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Magazine - Year 1954 - Version 2

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यज्ञ की बेला

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आज यज्ञ की बेला, साधक करो हृदय पावन।

किरणों के द्वारा सूरज का सन्देश आया। विहँगावलि का स्वर वेदों के मन्त्रों को लाया।

फूल-फूल पर, कली-कली, पर अलि दल का गायन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन।

उदय बना वेदी नीहार-कणों ने पट छोया। मलय मंच को स्वच्छ कर रहा है खोया-खोया॥

जन-रव करता जीवन, जब जागृति का आवाहन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन॥

नयी चेतना, नयी प्रेरणा और नया प्रण है। भक्ति, भाव, निष्ठा, इनका उत्साह चिरंतन है

सत्य-साधना में तुम कर दो अर्पित तन, मन, धन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन॥

यज्ञ की अनिर्वचनीय महत्ता

यो यज्ञे यज्ञ परमैरिज्यते यज्ञसंज्ञितः।

तं यज्ञ पुरुषं विष्णुँ नमामि प्रभु मीश्वरम्॥

जो यज्ञ द्वारा पूजे जाते हैं, यज्ञ मय हैं, यज्ञ रूप हैं उन यज्ञ रूप परमेश्वर को नमस्कार है।

भारतीय धर्मशास्त्रों को यज्ञ को ईश्वर रूप माना गया है। सब वेदों में ज्येष्ठ ऋग्वेद के सर्वप्रथम मन्त्र “अग्नेमीलं पुरोहित” में अग्नि रूप परमात्मा की वन्दना एवं प्रार्थना की गई है। इससे प्रतीत होता है कि वेद के अवतरण से भी पूर्व अग्नि रूप यज्ञ भगवान की महिमा प्रकट थी।

ब्राह्मण, ग्रन्थों, संहिताओं तथा उपनिषदों में अनेक स्थलों पर यज्ञ का ईश्वर परक, देव परक एवं अत्यन्त प्रतिष्ठित एवं महत्वपूर्ण शब्दों में स्मरण किया गया है।

यज्ञों वै विष्णुः। -शत. ब्रा.1।1।1।2

यज्ञों वै विष्णुः। -तैत्तिरीय संहिता 1।7।4

पुरुषो वै यज्ञः। -शत. ब्राह्मण 1।2।4।3।2

इन वाक्यों में यज्ञ को परमात्मा का रूप माना गया है, क्योंकि परमात्मा के अधिकाँश गुण यज्ञ की अग्नि में मौजूद होते हैं।

यज्ञो व स्वरइर्देवाः।

-शत.ब्रा.1।1।1।2।2

यज्ञ एव सचिता।-गो.ब्रा.पू.1।33

स्रयः स्र यज्ञोऽसौ स आदित्यः।

-शत. ब्रा.14।1।1।6

इन्द्रो वै यज्ञः। -मै. शा. 4।6।7

एष वै प्रत्यक्ष यज्ञों यत्प्रजापतिः।

- शत. ब्रा. 4।3।4।3

प्रजापतिर्वै यज्ञः। -तैति. 1।1।10।10

प्रजापतिर्वै यज्ञः। - गौपथ. ब्रा. पू. 2।18

प्रजापतिर्ययज्ञः। - शत. ब्रा. 1।1।11

यज्ञउवै प्रजापतिः। -कौ 10।1

यज्ञः प्रजापतिः। - शत. ब्रा. 11।6।3।9

इन वाक्यों में यज्ञों में को सूर्य इन्द्र, एवं प्रजापति माना गया है । जिस प्रकार सूर्य से प्रकाश, उष्णता, आरोग्य प्राप्त होता है, इन्द्र से वर्षा एवं वनस्पति उपलब्ध है, प्रजापति प्रजा का पालन करते हैं, वैसे ही यज्ञ भी इन तीनों देवताओं के कार्य को पूरा करता है। इसलिए उसे प्रत्यक्ष सूर्य, इन्द्र एवं प्रजापति माना गया है।

प्रथम हि यज्ञः।-कपि.शा.40।20

यज्ञो वै कर्म।-शत.ब्रा. 1।1।1।1

यज्ञो वै श्रेष्ठतर कर्म। -कपि.शा. 46।6

यज्ञो वै श्रेष्ठतर कर्म। -1।7।15

इन वाक्यों में यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ कर्म, सबसे आवश्यक प्राथमिकता देने योग्य कर्म कहा है। क्योंकि संसार में जितने भी श्रेष्ठ कर्म है उन सब में यज्ञ का स्थान निश्चय ही सर्वोपरि है। जितने कार्य संसार में आवश्यक हैं, सबसे पहले करने योग्य हैं उनमें यज्ञ का पहला नम्बर है। क्योंकि अन्य कार्य मनुष्य का जितना हित साधन करते हैं, यज्ञ उन सबसे अधिक लाभदायक हैं।

यज्ञो वै परशुः। -शत.ब्रा. 3।6।4।10

यज्ञो वै आपः। -शत.ब्रा. 1।1।1।1।

यज्ञो वा अनः।-शत.ब्रा. 1।1।1।2

यज्ञो वै प्रावित्रम् -शत.ब्रा. 1।4।3।52

इन वाक्यों में यज्ञ को परशुः, आपः, अनः, प्रावित्रम् सदृश्य महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रतीक बताया गया है। इन सूक्ष्म शक्तियों का लाभ प्राप्त करके मनुष्य प्रकृति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है।

यज्ञ की महिमा साधारण नहीं है। धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य यज्ञ हवन के साथ होता है। इतना ही नहीं आगे चलकर को यहाँ तक कि अपने आपको यज्ञ बना लेने का विधान है। मनुष्य का जीवन यज्ञ के साथ आरम्भ होता है और यज्ञ के साथ ही उसकी समाप्ति होती है। गर्भाधान का आरम्भिक संस्कार जिसमें रज-वीर्य के संयोग से देह का प्रथम कलल उत्पन्न होता है, यज्ञ के साथ होता है। जब देह में से प्राण निकल जाता है तब भी देह को यज्ञ भगवान को भेंट करने के लिये अन्त्येष्टि किया जाता है।

यज्ञ में वेद मन्त्रों के साथ आहुति देने के अनेक सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं, उन परिणामों में सबसे प्रथम यह है कि मनुष्य की आत्मा शुद्ध होती है, उसके चिर संचित कुसंस्कार नष्ट होते हैं, मनोविकार घटते हैं और शुभ संकल्प एवं ब्रह्मतेज की तीव्र गति से अभिवृद्धि होती है। शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं।

य एनं परिषी दन्ति समादधति चक्षसे। सप्रेद्धो अगिनर्जिह्वाभिरुदेतु हृदयादधि॥

अथर्व॰ 6।75।1

जो इस अग्नि के चारों ओर बैठकर हवन आदि करते है और दिव्य उद्देश्य से हवि चढ़ाते हैं उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है।

प्रहोत्रे पर्वयं वचोग्नये भरता ब्रहत्। विषाँ ज्योतीं विभ्रते न विद्यते ॥

सा. म. 38

यज्ञ करने से सद्बुद्धि, तेज और भगवान की प्राप्ति होती है।

ॐवसोः पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मात् रिश्वनो धर्मासि विश्वधा असि। परमेण धाम्ना ह हस्वमाह्वामीं ते यज्ञ पतिमाह्वायति।

यजु. 1।2

हे यज्ञ तू पवित्र है एवं पवित्रता का हेतु है। तू द्यौ लोक है, तू ही पृथ्वी लोक है। तू वायु को चलाता एवं शुद्ध करता है। तू विश्व को धारण करता है। तू परमधाम से सुख को बढ़ाता है। हे यज्ञ तू यजमान को मत त्याग, यह यजमान तुझे कभी न त्यागे।

दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपाँसिच।

वेदाः सत्य प्रतिष्ठानास्तमात्स्त्य परोभवेत॥

(वाल्मीक अयो 109।14)

दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद, इनका आश्रय लेना ही सत्य है। अतः सबको सत्यनिष्ठ होना चाहिए। अर्थात् यज्ञ ही उपरोक्त सत्य कर्त्तव्यों में संलग्न होना चाहिए।

यज्ञाः कल्याणं हेतवः।

विष्णु पुराण 6।9।8

यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

यज्ञ के द्वारा जो आध्यात्मिक आनन्द मिलता है वह अलौकिक है। उसे स्वर्ग सुख कहते है। यों यज्ञ द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति भी होती है पर उसका मुख्य लाभ आत्मकल्याण है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश का आविर्भाव करना है। यह ब्रह्म तेज किसी जीवन में जितना ही बढ़ना है उतना ही उसे देवताओं को उपलब्ध हो सकने वाला स्वर्गीय सुख प्राप्त होता है। कहा भी है-

नौह वा एषा स्वर्ग्या। यदगिन होत्रम्

शतपथ 2।3।3।15

यह अग्निहोत्र निश्चय ही स्वर्ग सुख प्राप्त करने वाली विशेष नौका है।

आगिनहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग कामः।

स्वर्ग की कामना करने वाले को अग्निहोत्र करना चाहिए।

यज्ञ दान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

गीता 18।5

यज्ञ, दान, तप और कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें करना ही उचित है। यह यज्ञ दान और मनीषियों को भी पवित्र करते हैं।

यज्ञेन देवा विमला विभान्ति यज्ञेन देवा अमृत्व माप्नुयुः। यज्ञेन पापैर्बहुभिर्विमुक्तः आप्रोन्ति लोकान् परमस्य विष्णोः।

(हारीत)

यज्ञ से समस्त लोक निर्मल ओर सुन्दर बनते हैं यज्ञ से देवता अमर होते हैं। यज्ञ से अनेक पापों से छुटकारा तथा परमात्मा के लोक की प्राप्ति होती है। स्वर्ग का अर्थ चाहे इस लोक का आध्यात्मिक अलौकिक दिव्य सुख किया जाय, चाहे स्वर्ग लोक में देवताओं को प्राप्त होने वाला सुख किया जाय दोनों ही जीव के लिए शुभ हैं। यज्ञ से मनुष्य निश्चित रूप से शान्तिदायक शुभ सद्गति को प्राप्त होता है।

त्रैविद्या माँ सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गति प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोक मश्नन्ति दिव्यान दिवि देव भोगान्॥

गीता 1।20

वेद विधान के अनुसार यज्ञों द्वारा मुझ भगवान को पूज कर जो निष्पाप मनुष्य स्वर्ग चाहते हैं वे अपने पुण्य के कारण देव लोक, स्वर्गीय सुख को भोगते हैं।

देह में जो असुरतामय, पाप रूप कुसंस्कार असुर प्राण भरे रहते हैं तथा वे कुविचारों के दूषित वातावरण के रूप में संसार में भ्रमण करते रहते हैं, यज्ञ द्वारा उनका विनाश होकर देव प्राण की वृद्धि होती है। अर्थात् असुरता घटकर देवत्व पनपता है। यथा :-

ये रूपाणि प्रति मुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यागिनष्टाँ ल्लोकात् प्रणुदात्य स्मात्॥

यजु. 2।30

जो असुर प्राण इस पृथ्वी पर असुर रूप से विचरण करते रहते हैं वे यज्ञ की अग्नि द्वारा शरीर में से निकाल बाहर किये जाते हैं।

यज्ञ होम आदि द्वारा इस शरीर को ब्राह्म बनाया जाता है, उसमें ब्राह्मी गुण स्थापित किये जाते हैं। इन आवश्यक धर्म कृत्यों की उपेक्षा करने से मनुष्य ब्राह्मणत्व से वञ्चित हो जाता है।

स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येन ज्ययासुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥

मनु॰

स्वाध्याय, व्रत, होम, वेदाध्ययन, सुप्रजनन,यज्ञ तथा महायज्ञों द्वारा यह शरीर ब्राह्म किया जाता है ।

यज्ञ ऐसा आवश्यक कर्म है कि उसे करते ही रहना चाहिये क्योंकि इससे परमात्मा प्रसन्न होता है, प्रभु की प्राप्ति होती है, जिस पर परमात्मा प्रसन्न है उसे किसी वस्तु की कमी नहीं रहती। यज्ञ परित्याग करने से मनुष्य अनेक सत्परिणामों से वञ्चित होकर अधोगामी बनता है।

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान यज्ञ पुरुषः।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वंर्णाश्रमान्वितैः।

तस्य राज्ञों महाभाग भगवान भूत भावनः।

परितुष्यति तिष्ठतो निज शासने।

तास्मिस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वर श्वरे॥

भागवत 4।14।18-20

जिस राष्ट्र या नगर में भगवान यज्ञ पुरुष का यजन होता है उस पर भगवान प्रसन्न होते हैं। जहाँ भगवान प्रसन्न होते हैं वहाँ कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती।

कस्त्वा विमुञ्चति सत्वा विमुञ्चति कस्मैत्व विमुञ्चति तस्मै त्वं विमुञ्चति । पोषाय रक्षसा भागोऽसि॥

यजु. 2।23

भला कौन सुख चाहने वाला, यज्ञ को छोड़ता है? जो यज्ञ को छोड़ता है उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी छोड़ देता है। सबकी पुष्टि एवं उन्नति के लिए हविष्य यज्ञ में छोड़ा जाता है। जो नहीं छोड़ता वह राक्षस हो जाता है ।

यज्ञ शब्द का अर्थ-

यज धातु से यज्ञ शब्द बना है। जिसका अर्थ है देव पूजा, संगति करण और दान। ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की आराधना, उपासना, उनकी समीपता संगति तथा अपनी समझी जाने वाली वस्तुओं को उनके अर्पण करना यह यज्ञ की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। देव गुण सम्पन्न सत्पुरुषों की सेवा एवं संगति करना तथा उन्हें सहयोग देना भी यज्ञ है। व्यावहारिक अर्थों में इसे यों भी कह सकते हैं कि बड़ों का सम्मान बराबर वालों से संगति, मैत्री, अपने छोटों को, कम शक्ति वालों को दान सहायता करना यज्ञ है। इस प्रकार ईश्वर उपासना, सत् तत्व का अभिवर्धन एवं पारस्परिक सहयोग भी यज्ञ माने जाते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द का प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है। हवन द्वारा भी उपरोक्त तीनों प्रयोजन पूर्ण होते हैं।

देवानाँ द्रव्य हविषाँ ऋक् साम यजुषाँ तथा।

ऋत्वजाँ दक्षिणानाँ च संयोगो यज्ञ उच्यते॥

-मत्स्य पुराण

देवों को हवि प्रदान, वेद मन्त्रों का उच्चारण, ऋत्विजों को दक्षिणा इन तीनों कार्यों का संयोग यज्ञ कहलाता है।

इज्यन्ते चत्वारों वेदाः सांगाः सरहस्याः सच्छिष्येभ्यः।

सम्प्रदीयन्ते (उपदिश्यन्ते) सदाचाय्यर्यै येन वा स यज्ञः॥

विद्वान आचार्यों द्वारा सत्पात्र शिष्यों को अंग-उपाँगों सहित वेदों का पढ़ाना यज्ञ है।

येन सदनुष्ठानेन इन्द्रादि देवाः सुप्रसन्नाः सुवृष्टिं कुर्युस्तत पदाभिधेयम।

जिस कार्य से इन्द्रादि देव प्रसन्न होकर उत्तम वर्षा करें उसे यज्ञ कहते हैं।

येन सदनुष्ठानेन स्वर्गादि प्राप्तिः सुलभाः स्यात तत् यज्ञ पदामिधेयम्।

जिस आयोजन द्वारा स्वर्ग आदि सद्गति को प्राप्त करना सुलभ हो वह यज्ञ है।

येन सदनुष्ठानेन सम्पूर्ण विश्वकल्याणं भवेत् तत् यज्ञपदाभिधेयम्।

जो आयोजन विश्व कल्याण करने वाला हो उसे यज्ञ कहते है।

येज सदनुष्ठानेन आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक तापत्रयोनन्मूलनं सुकरं स्यात तत यज्ञ पदाभिधेयम्॥

जिस सदनुष्ठान द्वारा आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों प्रकार के कष्टों का निवारण हो वह यज्ञ कहा जाता है।

वेदमन्त्रर्देवतामुदिश्य द्रव्यस्य दानं यागः।

वेद मन्त्रों द्वारा देवोद्देश्य के लिये दान करना यज्ञ है।

देव पूजा

यजनं देवानाँ पूजनं सत्कार भावनं यज्ञः।

देवों का पूजा सत्कार भाव यज्ञ है ।

इज्यन्ते देवा अनेनेति यज्ञः।

जिस कार्य के द्वारा देवताओं का सम्मान किया जाय वह यज्ञ है।

इज्यन्ते देवा आस्मिन्निति यज्ञः।

जिससे देवों का पूजन किया जाय उसे यज्ञ कहते हैं।

इज्यन्ते सम्पूजिताः तृप्तिमासाद्यन्ते देवा अन्नेति यज्ञः। जिससे देवों को पूजित एवं तृप्त किया जाय वह यज्ञ है।

संगतिकरण

यजनं धर्म देश जाति मर्यादा रक्षायै महापुरुषाणमेकीकरणं यज्ञः।

श्रेष्ठ पुरुषों को धर्म, देश, जाति की मर्यादा की रक्षा के लिए संगठित एवं एकत्रित करना यज्ञ है।

इज्यनते संगतीक्रियन्ते विश्वा कल्याणाथ महात्तो विद्वाँसः वैदिक शिरोमणयः निमन्ञ्यन्ते आस्मिन्निति यज्ञः।

1. जहाँ विश्व कल्याण के लिए श्रेष्ठ, विद्वान, वेद पुरुषों को आमन्त्रित एकत्रित किया जाता है वह यज्ञ है।

इज्यन्ते स्वकीय बन्धुवान्धवादयः प्रेम सम्मान भाजः संगति करणाय आहूयन्ते प्रार्थ्यन्ते च येन कर्मणेति यज्ञः।

जिस आयोजन में बन्धु बान्धवों, स्नेह सम्बंधियों को पारस्परिक संगठन के लिए प्रेम एवं सम्मान के साथ एकत्रित किया जाता है वह यज्ञ है।

दान

यजनं यथा शक्ति देश काला पात्रादि विचार पुरस्सरं द्रव्यादि त्यागः।

देश काल पात्र का विचार करके सदुद्देश्य के लिए जो धन दिया जाता है उसे यज्ञ कहते हैं।

इज्यते देवतोद्देशन श्रद्धा पुरस्सरं द्रव्यादि त्यज्यते यस्मिन्निति यज्ञः।

देवों के निमित्त श्रद्धापूर्वक जिसमें दान किया जाता है उस कार्य को यज्ञ कहते हैं।

इज्यन्ते भगवति सर्वस्वं निधाप्यते येन वा से यज्ञः ।

भगवान को आत्म-समर्पण करने की क्रिया यज्ञ है।

इज्यन्ते सन्तोष्यन्ते याचका येन कर्मण स यज्ञः।

याचकों को सन्तुष्ट करना यज्ञ है।

यज शब्द के तीन अर्थ हैं (1) देव पूजा (2) संगतिकरण (3) दान । इन तीनों पर विविध दृष्टि-कोण से विचार करने से उनके जो अर्थ निकलते हैं, उनका निष्कर्ष यह हैं कि :-

संसार में जो दैवी और आसुरी दो शक्तियाँ काम कर रही हैं। उनमें देवत्व की, न्याय सतोगुण की, और धर्म पक्ष की पूजा, उपासना एवं सहायता की जाय, उसी में श्रद्धा रखी जाय और अपना प्रत्येक कदम उसी दिशा में अग्रसर किया जाय। असुरता को हटाने, उससे लड़ने और उसका विरोध करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। यदि मजबूरी के कारण बुराई की परिस्थिति में रहना भी पड़े तो भी उसको मानसिक रूप से कभी स्वीकार न करना चाहिये । वरन् कम से कम उससे मानसिक घृणा तो रखनी ही चाहिए और उस परिस्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्रभु प्रार्थना तथा प्रयत्न भी करते रहना चाहिए। असुरता का पक्ष ग्रहण करना और उसी में तल्लीन हो जाना असुर पूजा है। यज्ञ में श्रद्धा रखने वालों को इससे बचना चाहिए।

(2) संसार में फूट, द्वेष, विलगाव, घृणा के भाव पहले से ही बहुत ज्यादा हैं, उनको बढ़ावा न देकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि एकता, मेल, प्रेम, संगठन, सहयोग तथा पारस्परिक आत्मीयता का वातावरण बढ़े। एक दूसरे के साथ उदारता तथा सेवा सहायता का व्यवहार करें। जाति-जाति में राष्ट्र-राष्ट्र में, प्राँत-प्राँत में, धर्म-धर्म में, वर्ग-वर्ग में जो विद्वेष, छीन झपट, आपा-धापी, फूट-फिसाद, चढ़ा-ऊपरी फैली हुई है उसे बढ़ाने का नहीं घटाने का प्रयत्न करना चाहिए और अनेकता को एकता में, मतभेद को समन्वय में परिवर्तित करना चाहिए। हिन्दू धर्म सहिष्णुता एवं अनेकता में एकता देखने का धर्म है, इसमें अनेकों संस्कृतियाँ, विचारधाराएँ, मान्यताएँ मौजूद हैं, कई तो परस्पर विरोधी भी हैं, इतने पर भी सब में एकता कायम है। अनेक दर्शन, अनेक वाद, अनेक सिद्धान्त और सहिष्णुता पूर्वक आपस में रह सकते हैं और लड़ने-झगड़ने की अपेक्षा प्रेमपूर्वक विचार विनिमय द्वारा, संगतीकरण द्वारा परम लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। इस संगतीकरण को दृष्टि में रखना यज्ञ का आवश्यक अंग है।

(3) परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया है वह हमारे ही भोगने या सञ्चय करने के लिए नहीं है। कुएं, नदी, वृक्ष, गाय, घोड़ा आदि तक अपनी सम्पत्ति को दूसरों को देते हैं फिर हम मनुष्य होकर उनसे भी पीछे रहें, यह यज्ञ भावना के विपरीत है। हमारे पास जो कुछ बल, बुद्धि, विद्या, धन, वैभव, ऐश्वर्य, प्रभाव आदि हैं उसे अपने छोटों को ऊपर उठाने में और अपने से बड़ों को आगे बढ़ाने में लगाना चाहिए। अपनी निजी आवश्यकताएं कम से कम रखें, पूर्ण श्रम एवं लगन के साथ अपनी साँसारिक, मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों को बढ़ावें, पर उस बढ़ोतरी का उद्देश्य ‘सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर’ होना चाहिए। बेटे-पोतों को जायदादें खड़ी करके उन्हें हरामखोर बना जाने की अपेक्षा अपनी कमाई को संसार में सद्गुण, सद्विचार सद्भाव, सत्कर्म एवं सुख शान्ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

आज दान का दुरुपयोग खूब होता है अनधिकारी लोग दूसरों को उल्लू बना कर मुफ्त का माल उड़ाने में बहुत प्रवीण होते हैं, इनसे बचना उचित है, परन्तु अपनी शक्तियों को सत्कर्मों के लिए दिल खोल कर खर्च करने में भी कंजूसी न करना उचित है।

उपरोक्त तीनों भावनाओं- देव पूजा, संगतिकरण और दान को हृदयंगम करना- अपनाना- कार्य रूप में लाना ही यज्ञ का सन्देश, शिक्षण एवं वास्तविक अर्थ है।

यज्ञ द्वारा देवों का आवाह्न

देवों और मनुष्यों को परस्पर सम्बन्ध स्थापित कराके सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला अमोध साधन यज्ञ है। केवल मनुष्य का स्थूल प्रयत्न भी पर्याप्त नहीं और केवल देवताओं की सूक्ष्म शक्तियाँ भी सब कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होती। कल्याण का आयोजन दोनों के सहयोग से ही होता है। गीता में इस रहस्य को स्पष्ट कर दिया गया है।

सहयज्ञा प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यष्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ देवान भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्पर भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्वन्ते यज्ञ भाविताः॥

गीता 3।10-11

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में या सहित प्रजा को उत्पन्न करके उससे कहा इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को देने वाला हो।

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को बढ़ाओं, वे देवता लोग तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार आपस में कर्तव्य समझ कर कर उन्नति करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होगे।

यज्ञ द्वारा बढ़ायें हुए देवता तुम्हारे लिए बिना माँगे ही अभीष्ट भोगों को प्रदान करेंगे।

यजुर्वेद अध्याय 22।23 में भगवान का आदेश है कि-

आयर्यज्ञेन कल्पताम् प्राणोयज्ञेन कल्पताम् चयोर्यज्ञेन कल्पताम् वाग्यज्ञेन कल्पताम् मनोयज्ञेन कल्पताम

आत्मा यज्ञेन कल्पताम् स्वाहा।

अपनी आयु, प्राण, इन्द्रियाँ, मन,आत्मा आदि सर्वस्व को यज्ञ के समर्पण करो।

इस मन्त्र में मनुष्यों को यह आदेश किया गया है कि वे अपना सर्वस्य यज्ञ के लिए लगा दें। यज्ञ के द्वारा देवों से सम्बन्ध स्थापित करने का पूरी तत्परता से प्रयत्न करने के लिए मनुष्यों की जैसी प्रेरणा देवों को भी दी गई है।

देवा यजमानश्च सीदत।

हे देवताओं। यजमान और तुम पास-पास बैठो और इकट्ठे यज्ञ करो।

मनुष्य का लाभ देवताओं से सम्बन्ध स्थापित करने, उन्हें सहयोग देने और बढ़ाने में ही है। क्योंकि इस प्रकार सन्तुष्ट और परिपुष्ट हुए देवता करते हैं। महर्षि अंगिरा का वचन हैं :-

यज्ञादिभिर्देवा शक्ति सुखादीनाम्।

-अंगिरा

यज्ञादि शुभ कर्मों से देवताओं को प्रसन्न करके मनुष्य शक्ति, सुख आदि सम्पदाएँ प्राप्त करता है।

अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह देव कौन हैं? कहाँ रहते हैं ? इनसे हमारा क्या सम्बन्ध है? और यज्ञ द्वारा यह क्यों सन्तुष्ट होते हैं? यज्ञ द्वारा उनका पोषण किस प्रकार होता है? और उनमें कौन सी सामर्थ्य है जिसके द्वारा संसार को वे लाभ पहुँचा सकें? बिना यज्ञ के संसार को लाभ पहुँचाने में उन्हें क्या अड़चन होती है? इन सब प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है ताकि उपरोक्त अभिवचनों का तात्पर्य ठीक प्रकार समझ में आ जावे।

देव शब्द का स्थूल अर्थ

देने वाला- सत्पुरुष ज्ञानी, विद्वान आदि श्रेष्ठ व्यक्ति है। ऐसे पुरुषों को सहयोग देना, उनकी शक्तियों एवं कर्म पद्धतियों को आगे बढ़ाने के लिए निस्वार्थ भाव से सहायता करना यज्ञ है। ऐसे लोगों का भाव बढ़ाकर, उनके पक्ष में वातावरण तैयार करके तथा अन्य मार्गों से उनके उद्देश्यों को सफल बनाने में सहयोग देकर उनकी पूजा की जाती है। उपासना का अर्थ समीपता भी है। सत्संग द्वारा उनके विचारों एवं कार्यों से समीपता स्थापित करके, लाभ उठाना भी देव पूजा है यदि हमारे मन में सत्पुरुषों के प्रति या उनके कर्मों के प्रति श्रद्धा न हो, उनका सहयोग या अनुकरण न करें, अनुशासन न मानें तो वे इच्छा करते हुए भी हमारी कोई सेवा नहीं कर सकते, हमें कोई लाभ नहीं पहुँचा सकते। इसलिए दोनों पक्षों में पारस्परिक स्नेह सम्बन्ध सहयोग एवं सद्भावना होना आवश्यक है। इस एकता का स्थापित करना ही यज्ञ है जहाँ सदुद्देश्य के लिए सच्चे मन से दो व्यक्ति मिलते हैं वहाँ एक और एक मिलकर दो होने का नहीं वरन् एक + एक = ग्यारह (11) होने का सिद्धान्त लागू होता है। उनकी सम्मिलित शक्ति दूनी नहीं, ग्यारह गुनी हो जाती है। इस बढ़ी हुई शक्ति से दोनों ही पक्षों को अपरिमित लाभ होता है। यहाँ स्थूल यज्ञ की साँसारिक देव पूजा हुई ।

दूसरे देवता वे हैं जो अदृश्य हैं, देवलोक या स्वर्ग आदि लोकों में रहते हैं। यह देवता ईश्वर की विविध प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। वैसे तो ईश्वर एक ही है, उसके शासन में और कोई साझीदार नहीं हैं। देवताओं को अनेक ईश्वर मानना मूर्खता है। ईश्वर, की विभिन्न शक्तियाँ अलग-अलग हैं, उनके गुण और कार्य भिन्न-भिन्न हैं इन्हें देव कहते हैं। इसी प्रकार प्रकृति के अन्तराल में काम करने वाली सृष्टि में रचना, विकास, पोषण और संहार करने वाली अनेक शक्तियाँ हैं यह भी देव कहलाती हैं। अनेकों ग्रहों और सौर मण्डलों से जो प्रभाव किरणें हम तक आती हैं उन्हें भी देव कहते हैं। सूर्य की किरणें में जो सप्त रंग की एवं विविध गुणों वाली अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट, एक्सरेज आदि धाराएँ काम करती हैं यह भी देव हैं।

ग्रन्थों में 33 कोटि देवताओं का वर्णन हैं। 33 प्रकार के देवताओं का परिचय इस प्रकार है- बसु 8, रुद्र 11, आदित्य 12, अश्विनी कुमार 1, पूषा 1, यह देव शक्तियों इस विश्व के वातावरण में नाना प्रकार के परिवर्तन, उपद्रव, उत्कर्ष उत्पन्न करती रहती हैं।

देवता 33 प्रकार के, पितर 8 प्रकार के, असुर 99 प्रकार के, गंधर्व 27 प्रकार के पवन 46 प्रकार के, बताये गये हैं। यह आश्चर्य कौतूहल एवं अविश्वास की बात नहीं हैं। यह भारतीय सूक्ष्म विज्ञान की चिरकालीन प्रयत्न एवं अन्वेषण के साथ की हुई खोज है। किसी समय इन शक्तियाँ की भारतीयों को भली प्रकार जानकारी थी और वे उनसे लाभ उठाकर समस्त प्रकृति के स्वामी बने हुए थे। कहा जाता है कि रावण के यहाँ देवता कैद रहते थे, उसने देवों को जीत लिया था या अपने वश में कर लिया था, वस्तुतः उसने इन अदृश्य शक्तियों की खोज करके उनका उपयोग, नियन्त्रण, संचालन, आवाहन और विसर्जन भली प्रकार जान लिया था। इसे ही अलंकारी रूप से देवताओं को कैद करना कहते हैं।

पाश्चात्य विज्ञान वेत्ता धीरे-धीरे प्रकृति की रुद्र शक्तियों का पता लगाते जा रहे हैं। संकाशी (ईथर) तड़ित (बिजली) गृध्रा (टेली विजन) शरभा (वाध्य) व्याता (अणु शक्ति) कोटय (गैस) बलाका (विस्फोटक) आदि थोड़ी सी शक्तियों के कुछ अंशों को जान पाया है। और इन्हीं के आधार पर अनेक यन्त्र बनाये हैं। यह रुद्र सेना है। शिवजी की बारात में जिन भूत-पिशाच आदि का व्यंगात्मक वर्णन पुराणों में आया है वह यही तीन शक्तियाँ हैं। इनकी गणना भी एक प्रकार से ही कोटि के देवों में ही होता हैं यह श्रेणी बाल क्रीड़ा जैसे कौतूहल की है। इनसे संसार का लाभ कम और हानि अधिक होती है इसलिये शिवजी की बारात जहाँ चित्रित की जाती है वहाँ उनकी सेना को “तनु छीन कोउ अति पीन, पावन कोई अपावन तनु धरे” दिखाया जाता है। यह उस सेना की तुच्छता का उपहास है। विष्णु, इन्द्र आदि प्रधान शक्ति पुण्य से जो शक्तियाँ संबंधित हैं उनकी सूक्ष्मता, सुन्दरता, महत्ता और उपयोगिता इस रुद्र सेना की अपेक्षा कहीं उच्च कोटि की है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने रुद्र सेना की शक्तियों का उपयोग खर्चीली मशीनों तथा खर्चीले ईंधनों से ही करना माना है और देव विद्या के भारतीय वेत्ता इन सब कार्यों को बिना मशीनों के बिना पैट्रोल आदि खर्च किये करना जानते थे। महाभारत युद्ध में तथा लंका युद्ध में ऐसे अनेक दिव्य अस्त्र शस्त्रों की चर्चा है। उनका उपयोग मन्त्र बल से ही होता था।

पूर्वकाल में अन्य लोकों तथा ग्रह नक्षत्रों तक मनुष्यों का आना-जाना होता था। शरीर को अणु के समान छोटा या अदृश्य बना लेना, आकाश में अत्यन्त विशाल रूप में फल जाना, जल पर चलना, आकाश में उड़ना आदि अष्ट सिद्ध, नवनिद्ध अनेक सिद्ध पुरुषों को करतलगत होती थीं। यह सब कार्य सूक्ष्म प्रकृति की उन शक्तियों द्वारा उत्पन्न होते थे जिन्हें देव नाम से पुकारते हैं। प्रत्येक सूक्ष्म शक्ति को अध्यात्म विज्ञान के अनुसार एक देव माना गया है। पञ्च तत्व देव-जल को वरुण देव, गर्मी को अग्नि, पवन को वायु देव, धरती को गौरी, आकाश को इन्द्र देव माना गया है। इसी प्रकार सृष्टि के अन्तराल में जो अनेकों शक्तियाँ काम कर रही हैं उनको भी देव संज्ञा दी गई है।

अदृश्य शक्तियों के दो भाग है- एक चेतना दूसरा क्रिया। क्रिया प्रकृति से सम्बन्धित है, चेतना ब्रह्म का अंश हैं। जैसे सूर्य का स्थूल रूप अग्नि पिण्ड मात्र है, भौतिक विज्ञानी सूर्य को केवल अग्नि का गोला या भ्रमण शील एक ग्रह मात्र समझते हैं पर अध्यात्म विज्ञान के अनुसार इस स्थूल रूप के अतिरिक्त सूर्य में एक चैतन्य प्राण भी है जो ब्रह्म भी है ब्रह्म से प्रेरणा प्राप्त करता है, ब्रह्म रूप है। इसी प्रकार, जल, वायु, अग्नि आदि देवों के जो स्थूल रूप हैं उनके अतिरिक्त उनमें एक चैतन्य आत्मा भी है जो ब्रह्म से सम्बन्धित है। जैसे मनुष्य का शरीर भीतर की प्राण चेतना के अनुसार कार्य करता है वैसे ही इन देवों की अन्तः चेतना ही उनकी दृश्य क्रिया का संचालन करती हैं। उस देव आत्मा से जब सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तो उसके अनुसार इन जलवायु आदि के चलाने और रोकने का कार्य होने लगता है। इन्द्र की चैतन्य सत्ता को उपासना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाय तो मनुष्य मनचाही वर्षा कराने में सफल हो सकता है। गंगा की देव आत्मा को प्रसन्न करके भागीरथ पृथ्वी पर गंगा नदी को लाये और उसी जल धारा को इच्छित मार्ग से समुद्र जल ले गये। पूर्व काल में इसी प्रकार अन्य देवों को लोगों ने प्रसन्न किया है और अभीष्ट लाभ प्राप्त किये है।

गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, ब्रह्मा, भैरव योगिनी, आदि देवता भी इसी प्रकार के हैं। यह शक्तियाँ मनुष्य पर अनेकों प्रभाव डालती हैं। जब इन देवों की स्थिति और मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति एक ही केन्द्र पर केन्द्रित होती है तो दोनों में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है। इसे ही देवता को प्रसन्न करना या सिद्ध करना कहते है दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि किन्हीं साधना विशेष द्वारा अपने शरीर की धातुओं, चक्रों-उपकरणों, ग्रंथियों को तथा ब्रह्मरंध्र के मस्तिष्कीय चुम्बक केन्द्र को ऐसा ढाल दें कि वे आकाश में फली हुई अभीष्ट देव शक्ति को अपनी ओर खींच सके तो उस साधन को देवोपासना कहेंगे। ऐसी देवोपासना जब सफल हो जाती है तो अभीष्ट सत्परिणामों से उपासक को तृप्त कर देती है। पश्चिमीय देशों के भौतिक विज्ञानी मशीन बनाने में संलग्न होकर रुद्र की बारात को को प्रसन्न कर रहे हैं, हमारे पूर्वज आत्म साधना, तपश्चर्या, मन्त्र, भोगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान् शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते रहे थे।

देव शक्तियों का परिचय, उनके सान्निध्य से प्राप्त होने वाले लाभ, उनकी आकृति एवं वाहनों का रहस्य उनकी उपासनाओं की विधियों का अन्तर, साधना मार्ग की कठिनाई, सफलता के रहस्य आदि का बहुत विस्तृत विज्ञान है। इस यज्ञ सम्बन्धी पुस्तक मे
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