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Magazine - Year 1989 - Version 2

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अन्न से बनता है मन

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अन्न को ब्रह्म कहा गया है। काया का समूचा ढ़ाँचा प्रकारान्तर से खाद्य की ही परिणति है। व्यक्ति का गुण, कर्म स्वभाव का मूलभूत ढ़ाँचा आहार के आधार पर ही बनता है। शिक्षा आदि से तो उस ढांचे को सँभाला सँजोया भर जाता है। यही कारण है कि अध्यात्म विज्ञान में आहार की उत्कृष्टता को अन्तःकरण, विचारतंत्र एवं कायकलेवर की पवित्रता प्रखरता का सर्वोपरि माध्यम माना गया है। आहार की शुद्धता पर ही मन का स्तर एवं उसकी शुद्धता निर्भर है। खान-पान जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जायगा।

“जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली उक्ति अक्षरशः सत्य है। तामसिक और राजसिक भोजन करने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की जड़ खोखली होती है वरन् उनका प्रभाव मानसिक स्तर पर भी पड़ता है। आहार के अनुरूप ही मानसिक स्थिति में तमोगुण छाया रहता है। कुविचार उठते हैं। उत्तेजनायें छाई रहती हैं। चिन्ता, उद्विग्नता और आवेश का दौर चढ़ा रहता है। ऐसी स्थिति में न तो एकाग्रता सधती है और न ध्यान धारणा बन पड़ती है। मन की चंचलता ही इन्द्रियों को चंचल बनाये रखती है। शरीर भी उसी के इशारे पर चलता है। इस विघ्न को जड़ से काटने के लिए अध्यात्म पथ के पथिक सर्व प्रथम आहार की सात्विकता पर ध्यान देते है।

मन की ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। वह भी शरीर का ही एक भाग है। अन्न से रस, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से अस्थि और मज्जा, मेद वीर्य आदि बनते - बनते अन्त में मन बनता है इसमें चेतना का समावेश तो है पर मस्तिष्क संस्थान वस्तुतः अन्न शरीर का ही एक भाग है। इसलिए स्वाभाविक है कि जैसा स्तर आहार का होगा वैसा ही मन बनेगा। शरीर शास्त्री और मनोवैज्ञानिक भी इस सम्बन्ध में प्रायः एक मत हैं कि आहार से मन का स्तर बनता है। प्रकृति की कैसी विचित्रता है कि जहाँ मन की प्रेरणा से शरीर को चित्र विचित्र काम करने पड़ते हैं वहाँ यह भी एक रहस्य है कि मन का स्तर शरीर द्वारा बनता है। वह शरीर जो आहार का अन्न का उत्पादन है जिसके आधार पर वह बनता बढ़ता, परिपुष्ट बनता और उसी का पाचन समाप्त होने पर अथवा उसमें विषाक्तता रहने पर वह मर भी जाता है। शरीर जहाँ मन को अनुचर है वहाँ उसकी स्थिति को बनाने में प्रमुख भूमिका भी निभाता है। इस उलझन को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि शरीर प्रधान है या मन। गुत्थी इस तरह सुलझती है कि दोनों का सृजेता अन्न है। इसीलिए शरीर और मन-दोनों का सूत्र संचालन मन को कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

प्रत्येक जीवन का आधार आहार को ही माना गया है। इसके आधार पर ही शरीर बनता और बढ़ता है। इसकी शुद्धता क्यों आवश्यक है, इस सम्बन्ध में शास्त्रकार कहते हैं - “अन्नमयं हि सोम्य मनः” अर्थात् “हे सोम्य! यह मन अन्नमय है” इसे अधिक स्पष्ट करते हुए छान्दोग्य उपनिषद् के छटे अध्याय के पाँचवें खंड में उद्दालक ऋषि ने कहा हैं - “ जो अन्न खाया जाता है, वह तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल अंश मल, मध्यम अंश रस-रक्त माँस तथा सूक्ष्म अंश मन बन जाता है। अगले खण्ड में कहा है-”हे सोम्य! मन्थन करने से जिस प्रकार दही का सूक्ष्म भाग इकट्ठा होकर ऊपर का चला जाता है और घी बनता है, ठीक इस प्रकार निश्चित रूप से भक्षण किए अन्न का जो सूक्ष्म भाग है वह ऊपर जाकर मन बनाता है। इसी तरह पिये हुए जल का सूक्ष्म भी ऊपर जाकर प्राण और घी तेल आदि का सूक्ष्म भाग ऊपर जाकर वाणी बनता है। इससे सिद्ध है कि अन्न का कार्य ही मन है।”

अतः जीवन का-व्यक्तित्व का स्तर निर्धारित करने के लिए सर्व - प्रथम अन्न के स्वरूप को सँभालना पड़ता है। क्योंकि वही शरीर को विनिर्मित करता है और उसी के अनुरूप मन की प्रवृत्ति बनती है। इस प्रधान आधार की शुद्धता पर ध्यान न दिया जाय तो न शरीर की स्थिति ठीक रहेगी और न मनकी दिशाधारा में औचित्य बना रह सकेगा।

अध्यात्म विधा के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म गुणों का - उसके समस्त आयामों का अत्यन्त गंभीरता पूर्वक अध्ययन किया था और यह पाया था कि प्रत्येक खाद्य पदार्थ अपने में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण धारण किये हुए है। और उनके खाने से मनोभूमि का निर्माण भी वैसा ही होता है। साथ ही यह भी शोध की गई थी कि आहार में निकटवर्ती स्थिति का प्रभाव ग्रहण करने का भी एक विशेष गुण है। दुष्ट, दुराचारी, दुर्भावना युक्त या हीन मनोवृत्ति के लोग यदि भोजन पकायें या परोसें तो उनके वे दुर्गुण आहार के साथ सम्मिश्रित हो कर खाने वाले पर अपना प्रभाव अवश्य डालेंगे। न्याय और अन्याय से पाप और पुण्य से कमाये हुए पैसे से जो आहार खरीदा गया है। उससे भी वह प्रभावित रहेगा। अनीति की कमाई से जो खाद्य सामग्री बनेगी, वह अभक्ष्य है। उसका सेवन उपभोक्ता को अपनी बुरी प्रकृति से अवश्य ही प्रभावित करेगा।

इन बातों पर भली प्रकार विचार करके ऋषियों ने साधक को सतोगुणी आहार ही अपनाने पर जोर दिया है। उनका भोजन स्वयं परम् सात्विक होता था। महर्षि कणादि अन्न के दाने बीन कर गुजारा करते थे। पिप्पलाद का आहार था, पीपल वृक्ष के फल। वैसी स्थिति यद्यपि आज कहीं नहीं पायी जा सकती, पर जितना कुछ संभव है, आहार की सात्विकता और व्यवस्था पर अधिकाधिक अंकुश रखना साधना की सफलता के लिए नितान्त जरूरी है। मद्य एवं अन्यान्य नशीले पदार्थों का सेवन, माँस, प्याज, लहसुन, चटपटे एवं उत्तेजक मसाले, गरिष्ठ, वासी-बुसे, तमोगुणी प्रकृति के लोगों द्वारा बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है। इन बातों का ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य के लिए या जीवन रक्षा के लिए जो खाद्यान्न मिताहार औषधि रूप समझ कर, भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जायगा, वह शरीर और मन में सतोगुणी स्थिति पैदा करेगा और उसी के आधार पर साधना मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।

तैत्तरीय उपनिषद् में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला गया है और आत्मकल्याण के इच्छुकों को आहार -शुद्धि का विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है। कहा गया है-” आहार शुद्वो सत्वशुद्विः सत्वशुद्वौ ध्रुवा स्मृतिः।” अर्थात् जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यानी अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेकबुद्धि ठीक काम करती है उस विवेक से अज्ञान जन्य बन्धन ग्रन्थियाँ खुलती हैं, फिर परमतत्व का साक्षात्कार हो जाता है। पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में भी कहा है कि-”आहार में अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता है। आहार की शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रंथियाँ टूटती जाती है” यही बात छान्दोग्य उपनिषद् में कही गई है। उसके अनुसार “आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण के शुद्ध हो जाने से भावना दृढ़ हो जाती है। और भावना की स्थिरता से हृदय की समस्त गाँठें खुल जाती हैं।

बाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और कहा गया है-”यदंन्न पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः।” अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता खाते हैं। कारण देवताओं का सबसे निकटवर्ती निवास स्थान अपनी देह है। इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यंगों में विभिन्न देव शक्तियों का निवास है। जैसा कुछ हम खाते पीते हैं, उसी के अनुरूप उनकी पोषण मिलता है और वे सशक्त अथवा दुर्बल बनते हैं। सात्विक खान-पान देव तत्वों की पुष्ट करता है और आसुरी तमोगुणी आहार करने से देव शक्तियाँ केवल मुख के द्वा ही आहार .... लेती वरन् प्रत्येक इंद्रियों द्वारा ही उसकी उचित-अनुचित प्रक्रियाओं द्वारा पुष्ट या अशक्त बनती है।

इसलिए साधक को आहार-विहार की शुद्धता .... साथ ही व्रत, संयम, उपवास, ब्रह्मचर्य एवं .... तपश्चर्याओं द्वारा अपने शरीर एवं मन को इस योग बनाना चाहिए कि उसमें निवास करने वाली .... शक्तियाँ जागृत होकर अपनी सजातीय महाशक्ति .... सूक्ष्म जगत में से अपनी ओर आकर्षित कर .... अतः आहार की शुद्धता अभीष्ट सिद्धि के .... नितान्त आवश्यक है।

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