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Books - ब्रह्मज्ञान का प्रकाश

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ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग

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संसार के अधिकांश दुःखों का कारण सांसारिक विषयों की कामनाएँ और भोगलिप्सा ही होती है । इससे पीड़ित व्यक्ति के लिए वास्तव में यह संसार दुःख कानन है । दुःख से घिरे हुए व्यक्ति के अंदर केवल एक ही विचार कार्य करता है कि वह निरीह और घृणास्पद है । अन्य व्यक्ति न उसके प्रति आकृष्ट होते हैं और न हार्दिक संवेदना ही प्रकट करते हैं और तो और उसका स्वयं अपने ही ऊपर से विश्वास हट जाता है । बात यही है कि दूसरों से न उसे सहायता मिलती है और न सांत्वना ही, पर उसके मन से यह बात अलग नहीं होती कि शायद किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसे दुःख से छुट्टी मिल जाए ।

दुःख के अवसर पर मन से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलती, क्योंकि उसकी अनर्गल इच्छाएँ ही दुःख उत्पन्न करती हैं । इच्छाओं से उत्पन्न सुख का तो वह आलिंगन करता है, पर दुःख के उपस्थित होने पर उसकी कुछ सुने बिना ही वह उसे भगा देना चाहता है । परिस्थितियों के अनुकूल होने पर यदा-कदा उसे अपनी चाल में सफलता मिल जाती है और बुद्धि निस्सहाय होकर सुषुप्ति-अवस्था में चली जाती है तथा दुःख के विषय पर गंभीर विचार करने में असमर्थ हो जाती है । मन के चक्र में फँसा हुआ प्राणी इस प्रकार अधिक काल तक दुःख भोगता रहता है । एक के बाद दूसरा-इस प्रकार कितने ही जीवन ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं ।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दुःख की घड़ी उपस्थित होने पर उस पर विचार करते हैं और सत्संग का आश्रय लेते हैं । लेकिन अधूरे विचार और बाहरी सत्संग से उन्हें लाभ नहीं होता, क्योंकि उसमें भी दुःख भोगने के अतिरिक्त उनका कोई दूसरा अभिप्राय नहीं होता । दुःख पर विचार करते समय या सत्संग के अवसर पर उनका पूरा मन वहाँ नहीं रहता । उनका मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है और दूसरों की बातों में दुःख से छुटकारा पाने के लिए समाधान खोजता है,जो उसे कभी नहीं मिलता है । कारण वह अपने इंद्रिय सुखों को छोड़ना नहीं चाहता । दुःख के अवसर जीवन में बार-बार आते हैं और जब-जब आते हैं । तब-तब मनुष्य को गहरी चोट पहुँचाते हैं । मनुष्य उससे तिलमिला उठता है, रोता और चिल्लाता है, पश्चात्ताप करता है और उसके मन में भोगों से मुँह मोड़ने की भी इच्छा होती है, लेकिन पुरानी आदत अवसर आने पर उसे भोग भोगने के प्रति पुन: प्रवृत्त कर देती है और उसका पूर्व का प्रत्यय मंद पड़ जाता है । वास्तव में उसका यह दुःख भी प्रतारणा ही है । किसी कार्य के प्रति सच्चे दुःख से सजगता उत्पन्न होती है । यदि ऐसा न हो, तो समझो कि दुःख का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है । दुःख से यदि मनुष्य नहीं सँभला तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो उसे सत्पथ पर ले जा सके ।

जिस मनुष्य ने जिंदगी की बातों को अर्थात उसके सुख-दुःख को भली प्रकार समझ लिया और जिसके मन में दुःखों से छुटकारा पाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई है, उसे जीवनपर्यंत सत्संग करते रहने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । सत्संग से बहुत कम लाभ उठाने वाले वे ही व्यक्ति होते हैं जो सदा सत्संग करते रहते हैं, लेकिन अपने को समझने की कभी कोशिश नहीं करते । अन्य सोसाइटियों की भाँति सत्संग भी उनके लिए वार्त्तालाप करने का एक साधन हो जाता है । कहीं दो घड़ी बैठकर वहाँ भी वे अपना मन बहला लिया करते हैं । ऐसे लोगों के अज्ञान का जल्दी अंत नहीं होता । जीवन की किसी बात को सम्मुख रखकर, जिसको कि समझने की उसे अत्यधिक आवश्यकता है । यदि वह किसी संत के पास जाता है तो संभव है कि उसे अल्पकाल के सत्संग से ही बहुत बड़ा लाभ हो जाए । लेकिन जो केवल बात सुनने एवं समय बिताने की गरज से सत्संग करता है, उसे बहुत कम और देरी से लाभ होता है । सत्संग का अभिप्राय है-मार्ग में किसी बाधा के आ जाने पर उसका समाधान कर लेना । हर बात को समझते और साधते हुए उपस्थिति होने पर सत्संग से लाभ उठाते हुए जीवन को ले चलने पर मार्ग सुगम हो जाता है ।

मनुष्य का जीवन एक वाटिका है । वाटिका को अच्छी दशा में रखने के लिए उस पर सब ओर से निगाह रखनी आवश्यक है । उद्यान के सौंदर्य को नष्ट कर देने वाली कोई चीज यदि बीच में उग आती है तो चतुर माली उसे तुरंत उखाड़कर फेंकता है । बाग देखने में यदि अच्छा न हुआ तो माली का सारा परिश्रम व्यर्थ समझा जाता है । माली जमीन को खूब कमाता है और उसे मुलायम बना देता है । जमीन के सब प्रकार से अच्छी हो जाने पर वह भाँति-भाँति के पुष्प और फल के वृक्षों को यथास्थान उसमें बिठाता है । प्रवीण माली द्वारा इस प्रकार सजाया हुआ बाग देखने में सुंदर मालूम होता है । बाग के मालिक की भी वहाँ बैठने की इच्छा होती है और आगंतुकों की भी । यह जीवन भी एक उद्यान के समान है । इसे सब प्रकार से सँभालकर रखना चाहिए ताकि इसकी स्वाभाविक प्रगति में किसी प्रकार का विघ्न उपस्थित न हो । बहुत प्रकार की इच्छाओं से घिर जाने पर मनुष्य का जीवन बिना सँभाली हुई वाटिका के समान हो जाता है । इच्छाओं की पूर्ति करने में वह परिश्रम करता है और उसमें संलग्न रहता है । सफलता निकट होती है, पर प्राय: वह विफल ही रहता है । बहुत समय तक इस सुखप्राप्ति की लगन में लगे रहने के कारण उसे अनेकों प्रकार के अनुभवों से होकर गुजरना पड़ता है । सुख के बीच उसकी प्रतिक्रिया से उसे प्रत्यक्ष आघात पहुँचता रहता है । फिर भी वह उसी को सही जीवन समझता है । दुःख के बहुत बढ़ जाने पर जीवन कभी-कभी उसे भार मालूम होता है । इस घबराहट के बीच उसके मन में एक ही धुन रहती है कि विपरीत स्थिति और दुःख से किस प्रकार छुटकारा मिले ? इसके लिए वह न करने योग्य कार्य भी कर डालता है । दु:ख के बहुत बढ़ जाने और बुद्धि पर उसका काबू नहीं रह जाता । मन की अतिशय खिन्न दशा में तो प्राणी शरीरांत तक चाहने लगता है । अशांत चित्त की यह बहुत ही मलिन दशा है । इसलिए दुःख की साधारण दशा में होश के रहते हुए जब चित्त में सजगता उत्पन्न हो तो इस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिए । दुःख के समय उत्पन्न हुई सजगता के चिरस्थाई बनाए रखने के लिए उचित प्रति विधान करना चाहिए ।

चूँकि हमें अपने सुख का आवश्यकता से अधिक ध्यान रहता है, इसलिए जीवन में यह सारी गड़बड़ी और मुसीबतें हैं । इंद्रिय सुख के संबंध में प्रत्येक का यही अनुभव है कि वह ऐसा सुख नहीं है, जो मनुष्य को निश्चित कर दे । प्रत्युत वह दिनोंदिन कष्ट उत्पन्न कर बंधन को बढ़ाता ही रहता है । इस सुख में तृप्ति नहीं है । किसी भोग को कुछ समय तक स्थाई रखने से मनुष्य को उसकी आदत पड़ जाती है । फिर तो अनायास ही अचेतन मन उस काम को कर बैठता है । इंद्रिय सुखों में यदि कोई विघ्न और निर्बंध न होता तो कदाचित इसको भी स्वाभाविक कहा जा सकता और फिर उससे छुटकारा पाने की कोई बात न सोची जाती । संसार में दिखलाई यही देता है कि विघ्न-बाधाओं से विमुक्त होकर कोई भी व्यक्ति इंद्रिय सुखों को नहीं भोग सकता है ? किसी भी सुख के भोग में सबसे बड़ा विघ्न तो अपना शरीर ही है । इसके अतिरिक्त परिस्थिति की विभिन्नता के अनुसार अनेकों प्रकार की दिक्कतें हैं जो मनुष्य के सामने रोज आया करती हैं और मनुष्य उनका नित्यप्रति अनुभव किया करता है । देखने और विचार करने पर यह भी मालूम पड़ता है कि सुख ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसके लिए हमें बाह्य किसी भी वस्तु पर निर्भर रहना पड़ता हो या हम पर उसकी प्रतिक्रिया न होती हो । ऐसी दशा में कौन प्राणी यह कह सकता है कि उसका सुख विघ्न- बाधाओं से रहित है । जब यह दशा है तो मनुष्य के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह अपने सुख-दुःख के प्रति सजग होकर जीवन की बातों को समझने की कोशिश करे और अपनी किसी इच्छा का जबरदस्ती दमन न करके उसके रहस्य को समझे । इच्छा का रहस्य जब भली प्रकार अवगत हो जाता है, तब उसे त्याग करने में दुःख नहीं होता । उचित प्रयास द्वारा मनुष्य उसे छोड़ने में समर्थ होता है । यह काम भी आसान नहीं है । यदि मनुष्य सदा सजग रहे तो संभव अवश्य है । यदि मनुष्य अपने चिरकाल के अभ्यास को नहीं छोड़ पाता तो उसे कोई दूसरी संज्ञान युक्ति बतलाई भी नहीं जा सकती । ऐसे असमर्थ प्राणी सदा दुःख में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं ।

मनुष्य को सच्चे मार्ग पर लाने के लिए दुःख से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है । दुःख ही मनुष्य को सजग होने का अवसर प्रदान करता है । सजगता द्वारा जीवन का बोध हो जाने पर उसकी गति स्वाभाविक हो जाती है । आरंभ में चित्त पहले से भी अधिक अशांत हो जाता है, लेकिन यह अशांति सजगता के प्रकाश में धीरे-धीरे कम होने लगती है । आरंभ की यह वह परेशानी है जो जीवन को समझ की राह पर ले जाती है । जीवन की त्याज्य बातों को समझकर ज्यों-ज्यों मनुष्य उन्हें आसानी से छोड़ सकने में समर्थ होता है, त्यों-त्यों उसका जीवन अधिकाधिक स्वाभाविक और गंभीर बनता जाता है । त्याग की हुई वस्तु में फिर उसका राग नहीं रह जाता । छोड़ने पर मन में उसके प्रति न कोई क्षोभ होता है और न उस पर विजय प्राप्त करने का गर्व ही । वह प्राणी अपनी किसी दशा में प्रतिहत नहीं होता । जीवन उसे अधिक रुचिकर और अपना मालूम होता है, क्योंकि उसने उसे पास से देखा है और उसके अलग-अलग पहलुओं पर गौर करना सीखा है । जीवन के साथ समवर्ती होने पर कष्ट कम होने लगता है । उसके सामने जो बात आएगी, उसे समझने के लिए वह अपना हृदय, मन और बुद्धि अर्पित कर देगा । उसके विचार और कार्य में कोई अंतर न होगा । अपने को समझाने के लिए मनुष्य को अन्य किसी व्यक्ति के उपदेश और आलोचना की आवश्यकता नहीं होती । राग-द्वेष से प्रेरित होकर वह न किसी को अपना मित्र समझेगा और न शत्रु ही । वह मनुष्य अपने को समझने में इतना संलग्न हो जाएगा कि बाह्य वस्तुएँ उसके लिए उपेक्षणीय हो जाएँगी । दूसरों की बातों पर ध्यान देने के लिए उसके पास समय न रहेगा और वह दूसरों के प्रति कोई विरुद्ध बात ही सोचेगा । किसी को अपने से श्रेष्ठ समझकर न वह उसका प्रभुत्व स्वीकार करेगा और न किसी को अपने से न्यून समझकर उसकी उपेक्षा करेगा या उस पर प्रभुत्व दिखलाएगा । दोनों ही दशाओं में भीतर भय और भेद रहता है । इसलिए ऐसे जीवन में न समत्व होता है और न स्वाभाविकता ही । इसका परिणाम संकीर्णता और अवनति है ।

जीवन में जब दूसरों का प्रभाव अधिक पड़ने लगता है, तब वह मनुष्य अपना नहीं रह जाता । उसके अंदर विचार और स्वतंत्र कार्य करने की क्षमता का अभाव हो जाता है । जीवन की ऐसी परिस्थिति में सत्य का प्रदर्शन नहीं होता । सत्य का अनुभव करने के लिए प्रत्येक प्राणी को अपना बन जाने की आवश्यकता है । सत्य की खोज करने वाले को हर्ष, शोक मोह, अनुराग और प्रभुत्व की भावना को अपने पास नहीं आने देना चाहिए । ये दशाएँ मन को उत्तेजित करने वाली होती हैं । चित्त को ऐसी स्थिति में रखा जाए कि उस पर बाहरी कोई बात अपना प्रभाव न डाल सके । चित्त में जब आनंद और निरालंब प्रेम स्थान पा लेता है, तब अपने-पराये का भेद मिट जाता है । ऐसा पुरुष न कभी उदास रहता है और न मन लगाने के लिए किसी अवलंब की आवश्यकता अनुभव करता है । जीव-जंतु और लता-बल्लियों के साथ उनका सौहार्द्र हो जाता है । कष्टदायक अवसरों का भी जीवन में अभाव होना आंरभ हो जाता है । मन सदा प्रसन्न और एकाग्र रहने लगता है । संसार के साथ उसका अप्लान प्रेम का संबंध स्थापित हो जाता है । संसार की प्रत्येक वस्तु में वह अपना रूप देखता है । उसको सर्वत्र सत्य का दर्शन होता है और प्रत्येक अवस्था उसके लिए आनंद की अवस्था हो जाती है । वायु के रूप में वह संसार की सैर करेगा। फूल-पत्तियों और घास के साथ वह नृत्य करेगा, आकाश उसका रूप होगा, जल, पृथ्वी और अग्नि उसके बाह्य प्रतीक होंगे । संसार की प्रत्येक वस्तु के साथ जब एकता और मैत्री स्थापित हो जाएगी । तब वह खिन्न और भयांतुर क्यों रहेगा ? शुद्ध और पवित्र मन के अंदर उच्च और वांछित भावना उदय होती है । उद्बोधित पुरुष संसार में आनंद-प्रसार करने के केंद्र बन जाते हैं । व्यक्त और अव्यक्त दोनों दशाओं में उनके द्वारा कार्य संपादन होता रहता है । आनंद-उपलब्धि की यह एषणा स्वार्थ की भावना नहीं है । इसमें निवास करने से मन के संकल्प-विकल्पों का तिरोभाव हो जाता है । जीवन की इस स्थिति में प्रयास नहीं रह जाता । यह जीवन की शुद्ध और सात्विक सहज दशा है । ऐसे व्यक्ति को देखकर दूसरे प्राणी भी इस शुद्ध भावना को ग्रहण करने की इच्छा करने लगते हैं और इस ओर अपना प्रयास आरंभ कर देते हैं । इस शुद्ध अवस्था की प्राप्ति एक ही क्षण में नहीं हो जाती, पर इसमें हताश होने की कोई बात नहीं है । सत्य सबके लिए एक और अनिवार्य है । सभी एक न दिन इसे प्राप्त करेंगे । प्रश्न केवल समय का हो सकता । इसके लिए सबसे आवश्यक बात है-तीव्र वेग का होना; तीव्र वेग वाले प्राणी उसे शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं । इन्हें इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता । देर तो उनको लगती है, जो शब्द-वेग के कारण रास्ते में रुककर इधर-उधर की सैर करने लगते हैं ।

भिन्न-भिन्न उपायों द्वारा लोगों ने इसकी खोज की और उनका कहना है कि सत्य की प्राप्ति के लिए मार्ग अनेक हैं, किंतु सत्य की प्राप्ति का मार्ग केवल एक है और वह है-"सृष्टि और जीवन के रहस्य को समझना ।" इसे लोग जब तक भली प्रकार नहीं समझ लेते, तब तक वे अनेक मार्ग और अनेक उपायों द्वारा अनुभव करने की चेष्टा करते रहते हैं । लोग कहते हैं कि ईश्वर घट-घट में व्याप रहा है, लेकिन वह भी केवल मुँह से ही कहते हैं । इस सत्य को समझ लेने पर प्राणी अपने प्रत्येक कार्य का जिम्मेदार हो जाता है । वह अपनी अंतरात्मा की ध्वनि को सुनता है और उसके अनुसार आचरण करता है अर्थात वह प्रत्येक कार्य में अपने हृदय और मन को एक करके कार्य करने की चेष्टा करता है । हृदय और मन में एक्य ही बुद्धि का विकास है । अंतःकरण में ईश्वर, सत्य तथा जीवन की अनुभूति हो जाने पर प्राणी अपने समस्त कार्यों के प्रति सावधान हो जाता है । उसका यह पथ जीवन की वास्तविकता को सामने रखता है । इससे जीवन स्वाभाविक और सरल बनता है । फिर उसके अंदर ईश्वरप्राप्ति और सत्य को जानने की भी कोई इच्छा नहीं रह जाती, प्रत्युत उसका जीवन ही सत्य हो जाता है । उसका प्रत्येक आचरण, व्यवहार और कार्य इस प्रकार का होता है कि उससे कोई कर्म बंधन स्थापित नहीं होता । इस प्रकार का समत्वमय जीवन ही सत्य है और इसमें ईश्वर का दर्शन है ।

सत्य की अनुभूति के बाद सब बातों और सब दशाओं में मनुष्य अपनी सत्ता का अनुभव करता है । संदेह उसके मन से हट जाता है । प्रत्येक स्थिति में वह सत्य के अंदर निवास करता है । अकेलेपन की भयावह दशा का अंत हो जाता है । प्रतिक्षण सत्य के सम्मुख होने से वह सदा आनंद में निवास करता है ।

सत्य-विहीन की दशा जल से बिछुड़ी हुई मछली की सी होती है । कुछ क्षण तक जीवित तो रहते हैं लेकिन उनके जीवन में आनंद, उत्साह और सार नहीं रहता । उनकी दशा उस मीन की सी होती है, जो किसी मछुए के जाल में फँसकर अतिशय दुःख से प्राण त्याग करती है । अपने किसी क्षणिक सुख के कारण यदि किसी मनुष्य ने अपनी दशा को इससे कुछ अतिरिक्त समझा है तो वास्तव में वह भ्रांत है और अपने जीवन को भली प्रकार नहीं समझ रहा है । संसार एक बहुत ही बड़ा जाल है, उसके असंख्य छिद्रों में मनुष्य अपनी इच्छाओं की तृप्ति देखता है और लोभ-मोह के कारण उसमें फँसने की चेष्टा करता है । एक बार फँस जाने पर उससे निकलना कठिन है । अत: मनुष्य को श्वास-प्रश्वास में सचेत रहना चाहिए । इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है ।

पूर्ण सचेत हो जाने पर कर्त्तापन का भाव भी जाता रहता है और उसे कोई वस्तु अपने में फँसा नहीं पाती । आनंद की सत्ता से अधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु जब दूसरी नहीं है, तब संसार का क्षणिक सुख-दुःख पश्चिम में डूबते हुए सूर्य की भाँति मन के दूर देश में कहीं अस्त हो जाता है । यह जीवन में तटस्थता की दशा है, जहाँ संसार के वैभव आकाश में स्थिति प्रातःकालीन नक्षत्रों की भाँति फीके होकर आनंद के परम प्रकाश में विलीन हो जाते हैं । आनंद की प्राप्ति के पश्चात संसार की बातों का चित्त पर असर ही नहीं होता । फिर कोई भी पदार्थ अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते । सारे प्रपंच मिट जाते हैं ।

जब यही एक वस्तु जीवन में प्राप्त करने के योग्य है, बल्कि यही जीवन है, तब मनुष्य यहाँ के सुख-दुःख के पचड़े में पड़कर व्यर्थ अपना समय क्यों नष्ट करता है ? मार्ग में यदि कोई प्रतिरोध आ जाए तो उस पर विचार करना चाहिए और उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए । आनंद को संपूर्ण रूप में प्राप्त कर लेने की प्रत्येक मनुष्य के अंदर अभिलाषा होनी चाहिए । इस पथ पर चलते हुए भी ऐसा नहीं है कि दुःख न पावे । दुःख के आने पर उसे टालने की व्याकुलता न हो । ऐसा करने से लगन के होते हुए भी लक्ष्य तक पहुँचने में विलंब होगा ।

आनंद की अनुभूति कोई किसी को करा दे, यह संभव नहीं है । अपने ही प्रयास से जीवन की यह स्थिति प्राप्त की जाती है । यह कोरी कल्पना नहीं है । बोधपूर्वक प्रयास करने पर इसमें सफलता मिलती है, यह ध्रुव सत्य है । प्रत्येक मनुष्य अपने पुरुषार्थ और प्रयास के द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है । लोगों के जीवन में विभिन्नता अवश्य दृष्टिगोचर होती है, लेकिन यह कोई रुकावट नहीं है । सत्य वस्तु में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है ।

चूँकि बहुतों के मन में सत्य को जान लेने की इच्छा और लगन है और किसी सरल मार्ग की खोज है, इसलिए उनको इस पथ पर चलने के लिए प्रस्तुत हो जाना चाहिए । एक बार सजग होकर पैर आगे बढ़ा देने पर फिर निराश नहीं होना पड़ता और मनुष्य पीछे कदम हटाना पसंद नहीं करता । समझ-बूझकर जब हम इस पथ पर पैर रखेंगे, तब हमारे अंदर सुख-दु:ख के रहस्य को समझने की क्षमता आ जाएगी । सुख का प्रसंग आने पर हमें फूलना नहीं चाहिए और दु:ख के प्रसंगों से घबराना नहीं चाहिए । बल्कि उनके बीच में रहते हुए उनके रहस्य को समझकर उनसे मुक्त हो जाना चाहिए ।

आनंद ही एकमात्र सत्य है । यही एक स्वाभाविक मंदिर है, जहाँ सबको आना है । यहाँ बैठकर आप सच्चे ध्यान में निमग्न हो सकते हैं । इसको एक बार दृढ़तापूर्वक अपना लेने से सारा संदेह दूर हो जाता है । ऐसी स्थिति में मनुष्य संसार का हो जाता है और संसार उसका हो जाता है । 'अहं' की पृथक भावना मिटकर विराट में लीन हो जाती है । राग-द्वेष की अग्नि सदा के लिए बुझ जाती है ।

इस आत्यंतिक आनंद के प्राप्त कर लेने पर मनुष्य स्वतंत्रतपूर्वक संसार में विचरण करता है । जो मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र हैं और आनंद में स्थित हैं, वे संसार के सामने कुछ सही बात रख सकते हैं । आनंद में प्रतिष्ठित हो जाने पर पुरुष प्राणीमात्र का मित्र हो जाता है और प्रेम ही उसका मुख्य आचरण रहता है, प्रेम के अतिरिक्त उसके पास और कोई वस्तु नहीं रहती । इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर एक को अनेक में देखने की क्षमता स्वाभाविक ही रहती है । यही मोक्ष की स्थिति है ।
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