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मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है, विषयासक्त मन बन्धन के लिये है और निर्विषय मन मुक्त माना जाता है।
-ब्रह्मबिंदु उप.
अमरीकी मनः चिकित्सा शास्त्री डॉक्टर वारमविन्सेन्ट पेले ने ‘अपने अनुभव’ पुस्तक में एक विवरण दिया- एक महिला जैसे ही गिरजे में जाती उसके सारे शरीर में बुरी तरह खुजली उभरती। अन्यत्र वह शान्त रहती। कई तरह से शारीरिक जाँच करने पर कुछ पता न चला तो मनः विश्लेषण किया गया। पता लगा कि वह महिला जहाँ नौकर थी उस फर्म में लगातार चोरी कर रही थी गिरजे में जाती तो उसे यह ध्यान आता कि ईश्वर के दरबार में पाप का दण्ड मिलेगा। बस उसे खुजली उभर आती, सारे शरीर में उसके लाल चकत्ते पड़े हुये थे।
मनः उपचारक की सलाह पर उस महिला ने फर्म के मालिक के सामने अपनी गलती प्रकट कर दी और चुराई हुई राशि वापस कर दी। मालिक उसकी इस आत्म-शोधन की वृति और गलती कबूल करने की हिम्मत पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने क्षमा कर दिया। इसके उपरान्त देखते-देखते उसकी वह खुजली अच्छी हो गई जो बहुत दिन में सुख रही थी और बहुत धन खर्च करने पर भी सुधरने में नहीं आ रही थी।
एक दूसरे मानसोपचारक डॉक्टर सी. डब्ल्यू. लेव ने अपने एक मरीज का अनुभव बताते हुए लिखा है- उसका एक मरीज हृदय रोग, रक्तचाप, सिरदर्द और अपच का पुराना मरीज था। औषधि चिकित्सा की दृष्टि से जो कुछ सम्भव था वह सब कुछ कर लिया गया पर बीमारी ने जरा भी घटने का नाम नहीं लिया। मानसिक स्थिति की खोज-बीन की गई तो पता लगा कि उसका बाप जो सम्पत्ति छोड़ मरा था, उसमें से उसने अपने छोटे भाई का बहुत सा हिस्सा हड़प लिया था। डॉक्टर ने वह धन लौटा देने की सलाह दी। पहले तो वह बदनामी की दृष्टि से तैयार न हुआ पर जब उसकी समझ में यह आ गया कि गलती को मंजूर कर लेना, सुधार लेना- बदनामी को धो डालने का बहुत ही अच्छा उपाय है तो वह रजामन्द हो गया और जितना पैसा भाई का लिया था वह वापिस करते हुए अपनी गलती पर दुख प्रकट किया। उसके बाद उसकी स्थिति तेजी से सुधरती चली गई और उसका रोग बिना दवा के ही अच्छा हो गया। आयुर्वेद शास्त्र का प्रतिपादन है कि ‘पूर्व जन्म के कृतं पापं व्याधि रूपेण पीड़ति।’ अर्थात् पूर्व जन्म के किये हुए पाप रोग रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ केवल पूर्व जन्म तक ही उस बात को सीमित नहीं समझना चाहिए वरन्- इस जन्म के कुविचारों और कुकर्मों का फल भी रोग रूप में प्रकट होने की बात सम्मिलित है। रोगों के संदर्भ में आहार बिहार की अस्त व्यस्तता और छूत आदि की उचित सतर्कता न बरतना भी पाप श्रेणी में लिया जा सकता है। नैतिक या सामाजिक पाप करने पर ही रोग उत्पन्न होते हों ऐसी बात नहीं, पर इतना अवश्य है कि उनके कारण भी शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं।

