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Magazine - Year 1967 - Version 2

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गायत्री महामन्त्र के शक्तिशाली 24 अक्षर

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First 24 26 Last
गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षर केवल इसीलिए नहीं हैं कि कविता की दृष्टि से आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण वाला छन्द गायत्री माना जाता है और यह महामन्त्र गायत्री छन्द भी कहा गया है। इसलिए उसमें 24 अक्षर होने ही चाहिएं। कविता के लिए आवश्यक अक्षरों की पूर्ति के लिए 24 अक्षर नियोजित नहीं किये गये हैं वरन् सच यह है कि प्रस्तुत गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों के बारे में भी विवाद चला आता है। ‘णयं’ शब्द पर गाड़ी अटक जाती है, किसी ऋषि ने उसे एक और किसी ने दो अक्षर गिना है। जो एक गिनते हैं उनके हिसाब से इस मन्त्र में 23 ही अक्षर ठहरते हैं। इस कमी के लिए णयं के उच्चारण-क्रम को थोड़ी लम्बी ध्वनि में बोलकर 24 अक्षरों की पूर्ति की जाती है। चारों वेदों में अनेक गायत्री मन्त्र हैं उनमें ऐसा विवाद नहीं है। उनके अक्षर सीधे-सादे और पूरे हैं। हमारे उपास्य महामन्त्र में जिस प्रकार का विवाद है, उस तरह का देखने में नहीं आता। इसलिए कविता की दृष्टि से 24 अक्षरों का होना जैसी सामान्य बात यहाँ नहीं है। कविता की दृष्टि से विवादास्पद कारण के रहते हुए भी, अक्षर वे ही रखे गये हैं, जो साधना के वैज्ञानिक प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। कविता थोड़ी दोषयुक्त भी हो तो हर्ज नहीं, उनमें शब्द-ब्रह्म का उसी तरह, उसी क्रम में प्रयोग हुआ है जिससे कि आत्म-बल एवं ब्रह्म-वर्चस्व के उद्भव का वास्तविक प्रयोजन ठीक तरह पूरा हो सके।

पिण्ड और ब्रह्माँड में कुल मिलकर 24 प्रमुख शक्तियाँ हैं। ब्रह्माँड में व्यापक शक्तियाँ पिण्ड-मानव-शरीर-के साथ जुड़ी हैं। चेतना के जो प्रमुख संस्थान इस शरीर में हैं, वे इसलिये नहीं हैं कि शरीर का दैनिक कार्य ठीक तरह चलाते रहें, वरन् इसलिए भी हैं कि निखिल ब्रह्माँड में संव्याप्त महान् शक्ति-स्रोतों के साथ अपना सूक्ष्म सम्बन्ध जोड़े रह सकें। इन्द्रियों के द्वारा यों मोटे तौर से वे विभिन्न वासनाओं की पूर्ति का सुख जुटाते प्रतीत होते हैं, पर उनकी वास्तविक महत्ता पराप्रकृति के विभिन्न विभागों के साथ-साथ जुड़े रहने और दिव्य आदान-प्रदान द्वारा दुर्बल मानव प्राणी को देवताओं की श्रेणी में लाकर बैठा देने में है।

कामेन्द्रियाँ यों एक क्षणिक वासना-सुख की पूर्ति का माध्यम प्रतीत होती हैं पर वास्तविकता यह कि ब्रह्मांडव्यापी प्रजनन क्षमता-ब्रह्मणि-के साथ वह अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। आकाश में भ्रमण करती हुई आत्मायें अपने प्रारब्ध कर्म भोगने को जहाँ जिस व्यक्ति शरीर में, जिस घर में जन्म लेने वाली हैं, उनकी आवश्यकता पूर्ण करने में कामेन्द्रिय एक निमित्त मात्र बनती है। अन्तरिक्ष में विचरण करने वाले जीव जहाँ जन्म लेने वाले हैं वहाँ निर्धारित व्यक्ति के शरीर में शुक्र बनकर प्रवेश करते हैं और कामेन्द्रिय उनकी भ्रूण-स्थापना की विधि-व्यवस्था बनाती है। कितना अद्भुत सृष्टिक्रम कामेन्द्रिय के द्वारा पूरा होता है। इस मर्म को तात्विक दृष्टि रखने वाले ही समझ सकते हैं। स्थूल दृष्टि वाला तो उस दिव्य अंग को केवल एक घृणित घर्षण क्रिया से उत्पन्न क्षणिक गुदगुदी का निमित्त मात्र ही समझता है।

यह बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्धों में भी है। यों जिह्वा, कान, नाक, आँख आदि से मोटे तौर पर हमें विभिन्न विषय-सुख मिलते हैं, पर उनका वास्तविक प्रयोजन ब्रह्माँडव्यापी, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श के पंचतत्वों में उत्पन्न तन्मात्राओं से सम्बन्ध मिलाना है। हर तत्व की एक तन्मात्रा है। शरीर भी पंच-तत्वों का बना है। पर पिण्ड और ब्रह्माण्ड में जो कुछ सूक्ष्म-सचेतन-शक्तिप्रवाह है उसका आदान-प्रदान इन तन्मात्राओं के माध्यम से ही होता है। आकाश तत्व की तन्मात्रा शब्द है, अग्नि तत्व की तन्मात्रा रूप, जल की रस, पृथ्वी की गन्ध और वायु की स्पर्श है। इनकी स्थूल एवं सूक्ष्म अनुभूतियाँ कान, नाक, आँख, जिह्वा एवं त्वचा के माध्यम से होती हैं। इन इन्द्रियों से जो चेतना संवेदना है वही मनुष्य का संबंध ब्रह्माँडव्यापी तात्विक चेतना के साथ जोड़ती है।

उपरोक्त पंक्तियों में इन्द्रिय संवेदन एवं ब्रह्माँडव्यापी तन्मात्राओं का संदर्भ प्रस्तुत किया गया है, केवल इन्द्रियाँ ही नहीं, अनेक शक्ति संस्थान ऐसे हैं जो पिण्ड एवं ब्रह्माँड की चेतनाओं -शक्तियों-क्षमताओं एवं संवेदनाओं को आपस में जोड़ते और प्रत्यावर्तन करते हैं। ऐसे स्रोत 24 हैं। इनमें से एक-एक स्रोत का प्रतिनिधित्व गायत्री का एक-एक अक्षर करता है। इन 24 अक्षरों को 24 विश्वव्यापी स्रोतों की कुञ्जियाँ कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

‘योगी याज्ञवल्क्य’ ने इस तभ्य का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है-

कर्मेन्द्रियाणि पंचैव पच्चः बुद्धीन्द्रियाणि च।

पंच पंचेन्द्रियाणार्थश्च भूतानाँ चैव पंचकम्॥

मनाबुिद्ध स्तथात्माच अव्यक्तं च यदुत्तमम्॥ चतुर्विंशत्यथैतानिः गायत्र्या अक्षराणि तु॥

-योगी याज्ञवल्क्य

पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच तत्व, पाँच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, आत्मा तथा परमात्मा इस प्रकार 24 शक्तियाँ गायत्री के 24 अक्षरों में समाई हुई हैं।

भौतिक विज्ञान के वर्तमान वैज्ञानिकों ने इनकी शोध अपने ढंग से की है। वे इस शक्ति को एनर्जी आफ फोर्स के नाम से पुकारते हैं। हीट पावर (ताप) इलेक्ट्रिकल एनर्जी (ताकत) एनर्जी आफ ऐलैस्टिसिटी (स्थिति) एनर्जी आफ ग्रेवीटेशन (मध्याकर्षण) कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी (विश्व विद्युत) इन्टैलिजेन्स (ज्ञान) सुपर फोर्स (उच्च शक्ति) आदि अनेक भेदों में इस शक्ति की विभक्त किया गया है और उसके गुण कर्मों को जान कर आविष्कारों का तारतम्य मिलाया है।

यह भौतिक शक्ति गायत्री के 24 अक्षरों के अनुसार 24 प्रकार की है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों-ऋषियों की भाषा में इन्हें 24 मातृकाएँ कहा गया है। इनके नाम इस प्रकार है (1) चन्द्रकेश्वरी (2) अजित वला (3) दुरितारि (4) कालिका (5) महाकाली (6) श्यामा (7) शात्ता (8) ज्वाला (9) तारिका (10) अशोका (11) श्रीवत्सा (12) चण्डी (13) विजया (14) अंकुश (15) पन्नगा (16) निर्वाण (17) वला (18) धारिणी (19) वरण प्रिया (20) नरदत्ता (21) गान्धारी (22) अम्बिका (23) पद्मावती (24) सिद्धायिका ।

शरीर में काम करने वाली विद्युत शक्तियों का भी आधुनिक वैज्ञानिकों ने पता लगाया है। औडीलिक फोर्स (ओजस) परसनल मेगनिट (शारीरिक चुम्बकत्व) आदि नामों से इन भेदों का अन्वेषण किया है।

योग-शास्त्रों में शरीर के अन्तः प्रदेश में काम करने वाले सहस्रों तत्वों का पता लाखों वर्ष पूर्व लगा लिया था। आधुनिक विज्ञान ने भी इस मार्ग पर कदम उठाने शुरू कर किये हैं। और पिछले दिनों जो शोधें हुई हैं उनके अनुसार-ऐथेरिक वाडी (प्राण भंडार) माइस्टिक प्लेसिस (अनाहत चक्र) थिराइड ग्लाण्ड (कंठ ग्रन्थि) पाइनियल ग्लाण्ड (आज्ञाचक्र) पाइट्यूटरी वाडी (शक्ति ग्रन्थि) आदि का पता चलाया है और यह माना है कि इन विलक्षण संस्थानों द्वारा मनुष्य की प्रसुप्त प्रतिभाओं और विशेषताओं के भाव अभाव-मन्दता और तीव्रता से-भारी सम्बन्ध हैं। फिर भी वे यह नहीं जान सके कि औषधि, सर्जरी आदि की सीमा से बाहर के इन सूक्ष्म संस्थानों का विकास किस प्रकार सम्भव है। इसका उत्तर एवं मार्ग-दर्शन तो योग-शास्त्र की कर सकता है और करता रहा है। गायत्री उपासना एक ऐसी सर्वांगपूर्ण योग-साधना है जिसके द्वारा इन सभी शक्ति संस्थानों को अति सरलतापूर्वक सक्रिय बनाया जा सकता है।

इन सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध और मुद्राओं का विधान मौजूद है । गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। उनमें से प्रसिद्ध मुद्राओं और बंधो के नाम नीचे दिए जाते हैं-(1)महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालंधर बन्ध (5) मूल बन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी मुद्रा (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काकी (18) मातंगी (19) भुजंगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कथठी (24) आकाशी।

महामुद्राओं की तरह प्राणायामों की साधना में भी 24 प्रत्यावर्तन मुख्य हैं। यों संख्या की दृष्टि से वे 84 हैं, पर प्रमुख उनमें से 24 ही हैं। इन 24 प्राणायामों, 24 मुद्राओं, 24 बंधो की साधना करके आत्म-विज्ञान के वैज्ञानिक अपने शरीर एवं मन को इतना सामर्थ्यवान् बना लेते हैं कि वे अपनी आत्मिक एवं भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी दूसरे पर निर्भर न रहें। सृष्टि का विधान जिस विधि-व्यवस्था पर चलता है उसके संचालन तक की क्षमता जिनमें विकसित हो गई, उन्हें देवाधीन अथवा प्रारब्धाधीन भी नहीं रहना पड़ता। वे अपने लिये अपनी स्वतन्त्र परिस्थितियाँ एवं संभावनाएँ विनिर्मित कर सकते हैं।

सरकारी शासन तन्त्र, कायदे-कानून और कर्मचारी अधिकारियों से बनी व्यवस्था पर चलता है। पर इस यन्त्र का संचालक राजा, प्रधान मन्त्री, राष्ट्रपति आदि जो भी हो, वह अपने विशेषाधिकार एवं अध्यादेश से प्रचलित व्यवस्था के व्यतिक्रम की भी कोई आवश्यक व्यवस्था कर सकता है। इसी प्रकार तपस्वी साधकों ने अपने अन्तरंग मर्म स्थलों में छिपी हुई प्रसुप्त शक्तियों का जागरण कर लिया, वे ईश्वरीय चेतना के स्तर तक जा पहुँचते हैं। जीवन मुक्ति में आत्मा को सायुज्य, सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य स्तर की स्थिति प्राप्त होती है। ऐसी परिस्थितियों तक पहुँचे हुए आत्मा का पद एवं अधिकार भी ईश्वर जैसा हो जाता है और यदि वह चाहे तो सृष्टि संचालन की चल रही विधि-व्यवस्था में समयानुसार आवश्यक हेरफेर भी कर सकता है।

गायत्री वेद वाङ्मय में प्रयुक्त होने वाला एक छन्दगीत है। जिसमें 8-8 अक्षरों के तीन चरण हों और जो निर्धारित स्वर-लहरी में गाया जा सके, उस कविता को वेद, विद्या के ज्ञाता गायत्री छन्द कहते हैं। यों गायत्री शब्द का अर्थ प्राणों का संरक्षण एवं संवर्धन करने वाली सत्ता भी होता है, पर मोटे तौर पर यह शब्द एक छन्द गीत का ही बोध कराता है। हर गीत की अपनी विशेषता होती है। वह अपने गर्भ में भरे हुए भावों को तो कोमल अभिव्यंजनाओं के साथ व्यक्त करता ही है, भावुकता को जगाता और सरसता को लहराता ही है, साथ ही एक वैज्ञानिक वातावरण भी पैदा करता है। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। गीत को ब्रह्म की तरल स्थिति माना गया है। भक्तगण गीत के माध्यम से अपने इष्टदेव के साथ तन्मय होने की लय साधना करते हैं। मीरा, सूर, तुलसी कबीर, चैतन्य, नारद आदि ने अपनी गीत साधनाओं से ही अपने उपास्य देवों का सामीप्य पाया था, ऋषि सामगान करके ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। दीपक राग से बुझे दीपकों का जलना और मेघ मल्हार की स्वर लहरी से वर्षा होने लगना प्रसिद्ध है। गीत-शास्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि किस ऋतु में, अथवा दिन के किस भाग में कौन से राग-रागिनी का गायन किया जाय तो सुनने वालों पर उसका क्या सूक्ष्म प्रभाव पड़ेगा? गीत का अपना एक वैज्ञानिक स्वरूप भी है, जिसकी शोध कर के आधुनिक पदार्थ विज्ञानवेत्ता अमुक स्वर लहरियों को ध्वनि विस्तारक यन्त्रों द्वारा प्रसारण कर के पशुओं से अधिक दूध लेना, पेड़-पौधों को अधिक फलदायक बनाना, रोगियों को कष्ट मुक्त करना आदि अनेक प्रकार के लाभ उठाने लगे हैं फौज में जब बिगुल बजता है, मार्च की ध्वनि बजती है तक कायर सैनिकों में भी वीरता के भाव लहराने लगते हैं। इसी प्रकार की अपनी विशेषताएँ अन्य गीतों की भी हैं। वेद-गीत तो इस दृष्टि से अत्यधिक प्रभावपूर्ण हैं। उनके अर्थ की महत्ता तो है ही, साथ ही उनका उच्चारण भी अपने आप में इतना प्रभावशाली है कि वेद-पाठ सामगान आदि के स्वर आयोजन मात्र से अद्भुत प्रतिफल उपस्थित होते हैं।

गायत्री की स्वर-लहरी अपने क्षेत्र में जादू का काम करती है। गायत्री छन्द के विधिवत् उच्चारण से आकाश में जो विद्युत कम्पन होते हैं उनका प्रभाव जिन समीपवर्ती ओर दूरवर्ती लोगों पर पड़ता है वे अनेक भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभों से लाभान्वित होते हैं। अथर्व वेद में गायत्री उपासना से प्राप्त होने वाले सात लाभों का वर्णन करते हुए कहा गया है:-

स्तुता मया वरदा वेद माता प्रचोदयन्ताँ पावमानी द्विजानाम्। आयु प्राणं प्रजाँ पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं। मह्माँदत्वा व्रजत ब्रह्म लोकम्।

-अथर्व 19।71।11

“वेदमाता गायत्री, उपासना करने वालों को पवित्र करती है प्रेरणा देती है, आयु, प्राण, प्रजा, पशु कीर्ति धन और ब्रह्म-वर्चस प्रदान कर के ब्रह्मलोक तक पहुँचाती है।”

अथर्व वेद की भाँति ही अन्य शास्त्रों तथा ऋषियों ने भी इस महामन्त्र का जो गुणगान किया है उससे सिद्ध होता है कि गायत्री उपासना, साधक को अनेक कठिनाइयों से छुड़ाने और सुख-शाँति का अधिकारी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करती है।

ऐहिकायुष्मिकं सर्वं गायत्री जपतो भवेत् ।

-आदि पुराण।

गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनाएं पूर्ण होती हैं।

शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो क्वान राजतः।

न शस्त्रानल तोयौधात्कदाचित्संभविष्यति।

-कात्यायान

न उसे शत्रुओं का भय रहता है, न दस्युओं का, न हथियारों का, न अग्नि का वह सब प्रकार के भयों से निर्भय हो जाता है।

शास्त्रकार ने गायत्री को सर्वोपरि महत्व का साधन उपादान बताया है। वस्तुतः यदि कोई सच्चे मन से और सच्चे क्रम से इस महत्तत्व के साथ अपने को जोड़ सके तो उसे भी अपनी अनुभूतियों के आधार पर शास्त्र की उक्ति को स्वयं भी दुहराना पड़ेगा।

शास्त्र कहता है-

गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यानच्यते।

सिद्धीनाँ सा मता माता नातः किंचिद् वृहत्तरम्।

गायत्री साधना लोके न कस्यापि कदापि हि॥

याति निष्फलता मेतत् ध्रुवं सत्यं हि भूतले।

योगिकानाँ समस्तानाँ साधनानाँ वरानने॥

- शिव कैवल्य

“गायत्री ही तप है, योग है, साधन है, ध्यान है। वही सिद्धियों की माता मानी गई है। इससे बढ़ कर श्रेष्ठ तत्व इस संसार में और कोई नहीं है। कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।

गायत्री एक वैदिक छन्द तो है ही, उस छन्द के सम्यक् उच्चारण से-जो सामान्यतः मिलना चाहिए वह तो मिलता ही है। पर विशेषता एक और भी है कि इन 24 अक्षरों में प्रत्येक अक्षर एक छन्द है। प्रत्येक अक्षर अपने-अपने में एक परिपूर्ण कविता हैं। इसे 24 काव्यों का एक समन्वय गुच्छक भी कहा जा सकता है। 24 प्रभावशाली औषधियों से मिला कर बनाई हुई औषधि रसायन की तरह-24 तारों की किसी उत्कृष्ट वीणा की तरह गायत्री के 24 अक्षर अपनी विशिष्ट प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं गायत्री का हर अक्षर अपने आपमें परिपूर्ण गीत-परिपूर्ण शक्ति प्रवाह है इसका स्पष्टीकरण गायत्री तन्त्र में किया गया है। भगवान शंकर नारद जी से कहते हैं-

इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानाँ क्रमशो मुने। गायत्र्युष्णिनानुष्टुप् च बृहती पंक्ति रेव च॥

त्रिष्टुभं जगती चैव तथाऽति जगती मता। शर्क्वयतिशक्वरी च धृतिश्वातिधृतिस्तथा॥

विराट प्रस्तारपंक्तिश्च कृति प्रकृतिराकृति।

विकृतिः संस्कृतिश्चैवाक्षर पंक्ति स्तथैव च॥ भूर्भुवास्वरितिच्छन्दस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम्।

इत्येतानि न छन्दाँसि कीर्तितानि महामुने॥

“हे नारद! गायत्री मन्त्र में अक्षरों से सन्निहित अब उसके 24 छन्दों को सुनिये-गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, धृति, अति धृति, विराट् प्रस्तार-पंक्ति , कृति, प्रकृति, आकृति, संस्कृति, अक्षर-पंक्ति , भूः, भुवः स्वः ओर ज्योतिष्मती से 24 छन्द क्रम से प्रत्येक अक्षर के साथ जुड़े हुए हैं।”

अपनों से अपनी बातें-

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