• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • आत्म-देव की उपासना
    • जीवन का अर्थ
    • विज्ञान से सिद्ध न होने पर भी ईश्वर है ही।
    • देव-सत्ता और असुर-सत्ता का अस्तित्व
    • अन्धे शिक्षक गोपाल शर्मा (Kahani)
    • भगवान की सर्वोत्कृष्ट रचना-मनुष्य कलेवर
    • राज्य तन्त्र (Kahani)
    • ज्ञान और कर्म ही नहीं भक्ति भी अपेक्षित है।
    • Quotation
    • जीवन का महत्व समझें और उसका सदुपयोग करें।
    • Quotation
    • मन को शासक नहीं, सेवक बनाया जाय।
    • जीव जगत और विधाता की विनोद प्रियता
    • कुसंस्कारी मन की दुःखदायी प्रतिक्रिया
    • Quotation
    • प्रथम अंग दान (Kahani)
    • बुढ़ापा आपके मन का भ्रम मात्र है।
    • मनःस्थिति का शरीर पर प्रभाव
    • Quotation
    • चन्द्रमा के संदेश संकेत जो हमारे लिये आते हैं।
    • प्रचण्ड वाक्शक्ति का चमत्कारी उपयोग
    • बूँद समुद्र में मिल गई (Kahani)
    • सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी
    • Quotation
    • Quotation
    • सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों?
    • Quotation
    • तनाव दूर करने के लिए शिथिलीकरण साधिए।
    • प्रेमास्पद के चुनाव में सतर्कता बरतें।
    • Quotation
    • न्यूजीलैण्ड के दो नन्हें जीव (Kahani)
    • यज्ञ का स्वास्थ्य पर प्रभाव
    • जलबिन्दु भाप बनकर (Kahani)
    • दुष्कर्मों का कलुष प्रायश्चित्य से ही मिटेगा।
    • Quotation
    • अपने जीवन के उद्देश्य (Kahani)
    • स्वप्नों में सन्निहित महत्वपूर्ण संकेत
    • Quotation
    • एक कुष्ठी भिक्षा माँग रहा था (Kahani)
    • कुण्डलिनी जागरण से अनेक देवताओं का उद्भव
    • आजादी सत्प्रवृत्तियों को मिले-दुष्प्रवृत्तियों को नहीं
    • एक सन्त कह रहे थे (Kahani)
    • दुःख और दुष्टता की जननी- दुर्बलता
    • Quotation
    • गुरुदेव की विश्व यात्रा तथा पंचवर्षीय क्रिया पद्धति
    • गुरुकुल में अध्ययन किया (Kahani)
    • उभरते युग बोध
    • उभरते युग बोध (Kavita)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1972 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


विज्ञान से सिद्ध न होने पर भी ईश्वर है ही।

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 2 4 Last
नास्तिकों का कथन है कि ईश्वर में विश्वास रखना अन्धविश्वास मात्र है। जब विज्ञान द्वारा ईश्वरीय सत्ता सिद्ध ही नहीं होती तो उसे माना ही क्यों जाये? परन्तु यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हम केवल उन्हीं बातों पर विश्वास करते हैं कि जो विज्ञान की कसौटी पर प्रामाणिकता पा चुकी हों? उत्तर मिलता है नहीं। जीवन के कितने ही आदर्श ऐसे हैं जिनकी पुष्टि विज्ञान से नहीं अपितु अन्तरात्मा से होती है। नीति शास्त्र भी ऐसा ही विषय है जो विज्ञान की दृष्टि से निरर्थक ठहरता है, वस्तुतः जिसे विज्ञान कहा जाता है वह पदार्थ-विज्ञान है। इस पदार्थ-विज्ञान द्वारा द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म ईश्वरीय तत्वों तक कैसे पहुँच जा सकता है?

अनेकों बातें ऐसी हैं जो वैज्ञानिक दृष्टि से अर्थहीन हैं परन्तु सामाजिक अभ्युन्नति के लिए वे मेरुदण्ड के समान हैं। उदाहरणार्थ विज्ञान की दृष्टि में नर और मादा का यौन सम्पर्क अत्यन्त स्वाभाविक है। पशु-पक्षी भी ऐसा करते हैं। उनमें माता, बहन या पुत्री के सम्बन्ध का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता, लेकिन मानव-समाज में माता, बहिन या पुत्री के साथ यौनाचार नितान्त पापाचार है। परन्तु यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन-सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है तो क्या हम इसकी व्यर्थता को मानकर माता-बहिन तथा पुत्री की मर्यादा को छोड़ देंगे ?

विज्ञान के अनुसार जीव-जीव का भोजन है प्रत्येक प्राणी के लिए अपने स्वार्थ की पूर्ति-पेट और प्रजनन परक जीवन ही प्रधान है। स्वार्थ-परत तथा चार्वाकों जैसे स्वच्छन्द भोगवाद का विरोध विज्ञान के आधार पर नहीं किया जा सकता। हाँ, समर्थन अवश्य हो सकता है। परन्तु यदि परोपकार, करुणा, सहानुभूति, त्याग, सेवा, सहिष्णुता जैसी सत्प्रवृत्तियों को मानव जीवन में बहिष्कृत कर दिया जाये तो सामाजिक सुख-शान्ति स्वप्न मात्र ही रह जायेगी।

विज्ञान के अनुसार मृत्यु से डरना प्रत्येक प्राणी का स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म से आबद्ध मान लिया जाये तो मातृभूमि की बलिवेदी पर हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान देने वाले वीर सैनिक प्रकृति विरोधी एवं महामूर्ख ही कहे जायेंगे। वे जान-बूझकर मृत्युपाश को गले क्यों लगाते हैं, इसका उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। इस प्रकार यह सुस्पष्ट है कि अनेक प्रश्नों का उत्तर विज्ञान के पास नहीं है और इसी प्रकार ईश्वर की सिद्धि असिद्धि में भी वह नितान्त असमर्थ है।

कुछ लोक कहते हैं कि प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर जिस वस्तु की सत्ता सिद्ध हो, उसे ही माना जाये। क्योंकि प्रत्यक्ष के आधार पर ईश्वरीय सत्ता सिद्ध नहीं होती अतएव उसे मानना रूढ़ि या परम्परा मात्र है। परन्तु यह तर्क भी उचित नहीं। प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर प्रत्येक वस्तु को सिद्ध नहीं किया जा सकता। उसके द्वारा तो यह भी सिद्ध नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता कौन है। परन्तु माता की साक्षी को ही इसके लिए पर्याप्त मान लिया जाता है।

‘ईश्वर दिखलाई नहीं देता इसलिए उसे माना न जाये’ यह तर्क नितान्त सारहीन है। अनेकों वस्तुएँ ऐसी हैं जो दिखलाई नहीं पड़तीं परन्तु फिर भी उन्हें अनुभव किया तथा माना जाता है। उदाहरणतः अपने नेत्र में लगा अञ्जन अपने को ही कहाँ दिखाई पड़ता है? सरोवर में बादलों के क्रोड़ से गिरे जलबिन्दुओं को कोई देख पाता है ? यद्यपि तारकगणों की सत्ता दिन में भी होती है परन्तु सूर्य के प्रकाश से अभिभूत होने के कारण वे कहाँ दृष्टिगत आते हैं ? बहुत सूक्ष्म वस्तु भी कहाँ दिखाई देती है? आकाश में छाये जलकण कहाँ दिखलाई देते हैं ? दूध में यद्यपि मक्खन की सत्ता होती है परन्तु वह दिखलाई नहीं पड़ती। जल में नमक घुल जाता है तो दिखलाई नहीं पड़ता परन्तु जल में उसका अस्तित्व नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मित्र के घर जाने पर यदि वहाँ मित्र नहीं मिलता तो हम उसका अभाव नहीं मानते। इसी प्रकार वस्तु के प्रत्यक्षतः प्राप्त न होने से ही उसका सर्वथा अभाव नहीं मानना चाहिए।

ईश्वर के अस्तित्व से केवल इसलिये मना करना कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण तथा आज के अविकसित विज्ञान के आधार पर सिद्ध नहीं होता, कोई महत्वपूर्ण कारण नहीं है। मानव जीवन से सम्बन्धित अनेकों प्रश्नों का उत्तर पदार्थ विज्ञान से नहीं अपितु उस अध्यात्म-विज्ञान से सुलझता है, जिसे आज हम पदार्थवादी बनकर विस्मृत करते जा रहे हैं। ईश्वर का अस्तित्व भी अध्यात्म-विज्ञान से ही सिद्ध होता है। तपः पूत ऋषि जन अपनी दिव्य दृष्टि से उस दिव्य तत्व की अनुभूति करते हैं।

इस नाना नाम रूपात्मक सृष्टि को बनाने वाला परमपिता परमेश्वर है। बिना कर्ता के क्रिया हो ही नहीं सकती। रंग ब्रुश आदि सभी उपकरण उपस्थित रहने पर भी क्या बिना चित्रकार के चित्र बनेगा? सृष्टि के जड़ पदार्थों में चेतना भरने वाला तथा कोटि-कोटि जीवों को बनाने वाला वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्व शक्तिशाली कारीगर ही है। सारी प्रकृति उससे व्याप्त है। प्राणियों की चेतना उस विशाल चेतना का ही अंश है। विश्व की सुन्दरता और सौम्यता उसकी ही सुन्दरता और सौम्यता है। सृष्टि के कण-कण में वह किसी न किसी रूप में विद्यमान है। जिस प्रकार रजकण और पृथ्वी में कोई विभेद नहीं होता, वह उसका ही अंश होता है उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा में भी कोई अन्तर नहीं। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। परन्तु जिस प्रकार बादल-दल से सूर्य का प्रकाश अप्रतिहत हो जाता है उसी प्रकार अज्ञान से अप्रतिहत होने के कारण हम आत्मतत्व को अपने आपको भूल जाते हैं और लक्ष्य विमुख होकर भटकते रहते हैं।

संसार में हम देखते हैं कि कोई प्राणी तो स्वर्गोपम जीवन व्यतीत करता है परन्तु कोई नारकीय यन्त्रणाओं में फँसा तिलमिलाता है। सुख प्राप्ति की प्राणिमात्र की स्वाभाविक इच्छा होती है। परन्तु इसमें परवशता क्यों सहनी होती है? कोई गधा, बैल, सर्प और छिपकली बनता है तो कोई सुसम्पन्न, श्री समृद्धि युक्त परिवार में जन्म लेता है। इनका एकमात्र उत्तर यही है कि कोई ऐसा न्यायाधीश है जो हमारे कर्मों के अनुसार फल देता है- सुख दुःख भोगने को विवश करता है। समाज की आँखों में, पुलिस की आँखों में धूल झोंकी जा सकती है परन्तु उस घट-घट वासी परमेश्वर की दृष्टि से हमारा कोई कार्य छिप नहीं सकता। हमारे कर्मों का अच्छा या बुरा फल वह हमें असम्भाव्य रूप से देता है। कर्मफल के आधार पर भी ईश्वर की सत्ता सिद्ध होती है।

तपोनिष्ठ आर्ष मुनियों ने मानव-जीवन में आस्तिकता को जो महत्वपूर्ण स्थान दिया है, वह उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। उनकी सूक्ष्म ग्राहिणी बुद्धि ने यह अनुमान लगा लिया था कि मनुष्य एक दिन अपनी बुद्धि एवं प्रकृति का दुरुपयोग कर कुमार्गगामी बन सकता है तथा शान्ति एवं सुव्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है। इस पथ भ्रष्टता से बचाने के लिए ही उन्होंने आस्तिकता को जीवन का प्रथम आधार बनाया। ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, उसकी दृष्टि से हमारा कोई भी कार्य छिप नहीं सकता, उसकी न्याय-व्यवस्था हर किसी के लिए समान है- ये मान्यताएँ पापों से बचाती हैं तथा सदाचार और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन में सहायक बनती हैं। ईश्वरीय नियमों में विश्वास रखकर ही अब तक की मानव जाति की प्रगति सम्भव हुई है।

ईश्वरीय सत्ता के साथ तद्रूपता बनाये रखना न तो दुस्साध्य है, न असम्भाव्य। मनुष्य अपने दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को दूर करके, काम, क्रोध, लोभ, मोह, छल, प्रपंच, अहंमन्यता, संकीर्णता, स्वार्थपरता का त्याग करके ईश्वरीय तत्वों के समीप पहुँचता जाता है। जिस प्रकार से पर्वत के क्रोड़ से निकल कर बहती हुई सरिता सागर में स्वयं को समर्पित कर उसमें विलय हो जाती है, उसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सभी ईश्वर के चरणों में समर्पित कर, अपनी चेतना को उसमें एकाकार कर मनुष्य भी उसमें एक रूप हो सकता है। फिर उसमें और ईश्वर में कोई विभेद नहीं रह जाता। उसकी वाणी ईश्वर की वाणी होती है, उसका मार्ग-दर्शन ईश्वर का मार्ग-दर्शन होता है। श्रीकृष्ण, श्रीराम, गौतम बुद्ध, ईसामसीह, गुरुनानक आदि इसके उदाहरण हैं ।

First 2 4 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • आत्म-देव की उपासना
  • जीवन का अर्थ
  • विज्ञान से सिद्ध न होने पर भी ईश्वर है ही।
  • देव-सत्ता और असुर-सत्ता का अस्तित्व
  • अन्धे शिक्षक गोपाल शर्मा (Kahani)
  • भगवान की सर्वोत्कृष्ट रचना-मनुष्य कलेवर
  • राज्य तन्त्र (Kahani)
  • ज्ञान और कर्म ही नहीं भक्ति भी अपेक्षित है।
  • Quotation
  • जीवन का महत्व समझें और उसका सदुपयोग करें।
  • Quotation
  • मन को शासक नहीं, सेवक बनाया जाय।
  • जीव जगत और विधाता की विनोद प्रियता
  • कुसंस्कारी मन की दुःखदायी प्रतिक्रिया
  • Quotation
  • प्रथम अंग दान (Kahani)
  • बुढ़ापा आपके मन का भ्रम मात्र है।
  • मनःस्थिति का शरीर पर प्रभाव
  • Quotation
  • चन्द्रमा के संदेश संकेत जो हमारे लिये आते हैं।
  • प्रचण्ड वाक्शक्ति का चमत्कारी उपयोग
  • बूँद समुद्र में मिल गई (Kahani)
  • सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी
  • Quotation
  • Quotation
  • सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों?
  • Quotation
  • तनाव दूर करने के लिए शिथिलीकरण साधिए।
  • प्रेमास्पद के चुनाव में सतर्कता बरतें।
  • Quotation
  • न्यूजीलैण्ड के दो नन्हें जीव (Kahani)
  • यज्ञ का स्वास्थ्य पर प्रभाव
  • जलबिन्दु भाप बनकर (Kahani)
  • दुष्कर्मों का कलुष प्रायश्चित्य से ही मिटेगा।
  • Quotation
  • अपने जीवन के उद्देश्य (Kahani)
  • स्वप्नों में सन्निहित महत्वपूर्ण संकेत
  • Quotation
  • एक कुष्ठी भिक्षा माँग रहा था (Kahani)
  • कुण्डलिनी जागरण से अनेक देवताओं का उद्भव
  • आजादी सत्प्रवृत्तियों को मिले-दुष्प्रवृत्तियों को नहीं
  • एक सन्त कह रहे थे (Kahani)
  • दुःख और दुष्टता की जननी- दुर्बलता
  • Quotation
  • गुरुदेव की विश्व यात्रा तथा पंचवर्षीय क्रिया पद्धति
  • गुरुकुल में अध्ययन किया (Kahani)
  • उभरते युग बोध
  • उभरते युग बोध (Kavita)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj