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Magazine - Year 1967 - Version 2

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आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा पाने के कुछ उपाय

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इस व्यस्त संसार में व्यग्रताओं का होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। व्यग्रतायें आती हैं, चिंताएं घेरती हैं-यह उतना हानिकारक नहीं है जितना कि उनको लेकर बैठ जाना और मस्तिष्क को मथने का अवसर देना।

विद्वानों का कहना है कि जिस प्रकार इंधन देने से आग बढ़ती है और इंधन देना बन्द कर देने से वह बुझ बुझ कर नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार मनन करते रहने से चिन्तायें बढ़ती हैं और उन पर अधिक विचार न करने से नष्ट हो जाती हैं।

मानव-मस्तिष्क में प्रायः अनेक प्रकार की चिन्ताएँ अपना डेरा डाल लिया करती हैं जिनमें से निर्धनता की चिन्ता सबसे प्रमुख एवं असुखकर होती है।

निर्धनता के भय से चिन्तित व्यक्ति सदा अपनी आय की अल्पता का रोना रोया करता है। उसे हर समय यही चिन्ता सताया करती है कि उसकी आमदनी कम है। उसके बच्चे बढ़िया खाना और बढ़िया कपड़े नहीं पाते। उसकी पत्नी के पास कीमती साड़ियां नहीं हैं, उसके अंग आभूषणों से रिक्त हैं। उसका मकान छोटा है। उसके पास रेडियो, बिजली, पंखा अथवा सोफा सेट नहीं है। उसे साधारण चारपाइयों पर सामान्य बिस्तर के साथ सोना पड़ता है। उसके पास इतना पैसा नहीं हो पाता हो वह अपने मित्रों को अच्छी दावत देकर अपना सम्मान बढ़ा सके, उन्हें सिनेमा दिखाकर अपनी उदारता का परिचय दें सके। उसके पास इतना पैसा नहीं बचता, जिससे वह बेटी की शादी किसी बड़े घर में कर सके। उसकी आय कम है और वह एक निर्धन आदमी है।

इस प्रकार न जाने कितने लोग अपनी ही रीति से अपनी निर्धनता एवं अल्प आय की चिन्ता में व्यग्र से रहा करते हैं और उसकी आग में अपनी मानसिक शाँति के साथ स्वास्थ एवं शक्तियों को जलाया करते हैं। उन्हें न जाने यह समझ क्यों नहीं आती कि इस प्रकार अपनी निर्धनता की कल्पना करते रहने से क्या उनकी आय बढ़ जायेगी, निर्धनता दूर हो जायेगी?

उन्हें समझना चाहिए कि वे ज्यों-ज्यों अपनी निर्धनता की चिन्ता करते हैं त्यों-त्यों वह बढ़ती हुई उन्हें और अधिक व्यग्र बनाती जायेगी। वे अधिकाधिक निराश होते जा रहे हैं, जिससे कि उनका उज्ज्वल भविष्य अन्धकार में डूबता जा रहा है जब उनके मस्तिष्क में अपनी निर्धनता की चिन्ता शुरू हुई थी तब वे इतने हताश, निराश अथवा व्यग्र नहीं थे, जितने कि आज हो रहे हैं। उनकी चिन्ता ने आज जितना उग्र रूप धारण कर रखा है, प्रारम्भ में उसका रूप इतना भयानक नहीं था। चिन्ता की इस विकट वृद्धि का यही कारण रहा है कि उसको मनन का इंधन दें देकर स्वतः बढ़ाया गया है । यदि वे प्रारम्भ में ही इस निकम्पी चिन्ता को अपने मस्तिष्क में प्रवेश न करने देते अथवा आ जाने पर उसे इंधन न देते बल्कि उसे एक प्रेरणा समझकर आय बढ़ाने के उपायों में लग जाते तो निश्चय ही उनकी यह चिन्ता ग्रन्थि बनकर उनके स्वभाव का अंग न बन पाती ।

अब भी कुछ विशेष बिगाड़ नहीं है, यदि आपको इस प्रकार की चिन्ता सता रही है तो इसके पूर्व ही कि वह आपके स्वास्थ्य को सदा-सर्वदा के लिए चौपट कर दें और आपके रहे-सहे भविष्य को जलाकर फैंक दें, आप स्वयं ही उसे अपने मस्तिष्क से निकाल फेंकिये। चिन्ता का अचिन्तन चिन्ता दूर करने का सबसे सरल एवं सफल उपाय है।

यह बात सही है कि उत्तरदायी व्यक्ति के पास अनेक चिन्तायें आ सकती हैं किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके पास आई हुई चिन्ता इस बात की हकदार है कि आप उसे अपने चिन्तन, समय तथा शाँति का कुछ अंश अवश्य ही दें। मनुष्य के वास्तविक चिन्तायें बहुत कम आती हैं और यदि वे आती हैं तो हर उत्तरदायी व्यक्ति उनका मनन करने के बजाय चिन्ता का कारण दूर करने का प्रयत्न किया करता है। वह अपने मस्तिष्क को चिन्ता की शाखा-प्रशाखाएँ छोड़कर बेकार में न तो उलझाया करता है और न उसकी शक्ति क्षीण किया करता है। वह सीधे-सीधे उसका हल निकालने में अपनी सारी शक्तियों को नियोजित किया करता है और ठीक तरह से , ठीक दिशा में शाँत मस्तिष्क से सोचने पर उसका हल निकाल भी लेता है। बहुत करके तो निरर्थक एवं काल्पनिक चिन्तायें ही अधिकतर मनुष्य को घेर लिया करती हैं।

यदि आप अल्प आय के कारण निर्धनता के भय से व्यग्र हैं तो सबसे पहले इस बात की परीक्षा कीजिए कि कहीं आपकी यह चिन्ता आरोपित तो नहीं है। कहीं किसी पड़ौसी अथवा मित्र की स्थिति, उसका रहन-सहन एवं जीवन-स्तर देखकर स्पर्धावश यह चिन्ता आपके मस्तिष्क में तो नहीं आई है। हो सकता है कि दूसरे के बीवी बच्चों, मकान तथा साधन-सुविधाओं को देखकर आपके मस्तिष्क के किसी कोने में ईर्ष्या ने जन्म ले लिया हो और निर्धनता की यह चिन्ता उसी नागिन का विष हो। यदि ऐसा है तो निश्चय ही यह शर्म की बात है। यह सभ्यता एवं सज्जनता के विरुद्ध व्यवहार है । ऐसी स्थिति में आपकी निर्धनता की चिन्ता-चिन्ता का विषय नहीं है जितनी कि आपकी वह ईर्ष्या-भावना जो किसी का रहन-सहन देखकर उत्पन्न हुई है। जितनी जल्दी आप अपने मस्तिष्क से, यदि ऐसा है तो, इस ईर्ष्या को निकाल फेंकिये अन्यथा आप द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह के ऐसे बवंडर में फँस जायेंगे कि सारा लोक-परलोक ही तबाह हो जायेगा।

यदि आप में ईर्ष्या रूपी विष का प्रभाव नहीं हुआ है तो निश्चय ही आप साधारण जीवन एवं सामान्य रहन सहन की सुन्दरता एवं सुख-शाँति को भूल गये हैं और विलासिता, प्रदर्शन तथा निरर्थक आवश्यकताओं की ओर झुक गये हैं जिससे आपको अपनी आय तो पहले कम नहीं मालूम होती थी, अब कम मालूम होने लगी है। यदि आपमें सादगी के प्रति अरुचि होने लगी है और आप विलासिता की ओर उन्मुख होने लगे हैं तो अपने सहज सन्तोष को अपने हाथों बरबाद करके ऐसी सम्भावनाओं का बीजारोपण कर रहे हैं जिसका फल आपको इतना निर्धन बना देगा, जितने निर्धन न आप पहले थे, न अब हैं और न आगे होने की शंका है। निश्चय जानिए कि आपको यह अंकुरित विलास-वृत्ति आपको व्यसनी तक बना सकती है। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है और कल्याण भी कि आप अपने सहज सुखदाता सन्तोष की रक्षा करें और अपने साधारण जीवन-स्तर में सज्जनोचित दृष्टिकोण से सुन्दरता देखिये।

ईमानदारी से निरीक्षण कर लेने के बाद यदि आप अपने में इन दुर्बलताओं में से किसी को भी न पायें तो देखिये कि आप परिश्रम कम तो नहीं करते हैं, आप अपनी योग्यताओं अथवा क्षमताओं से अधिक तो नहीं चाहते? ईमानदारी से निर्णय कीजिए -यदि आपकी आप आपके परिश्रम तथा योग्यताओं के अनुरूप है तो आप अधिक की कामना करके अपने तथा समाज दोनों के साथ अन्याय करते हैं। चोरी न करने पर भी चोरी का इरादा रखना भी जिस प्रकार चोरी है उसी प्रकार योग्यता से अधिक चाहना भी एक नैतिक अपराध है। आपकी आय यदि आपके उद्योग एवं योग्यता के समानान्तर है तो यह चिन्ता का विषय नहीं है। आपको उस पर सन्तोष करना ही चाहिये। उसके लिये चिन्तित होना किसी भी दशा में ठीक नहीं।

अपने खर्च के एक-एक बिन्दु पर बारीकी से नजर डालो। जहाँ अपव्यय की तनिक भी गन्ध आती हो वहाँ तुरन्त कसौटी-किफायता आरंभ कर दीजिए। अनावश्यक खर्चों को घटा देना, आमदनी बढ़ाने का सबसे सरल तथा तात्कालिक उपाय है।

आय-अल्पता की चिन्ता का एक कारण, अपने दायरे से आगे निकलकर सोचना भी है। यह उचित है कि लोग अपनी संतान को बहुत ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी संतान अधिक से अधिक उन्नत एवं योग्य बने। समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्राप्त करे। किन्तु अल्प आय के कारण वे ऐसा कर सकने में अपने को विवश पाने से चिन्तित होने लगते हैं। यदि आपने अपने दायरे से बाहर निकलकर बच्चों के लिये इस प्रकार की सद्भावनाओं को भावुकता से जोड़ दिया तो निश्चय ही ये सद्भावनाएँ आपका सर-दर्द बन जाएँगी। अपनी सीमाओं तक उन्हें ॐ चा उठाने और पढ़ाने-लिखाने में पूरे ईमानदार रहिये किन्तु भावुकता में आकर उसे चिन्ता का विषय न बनाइए । इससे बनना तो कुछ नहीं, सन्तोषपूर्ण जिन्दगी में काँटे ही उग आयेंगे।

सन्तान को ऊँची शिक्षा दिला सकना अथवा किसी बड़े पद पर पहुँचा सकना यदि आपके हाथ में नहीं है तो उन्हें अधिक से अधिक सच्चरित्र एवं सदाचारी बना सकना तो आपके हाथ में है ही। इस विकास के लिये तो किसी पूँजी की जरूरत होती नहीं। उन्हें उपदेश, व्यवहार तथा अपने जीवन-उदाहरण से अधिक से अधिक नैतिक एवं आचरणवान बनाने का प्रयत्न कीजिए। यदि आप बुद्धिमत्तापूर्वक उन्हें एक उन्नतमना मनुष्य बना सके तो निश्चय ही आपने उन्हें एक बड़ा आदमी तो बना ही दिया साथ ही उनके लिये जीवन का ऐसा उत्तम पथ प्रशस्त कर दिया जो उन्नति की ओर ही जाता है। अल्पशिक्षित तथा सामान्य स्थिति में रहने वाले व्यक्ति में यदि चारु-चरित्र की विशेषता विकसित हो गई तो वह अपनी स्थिति से ऊपर बढ़ेगा यह ध्रुव सत्य है। वह स्वयं बढ़ेगा और समाज न केवल उसे बढ़ने का अवसर ही देगा बल्कि सहायता भी करेगा नहीं तो सबसे ऊपर -चारुचरित्रता अपने में स्वयं एक बड़ी बात है जो साधारण स्थिति में भी सम्मान एवं प्रतिष्ठा का पात्र बना देती है।

पत्नी के लिये भूषण-वसन की चिन्ता करने के बजाय उसे प्रेम, आदर तथा एकात्मकता से प्रसन्न एवं परितुष्ट करिए। पति का सच्चा स्नेह पाई हुई पत्नियों को भूषण-वसन की विशेषता की ओर कोई जिज्ञासा नहीं होती और पति का पूर्ण प्रेम तथा अखण्ड विश्वास पाकर वे साधारण वेष-भूषा में भी दामिनी की तरह दमकती रहती हैं। निश्छल, प्रेमी-एवं सच्चरित्र पति पाकर पावन पत्नियाँ आत्म-सन्तुष्ट होकर पूर्णकाम हो जाती हैं। फिर वे संसार के अन्य वैभव-विभव के लिये लालायित नहीं होती।

अपने साधारण घर में मानसिक उच्चता एवं स्वच्छता से रहिए। घर का वातावरण प्रसन्न एवं पावन रखिए और देखिए आपको अपनी उस सामान्यता में ही सम्पन्नता के दर्शन होंगे। यह सब आपके अपने हाथ में है। इस सुख-शाँति के आप जन्मसिद्ध अधिकारी हैं। अपने अधिकार का उपयोग कीजिए, आपकी निर्धन भावना को दूर होते देर नहीं लगेगी और आपका सामान्य घर सम्पन्न स्वर्ग का एक कोना बन जायेगा।

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