मेरे मन के अधिकारी (Kavita)
जिसे देख कर सहसा वाणी है मुखरित हो जाती।
वो मेरे दुखमय जीवन की है सबसे प्रिय थाती॥
प्राणों में श्रद्धा नयनों में करुणा-कण लहराते।
करके जिसकी याद पन्थ के शूल सुमन बन जाते॥
गाता है मन-मोर देख जिसको तुम वह बादल हो।
सागर सम अविकार व्योम के सदृश सरल निरथलहो।
स्वाति-बिन्दु तुम, जिसे बुलाता मेरा चातक प्यासा।
मूर्ति मान तुममें मानस की युग-युग की अभिलाषा॥
कितने दिन हैं अभी दूर रहने को मेरे स्वामी।
कितने दिन यह मन खोजेगा तुमको अन्तर्यामी॥
कितने दिन तक अभी न लय होने दोगे अपने में।
कितने दिन तक छिपे रहोगे कलित काव्य सपने में॥
मेरे बिना अपूर्ण रहेगी सत्ता देव, तुम्हारी।
इस मन पर अधिकार करो हे, हे मेरे अधिकारी!!

