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Magazine - Year 1972 - Version 2

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तनाव दूर करने के लिए शिथिलीकरण साधिए।

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तनाव के दो कारण होते हैं- एक शारीरिक, दूसरा मानसिक। अधिक काम करने से, विश्राम न लेने से, नशे पीने या शीत ताप की अधिकता जैसे शरीर पर अतिरिक्त बोझ डालने वाले कारण से शरीर संस्थान उत्तेजित हो उठता है और प्यास, थकान, सिर दर्द, बेचैनी, नींद न आना, दाह जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

मानसिक कारणों में क्रोध, आवेश, उत्तेजना मुख्य हैं। चिन्ता, भय, शोक, उदासी, कुढ़न, ईर्ष्या आदि कारणों से भी तनाव बढ़ जाता है। कपटी, षड्यंत्रकारी और आतंकवादी व्यक्ति अपनी उद्धत गतिविधियों के कारण मन को बुरी तरह उत्तेजित कर देते हैं और तनाव बढ़ जाता है। यह मानसिक विकृतियाँ रक्त में अम्लता बढ़ाती हैं, पाचन क्रिया बिगाड़ती हैं और शरीर को रुग्ण बना देती हैं।

मानसिक उद्वेगों के कारण माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान के मिलन केन्द्रों पर एसिटिल कोलेन नामक पदार्थ बनने लगता है। यह अन्य पदार्थों के साथ मिलकर कार्बन और कोगल का निर्माण करता है। इसी स्थिति में लैक्टिक अम्ल भी बनने लगता है जिससे शरीर की मुलायमी चली जाती है और कड़ापन बढ़ने लगता है। यह कड़ापन रक्त प्रवाह और पेशी सञ्चालन में अवरोध उत्पन्न करती है। यहीं से कई प्रकार के रोग होना शुरू हो जाते हैं।

कैल्शियम और मैग्नेशियम फास्फोरस की कमी से जो शारीरिक तनाव उत्पन्न होता है उसकी पूर्ति दही, दूध, पनीर, विटामिन डी., पालक, चुकन्दर, गेहूँ, खजूर जैसे पदार्थ लेकर पूरी करली जाती है। इसी प्रकार आहार विहार की गड़बड़ी का सुधार एवं थकान को विश्राम से ठीक किया जा सकता है। कठिनाई उस तनाव को दूर करने में आती है जो मनोविकारों के कारण उत्पन्न होता है। यदि सोचने का ढंग सुधारा न जाय, प्रसन्न और भार मुक्त रहने का स्वभाव न बनाया जाय तो फिर ‘तनाव’ के कष्ट से छुटकारा पाना कठिन है। इस कष्ट से स्थायी मुक्ति तभी मिल सकती है जब अपने चिन्तन और स्वभाव में सज्जनता एवं शालीनता की मात्रा बढ़ाकर चित्त को हलका और उल्लसित रखा जाय।

मानसिक तनाव दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि सरल, निर्मल और निष्कपट जीवन जिया जाय। महत्वाकाँक्षाएं उतनी रखी जायें जो आज की स्थिति में सम्भव हों। अक्सर लोग ऐसी कल्पनाएं और आकाँक्षाएं गढ़ते रहते हैं जो साधन सम्पन्न स्थिति में ही सम्भव हैं। अभी से उनके लिए ललचाते रहने पर अकारण असन्तोष और उद्वेग उत्पन्न होता है और मानसिक तनाव बढ़ता है। उन्नति की योजनाएं तो बनानी चाहिए पर उनकी पूर्ति के लिए आतुर नहीं होना चाहिए विशेषतया तब, जबकि उस स्तर की सफलता प्राप्त करने के साधन अपने पास नहीं हैं। ऐसा मानसिक सन्तुलन गीता में ‘स्थिति प्रज्ञ’ स्थिति कही गई है। मानसिक तनाव से बचते हुए अधिक सफलता प्राप्त करने का यही उचित तरीका भी है।

क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, चिन्ता, भय का वास्तविक कारण बहुत स्वल्प होता है। यह मनोविकार कल्पनाशक्ति की अव्यवस्था और दृष्टिकोण उलझा हुआ होने के कारण ही उत्पन्न होते हैं। इन्हें अपनाकर मनुष्य अपनी विवेक बुद्धि खो बैठता है और किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर उलटे-पुलटे काम करता है, फलस्वरूप स्थिति और भी बिगड़ जाती है। ऐसे ही कारणों को लेकर आमतौर से लोग उद्विग्न रहते हैं और मानसिक तनाव से घिरे रहकर अपने स्वास्थ्य को अपार हानि पहुँचाते हैं। इस मनःस्थिति को साहसपूर्वक सुधारना-स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक है।

तनाव कम करने के उपचारों में सबसे सरल और उपयोगी शिथिलीकरण प्रक्रिया है। कुछ समय के लिये शरीर को, मन को अधिकाधिक निःचेष्ट बना देने से थकान में बड़ी कमी आती है। प्रकृति यह कार्य रात्रि को सोने का अवसर देकर सम्पन्न करती है। योगी लोग समाधि में यही कार्य करते हैं वे शरीर ही नहीं मन को भी चेष्टा रहित बना देते हैं। कायाकल्प की योग प्रक्रिया में भी यही होता है- कलेक्शेशन- शिथिलीकरण का उपयोग करके कितने ही प्राणी अपने क्षरण की पूर्ति करते हैं और आगे अधिक काम करने की क्षमता संग्रह कर लेते हैं।

शीत ऋतु में रीछ, साँप आदि कितने ही प्राणी चुपचाप इस तरह पड़ जाते हैं कि करवट बदलने की भी यदाकदा ही आवश्यकता पड़ती है। इस विश्राँति से शरीर की क्षति बची रहती है, फलतः बिना भोजन के भी काम चला लेते हैं। निराहार रहने के कारण जो दुर्बलता आनी चाहिए वह भी नहीं आती वरन् भोजन करते रहने के दिनों की अपेक्षा और भी अधिक स्फूर्तिवान होकर उठते हैं। लंघन के रोगी जब अच्छे होते हैं तो उनकी भूख बढ़ जाती है और शरीर की क्षतिपूर्ति जल्दी ही हो जाती है प्रसव के उपरान्त जच्चा को भी शिशुजन्म की थकान को दूर करने के लिये नई चेतना प्राप्त होती है। पर यह होता तभी है जब उसे इस बीच समुचित विश्राम मिल जाय। कुत्ते, बिल्ली आदि कई जानवर शरीर को पूरी तरह शिथिल करके पड़ जाते हैं और उतने से ही नींद की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं।

नींद और शिथिलीकरण में यह अन्तर है कि नींद में करवटें बदलने जैसा और स्वप्न देखने जैसा श्रम तो चलता ही रहता है। शिथिलीकरण में मनोयोगपूर्वक उसे भी बन्द कर दिया जाता है। शरीर और मन दोनों को ही पूरी तरह निःचेष्ट होकर कुछ समय के लिये विश्राम की स्थिति में पड़ा रहना ही शिथिलीकरण है, इससे तनाव घटाने और नई स्फूर्ति प्राप्त करने में बड़ी सहायता मिलती है।

योग साधना में इसे ‘शव आसन’ कहते हैं। बौद्ध सम्प्रदाय में यह क्रिया “अनापान स्रति” के नाम से प्रख्यात है।

आराम कुर्सी, पलंग, चटाई, गद्दी, दीवार के सहारे जहाँ भी सुविधा हो यह आसन किया जा सकता है। चित्त पीठ के बल लेट जाइये। हाथ पैर सीधे रखिये। शरीर ढीला छोड़िये। इतना ढीला-इतना ढीला मानो उसमें से प्राण ही निकल गया हो, सर्वथा निर्जीव स्थिति हो गई हो। इस भावना को अंग-प्रत्यंगों में उतारने में कुछ समय लगता है। आरम्भ में मन कम ही ढील छोड़ता है और अवयव भी अपना तनाव कम ही शिथिल करते हैं। पर प्रबल इच्छा शक्ति-मस्तिष्क के समर्थ निर्देश और भावना को श्रद्धा में परिणत करने की चेष्टा के संयुक्त प्रयत्न कुछ समय में सफल होने लगते हैं और शरीर सचमुच इतना ढीला लगने लगता है मानो वह पूर्णतया अशक्त हो गया हो। हिलने-डुलने तक की क्षमता खो बैठा हो। पैर के अंगूठे से लेकर सिर की चोटी तक मन को यह निरीक्षण एवं अनुभव करने देना चाहिए कि समस्त माँस पेशियाँ और रक्त वाहिनियाँ अपना काम बन्द करके पूर्ण विश्राम का आनन्द ले रही हैं और सर्वथा शिथिल पड़ी हैं।

शरीर के बाद मन का नम्बर आता है। जब देह में पूर्णतया शिथिलता अनुभव होने लगे तो उसी प्रकार विश्राम मन को देना चाहिए। मस्तिष्क मानों नींद में चला गया हो, गहरी निद्रा की मनः स्थिति बन गई हो चित्त जागृति और स्वप्न की स्थिति से आगे बढ़कर सुषुप्ति और तुर्या स्थिति में पड़ा हुआ पूर्ण शान्ति-विश्रान्ति का अनुभव कर रहा हो। न कोई चिन्ता, न इच्छा, न आकर्षण। पूर्ण निश्चिन्तता और निर्द्वन्दता की स्थिति विचारों से सर्वथा रहित मन।

शिथिलीकरण का प्रयोग किसी भी थके हुए क्षतिग्रस्त रोगी को अपनी जीवनी शक्ति पुनः अर्जित करने में बहुत सहायक सिद्ध होता है। मनः शास्त्री डॉक्टर विलियम ब्राउन ने द्वितीय महायुद्ध में मानसिक रुग्णता ग्रस्त अनेकों सैनिकों को इस उपचार से अपनी खोई हुई मानसिक क्षमता पुनः प्राप्त करने में सफल बनाया था। उसने मानसोपचार की दृष्टि से इसे बहुत ही सफल साधन बताया है।

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