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Magazine - Year 1953 - Version 2

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चैत्र मास की नवरात्रि आ रही है।

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नवरात्रि का महत्व अखण्ड-ज्योति के पाठकों से छिपा नहीं है। पिछली नवरात्रियों से इस महापर्व के सम्बन्ध में प्रकाश डाला जाता रहा है। गर्भाधान के लिए ऋतु काल का जो महत्व है, बीज बोने के लिए खेत की उचित स्थिति (ओठ आना) का जो महत्व है, मिठाई बनाने के लिये चासनी पककर तार उठने के समय का जो महत्व है, साधना के लिए संध्या काल का जो महत्व है, वैसा ही महत्वपूर्ण अवसर अध्यात्मिक कार्यों के लिए नवरात्रि का होता है। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं के सम्मिलन की संध्या नवरात्रि है। इसी समय वैद्य लोग पुराने रोगियों को जुलाब देकर उनकी स्थायी कोष्ठ शुद्धि एवं निरोगता का उपचार करते हैं, यही समय आत्मिक दुर्बलताओं को हटाकर अन्तःकरण श्द्धि एवं आत्मबल बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम सिद्ध होता है। साधना कार्य के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई शुभ मुहूर्त नहीं हो सकता।

अश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में गायत्री की विशेष उपासना करते रहने के लिए हम अपने पाठकों को सदा ही प्रेरणा देते रहते हैं। कारण यह है कि हम अपने तथा साधकों के प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जितना लाभ अन्य समयों में लम्बी अवधि तक साधना करने का भी नहीं हो पाता वह इन 6 दिनों की साधना से होता देखा जाता है। ऐसे अगणित अनुभवों का हमें भली प्रकार ज्ञान है और उसी आधार पर हम विशेष उत्साह एवं साहस के साथ नवरात्रि में गायत्री उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।

लघु अनुष्ठान-

आगामी मास चैत्र की नवरात्रि ता. 16 मार्च सोमवार से आरम्भ होकर ता. 24 मंगलवार तक रहेगी। इन नौ दिनों में जिनसे बन पड़े उन्हें 24 हजार जप का लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रतिदिन 25 मालाओं का नित्य जप करने से प्रतिदिन लगभग 24 घंटे लगते हैं इतना निकाल लेना कुछ बहुत मुश्किल बात नहीं है। प्रातःकाल दो घण्टे रात्रि रहे, शौच स्नान से निवृत्त होकर साधना पर बैठा जाय तो प्रातःकाल के समय में ही नियत जप पूरा हो सकता है। जो लोग देर में उठते हैं या जिन्हें जल्दी ही किसी काम पर लगना होता है, वे आधे से कुछ अधिक जप प्रातःकाल और शेष सायंकाल में पूरा कर सकते हैं।

नियमित अनुष्ठान के लिए जप के समय तक घी का दीपक या धूपबत्ती जलाए रहना चाहिए। पास में जल पात्र भी रहे। क्योंकि अनुष्ठान काल में अग्नि देवता और वरुण देवता (जल) को साक्षी रखना आवश्यक माना गया है। ब्रह्म संध्या के पाँचों अंग (आचमन, शिखाबंध, प्राणायाम, अघमर्षण और न्यास) गायत्री महाविज्ञान तथा सर्व सुलभ साधना पुस्तक में बताये जा चुके हैं। स्नान करके, आसन पर बैठ कर जल और अग्नि को समीप रखें। फिर ब्रह्म संध्या करें। तत्पश्चात् गायत्री और गुरु का पूजन करके जप आरम्भ कर दें। जो लोग निराकार उपासना करने वाले हैं वे अग्नि को गायत्री के तेज का प्रतीक मानकर उस पर घृत एवं सुवासित सामग्री चढ़ाकर पूजन कर लें। जो लोग साकार उपासना में विश्वास रखते हैं वे गायत्री का चित्र सामने रख उसका धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन कर सकते हैं। इसी प्रकार अपनी अपनी भावना और मान्यता के अनुसार गुरु पूजन के लिए परमात्मा या किसी महापुरुष को मानसिक प्रणाम किया जा सकता है अथवा नारियल या चित्र का प्रतीक मानकर गुरु पूजन किया जा सकता है। जप पूरा होने पर विसर्जन कर देना चाहिए। जिस प्रकार जप के आरम्भ में पूजन करते समय मंत्र द्वारा या भावना द्वारा गायत्री महाशक्ति का आह्वान किया जाता है वैसे ही जप समाप्त होने पर मंत्र द्वारा-यदि मंत्र याद न हो तो भावना द्वारा-विसर्जन कर देना चाहिए। दीपक का घी समाप्त होने पर अपने आप बुझ जाने के लिए छोड़ देना चाहिए और जल को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए।

अनुष्ठान के दिनों में शरीर से भी कुछ तपश्चर्याएँ करना तथा व्रत नियमों का पालन करना उचित है। इन दिनों के लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक नियम है। जानबूझ कर कदापि कामसेवन नहीं करना चाहिए। स्वप्नदोष हो जाए तो दस मालाएँ प्रायश्चित्त स्वरूप अधिक जपनी चाहिए और एक आहार का अन्नदान करना चाहिए।

कामेन्द्रिय के भाँति जिह्वा इन्द्रिय का भी तप करना चाहिए। नौ दिन तक पूर्ण निराहार केवल जल के आहार पर रहना तो हर एक का काम नहीं है। जिन्हें जल पर रहना हो वे इस के लिए हमारी स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लें। जिनका शरीर इस योग्य नहीं है वे पूर्ण निराहार उपवास करने पर खतरे में पड़ सकते हैं। इसलिए सर्व साधारण को फल, दूध, छाछ आदि ‘फलाहारी’ कहे जाने वाले पदार्थों की सहायता से उपवास करना चाहिए। जो ऐसा उपवास न कर सकें वे नमक और शक्कर दोनों या दोनों में से एक स्वाद छोड़कर एक बार अन्नाहार लेते हुए अपना उपवास कर सकते हैं। दुर्बल लोग एक समय स्वाद रहित अन्नाहार दूसरे समय दूध या फलाहार लेकर उपवास का कोई न कोई आधार रख सकते हैं।

ब्रह्मचर्य तथा उपवास के अतिरिक्त तपश्चर्या के कुछ अन्य नियम भी हैं। यह नियम ब्रह्मचर्य तथा उपवास की तरह अनिवार्य तो नहीं हैं पर जिससे जितना बन पड़े यथा सम्भव इन नियमों का पालन करने का भी प्रयत्न करना चाहिए। (1) अपनी शारीरिक सेवाएँ स्वयं करना अर्थात् अपने भोजन, जल, हजामत, वस्त्र धोना आदि के लिए किसी दूसरे की सेवा स्वीकार न करके अपने हाथ ही यह सब काम करना। पशुओं पर सवारी न करना। (2) चारपाई या पलँग की अपेक्षा भूमि या तख्त पर सोना। (3) चमड़े का उपयोग न करके, रबड़ कपड़ा आदि से बने हुए जूते प्रभृति उपकरणों को प्रयोग करना। (4) मन, वचन और काया के दुष्कृतों का त्याग। (5) मौन धारण के लिए थोड़ा बहुत समय निकालना।

अनुष्ठान के अन्तिम दिन पूर्णाहुति के लिए थोड़ा बहुत यज्ञ तथा दान करना आवश्यक है। 24 हजार का दशाँश न सही शताँश हवन किया जाय तो 240 आहुतियों का हवन होता है। कई व्यक्ति हवन में साथ बैठकर आहुतियों को बाँट भी सकते हैं। हवन के उपरान्त सत्पात्रों को ब्राह्मण भोजन या यज्ञ दक्षिणा देने का नियम है। यह भी यथासंभव करना चाहिए। जिन्हें आर्थिक कारणों से हवन की सुविधा न हो वे केवल घृत से 24 आहुतियाँ दे लें। जो ब्रह्म-भोज नहीं करा सकते वे गौ को 24 छटाँक आटा और 24 तोले गुड़ के गोले बनाकर खिला दें। ब्राह्मण भोजन एवं दान का एक अच्छा तरीका यह भी है कि सामर्थ्यानुसार पैसे की गायत्री सम्बन्धी छोटी छोटी पुस्तकें मँगाकर सत्पात्रों को वितरण कर दी जायं। अन्नदान से ज्ञानदान का पुण्य अधिक है। 24 हजार जप पूरा होने पर हवन आदि की पूर्णाहुति तारीख 24 मार्च को नव में दिन करनी चाहिए जब तक पूर्णाहुति न हो जाय तब तक ब्रह्मचर्य, उपवास तथा तपश्चर्या के अन्य नियम पालन करते रहना चाहिए।

अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति यदि अपने निश्चय की पूर्व सूचना अखण्ड-ज्योति के पते पर हमें भेज देंगे तो उनकी साधना को संरक्षण तथा अनुष्ठान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ पर किया जाता रहेगा। तप में बहुधा आसुरी शक्तियाँ बहुत विघ्न फैलाती हैं, इसीलिए उसके संरक्षण के लिए ब्रह्मा तथा दृढ़ पुरुष आदि की नियुक्ति की जाती है।

जो व्यक्ति स्वयं साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इसी प्रकार जो लोग स्वयं हवन आदि नहीं कर सकते, उनके बदले का हवन दूसरे कर सकते हैं। जिन्हें इस प्रकार की असुविधा हो वे गायत्री संस्था द्वारा सहायता ले सकते हैं।

सदा की भाँति इन चैत्र की नवरात्रियों में भी हमारा केवल जल लेकर पूर्ण निराहार व्रत रहेगा। इसलिए साधकों से प्रार्थना है कि उन दिनों हम से न तो अनावश्यक पत्र व्यवहार करें और न मथुरा पधार कर हमारी शाँति भंग करें।

गायत्री चालीसा का अनुष्ठान

जो लोग अधिक कार्य व्यस्त हैं, जो अस्वस्थता या अन्य कारणों से नियमित साधन नहीं कर सकते वे गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान कर सकते हैं। 9 दिन नित्य 12 पाठ करने से करने से नवरात्रि में 108 पाठ पूरे हो सकते हैं प्रायः डेढ़ घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के नियम, प्रतिबन्ध, संयम, तप आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके बैठना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए। अन्तिम दिन 108 या 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देना चाहिए। स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा के अनुष्ठान को बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यों तो गायत्री उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं। अभाव, कष्ट, विपत्ति, चिंता, शोक एवं निराशा की घड़ियों गायत्री का आश्रय लेने से तुरन्त शाँति मिलती है, माता की कृपा प्राप्त होने से पर्वत के समान दीखने वाले संकट राई के समान हलके हो जाते हैं और अन्धकार में भी आशा की किरणें प्रकाशमान होती हैं। गायत्री को शक्तिमान, सर्वसिद्धि दायिनी सर्व कष्ट निवारिणी कहा गया है। इससे सरल, सुगम, हानि रहित, स्वल्परमसाध्य एवं शीघ्र फलदायिनी साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।

गायत्री तपोभूमि का निर्माण

प्रसन्नता की बात है कि गायत्री मन्दिर का निर्माण बड़ी तेजी से हो रहा है। मथुरा शहर से वृन्दावन-जाने वाली सड़क पर ठीक एक मील दूर यह तपोभूमि बन रही है। बीच में गायत्री मन्दिर तथा दोनों बंगलों में दो छोटे कमरे (1) हस्तलिखित मंत्रों की स्थापना के लिए (2) 24 हजार तीर्थों की रज तथा जल की स्थापना के लिए रखे गये हैं। सत्संग भवन, दस साधकों के रहने लायक कुटियाँ, पक्का कुँआ, सुन्दर गेट तथा बगीचे में फुलवारी लगाने का आयोजन हो रहा है, आशा है कि हमारा 24 दिन का केवल गंगाजल पर उपवास आरम्भ होने की तिथि वैशाख सुदी 15 तक मन्दिर का सभी आवश्यक भाग बनकर तैयार हो जायगा। माता की प्रतिमा, जयपुर के सर्वश्रेष्ठ कारीगर द्वारा बन रही है। यह तपोभूमि भारतवर्ष में अपने ढंग की अनोखी होगी। इमारत की दृष्टि से नहीं, सूक्ष्म विशेषताओं की दृष्टि से इसका महत्व असाधारण होगा।

पूर्णाहुति की तैयारियाँ

पूर्णाहुति यज्ञ में केवल 124 ऋत्विजों को सम्मिलित करने का विचार था पर अत्यधिक संख्या में प्रार्थना पत्र आ जाने के कारण अब तक 175 व्यक्तियों को स्वीकृति दी जा चुकी है। सम्भवतः यह संख्या 240 तक पहुँच जायगी। आने वाले दर्शकों पर विशेष प्रति बन्ध तो नहीं है फिर भी उन्हें आने की सूचना अवश्य दे देनी चाहिए। देश के प्रत्येक भाग में से तीर्थों, पवित्र नदियों, सरोवरों तथा सिद्ध पीठों का जल तथा रज संग्रहीत किया जा रहा है।

सहस्रांशु ब्रह्म-यज्ञ, गायत्री मंत्र लेखन यज्ञ तथा 24 महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के साथ-साथ गायत्री मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा यह आयोजन इस युग का एक महान पुण्य पर्व है। इसे तामसिक अपव्ययों, राजसिक प्रदर्शनों से बचाकर ब्रह्म वर्चस्व और ऋषिकल्प सात्विकता प्रधान ही रखा जा रहा है। इस यज्ञ में केवल कुछ तपे हुए और परखे हुए लोगों को ही सम्मिलित किया जा रहा है ताकि यज्ञ की सूक्ष्म शक्ति में अभिवृद्धि हो। ता. 20, 21, 22, जून सन् 53 को यह यज्ञ आयोजन होगा। जिन्हें स्वीकृति मिल चुकी है उन्हें ता. 19 की शाम को ही मथुरा पहुँच जाना चाहिए।

मंत्र लेखन यज्ञ

मंत्र लेखन यज्ञ उत्साह पूर्वक चालू है। कई व्यक्तियों ने आश्चर्यजनक संख्या में मंत्र लिखे हैं। आशा की जाती है कि कुछ ही दिनों में वह संख्या 24 करोड़ तक पहुँच जायगी। अच्छा यह हो कि अधिकाधिक लोगों को इस यज्ञ में सम्मिलित किया जाय। मंत्रों की संख्या बढ़ने की अपेक्षा लिखने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होना अधिक महत्वपूर्ण है। जिन सज्जनों को इस मार्ग में रुचि है उन्हें चाहिए कि अपने निकटवर्ती लोगों में गायत्री मंत्र लेखन का अधिकाधिक प्रचार करें, भले ही कोई थोड़ी-थोड़ी संख्या में ही लिख सकें पर धार्मिक प्रकृति के अपने निकटवर्ती लोगों को अधिक संख्या में इस यज्ञ में सम्मिलित करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। कम से कम 240 तक की संख्या में भी मंत्र लिखाये जा सकते हैं। मंत्र लेखन यज्ञ में भागीदार बनने वाले सज्जनों की संख्या बढ़ाने का प्रयत्न करना गायत्री प्रेमियों का आवश्यक कर्त्तव्य हैं।

गायत्री उपासना के अनुभव भेजिए

सदा की भाँति अखण्ड-ज्योति का जुलाई 53 का अंक गायत्री अंक होगा। उसमें गायत्री उपासकों के अनुभव तथा चित्र रहेंगे। यदि गायत्री उपासना से आपको कोई आध्यात्मिक या साँसारिक ऐसा विशेष लाभ हुआ हो जिससे दूसरे लोग भी उसे पुण्य मार्ग पर आकर्षित हों तो उन अनुभवों को विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपने आधे शरीर के फोटो समेत छपने को भेज दें। इसी प्रकार किन्हीं अन्य जीवित या स्वर्गीय गायत्री उपासकों के उत्साहवर्धक अनुभव आपको मालूम हों तो उनके वर्णन तथा फोटो भी प्रकाशनार्थ भेजने की कृपा करें।

तीर्थों का जल तथा रज भेजिए

गायत्री तपोभूमि में भारतवर्ष के सभी तीर्थों का जल तथा रज रखने की व्यवस्था की गई है। समस्त गायत्री प्रेमियों से प्रार्थना है कि अपने निकटवर्ती तीर्थों की दो-दो छटाँक रज (मिट्टी) किसी उत्तम स्थान की भेजने की कृपा करें। जल ठीक से भेजना असुविधाजनक हो तो उस रज को जल में भिगोकर सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार दोनों का संमिश्रण होने से भी काम चल जायगा। जिन तीर्थों का जल तथा रज भेजी जाय उनका पूरा विवरण अवश्य लिखना चाहिए।

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