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Magazine - Year 1984 - Version 2

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इस जीवन चर्या के गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण की आवश्यकता

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जिन्हें भले या बुरे क्षेत्रों में विशिष्ट व्यक्ति समझा जाता है उनकी जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए घटनाक्रमों को भी जानने की इच्छा होती है। कौतूहल के अतिरिक्त इसमें एक भाव ऐसा भी होता है, जिसके सहारे कोई अपने काम आने वाली बात मिल सके। जो हो कथा-साहित्य से जीवनचर्याओं का सघन सम्बन्ध है। वे रोचक भी लगती हैं और अनुभव प्रदान करने की दृष्टि से उपयोगी भी होती हैं।

हमारे सम्बन्ध में प्रायः आये दिन लोग ऐसी पूछताछ करते रहे हैं, पर उसे आमतौर से टालते ही रहा गया है क्योंकि उसमें जादू चमत्कार जैसी किंवदंतियों का घटाटोप जुड़ नहीं सकता था और सीधी-सीधी-सी कार्य पद्धति में ऐसा कुछ आकर्षण था नहीं, जिसमें सुनने वाले या सुनाने वाले का उत्साह बढ़े।

पर अब उस वृत्तांत का प्रकटीकरण आवश्यक हो गया है। उसमें कौतूहल व अतिवाद न होते हुए भी वैसा सारगर्भित बहुत कुछ है, जिससे अध्यात्म विज्ञान के वास्तविक स्वरूप और उसके सुनिश्चित प्रतिफल को समझने में सहायता मिलती है। उसका सही रूप विदित न होने के कारण इतनी भ्रान्तियों में फँसते हैं कि भटकाव्य जन्य निराशा से वे श्रद्धा ही खो बैठते हैं और इसे पाखंड मानने लगते हैं। इन दिनों ऐसे प्रच्छन्न नास्तिकों की संख्या अत्यधिक है जिनने कभी उत्साहपूर्वक पूजा पत्री की थी- अब ज्यों-त्यों करके चिन्ह पूजा करते हैं। तो भी अब लकीर पीटने की तरह अभ्यास के वशीभूत हो करते हैं। आनन्द और उत्साह सब कुछ गुम गया। ऐसा असफलता के हाथ लगने के कारण हुआ। उपासना की परिणतियाँ फलश्रुति पढ़ी-सुनी गई थी। उसमें से कोई कसौटी पर खरी नहीं उतरी तो विश्वास टिकता भी कैसे ?

हमारी जीवन गाथा एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकती है। यह एक बुद्धि जीवी और यथार्थवादी द्वारा अपनाई गई कार्यपद्धति है। छद्म जैसा कुछ उसमें है नहीं। असफलता का लाँछन भी उन पर नहीं लगता। ऐसी दशा में जो गम्भीरता से समझने का प्रयत्न करेगा कि सही लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग हो सकता था, शार्टकट के फेर में भ्रम-जंजाल न अपनाये गये होते तो निराशा, खीज ओर थकान हाथ न लगती। तब या तो महंगा समझकर हाथ ही न डाला जाता, यदि पाना ही था तो उसका मूल्य चुकाने का साहस पहले से ही संजोया गया होता। ऐसा अवसर उन्हें मिला नहीं, इसी को दुर्भाग्य कह सकते हैं। यदि हमारी जीवन गाथा पढ़ी गई होती? उसके साथ आदि से अन्त तक गुँथे हुए अध्यात्म तत्व-दर्शन और क्रिया विधान को समझने का अवसर मिला होता तो निश्चय ही प्रच्छन्न भ्रमग्रस्त लोगों की संख्या इतनी न रही होती जितनी अब है।

एक ओर वर्ग है- विवेक दृष्टि वाले यथार्थवादियों का। वे ऋषि परम्परा पर विश्वास करते हैं और सच्चे मन से विश्वास करते हैं कि वे आत्मबल के धनी थे। उन विभूतियों से उनने अपना, दूसरों का और समस्त विश्व का भला किया था। भौतिक विज्ञान की तुलना में जो अध्यात्म विज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं उनकी एक जिज्ञासा यह भी रहती है कि वास्तविक स्वरूप और विधान क्या है? कहने को तो हर कुँजड़ी अपने बैरो को मीठा बताती है पर कथनी पर विश्वास न करने वालों द्वारा उपलब्धियों का जब लेखा-जोखा लिया जाता है तब प्रतीत होता है कि कौन कितने पानी में है।

सही क्रिया, सही लोगों द्वारा, सही प्रयोजनों के लिए अपनाये जाने पर उसका सत्परिणाम भी होना ही चाहिए। इस आधार जिन्हें ऋषि परम्परा के अध्यात्म का स्वरूप समझना हो, उन्हें निजी अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है। वे हमारी जीवनचर्या को आदि से अन्त तक पढ़ और परख सकते हैं। विगत साठ वर्षों में से प्रत्येक वर्ष इसी प्रयोजन के लिए व्यतीत हुआ है। उसके परिणाम भी खुली पुस्तक की तरह सामने हैं। इन पर गम्भीर दृष्टिपात करने पर यह अनुमान निकल सकता है कि सही परिणाम प्राप्त करने वालों ने सही मार्ग भी अवश्य अपनाया होगा। ऐसा अद्भुत मार्ग दूसरों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। आत्म विद्या ओर अध्यात्म विज्ञान की गरिमा से जो प्रभावित हैं। उसका पुनर्जीवन देखना चाहते हैं, प्रतिपादनों को परिणतियों की कसौटी पर कसना चाहते हैं, उन्हें निश्चित ही हमारी जीवनचर्या के पृष्ठों का पर्यवेक्षण सन्तोषप्रद और समाधान कारक लग सकता है।

अब तक उस संदर्भ में कभी कोई कहने लायक प्रकाश नहीं डाला गया। अब समय आ गया कि उन रहस्यों का प्रकटीकरण कर दिया जाय। अन्यथा दूसरे लोग रागद्वेष वश उसमें भली बुरी अत्युक्तियों का समावेश कर सकते हैं।

प्रत्यक्ष घटनाओं की दृष्टि से हमारे जीवन क्रम में बहुत विचित्रताएँ एवं विविधताएँ नहीं हैं। कौतुक-कौतूहल व्यक्त करने वाली उछल-कूद एवं जादू-चमत्कारों की भी उसमें गुंजाइश नहीं है। एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढर्रे पर निष्ठापूर्वक समय कटता रहा है। इसलिए विचित्रताएँ ढूँढ़ने वालों को उसमें निराशा भी लग सकती है पर जो घटनाओं के पीछे काम करने वाले तथ्यों ओर रहस्यों में रुचि लेंगे, उन्हें इतने से भी सनातन अध्यात्म की परम्परागत प्रवाह का परिचय मिल जायेगा और वे समझ सकेंगे कि सफलता, असफलता का कारण क्या है? क्रियाकाण्ड को सब कुछ मान बैठना और व्यक्तित्व के परिष्कार की- पात्रता की प्राप्ति पर ध्यान न देना यही एक कारण है जिसके चलते उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म की उपहासास्पद बनने- बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं। पर उसके पीछे उस पृष्ठ भूमि का समावेश है जो ब्रह्म तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।

घटनाओं का विवरण आते संक्षिप्त है। पन्द्रह वर्ष तक की आयु का बचपन तथा अध्ययन। इसके बाद चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला। स्वतन्त्रता संग्राम आंदोलनों में भागीदारी एवं जेलयात्रा। स्वराज्य के उपरान्त धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण के क्षेत्र में प्रवेश। साहित्य, संगठन, सृजन प्रयोजनों में संलग्नता। संक्षिप्त में इतना भर ही क्रियाकलाप है। उसके भेद-उपभेदों पर प्रकाश डालते हुए उसे विस्तृत भी किया जा सकता है। पर उस घटना परक विस्तार से कौतूहल बढ़ने के अतिरिक्त और कुछ लाभ है नहीं। काम की बात है की इन क्रियाओं के साथ जुड़ी हुई अंतर्दृष्टि और उस आन्तरिक तत्परता का समावेश जो छोटे से बीज की खाद पानी आवश्यकता पूरी करते हुए विशाल वृक्ष बनाने में समर्थ होती रही। वस्तुतः साधक का व्यक्तित्व ही साधना क्रम में प्राण फूँकता है अन्यथा मात्र किया कृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।

तुलसी का राम, सूर का रहे कृष्ण, चैतन्य का संकीर्तन, मीरा का गायन, रामकृष्ण का पूजन मात्र क्रिया-कृत्यों के कारण सफल नहीं हुआ था। ऐसा औड़म बौड़म तो दूसरे असंख्य करते रहते हैं पर उनके पल्ले विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता। बाल्मीकि ने जीवन बदला तो उल्टा नाम जपने ही मूर्धन्य हो गए। अजामिल, अंगुलिमाल, गणिका, आम्ब्रपाली मात्र कुछ अक्षर दुहराना ही नहीं सीखे थे, उनने अपनी जीवनचर्या को भी अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप ढाला था।

आज कुछ ऐसी विडंबना चल पड़ी है कि लोग कुछ अक्षर दुहराने और कुछ क्रिया-कृत्य करने स्तवन उपहार प्रस्तुत करने भर से अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार तो उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। हमारी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु वह यथार्थ वादी भी है और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी भी।

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