाता है।
ततस्तैरंगषंकस्यात्तैरेव व्यापकत्रयम्।
पूर्वोक्त देवताँ ध्यायेत्साकारगुणसंयुताम्॥ 16॥
इसके छः अंग हैं, यह तीनों भुवनों में व्यापक है। इन पूर्वोक्त गुणों से संयुक्त देवता का ध्यान करना चाहिये।
पंचवक्राँ दसभुजाँ त्रिपंचनयनैर्युताम्।
मुक्ताविद्रु मसौवर्णा सितशुभ्रसमाननाम्॥ 17॥
पाँच मुँह हैं, दस भुजा हैं, पन्द्रह नेत्र हैं और मुक्त, विद्रम के तुल्य सुवर्ण, सफेद तथा शूम्र आनन है।
आदित्य पथ गामिन्याँ स्मरेद्ब्रह्मस्वरूपिणीम्।
विचित्रमन्त्र जननीं स्मरेद्विद्याँ सरस्वतीम्॥ 18॥
वह सूर्य मार्ग से गमन करती है, उस ब्रह्म स्वरूपिणी का स्मरण करना चाहिये, उस मन्त्रों की जननी विद्या सरस्वती का स्मरण करना चाहिए।
उपरोक्त श्लोकों में गायत्री का विराट स्वरूप दिखाया गया है। इस भावना को हृदयंगम करने से सर्वत्र उस दिव्य शक्ति के दर्शन होते हैं। अणु—अणु में माता को समाया हुआ देखने वाला व्यक्ति सदा निर्भय रहता है, गुप्त रूप से भी बुरे विचार या कार्य नहीं करता एवं समस्त जड़ चेतन विश्व के त्याग एवं उदारता का सद्व्यवहार करता है। यह विराट दर्शन की मान्यता, भावना, विचार पद्धति एवं कार्य-प्रणाली साधक की अन्तरात्मा को सच्चे आनन्द से ओत-प्रोत कर सकती है।

