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Magazine - Year 1989 - Version 2

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अपनी जैविक लय को जानिए कार्यक्षमता बढ़ाइये।

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प्रकृति का अपना समय चक्र होता है जिसके आधार पर ऋतु-परिवर्तन से लेकर मौसम सहित सभी क्रियाकलापों में हेर-फेर होता रहता है। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमन्त आदि ऋतुएँ एक के बाद दूसरी आती रहती हैं और तदनुरूप ही धरती की शोभा सुषमा परिलक्षित होती है। अपनी जैसी घड़ी के द्वार वह वृक्ष-वनस्पतियों से लेकर जीव जन्तुओं तक की क्रियाशीलता पर शासन करती है। प्रकृति के इस अनुशासन को जाने-अनजाने रूप से सभी को पालन करना पड़ता है। इसी घड़ी के सहारे भोर होते ही मुर्गे बाँग लगाने लगते हैं। अँधेर कमरे में रखे पिंजड़े में कैद पक्षी सबेरा होते ही चहचहाने लगते हैं और उन्मुक्त वातावरण में उड़न के लिए पर फड़फड़ाने लगते हैं। इस प्रबल प्रेरक शक्ति के सहारे ही समस्त प्राणियों का जीवन व्यापार चलता है।

प्राणिवेत्ताओं का कहना है कि अन्यान्य जीवधारियों की तरह मनुष्य का भी अपना एक दैनिक सक्रियता चक्र होता है। अर्थात् शिथिलता और सर्वोच्च सक्रियता की क्षमता युक्त अवधियाँ होती हैं इनमें से सर्वाधिक सक्रियता वाली अवधि को यदि जाना और उसका सुनियोजन किया जा सके तो कठिन से कठिन कार्य भी सरलतापूर्वक उस समय चक्र में सफल सम्पन्न हो सकते हैं।

इस संबंध में क्रोनोबायोलाँजी के विशेषज्ञों ने गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि मानवी मन अपनी आन्तरिक घड़ी के अनुसार सक्रिय रहा करता है और जब कभी बाह्म समय का आन्तरिक समय से तालमेल नहीं बैठता व्यक्ति थका हारा तनावग्रस्त दीखने लगता है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की बायोलॉजिकल क्लाँक भिन्न होती है। जिसके कारण उनकी सक्रियता में भी भिन्नता पाई जाती है। किसी को अपने जटिल कार्यों लेखन साहित्य सृजन आदि को पूर्ण करने में सुबह का समय उपयुक्त लगता है, तो किन्हीं किन्हीं को अन्य समयों में कार्यों के प्रति अभिरुचि जगती और सक्रियता-कर्मठता का तारतम्य बैठता है। दैनिक जीवन के कार्यों का पर्यवेक्षण कर अपने जीवन के सर्वोच्च सक्रियता वाले समय का निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर सकता है जानकारी होने पर होना तो यह चाहिए कि इस अवधि को अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सुरक्षित रखा जाय। शेष समय में सामान्य कार्यों को निबटाया जाय। यद्यपि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है फिर भी सक्रियता वाले समय का सदुपयोग वाँछित सत्परिणाम प्रस्तुत करता है।

अन्य जीवों की भाँति मनुष्य की जैव घड़ी भी सूर्य से प्रभावित होती है। जिस क्रम से सूर्य ऊपर की ओ चढ़ता जाता है और 12 से 2 बजे के मध्य अपनी चरम अवस्था में रहता है, उसी प्रकार व्यक्ति की ऊष्मा भी बढ़ती और सक्रियता आती है। शरीर गर्म होने पर मनःमस्तिष्क भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। यही कारण है कि उस समय शारीरिक परिश्रम वाले क्रियाकलापों को सम्पन्न करने की सलाह मूर्धन्य लोग दिया करते हैं। उस वक्त श्वसन दर एवं रक्त-प्रवाह भी तीव्रतर होता है। व्यक्ति अपने कार्य की श्रेणी परखकर उसे उचित समय में करते रहने का कार्यक्रम अपना सकता ह। मोटे हिसाब से मानसिक कार्य दिन के पूर्वार्द्ध में और शारीरिक श्रम उत्तरार्द्ध में निबटाने का नियम है परन्तु जहाँ नियम हैं वही अपवाद भी देखने को मिलते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एवं यूलियस एस. ग्रान्ट चिन्तन मनन वाले कठिन कार्या को सर्वोत्कृष्ट क्षमता वाले अपने उस जैवसमय में किया करते थे जब सायं अँधेरा छाने लगता। विख्यात वैज्ञानिक थामस एडीसन को तो रात में ही काम करने का शौक था किन्तु सबसे बड़ी बाधा अँधेर की थी इसे दूर करने में भी उनने सफलता पाई और विधुत बल्ब का आविष्कार इसी अवधि में कर डाला। इसी तरह पाश्चात्य सिनेमा के जाने माने कलाकार फ्रैंस सिनाट्रा को राम में कार्य आरंभ करने और सफलता तक पहुँचने की धुन सवार रहती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म-”एहोल इन दी हेड” को उसने एक रात्रि में पूर्ण कर दिखाया जबकि उस समय आम प्रचलन दिन में ही कार्य करने का था।

जिस प्रकार लोगों की शक्ल-सूरत विचार, रुचि-रुझान आदि में विभिन्नता होती है, ठीक उसी तरह हम सबके जैविक-लय में भी भिन्नता होती है। कई व्यक्ति सक्रियता वाले तापमान पर हाथ में लिए कार्यों को शीघ्रता से पूरा कर लेते हैं तो अन्य दीर्घसूत्री होते हैं। कुछ में यह जैवसक्रियता जगने से लेकर दो-चार घण्टे तक बनी रहती है तो दूसरों में पाँच-छः घण्टे बाद आती है। एडीसन जैसे व्यक्तियों में यह उनके जागरण के 12 घण्टे के बाद ही चरमोत्कर्ष पर पहुँचती थी। ऐसे ही देर से सक्रिय होने वालों में विख्यात वैज्ञानिक डा सिडनी माडर थे। वह कहा करते थे “हमारा शरीर सुबह बिस्तर से जब उठता है तब बेमन रहता है, जैसे वह भीनी-भीनी आतिशबाजी हो। दोपहर-भोजन के पश्चात भी वह पूर्ण चैतन्य नहीं होता। उसकी सक्रिय क्षमता तो रात्रि आगमन के साथ ही उभरती है।”

जैविकलय के अनुसार सर्वाधिक क्रियाशील समय किस व्यक्ति का कब है? यह उसके रहन-सहन चिन्तन-मनन, आचार विचार, संस्कृति एवं व्यक्तिगत रुचि रुझान पर निर्भर करता है। बाह्म याँत्रिकी घड़ी में तो एक रूपता होती है किन्तु भीतरी जैविक घड़ी में भिन्नता क्यों है? इसका उत्तर गहन अनुसंधान के पश्चात ढूँढ़ निकाला है - बोस्टन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोविज्ञानी डा विलियम एस काँडन और उनके सामर्थ्यों ने उनके अनुसार नवजात शिशु की जैव घड़ियों का तारतम्य आरंभ के कुछ घण्टों तक अपनी जन्मदात्री माँ से मिला रहता है। किन्तु ज्योंही उस अन्य लोगों की आवाजें सुनने को मिलती हैं वह उन लयों के अनुसार अपने को ढालने लगता है। यह जीवंत घड़ियाँ याँत्रिकी घड़ों की तरह ठीक समय पर टिक-टिक तो नहीं करती पर प्रकृति की लय के साथ अवश्य मिली होती हैं। इसकी उपलब्धता मनुष्य समेत समस्त प्राणियों के पास होती है। इसी के सहारे केकड़े को पता चल जाता है कि कब धारा बदलने वाली है। चूहे, तिलचट्टे, उल्लू जैसे रात्रिचर प्राणी सायंकाल आरम्भ होते ही सक्रिय हो जाते है। चमगादड़ भोजन की खोज में उड़ चलते हैं। इन सभी के जीवन आन्तरिक लय के अनुसार चला करते हैं, परन्तु मनुष्य वह चेतन प्राणी है जो वातावरण, परिस्थितियों के साथ-साथ अपनी आन्तरिक लय को बदलने में एवं उसे इच्छित दिशा में मोड़ने-मरोड़ने में सक्षम है।

योरोप के प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता डा क्लीटमैन अपने सहयोगी डा ब्रस रिचार्डसन के साथ केंटकी मैमथ की अन्धेरी गुफा में 32 दिनों तक इसलिए रह कि क्या वह 19 घण्टे काम और 9 घण्टे विश्राम वाले 28 घण्टे के दिन की संगति बिठा सकते हैं। प्रयोग सफल रहा। उनका कहना था कि “गर्मियों में दिन और सर्दियों की रात बड़ी होती हैं। फिर भी हमारी जैविक घड़ियाँ अपने आप इन परिवर्तनों के अनुकूल बनती जाती हैं। दुर्घटनाओं के शिकार लोग प्रायः बताते है कि दुर्घटना के समय हर बात बड़ी धीमी गति से होती है जिससे पता चलता है कि मस्तिष्क में कोई ऐसी सक्षम व्यवस्था है जो मनुष्य को बोध क्षमता को सामान्य से कई गुना अधिक बढ़ा देती है। जिसके परिणाम स्वरूप संसार का घटना चक्र भी धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। यही वह समय होता है जिसमें दुर्घटना में फँसा व्यक्ति अपने बचाव का उपाय सोचता”है।

पाश्चात्य मनोविज्ञानियों ने अपने विविध प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर बताया है कि अधिकांश व्यक्ति अपने सर्वाधिक सक्रियता वाले क्षणों का मात्र दो घण्टे तक ही सदुपयोग कर पाते हैं। यह देखा भी गया है कि इस सीमित अवधि में वे दिन के किन्हीं अन्य समयों की अपेक्षा अधिक चैतन्य रहते और स्वस्थ-सक्रिय अनुभव करते हैं। इस अवधि के पश्चात् उन्हें बेमन से कार्य करते और तनाव ग्रस्त रहते देखा गया है। तन्मयता-तल्लीनता के अभाव में ही ऐसा बन पड़ता है अन्यथा जटिल कामों की संगति आन्तरिक लयबद्धता के साथ बिठाकर अभ्यास द्वारा उस अवधि को बढ़ाया जा सकता है।

मस्तिष्क विज्ञानियों ने उपकरणों से परीक्षण करने पर पाया है कि उषाकाल में व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर अल्फातरंगों की प्रधानता होती है। चिन्तन मनन का वह सबसे उपयुक्त समय होता है। विद्यार्थियों के अध्ययन का भी यही समय सर्व श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म वेत्ताओं ने तो उषाकाल को आध्यात्मिक क्रियाकृत्यों हेतु सबसे अच्छा समय बताया है। आसन-प्राणायाम, ध्यान धारणा जैसे योगाभ्यासपरक अध्यात्म उपचारों को अपनाकर जैविक लय की सक्रियता को बढ़ाया और चिरस्थायी बनाया जा सकता है।

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