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Magazine - Year 1972 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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दुष्कर्मों का कलुष प्रायश्चित्य से ही मिटेगा।

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कर्मफल भोगने की प्रक्रिया शाश्वत है, विश्व की सारी क्रम व्यवस्था उसी आधार पर चल रही है। यदि कर्मफल संदिग्ध रहता तो फिर सत्कर्म करने का कष्ट सहने और दुष्कर्म से तात्कालिक लाभ प्राप्त करने का प्रलोभन छोड़ने को कोई कदापि तैयार न होता, फिर कर्म अकर्म के बीच भेद करने की आवश्यकता ही क्या रहती। स्वभावतः मनुष्य इतना उदार और महान नहीं है कि मात्र आदर्शों की रक्षा और लोक मंगल की बात सोचकर स्वार्थ, त्यागी और कर्त्तव्य परायण बना रहे। उसकी पशुता को नियन्त्रित करने में कर्मफल का विधान बहुत काम करता है।

पशु जब कुमार्ग पर चलता है तो पीठ पर डण्डा पड़ता है। उस भय से वह रास्ते पर आ जाता है। दुष्कर्मों का दण्ड विधान मनुष्यों को अवाँछनीय रीति-नीति न अपनाने के लिये बाध्य करता है। उसी प्रकार घास, चारे का लोभ देकर गधे को, रोटी का टुकड़ा दिखाकर कुत्ते को दूर तक ले जाया जा सकता है। शुभ कर्मों के सत्परिणाम भी ऐसे ही प्रलोभन हैं जिनकी आकाँक्षा से मनुष्य सन्मार्गगामी बनने और परमार्थ परायण रहने के लिए सहमत हो जाता है। मरणोत्तर जीवन में स्वर्ग-नरक की व्यवस्था इसी दृष्टि से भगवान ने की है और इस जीवन में कुकर्मी को विविध विधि प्रताड़नाएं सहने और सन्मार्गगामी को सम्मान, सहयोग पाने का जो विधान रखा है उससे संसार का क्रम ठीक बना रहने में बड़ी सहायता मिलती है। कर्मफल जैसी कोई व्यवस्था यदि न रहे तो फिर पशुता की पैशाचिकता का रूप धरण करने में देर न लगे। कभी-कभी ऐसी उच्छृंखलता वह बरतता है तो प्रकृति की कर्म विधान व्यवस्था उसे ठोक-पीटकर सही रास्ते पर ला देती है।

इस लोक में दुष्कर्मों का फल आधि-व्याधि के रूप में आता है, यह शास्त्र सम्मत भी है और विज्ञान सम्मत भी। इस संदर्भ में शास्त्र-वचन इस प्रकार है-

आत्मापराधवृक्षस्यं फलान्येतानि देहिनाम्।

दारिद्रयदःखरोगानि बन्धनव्यसनानि च॥2॥

-चाणक्य

मनुष्यों को अपने अपराध रूपी वृक्ष के दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन और विपत्ति आदि फल मिलते हैं।

-महाभारत, उद्योग पर्व ॥23॥

राजन्! धर्म और पाप दोनों के पृथक-पृथक फल होते हैं और उन दोनों का ही उपभोग करना पड़ता है।

आचराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः।

आचाराद्धमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥

दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः

दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥

-मनु. 4।156 से 157

श्रेष्ठ आचरण का जीवन जीने वाला, दीर्घजीवी होता है। श्रेष्ठ सन्तान पाता और सम्पन्नता प्राप्त करता है। बुरों को भी सुधार देता है।

दुराचारी निन्दित होता है। दुःख भोगता है। अल्पजीवी होता है। रोगी रहता है।

पुण्यापुण्येहिपुरुषःपर्यायेणसमश्नुते।

भुञ्जतश्चक्षययातिपापंपुध्यमथापिवा ॥16॥

नतुभोगादृतेपुण्यपापंवाकर्ममानवः।

परित्यजतिभोगाच्चपुण्यापुण्ये निबोधमे ॥17॥

दुर्भिक्षादेवदुर्भिक्षक्लेशात्क्लेशंभयाद्भयम्।

मृतेभ्य,प्रमृतायान्तिदरिद्राःपापकर्मिणः ॥18॥

गतिंनानाविधाँयान्तिजन्तवः कर्मबन्धनात्।

उत्सवादुत्सं यान्तिस्वर्गान्स्त्रर्गंसुखात्सुखम्॥19॥

-मार्कंडेय पुराण (कर्मफल)

अपने किये हुए पाप अथवा पुण्य के फल मनुष्यों को भोगने ही पड़ते हैं। भोगने से ही कर्मफल भुगता जाता है। भोगे बिना कोई रास्ता नहीं, भोग बिना शुद्धि नहीं होती और तभी कर्म बन्धन से छुटकारा मिलता है।

जो पापी हैं वे दरिद्र होते हैं। क्लेश, भय और संकट, संतापों से घिरे रहते हैं और बेमौत मरते हैं। पुण्यात्माओं के उनके शुभ कर्मों के सत्परिणाम अनेक सुख-साधनों के रूप में उपस्थित होते रहते हैं।

आधिक्षयेणाधिभवाः क्षीयन्ते व्याधयोऽप्यलम्।

शुद्धया पुण्यया साधे क्रियया साधुसेवया॥

मनः प्रयाति नैर्मल्यं निकषेणेव काञ्चनम्।

आनन्दो वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राधव॥

सत्वशुद्धया वहन्त्येते क्रमेण प्राणवायवः।

जरयन्ति तथान्नानि व्याधिस्तेन विनश्यति॥

-योग वशिष्ठ

शरीर के रोग ‘व्याधि’ और मन के रोग ‘आधि’ कहलाते हैं। इन दोनों के उत्पन्न होने का कारण विवेक की कमी और मूर्खता की प्रबलता ही है।

जब अविवेक के कारण मनुष्य का मन बेकाबू हो जाता है तो नाना प्रकार की तीव्र साधनाएं उठती हैं। उन्हें पूरा करने के लिये अखाद्य खाता है, अगम्य गमन (अनुचित काम सेवन) करता है। अनियमितता और अस्त-व्यस्तता बरतता है, दुष्ट संग करता है और मस्तिष्क में बुरे विचार भरे रहता है।

इससे उसकी नाड़ियाँ शिथिल हो जाती हैं, अंग काम करना छोड़ देते हैं। प्राण शक्ति का सञ्चार अस्त-व्यस्त हो जाता है। इन परिस्थितियों में शरीर की स्थिति गड़बड़ा जाती है और नाना प्रकार के दुखदायक रोग उत्पन्न होते हैं।

मानसिक विकारों से शरीर रुग्ण होता है। उन विकारों के दूर होने से शरीर निरोग हो जाता है।

पादन्यासकृतंदुःखंकण्टकोत्थंप्रयच्छति।

तत्प्रभूततरस्थूलशकुकीलकसम्भवम् ॥25॥

खंयच्छतितद्बच्चशिरोरोगादिदुःसहम्।

अपथ्याशनशीतोष्णश्रमतापादिकारकम् ॥26॥

-मार्कण्डेय पुराण (कर्मफल)

पैर में काँटा लगने पर तो एक ही जगह पीड़ा होती है पर पाप कर्मों के फल से तो शरीर और मन में निरन्तर शूल उत्पन्न होते रहते हैं।

पापों कर्मों के फलस्वरूप अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। शस्त्र पीड़ा, अग्नि दाह, रोग बन्धन आदि अगणित प्रकार के अप्रत्याशित दुःख सामने आ खड़े होते हैं।

जो कर्म इस जन्म में फल नहीं दे पाते वे आगे के लिए जीव के साथ जाते हैं। मरणोत्तर जीवन में नरक के रूप में अथवा नीच योनियों की स्थिति में जाकर मनुष्य दुष्कर्मों का फल भोगता है और सत्कर्मों के लिये उसे स्वर्ग एवं देव योनियों का आनन्द मिलता है। नशा पीने के कुछ देर बाद खुमारी आती है। इसी प्रकार कर्म का फल मिलने में कभी-कभी कुछ देर लग जाती है। देरी होने से छुटकारा जैसी बात नहीं सोचनी चाहिए। मरण होने के उपरान्त भी कर्म साथ जाते हैं और अपना फल देते हैं। इस सम्बन्ध में शास्त्र का अभिमत इस प्रकार है-

न तेऽत्र प्राणिनः संति ये न याँति यमक्षयमँ

अवश्यं हि कृतं भोक्तव्यं तद्विधारितम् ॥4॥

-भाव्य

यहाँ पर ऐसे कोई भी प्राणी नहीं हैं जो यमराज के घर में नहीं जाते हैं अर्थात् एक बार तो यहाँ सभी प्राणियों को जाना ही पड़ता है। उनका जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह अवश्य ही उन्हें भोगना ही पड़ता है।

न केचित्प्राणिनः सन्ति ये न यान्ति यमक्षयम्।

अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यं तद्विचार्य्यताम्॥

-शिव पुराण

अपना किया हुआ कर्म सभी को अवश्य ही भोगना पड़ता है। इसलिये ऐसे कोई भी प्राणी नहीं हैं जो यमराज के लोक को नहीं जाते हैं। शुभ-अशुभ कर्मों का निर्णय वहाँ पर ही होता है।

इदानीं कि प्रलप्यध्वं पीड़यमानाः स्वकर्मभिः।

भुज्यताँ स्वानि कर्माणि नास्ति दोषो ही कस्यचित्॥

शिव पुराण

यमदूतों ने पाप कर्मियों से कहा- इस समय तुम अपने ही कर्मों से उत्पीड़ित होते हुए क्यों रोते चिल्लाते हो? अब कर्मों के फलों को भोगो, इसमें अन्य किसी का कुछ भी दोष नहीं है।

स्वमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धास्यन्ति धावतः।

तत्र पापक्षयात्पापा नराः कर्मानुरूपतः॥

-शिवपुराण

धातुओं के मैल को हटाने के लिए जैसे उन्हें तीक्ष्ण अग्नि में रखते हैं उसी तरह पापी प्राणियों को पाप-नाश के उद्देश्य से ही अपने कर्मों के अनुसार ही नरकों में गिराया जाता है।

कलौ प्रेतत्वामप्नोति ताक्ष्याशुद्ध क्रिया परः।

रुतादौ द्वापरं यावन्न प्रेतौ नैव पीडनम्॥

-गरुड़ पुराण

कलियुग में मनुष्यों के रहन-सहन के अशुद्ध हो जाने से वे प्रेतत्व को प्राप्त होते हैं। सतयुग, द्वापर आदि में न कोई प्रेत बनता था न किसी की प्रेत सम्बन्धी पीड़ा होती थी।

यौनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।

स्थाणुमन्ये ऽनसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥

-गरुड़ पुराण

जिसने श्रवण-मनन द्वारा जैसा मनोभाव प्राप्त किया है उसी के आधार पर अपने-अपने कर्मों के अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्ष लता पर्वत आदि स्थलों पर पदार्थों के रूप को ग्रहण कर लेते हैं।

ज्ञानिनस्तु सदा मुक्ता स्वरूपानुभवेन हि।

अतस्ते पुत्र दत्तानाँ पिण्डानाँ नैव काँक्षिणः॥

-महाभारत

“ज्ञानी मनुष्य तो अपने सच्चे स्वरूप को समझकर और तद्नुसार आचरण करके सदा ही मुक्त होते हैं। उनको पुत्रों द्वारा किये गये पिण्डों की आकाँक्षा कभी नहीं होती है।”

यमनियमविधूतकल्मषाणामनुदिनमच्युत-सक्तमानसानाम्।

अपगतमदमानमत्सराणाँ त्यज भट दूर-तरेण मानवानाम्॥26॥

-विष्णु पुराण

जिनके पाप समूह यम नियमों के पालन से नष्ट हो गये हैं। जिन्होंने मत्सर ओर अहंकार छोड़ दिया है। उन सच्चे भगवत् भक्तों को हे यमराज नरक में मत ले जाना।

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयन्तत्फलमश्नुते।

स्वयं भ्रमति संसारे स्वयन्तस्माद्विमुच्यते ॥9॥

-चाणक्य

जीव आप ही कर्म करता है, उसका फल भी आप ही भोगता है, आप ही संसार में भ्रमण करता है; और आप ही उससे मुक्त भी होता है इसमें उसका कोई साक्षी नहीं।

भगवान राम और कृष्ण कर्मफल भोग से न बच सके। वे अपने सम्बन्धियों को भी कर्मफल के प्रभाव से न बचा सके। बालि को छिपकर तीर मारने का फल राम को कृष्ण जन्म में मिला। बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारा और वे स्वर्गवासी हुए। राम के पिता को श्रवणकुमार का वध करने का प्रतिफल पुत्र शोक में प्राण त्यागने के रूप में मिला। कृष्ण अपने सखा अर्जुन को अभिमन्यु मरण के कारण उत्पन्न दुख से न बचा सके, कर्मफल अवश्यंभावी है।

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