नर और नारी के मध्यवर्ती अनुदान प्रतिदान
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स्त्री के व्यक्तित्व की बनावट ऐसी है, कि अपने पति, बच्चे एवं परिवार के साथ घुल-मिल जाती है। पुरुष के लिए इसमें जितनी कठिनाई पड़ती है, स्त्री को उतनी नहीं। इसका अर्थ है, आत्मीयता का विस्तार। जिस घर में बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन की देहली पर पहुँचती है, जिन सहेलियों के साथ खेलती और जिन कुटुम्बियों के साथ इतनी आयु बिताती है, उसे छोड़कर सर्वथा नये परिवार में जा पहुँचना और सर्वथा अपरिचित लोगों को अपना बना लेना, सर्वथा अपने को उनमें घुला देना, असाधारण बात है। पति का एक दिन का परिचय दूसरे दिन इतनी घनिष्ठता में बदल जाना, मानो उसी के साथ पालन-पोषण हुआ हो, वस्तुतः आश्चर्य की बात है। पुरुष को उस सीमा तक इतनी जल्दी जा पहुँचना कठिनाई की बात है। आत्मीयता के क्षेत्र में इतनी जल्दी इतनी प्रगति करना पुरुष के लिए कठिन है।
यदि परिचय न हो और पिछले दिनों से घनिष्ठता न चल रही हो, तो स्त्री के प्रति पुरुष के मन में कौतूहल आश्चर्य अजनबीपन और अविश्वास बना रहता है। उसे दूर करने में देर लगती है।
नारी का निर्माण कुछ ऐसे तत्वों से हुआ है कि वह समर्थ और सुयोग्य होते हुए भी समर्पण कर सकती है। यह समर्पण परावलम्बन नहीं है। बच्चों को वह प्राणप्रिय मानने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं, कि वह उनके आश्रित है या उनसे कोई प्रतिदान प्राप्त करती है। यही बात पति या समूचे परिवार के प्रति है। उसका श्रम, समर्पण इतना बहुमूल्य है कि उसका मूल्याँकन पैसों में नहीं किया जा सकता है।
पति पत्नि के प्रति जो भोजन, वस्त्र के अनुदान प्रस्तुत करता है, उसका लेखा-जोखा मजूरी के हिसाब से नहीं लगाया जा सकता। दिन और रात शारीरिक और मानसिक ही नहीं, आत्मिक अनुदानों को प्राप्त कर सकना कितनी ही बड़ी राशि के बदले नहीं हो सकता। फिर कपड़ा तो पति ही देता है। बच्चे क्या देते हैं? वे तो पति से भी अधिक प्राप्त करते हैं। पूरा परिवार जो स्नेह-सम्मान प्राप्त करता है, उसका कौन आर्थिक मूल्य चुका पाता है। दर्द के समय इतनी कष्टसाध्य सेवा कर सकना किसी वेतन भोगी कर्मचारी से सम्भव नहीं। मानापमान का ध्यान न करते हुए एक रस आत्मीयता। बनाये रखना देवता जैसे सौजन्य के लिए ही सम्भव है।
परिवार से नारी भी कुछ प्राप्त करती है। इससे आँशिक पूर्ति वह भी करती है। बच्चे उसकी गोदी में बैठकर आँचल की छाया में कलोल करते हुए माता को जो देते हैं, उसका मूल्याँकन धाय के वेतन की तरह नहीं चुकाया जा सकता। प्रणय-क्रीड़ा में पत्नी को जो मिलता है, पति उससे कहीं अधिक पाता है। दाम्पत्य जीवन में यह विवेक राई-रत्ती के बराबर ही है। हर घड़ी एक अभिन्न साथी की भूमिका पत्नी ही निभा पाती है। ऐसी आशा किसी लाभदायक मित्र से भी नहीं की जा सकती।
पति अपने स्नेहिल अनुदान जितने गहरे प्रदान करता है, उसकी तुलना में वह पाता कहीं अधिक है। पत्नी एक शोभायमान उद्यान है, जिसे पति सींचता भर है, पर उससे जो पत्र, पल्लव, पुष्प, फल, छाया और प्राणवायु प्राप्त करता है उसकी नाप-तोल प्रतिपादन के रूप में नहीं की जा सकती।
जहाँ पुरुष दुर्बल पड़ता है, वहाँ स्त्री की शक्ति प्रकट होती है। पुरुष बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है, पर स्त्री सब कुछ दे सकती है। पुरुष के लिए अप्राप्य कुछ भी नहीं और स्त्री के लिए अदेय। पुरुष स्त्री को गिरा कर खड़ा रहता है और स्त्री गिरकर भी पुरुष की रक्षा करती है। यही है दोनों के मध्य सात्विक सहयोग अनुदानों का क्रम।

