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Magazine - Year 1953 - Version 2

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Language: HINDI
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ब्रह्मचर्य आवश्यक है।

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पहले, जब आजकल की भाँति दूषित वातावरण नहीं था, ब्रह्मचर्य की रक्षा सुलभ थी और स्वतः ही हो जाया करती थी। उस समय का रहन-सहन, वेश-भूषा, आचार-विचार, शिक्षा-प्रणाली और सभ्यता आदि लोगों को ब्रह्मचर्य-व्रत के धारण करने में सहायता पहुँचाते थे। आजकल की परिस्थिति ठीक इसके विपरीत है। पहले बाल जीवन पवित्र और सरल था। लोगों का आहार-विहार नियमित था। वे सत्य के उपासक होते थे अतः ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिति रहने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। ब्रह्मचर्य व्रत को स्थायी बनाने के लिए आश्रम-धर्म भी उसका एक प्रधान अंग था। प्राचीन काल के पुरुष गृहस्थाश्रम में केवल इन्द्रिय-सुख के लिए नहीं प्रवेश करते थे। विद्यार्थी-जीवन समाप्त करके विद्यालय से निकलने के पश्चात जिनका उद्देश्य प्रवृत्ति-मार्ग में आकर सृष्टि उत्पन्न करना चाहता था, केवल वे ही गृहस्थ-धर्म स्वीकार करते थे। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर भी उनका जीवन विलासी नहीं होता था, प्रत्युत किसी मुख्य उद्देश्य की पूर्ति के हेतु इस आश्रम में भी वे अपना रहन-सहन शुद्ध एवं संयमित रखते थे। अपने ही सदृश एक नूतन आकृति को उत्पन्न करने के निमित्त से वे रति-रहस्य में सम्मिलित होते थे, अन्यथा नहीं। जीवन में केवल कुछ ही ऐसे अवसर होते थे, जब उन्हें अपनी शक्ति को बहिर्मुख करने की आवश्यकता पड़ती थी। संतान हो जाने के बाद उसे युवावस्था प्राप्त कर लेने के पूर्व ही, वे गृहस्थाश्रम छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। आजकल की तरह उस समय ऐसी भद्दी प्रथा कहीं देखने को भी नहीं थी कि एक ही परिवार के पिता और पुत्र दोनों चिरकाल तक संतानोत्पत्ति के कार्य में प्रवृत्त रहें।

आजकल जीविका का प्रश्न संसारव्यापी विकट समस्या हो रही है। स्वतंत्र कृत्रिम उपायों द्वारा इसके हल करने का कुछ आयोजन किया है। जिस समय भारतवर्ष की जन-संख्या कम थी और भूमि उर्वरा एवं रत्न गर्भा होने के कारण भोजन, वस्त्र तथा जीवन की अन्य आवश्यक सामग्री का अभाव नहीं था, उस समय विवाह के शुभ अवसर पर वर-वधू को यह आशीर्वाद दिया जाता था कि वह दम्पत्ति अनेक संतानों से सम्पन्न हो। देश तथा समाज की उस समय की स्थिति एवं आवश्यकता के अनुसार ऋषियों और शुभचिन्तकों का यह आशीर्वाद उनके लिए शुभ वचन था। लेकिन वर्तमान परिवर्तित स्थिति में वैसी शुभकामना दुःख का मुख्य कारण बन सकती है।

संसार के इस अशान्त वातावरण में, देश में भीषण गरीबी एवं आवश्यकता से अधिक जन संख्या हो जाने से यहाँ के युवक-युवतियों का युग के अनुसार यह मुख्य धर्म हो गया है कि वे जहाँ तक हो सके पूर्णरूप से पवित्र रहकर अपने को विवाह-बन्धन से मुक्त रखने का प्रयत्न करें। विवाह-बन्धन से अपने को अलग रखना तथा आचरण को पूर्ण संयमशील बनाना चरित्र की पवित्रता की पराकाष्ठा है। मन और शरीर दोनों से ब्रह्मचर्य का व्रत पालन करना निःसंदेह बहुत ही कठिन है, लेकिन मन और शरीर के होम किए बिना उसकी पूर्णता कदापि सम्भव नहीं है। इस सम्बन्ध में हमें इस बात को हृदयंगम करना चाहिए है कि मनुष्य और ऊपर उठना चाहता है तो यह आवश्यक है कि उसके मन के अन्दर स्त्री और पुरुष भाव की कोई पृथक सत्ता न रह जाय। स्त्री और पुरुष की पृथक सत्ता सृष्टि का कारण होती है, किन्तु जिस समय प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है उस समय उसकी सृजन-क्रिया का कार्य समाप्त हो जाता है। स्त्रियाँ प्रकृति रूपिणी हैं। अतः मनुष्यों के लिए यह कहा जाता है कि वे प्रकृति को देखते हुए उससे शनैः शनैः अलग हो जाने की कोशिश करें। इस सिद्धान्त को ही सामने रखकर प्राचीन काल में स्त्री-पुरुषों के लिए आश्रम-धर्म का आयोजन किया गया था। लेकिन आज भी यह जन कल्याण के लिए लाभदायक एवं उपयोगी है। अतः आधुनिक काल स्त्री-पुरुषों को इस सिद्धान्त का मनन करके उससे लाभ उठाना चाहिए। इससे एक दूसरा लाभ यह होगा कि ऐसे स्त्री-पुरुष संसार की आर्थिक समस्या के प्रश्न को हल करने में सहायक होंगे।

इस कठिन विधान को समझने तथा उस पर अमल करने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें हृदय और मन दोनों का पूर्ण सहयोग हो। दोनों के मेल से कार्य आसान हो सकेगा। अन्यथा मनुष्य अपनी वास्तविक आवश्यकता को न समझकर या तो उसे बलात्कार से दमन करने की कोशिश करेगा या अनर्गल भोगवासनाओं में डूब जायगा। दोनों ही दशाएँ असंगत हैं। चरित्र कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जिसे बलात् किसी नियम अथवा नियन्त्रण में बाँधकर सुधारा जा सके। किसी भावना का दमन करके जब कोई बात चरित्र में लाने की चेष्टा की जाती है तो उसका परिणाम प्रायः दुःख और क्लेश ही होता है।

ब्रह्मचर्य-व्रत के पालक के लिए भोजन की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जैसा भोजन किया जाता है, वैसा ही शरीर और मन बनता है। अतः ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए, जो अन्दर के तन्तुओं को उत्तेजित करे। अधिक सब्जी, मोटे आटे की रोटी, कुछ चावल, ताजे फल, आधी छटाँक तक घी और आध सेर तक दूध ब्रह्मचर्य-पालकों के लिए उत्तम भोजन है। कुछ भूखा रखते हुए भोजन समाप्त करना चाहिए, रात्रि में रोटी सब्जी का सादा भोजन ही सूर्यास्त तक कर लेना लाभदायक है। ब्रह्मचारियों के लिए रात्रि में दूध-सेवन भी अहितकर है। बासी भोजन और माँस का सेवन कभी न किया जाय। गरम मसाला, मिर्च, गुड़, चीनी, नमक और तेल ब्रह्मचर्य-पालन के लिये हानिकर हैं। अतः इन्हें त्याग समझना चाहिए। नमक का उपयोग छोड़ देना मुश्किल जरूर हैं, किन्तु छोड़ दिया जाय तो विशेष हितकर है।

जैसा कि इस लेख में ऊपर लिखा जा चुका है, स्त्री सत्ता का पुरुष के अन्दर विलीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य-व्रत की चरम सीमा है। लेकिन यह उच्च आदर्श इतना कठिन है कि इसके साधने में कोई विरला ही सफल हो सकता है। इससे नीचे उतरकर साधक को यदि इतनी सफलता भी मिल जाय कि स्त्री की आकृति उसके मन में बस कर उसे उद्विग्न न कर सके, तो यह भी थोड़ी सफलता नहीं है, स्त्रियों के प्रति राग छोड़ देने से ही यह सम्भव है, अन्यथा नहीं। स्त्री का ख्याल रखते हुए उसके प्रति आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है।

यह प्रश्न हो सकता है कि जब यह व्रत इतना कठिन है तो मनुष्य इसका पालन कैसे कर सकता है जितना कठिन यह प्रश्न है, उतना ही कठिन, यदि कुछ दिया जा सके, तो उसका उत्तर भी होगा।

स्त्री की बात तो जाने दीजिए, लोग छोटी-छोटी चीजों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, फिर विवाह तो वयस्क स्त्री-पुरुषों के लिए जीवन का बहुत बड़ा प्रलोभन जान पड़ता है। किसी अच्छे मकान, सुन्दर वस्त्र, उत्तम भोजन सामग्री आदि को देखकर लोग इस कदर उनके प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, मानो उनका व्यक्ति तत्व कोई चीज ही नहीं है संसार की छोटी-से छोटी चीज उनके मन को अपने साथ उड़ा ले जाती है। पाने की कोई आशा न होते हुए भी लोग इस कदर उसके पीछे पड़ते हैं कि उनके पास अपनी कोई चीज ही नहीं हैं। किसी चीज के चाहने पर उसके न मिलने पर मन की यही दशा होती है। इन सब बातों के मूल में हमें एक ही कारण प्रतीत होता है कि हम लोग अन्दर से बहुत दीन हैं। इसलिए मन चारों ओर दौड़ता है। लोगों की यह दयनीय दशा ही उनकी विपत्ति का मुख्य कारण हैं। संसार की किसी वस्तु के चाहने पर हमें मन को उसके प्रति अर्पित कर देना पड़ता है, फिर भी उसकी प्राप्ति सदा साध्य नहीं है। यदि इच्छित वस्तु प्राप्त भी करली गयी तो उसके उपभोग के लिये दूसरों पर निर्भर करना ही सबसे बड़ी गरीबी है। बाह्य सभी सुखों के लिए हमें उनके साथ रहना और चलना पड़ता है, जिसका अन्तिम परिणाम सदा दुःख है।

ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना उन्हीं के लिए शक्य है जिनका मन बाहर के प्रलोभनों में न पड़कर अन्तर्मुख हो जाय। आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाने पर फिर संसार उस व्यक्ति को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पाता। इसमें जो भी मनुष्य सफलता प्राप्त कर सके, उसी का जीवन धन्य है। ब्रह्मचर्य का जीवन सर्वोत्तम है। आधुनिक काल में संसार की दुर्दशा को देखते हुए जो व्यक्ति इस व्रत का पालन करने में समर्थ होता है, वह केवल अपना ही कल्याण नहीं करता, बल्कि उससे सारे संसार का हित होता है। वह अपने आचरण और शुद्ध व्यवहार तथा आदर्श जीवन द्वारा समाज में नवीन शक्ति का संचार करेगा। उसका पवित्र जीवन दूसरों के लिए आदर्शमय जीवन का एक ज्वलन्त उदाहरण होगा। ब्रह्मचर्य का जीवन दीर्घसूत्री न होगा। शुद्ध मन और स्वस्थ शरीर वाला छोटा बालक जैसे प्रसन्न रहता है वैसे ही ब्रह्मचारी भी आत्मानन्द में निरत रहेगा। बालक के मान में जैसे किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मचारी का मन भी वृति शून्य होगा। समत्व की भावना होने से ब्रह्मचारी सदा जगत के कल्याण सम्पादन में लगा रहेगा। लेकिन न वह किसी के प्रति अनुराग दिखलायेगा और न किसी की ओर आकृष्ट होगा। इस प्रकार ब्रह्मचारी का जीवन परम पवित्र और शुद्ध जीवन है।

इससे सम्बन्ध रखने वाला दूसरा प्रश्न यह हो सकता हैं कि जो लोग इतनी कठिन तपश्चर्या नहीं कर सकते, उन्हें क्या करना चाहिये। इसका स्वाभाविक उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थाश्रम-धर्म स्वीकार करके मर्यादोचित जीवन व्यतीत करें। यह भी कोई आसान काम नहीं है। गृहस्थाश्रम-जीवन स्वीकार करने का अर्थ है अपने ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी को लेना। केवल उसी को विवाह-बन्धन में फंसने का हक है जो सब प्रकार से इसका पात्र हो अर्थात् जिसका मन बलवान् और शुद्ध है, शरीर द्वारा जो स्वस्थ है, जिसे कोई संक्रामक रोग नहीं है। जिसका परिवार भी ऐसे रोगों से मुक्त रहा हो, जिसके सम्मुख कठिन आर्थिक प्रश्न न हो, जिसका हृदय कोमल और दयालु हो और जो देखने में कुरूप न हो। इन बातों के अतिरिक्त उसके अन्दर समत्व की भावना भी हो, ताकि वह जीवन के सुख दुःख को सहन कर सके। जिनके अन्दर ये सब गुण विद्यमान हैं, केवल वे ही विवाह के लिए उचित पात्र हैं, ऐसे दम्पत्ति जो सृष्टि का रचनात्मक कार्य करेंगे, उससे संसार में शान्ति स्थापित होगी और लोगों का जीवन सरल बनेगा। इस लेख में मुझे एक और बात की ओर ध्यान दिलाना उचित मालूम पड़ता है कि ऐसे दम्पति भी उतनी ही संतान उत्पन्न करें, जिनका वे भली प्रकार पालन-पोषण कर सकें। भारत वर्ष में परिवारों की दशा आजकल बहुत ही शोचनीय है। अधिकतर तो ऐसे ही दम्पति हैं, जिन्होंने विवाह की जिम्मेदारी को न समझकर इस भार को अपने ऊपर उठा लिया है। जिस काम के वे सब प्रकार से नाकाबिल थे, उसे अपने ऊपर लेकर उन्होंने अपना जीवन तथा समाज का जीवन बहुत ही कष्टमय बना दिया है। उनका सारा जीवन चिन्ता में और रोते-झींकते बीतता है। यह भी देखा जाता है कि जो लोग गरीब हैं, उनके यहाँ संतान अधिक होती है। गरीब के यहाँ अधिक संतान का होना दुःख-पर-दुःख का आना है। गरीबों के यहाँ बच्चों की दुर्दशा देखकर जी भर आता है। कीड़े-मकोड़ों की भाँति वे घर में इधर-उधर घूमते या पड़े रहते हैं। उनके तन पर न ठीक वस्त्र दिखायी पड़ता है और ने उनके शरीर में भोजन ही पहुँचता है, जिससे उनके शरीर की उचित उन्नति होकर उनके मन और बुद्धि विकसित हों।

प्राचीन काल में विवाह का उद्देश्य परम पावन था, शुद्ध जीवन व्यतीत करने का वह एक उचित माध्यम था। किन्तु इस समय के ठीक विपरीत विवाह करने का अभिप्राय लोगों की दृष्टि में काम लिप्सा को तृप्त करने का एक साधन मात्र है। इस बात पर विचार करने के लिए तो एक बिल्कुल ही स्वतंत्र लेख की आवश्यकता है। इस लेख में तो सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत के कुछ पहलुओं पर ही विचार किया गया है।

विवाहित स्त्री-पुरुषों के लिये या जो लोग इस बन्धन में अपने को फंसाने जा रहे हैं, उन्हें अपने कष्टों पर ध्यान देते हुए सजग होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। जिन्होंने बिना समझे अपने सिर पर इस जिम्मेदारी को ले लिया है उन्हें अपना ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहिए कि वे कम से कम संतान पैदा करें जिसकी वे उचित देखभाल कर सकें। ऐसा करने से उनके कष्ट में कमी हो सकती है नहीं तो जीवन कहीं का न रह जायगा, और कष्ट दिनों दिन बढ़ता ही जायगा। वैवाहिक जीवन विषय भोग का जीवन नहीं है। प्राचीन काल में संतान उत्पन्न करने के एक निश्चित अभिप्राय से ही वीर्य का क्षण किया जाता था, अन्यथा नहीं। उस समय के दम्पति में भोग-वासना की लिप्सा नहीं के बराबर होती थी। संतानोत्पत्ति के अवसर के अतिरिक्त स्त्री-पुरुषों का आचरण शुद्ध होता था। एक-दूसरे को कामाभाव की दृष्टि से नहीं देखते थे, बल्कि एक मित्र या आत्मीय की दृष्टि से। इन सब उच्च आदर्शों के प्रति कहाँ तक किसको सफलता मिल सकती है, बिलकुल ही व्यक्तिगत प्रश्न है, इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो लोग संसार के दुःख अथवा अपने को देखकर सजग हो जायेंगे उन्हें लाभ ही होगा। दुःख में बिना सजग हुए उससे छुटकारा नहीं मिलता। जो लोग दुःख से सजग नहीं होते, उनका कहीं ठिकाना नहीं लगता।

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