मनःस्थिति का शरीर पर प्रभाव
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विलियम जैम्स का कथन है कि सौ पीछे निन्यानवे बीमारी विक्षोभ के कारण उत्पन्न होती हैं और वे शरीर पर उभरती प्रकट होती हैं। साधारणतया शरीर की रचना ऐसे अच्छे ढंग से हुई है कि थोड़ी बहुत खराबी गड़बड़ी को तो वह ऐसे ही संभाल सुधार देता है। यदि मनुष्य मानसिक दृष्टि से निरोग रहे तो दुर्बल गठन का शरीर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकेगा। इसके विपरीत यदि मानसिक स्थिति विक्षोभ ग्रस्त रहेगी तो मस्तिष्कीय नियन्त्रण उस विक्षोभ से प्रत्येक रक्त कण और जीवाणु को प्रभावित करके उसे ऐसी विकृत स्थिति में डाल देगा कि किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ रोग उठ कर खड़ा होता रहे। ऐसे मनः क्षेत्र में जड़ जमाये हुए रोग दवा दारु कराने पर भी टस से मस नहीं होते। दवा तो शरीर पर ही असर करेगी, जब जड़ मन में है तो दवा वहाँ तक कैसे पहुँचे ? इस कठिनाई के कारण अच्छी चिकित्सा भी उन्हें रोग मुक्त कर सकने में सफल नहीं होती।
कनाडा के चिकित्सकों की एक समिति यह खोज करने के लिए डॉ. हाल्डैन कैवी की अध्यक्षता में नियुक्त की गई कि रोग निदान-जाँच पड़ताल परीक्षा और सही औषधियों का उपयोग करने पर भी रोग अच्छे क्यों नहीं होते। गलती कहाँ रह जाती है। इस समिति ने लगभग 3 हजार रोगियों के लम्बे रोगों का बारीकी से अध्ययन किया और उन्हें मनोविज्ञान वेत्ताओं के पास भेजा। पता चला कि उनमें दो तिहाई मरीज भयंकर मानसिक रोगों से ग्रसित थे। बाहर से पता नहीं चलता पर भीतर ही भीतर वे घुटन के रूप में शरीर को खाते खोखला करते रहते हैं। रोग की असली जड़ वहीं होती है। ऐसे रोगी मानसिक चिकित्सा के बिना अच्छे नहीं हो सकते। औषधि चिकित्सा उन्हें सान्त्वना भर देती रहती है। कई बार तो तेज औषधियाँ उलटे उस रोग को बढ़ाने का कारण बन जाती हैं और स्वयं नये किस्म के राग उत्पन्न करती हैं।
कई मरीज उन चिकित्सकों के इलाज से मामूली और बेतुकी दवा से अच्छे हो जाते हैं जिन पर उनका विश्वास होता है उसके विपरीत उच्च कोटि की दवादारु करने पर भी वे चिकित्सक कुछ लाभ नहीं पहुँचा पाते जिनके ऊपर रोगी का विश्वास न हो। निश्चित रूप से दवा की अपेक्षा विश्वास अधिक काम करता है। झाड़ फूँक करने वालों की भस्म भभूत कई बार इसी कारण जादू जैसा चमत्कार दिखाती देखी गई है कि उस पर रोगी का गहरा विश्वास जमा होता है। भूत का सारा अस्तित्व मरीज की मान्यता पर टिका हुआ है। भय भरी आशंका ही विश्वास के रूप में विकसित होकर भूत बन जाती है और ओझा स्याने अपने तन्त्र, मन्त्र द्वारा उन भूतों को बुलाने, कुछ कहलवाने और भगाने जैसे अटपटे काम करके रोगी को अच्छा कर देते हैं। यह विश्वास शक्ति के चमत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
विश्वास और औषधि दोनों की तुलना करते हुए अधिक प्रभावी विश्वास को ही पाया गया है। डॉक्टर जान शिंडलर ने अपने चिकित्सा अनुभवों का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘कई बार ऐसे रोगी आते हैं जिनका इलाज किसी दवा से नहीं हो सकता। तब मैं यह सोचता हूँ काश मुझे भी ओझाओं जैसी हरकतें करने की छूट रहती तो यह रोगी अच्छे किये जा सकते थे।’
किस जमाने में मानसिक विश्लेषण को एक अलग पद्धति माना जाता था। अब उसे समग्र उपचार का एक अभिन्न और आवश्यक अंग मान लिया गया है। केवल तापमान, रक्त चाप, मलमूत्र एवं रक्त विश्लेषण आदि शरीर परीक्षा के माध्यम से रोग का कारण जानने की बात अब अधूरी मानी जाती है और रोगी की मानसिक स्थिति का लेखा-जोखा लेना भी आवश्यक समझा जाता है और चिकित्सा में ऐसी प्रक्रिया का समावेश किया जाता है जिससे रोगी का अधिक विश्वास एवं सहयोग अर्जित किया जा सके। रोगी यदि चिकित्सक से या चिकित्सा पद्धति से रुष्ट असंतुष्ट रहा तो फिर कारगर औषधि उपचार से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा। अब शरीर शास्त्र और मनः शास्त्र के दोनों पहियों को समान रूप से महत्व देकर स्वास्थ्य समस्या के समाधान की बात सोची जा रही है। चिकित्सा विज्ञान के नये कदम अब इसी दिशा में उठ रहे हैं।
व्यक्तित्व का विकास बौद्धिक और भावनात्मक स्तर की उन्नति के साथ जुड़ा हुआ है। समुन्नत कहे जाने वाले लोग अपनी चिन्तन क्षमता बढ़ाते हैं। यह अच्छी बात है यदि दृष्टिकोण सुलझा हुआ रहे और विचार करने की कला के अनुरूप वह विकसित व्यक्तित्व की प्रक्रिया चलती रहे, तब तो निस्संदेह एक बड़े सौभाग्य के जीवन को सुख शान्ति से भर देने वाली उपलब्धि है पर यदि कहीं उनका अशुभ और अशुद्ध चिन्तन चल पड़े तो अंतर्द्वंद्व जन्य विपत्ति में भी वे ही अधिक फँसते हैं। अविकसित लोगों की न बुद्धि विकसित होती है न भावना। वे परिस्थितियों को बहुत हलकी दृष्टि से देखते हैं और भोजन वस्त्र प्राथमिक आवश्यकताओं के पूरा होते रहने पर संतुष्ट रहते हैं। उन्हें मान, अपमान, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध, आशा, महत्वाकाँक्षा, वासना, तृष्णा, लोभ, मोह, यश, सम्मान आदि की अनेक बातें प्रभावित करती हैं। इनमें जहाँ-जहाँ अवरोध रहते हैं वहीं उन्हें मानसिक उद्वेग आ घेरते हैं और उसका समाधान न ढूंढ़ सकने के कारण आरोग्य संतुलन खो बैठते हैं। सम्मान, शिक्षा, पद आर्थिक सुविधाएं रहते हुए भी आज पिछड़े कहलाने वालों की तुलना में वे लोग ही अधिक बीमार पड़ते हैं जिन्हें बुद्धिजीवी कहा जाता है।
क्रोध आवेश से आक्रान्त मनुष्य की आवाज काँपने लगती है, मुँह लाल पड़ जाता है, पुतली फैल जाती है, आँखों में लाल डोरे पड़ जाते हैं, मुट्ठियाँ भिंचती हैं, बांहें फड़कती हैं, होठ भिंचते हैं और शरीर थरथराने लगता है। यह सारे लक्षण इस बात के हैं कि शरीर की सामान्य क्रिया अस्त व्यस्त हो गई और किसी संभावित विपत्ति का सामना करने के लिए जीवनी शक्ति ने अपनी सारी क्षमता एकत्रित कर ली। जिस प्रकार कोई व्यक्ति संकट की स्थिति में अपना घर बार बेचकर भागना चाहता है और सामान असवाब के औने पौने पैसे इकट्ठे कर लेता है इसी प्रकार हमारा अचेतन क्रोध को एक भूकम्प विस्फोट जैसी विपत्ति मानता है और उस स्थिति का सामना करने के लिए अनेक उपयोगी कार्यों में लगी हुई सारी शक्ति को सब जगह से छुड़ाकर एक जगह इकट्ठी कर लेता है। क्रोध के समय मनुष्य में अतिरिक्त सामर्थ्य देखी जाती है। कमजोर आदमी भी बलवान पर आक्रमण कर बैठता है और उस आवेश ग्रस्त से डरकर बलवान को भी भागना पड़ता है। यह तो हुई सामयिक बात। पर जैसे सामान असवाब बेचकर फिर दुबारा खरीदने की व्यवस्था बनाने में उसे दुहरा घाटा उठाना पड़ता है उसी प्रकार क्रोध प्रयोजन के लिए अन्य कामों से हटाकर शक्ति का जमा करना और फिर उसे वितरण करना निश्चित रूप से घाटे का काम है। जिस प्रकार भट्ठी गरम करने में बहुत सा ईंधन जल जाता है उसी प्रकार क्रोध की स्थिति में जो शरीर रूपी भट्ठी गरम की जाती है इसमें ढेरों का ढेरों वह ईंधन जल जाता है जो स्वास्थ्य संतुलन के लिए नितान्त आवश्यक था। डॉ. कैनाल्ड के अनुसार आधा घन्टे के क्रोधावेश में तीन दिन तक बुखार आने की बराबर जीवनी शक्ति जल जाती है।
अपने विषय के पारंगत इंग्लैंड के अति प्रख्यात डॉक्टर जान हन्टर क्रोधी स्वभाव के थे। उनकी पत्नी झगड़ालू प्रकृति की थी। रोज की बकझक ने हन्टर के स्वभाव को चिड़चिड़ा बनाते बनाते अत्यन्त उग्र बना दिया था। वे बहुत क्रोधी हो गये थे और तनिक-तनिक सी बात पर आग बबूला हो जाते थे। वे इस बुराई को समझते थे और दिल से चाहते थे कि यह कुटेब छूट जाय पर वह आदत उन पर ऐसी हावी हो गई थी कि कुछ बन नहीं पड़ता था, जब आवेश आता तो उनके लिए अपने को संभाल सकना संभव ही न होता था।
डॉक्टर हण्टर ने भविष्यवाणी की कि मैं किसी दिन क्रोध के आवेश में ही अपने प्राण खो दूँगा। हुआ भी ऐसा ही डाक्टरों की एक गोष्ठी में किसी साधारण से विवाद पर उन्हें इतना आवेश आया कि वहीं उन्हें दिल का दौरा पड़ गया और उसी में वे चल बसे।
सामान्यतः रक्त का दबाव 130 रहता है पर क्रोध की स्थिति में वह 230 से भी ऊपर निकल जाता है हृदय की धड़कन यों 180 बार प्रतिमिनट होनी चाहिए पर क्रोध में वह 220 से भी आगे बढ़ जाती है। चोट लगने पर दर्द की वजह से रक्त में तत्काल थक्के बनना शुरू हो जाते हैं ताकि चोट के स्थान से अधिक रक्त न बहे और वह जम जाय। शरीर का अचेतन यह मान लेता है कि क्रोध का आवेश कुछ विपत्ति बुलायेगा, कहीं मरेगा पिटेगा। उस आशंका से रक्त पूर्व तैयारी करना शुरू कर देता है और खून में थक्के बनने शुरू हो जाते हैं। भयंकर विपत्ति के समय तात्कालिक आवश्यकता की बात अलग है, सामान्यतया रक्त में थक्के बनना चिन्ता का विषय है। वे थक्के हृदय में गतिरोध पैदा करके प्राण संकट उपस्थित कर सकते हैं।
क्रोध का सबसे बुरा प्रभाव आँतों पर पड़ता है। वे बेतरह ऐंठती और सिकुड़ती हैं, इस ऐंठन सिकुड़न का तात्कालिक प्रभाव तो अपच, पेट का भारी पन, भूख बन्द हो जाना, पेट में हलका दर्द होने लगना जैसे लक्षणों में दीख ही पड़ता है। बार-बार क्रोध करने पर आँतों को इसी तरह की आदत पड़ जाती है। फिर समय समय पर बिना क्रोध के भी वैसी ही सिकुड़न और ऐंठन होने लगती है। फलतः पाचन क्रिया का स्वाभाविक ढर्रा ही खराब हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों की आँतों की सूजन-कोलाइ विस और आत्माशय शोथ-अल्सर जैसी शिकायतें उठ खड़ी होती हैं।
लेखक विचारक, विद्वान, वकील, अध्यापक, नेता, प्रबन्धक आदि को अक्सर पेट में अल्सर की, मस्तिष्क में अनिद्रा की, पेशाब में शक्कर की, रक्त में उत्तेजना की, हृदय में अवरोध की शिकायतें अत्यधिक मात्रा में बढ़ती जा रही हैं। इसका कारण मोटी समझ से नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वैसे इन्हें श्रम कम करना पड़ता है। आराम अधिक मिलता है, खुराक अच्छी खाते हैं। स्वास्थ्य के नियम भी जानते हैं और अच्छी चिकित्सा के साधनों की भी कमी नहीं रहती। इस पर भी यह वर्ग रुग्ण क्यों रहता है जब कि इन सब सुविधाओं से रहित निर्धन और अशिक्षित वर्ग तुलनात्मक दृष्टि से कहीं अधिक निरोग पाया जाता है। इसका एकमात्र कारण उनकी मानसिक उलझनें, प्रतिस्पर्धा और महत्वाकाँक्षाएं जैसी असंतुष्ट एवं अतृप्त आकाँक्षाएं ही होती हैं। खोये-खोये रहते हैं और यह उद्विग्नता उन्हें रुग्णता के गर्त में धकेल देती है।
डॉ. शिडलर ने एक ऐसे मरीज का किस्सा लिखा है जिसे निरन्तर चक्कर आते थे। तीन महीने तक बढ़िया इलाज करने पर भी कुछ परिणाम न निकला तो उनसे उसके मनोवैज्ञानिक कारण जाने। मालूम हुआ कि कुछ दिन पूर्व उनकी प्यारी पत्नी की मृत्यु हो गई थी और उनने उसकी हर चीज संभाल कर रखी थी। घर आता तो एक चीज के साथ जुड़ी हुई स्मृतियों को याद करता और बिलख बिलख कर रोता। यही कारण चक्कर आने की बीमारी के रूप में परिवर्तित हो गया। डाक्टरों ने उसे मृत पत्नी का सामान हटा देने, मकान बदल देने और दूसरा विवाह करने की सलाह दी। उसने वैसा ही किया और धीरे-धीरे उस कष्ट साध्य रोग से मुक्त हो गया जो बहुत इलाज और खर्च करने पर भी अच्छा नहीं हो रहा था।

