लाख छिपायें, अन्दर के भाव छिप नहीं सकते
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कई बार मनुष्य नकली भाव-भंगिमा बना कर असली भाव संवेदना को छिपा ले जाता है, जैसे वह बिल्कुल सच्चा अभिनय कर रहा हो, पर कोई उसकी आँखों में झाँक कर देखे, तो पता चलेगा कि कुछ भी उससे छिपा नहीं। वह सच-झूठ को सदा उसी प्रकार प्रकट करती रहती है, जिस प्रकार मुकदमें का कोई चश्मदीद गवाह अपराधी की सत्यता का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
पिछले दिनों आँख और पुतलियों पर हुई शोध से ज्ञात हुआ है कि अनेक अवसरों पर जहाँ व्यक्ति की बनावटी मुखमुद्रा सत्य पर सामान्य रूप से पर्दा डालने में सफल हो जाती है, वहीं उसकी पुतलियाँ भेद खोलती रहती है। इस रहस्य को जानने वाला कोई भी व्यक्ति तथ्य को देख कर सत्य का पता लगा सकता हैं, भले ही उस पर बनावटीपन का कितना ही मुलम्मा क्यों न चढ़ा हो। आमतौर पर देखा यह जाता है कि जब किसी व्यक्ति को वर्षों का बिछुड़ा उसका प्रियजन मिलता है, आकस्मिक संपदा अथवा मनोवांछित वस्तु प्राप्त होती है, किसी ऐसे कार्य में सफलता मिलती है, जिसमें आशा नगण्य जितनी की गई थी, तो वह भाव-विभोर हो उठता है, प्रसन्नता से उसकी आँखें चमक उठती हैं। इस दौरान उसकी पलकें थोड़ी चौड़ी हो जाती है और आंखें कुछ बड़ी दिखने लगती है। आश्चर्य और प्रसन्नता दोनों स्थितियों में यह क्रिया समान रूप से होती है। इसी प्रकार जब कोई बुरी खबर, प्रतिकूलता, भय, विषाद जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो आँखें निस्तेज, बुझी-बुझी-सी दिखाई लगती हैं। यह अनुकूलता-प्रतिकूलता, प्रसन्नता, विषण्णता के अभिव्यक्ति पाने का स्वाभाविक ढंग है, पर अनेक बार व्यक्ति सच्चाई का ढोंग रच कर तथ्य को सामने वाले से छिपाने का प्रयत्न करता है। अभिनय में वह बहुत हद तक सफल भी हो जाता है, इतने पर भी उसकी पुतलियाँ उसके अन्दर के भाव को बिना किसी दुराव-छिपाव के, सही-सही बताती रहती हैं। इस दृष्टि से यह एक प्रकार की “लाई डिटेक्टर “ है। इसी कारण इन दिनों इनका इस्तेमाल अपराध-जगत में सही-गलत अपराधियों को पहचानने, परखने में किया जा रहा है।
यों शरीरशास्त्र में पुतलियों का कार्य उपयुक्त परिमाण में प्रकाशन के प्रवेश करने और अनावश्यक को भीतर जाने से रोकने तक ही अनावश्यक को मनोविज्ञानवेत्ता बताते हैं कि यह तो इसका अत्यन्त स्थूल कार्य हुआ। सूक्ष्म और महत्वपूर्ण तो वह है, जो पक्ष पर अनुसंधान हो रहे हैं, जिसमें अन्वेषणकर्ता यह जानने का प्रयास कर रहे है कि पुतलियाँ इस कार्य को किस प्रकार कितनी दक्षता से करती हैं।
एक प्रयोग के दौरान देखा गया कि जब कुछ छात्रों को गणित संबंधी जटिल प्रश्न हल करने को दिये गये, तो पाया गया कि उनकी पुतलियाँ फैल गई है और तब तक इसी अवस्था में बनी रही जब तक छात्रों ने सवाल हल न कर लिये। इसके अतिरिक्त अन्य ऐसे शारीरिक लक्षण भी उस दौरान उनमें देखे गये, जो प्रकट करते थे कि छात्र घबराहट की स्थिति से गुजर रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्वाद और गंध भी पुतलियों को समान रूप से प्रभावित करते है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह कथन किस हद तक सही है। शोध के दौरान उन्होंने कुछ लोगों को मृदु पेय पीने को दिया। उसके प्रथम घूँट के साथ ही स्वाद के संबंध में लोगों की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं। यह प्रतिक्रियाएँ, उनके बोलने से पूर्व ही उनकी पुतलियों ने फैल और सिकुड़ कर जाहिर कर दीं। उल्लेखनीय है कि खुशी, अच्छे स्वाद अथवा सुगंध की स्थिति पुतलियाँ फैल कर इसकी अभिव्यक्ति करती हैं, जबकि दुर्गंध, बेस्वाद, एवं विषाद अथवा भय के अवसर पर वह अत्यन्त सिकुड़ जाती है, जो इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति अच्छा अनुभव नहीं कर रहा है। मनःशास्त्रियों का कहना है कि पुतलियों का अध्ययन कर और भी गहरी और सूक्ष्म जो कि गहन अन्तराल में अवस्थित हो और जिसकी स्थूल अभिव्यंजना छिपायी जा रही हो, किन्तु यह अवयव अन्तस् के उस भाव को भी पकड़ने और प्रकट करने में सक्षम है। आवश्यकता इस आशय के विस्तृत अन्वेषण की है, ताकि यह जाना जा सके कि किस भाव को प्रकट करने के लिए यह कैसा प्रदर्शन करती है। मनोविशारदों का कहना है कि चूंकि मनुष्य का अपनी पुतलियों पर कोई नियंत्रण नहीं है, अस्तु इस माध्यम से उन संवेदनाओं को भलीभाँति समझा जा सकता है, जो उनके स्थूल अवयव गुप्त रखने में सफल हो जाते है। इस अध्ययन से पूर्व तक मान्यता यह थी कि नारी की पुतलियाँ पुरुषों के प्रति कोई भाव प्रकट नहीं करतीं। अतएव एक प्रयोग द्वारा इस बात की जाँच करने का निश्चय किया गया कि उपरोक्त कथन किस सीमा तक सत्य है। प्रयोग के दौरान जब एक महिला के समक्ष एक आकर्षक व्यक्ति का चित्र रखा गया, तो पुतलियाँ अचानक फैल गई, यद्यपि उसने प्रकट रूप में इस प्रकार का कोई भाव व्यक्त नहीं किया था, जिससे तत्सम्बन्धी किसी मान्यता पर पहुँचा जा सके, पर पुतलियों का फैलना इस बात की साक्षी थी कि नारी को तस्वीर देखकर खुशी हुई है। निष्कर्ष को और अधिक स्पष्ट और पुष्ट करने के लिए दूसरी बार उसी नारी के सम्मुख एक अन्य नर का चित्र प्रस्तुत किया गया, पर इस बार की तस्वीर एक ऐसे व्यक्ति की थी जो बड़ा ही कुरूप भौंड़े नाक-नक्शा युक्त और डरावना था। तस्वीर के सामने आते ही उसकी पुतलियाँ सिकुड़ कर अत्यन्त छोटी हो गई, जो इस बात को सिद्ध कर हरी थी कि महिला के मन में घृणा उपज रही है। इस प्रकार उस संबंध में प्रयोगार्थी के बिना कुछ कहे भी उसकी आंखें बहुत कुछ कह रही थीं।
भय के संदर्भ में पुतली की प्रतिक्रिया कैसी होती है? यह जानने के लिए प्लास्टिक के एक नकली व्यक्ति के सामने अचानक रख दिया गया। उसकी चीख निकल गई, साथ ही आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ कर संकीर्ण बन गई।
मनोविज्ञानियों का मानना है कि यदि इस कला में निपुणता हासिल की जा सके, तो अनेक मौकों पर ऐसे करतब दिखाये जा सकते हैं, जो जनसाधारण को चमत्कार जैसा लगे। उदाहरण देते वे बताते हैं कि अनेक तमाशेबाज ऐसे होते हैं, जो अपनी विद्या में निष्णात नहीं होते, फिर भी ताश के खेल में वे कई बार ऐसे कौशल दिखा जाते हैं, जो सामने वालों को चमत्कृतकर जाते हैं। उनका कहना है कि ऐसा बाजीगर ऐसे क्षणों में पुतली की हलचलों द्वारा ही ऐसा कुछ कर सकने में सफल होते हैं। इस दौरान वे सामने वाले की आँखें पर अपना अधिकाँश ध्यान केन्द्रित रखते हैं, और बड़ी सूक्ष्मता से पुतलियों की गतिविधियों का अध्ययन करते रहते हैं। उनके अचानक फैलने संकुचित होने के आधार पर ही वे भविष्यवाणी करते हैं। जब वे सही सिद्ध होती, तो तरह-तरह के नाम-उपनाम दे डालते हैं-बहुत बड़ा जादूगर मान बैठते हैं, पर यथार्थता इतनी है है कि आँख की वह खिड़की ही सब को देखती-दिखाती बोलती-बताती रहती है। उससे कुछ भी तो छिपा नहीं है।


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