ब्रह्मज्ञान का मार्ग कठिन नहीं
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यद्यपि सांसारिक लोग ब्रह्मज्ञान को बड़ा कठिन प्राय: असंभव मानते हैं, पर यह एक बड़ी भूल है । ब्रह्मज्ञान अथवा अध्यात्मिकता मनुष्य के जीवन में आदिकाल से ओत-प्रोत है, इसलिए उसे समझ सकना और पालन कर सकना कुछ कठिनाई जान पड़ती है, उसका कारण यही है कि इन दिनों संसार वास्तविकता को छोड़कर कृत्रिमता में बहुत अधिक लिप्त हो गया है । इसलिए जो मार्ग मनुष्य के वास्ते सीधा, सरल और हितकारी था, वही उसे कठिन और असंभव जान पड़ता है, पर यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो भलाई एवं पवित्रता का मार्ग पाप और नीचता की अपेक्षा कहीं सरल है । भलाई में जो स्वाद है, पवित्रता में जो आनंद है, वह पाप और नीचता के सरूर से अधिक मजेदार है । भलाई करना पाप करने से ज्यादा आसान है क्योंकि परमात्मस्वरूप मनुष्य की प्रवृत्ति स्वभावत: पवित्रता की ओर है । पाप और नीचता बड़े अप्राकृतिक हैं । मनुष्य नहीं चाहता कि वह निकृष्टता के पंजे में फँस जाए । उस मार्ग पर चलने में उसे पग-पग पर अपनी आत्मा का संहार करना पड़ता है, मन की रुचि पर बलात्कार करना होता है, तब कहीं वह पाप कर पाता है ।
जो व्यक्ति धूम्रपान का प्रारंभ करते हैं, उन्हें भयंकर खाँसी उठती है, नेत्रों में आँसू आ जाते हैं, शरीर में पीड़ा होती है, सर में चक्कर आते हैं, मुँह में से दुर्गंध उठती है । यह सब इसी कारण होता है क्योंकि तंबाकू अप्राकृतिक है । परमेश्वर नहीं चाहता कि हम वह कार्य करें । प्रकृति का सहयोग उसमें नहीं है । केवल हमारी अनधिकार चेष्टा ही उन दिव्यशक्तियों के विरुद्ध युद्ध करती है ।
इसी प्रकार पाप एवं नीचता का प्रारंभ करने में हमारे अंत:करण में भयंकर विक्षोभ होता है, आत्मग्लानि तथा क्लेश उत्पन्न होता है, मन किसी अज्ञात भय से थर-थर काँपता है, हमारे दुष्कृत्य में साथ देना चाहता, हमारा शरीर स्वाभाविक गति से उस ओर नहीं चलता । अड़ियल घोड़े की तरह वह स्थान-स्थान पर अटकता है और उस मार्ग पर नहीं चलना चाहता । हमारे संकल्प, हमारी धारणाएँ हमारी वृत्तियाँ सब ही जवाब दे देते हैं । अपने मन पर अत्याचार करते हुए हम पाप में प्रवृत्त होते हैं । बार-बार उसी की आवृत्ति करते रहने से हमारी पवित्र आकांक्षाएँ मृतप्राय हो जाती हैं । जिस प्रकार जानते-बूझते हम अफीम, शराब, तंबाकू तथा अनेकों विषैले पदार्थों के अभ्यस्त हो जाते हैं तथा हमें उनकी कडुवाहट भी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार अभ्यस्त हो जाने पर हमें पाप और नीचता करते हुए ग्लानि का अनुभव नहीं होता । कालांतर में हम पक्के पापी हो जाते हैं ।
परमात्मा को अपने अंदर से कार्य करने दीजिए । आदिप्रभु की जो इच्छा है उसी के अनुसार चलने के लिए अपने आप को विवश कीजिए । परमात्मा को स्वयं अपनी मरजी के अनुसार चलने को मजबूर न कीजिए । तुम्हारी इच्छा एक होनी चाहिए । तुम वही सर्वशक्तिमान परमात्मा हो जिसने तमाम जगत को अपनी पवित्रता प्रदान की है और अणु-अणु में वही उत्कृष्ट तत्त्व ओत-प्रोत कर दिया है, जो सत्य है, सुंदर है तथा सर्वत्र शिव है ।
आत्मनिरीक्षण द्वारा मालूम कीजिए कि कितने अंशों में तुम ईश्वरेच्छा के अनुगामी बने हो ? तुम्हारे कितने कार्य परमात्मा के लिए होते हैं ? कितनी देर तुम 'स्व' की पूर्ति में व्यतीत करते हो ? कितनी देर तुम पूजा-उपासना में लगाते हो ?
तुम्हारे विभिन्न अंगों का क्या अभिप्राय है ? वे किस आशय से बनाए गए हैं ? तुम्हारे नेत्रों का कार्य पवित्र से पवित्र वस्तुओं का दर्शन होना चाहिए, तुम कुरूपता में भी भव्यता खोज निकालो । प्रतिकूलता में भी सहायक तत्त्वों के दर्शन करते रहो । कठिन से कठिन और विषम से विषम परिस्थिति में भी विचलित न हो । तुम्हारे पाँव तीव्र आँधी-पानी में भी स्थिर रहें । तुम्हारे हृदय में पवित्रता की गरमी हो । शरीर में उत्साह हो । परमेश्वर का तेज अंग-प्रत्यंग से झलकता हो ।
आत्मबंधुओ ! हमारा इस संसार से कोई संबंध नहीं है । हम सत्-चित्- आनंद विशुद्ध परम पदार्थ आत्मा हैं । संसार और सांसारिक संबंध खिलौने मात्र हैं । अकसर हम कहा करते हैं कि अमुक व्यक्ति हमारा शत्रु है, अमुक हमारा मित्र है, अमुक हमारा पिता है, अमुक हमारा पुत्र है किंतु वास्तव में न कोई शत्रु है, न मित्र है न पिता है और न पुत्र । हम सब साक्षात परब्रह्म पदार्थ हैं । हमारा संसार के क्षुद्र झगड़ों से कोई संबंध नहीं है । सुख, दु:ख, छाया तथा उजेला है जो आया-जाया करता है । हमारी आतरिक शांति भंग नहीं होनी चाहिए । हम संसार से बहुत ऊँचे हैं ।
जैसे वायुयान मे बैठकर आकाश में विहार करने से संसार की प्रत्येक वस्तु घरबार, मनुष्य, पशु वृक्ष आदि छोटे-छोटे प्रतीत होते हैं । उसी प्रकार आत्मस्वरूप का प्रकाश करने वाले साधक को सांसारिक पदार्थ मिथ्या प्रतीत होते हैं । वह उससे बहुत ऊँचा उठ जाता है । माया-मोह के चक्र में नहीं फँसता। उसे दिव्यज्ञान वह प्रकाश प्रदान करता है, जिसकी रोशनी में उसे भव्यता, पवित्रता तथा वास्तविक सत्यता के दर्शन होते हैं ।
आप संसार के साथ जुदा ही रहकर आत्मज्योति का प्रकाश कर सकें, ऐसी बात नहीं है । संसार के थपेड़े सहकर भी आप भली-भाँति दिव्यता प्राप्त कर सकते हैं । घर-गृहस्थ के अनेक उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए भी आप सहर्ष अपने भीतर से परमात्म तत्त्व को प्रकाशित कर सकते हैं ।
आप यह मानकर प्रत्येक कार्य को कीजिए कि आप परमात्मा हैं । उसी के अंग हैं । आप में, ज्ञान, सत्य, प्रेम भरा पड़ा है और आप नित्यप्रति के जीवन में उन्हीं तत्त्वों का प्रकाश कर रहे हैं । आप सर्वत्र प्रेम, दिव्यता एवं शांति का ही दर्शन करते हैं । आपकी दृष्टि केवल भव्य तत्त्वों के चिंतन में ही लगती है । आप पवित्र शब्दों का ही उच्चारण करते हैं और मनोमंदिर में सदा-सर्वदा पवित्र संकल्पों को ही स्थान देते हैं ।
आपका लक्ष्य एवं आदर्श जितना दिव्य होगा उतनी ही आपको ईश्वरीय प्रेरणा प्राप्त होगी । जो गुण आप में नहीं है उन्हें अपने अंदर मान लीजिए । फिर उन्हीं के अनुरूप आचरण कीजिए । कालांतर में वे ही शुभ तत्त्व आप में प्रकट होंगे । आप अपने को दीन-हीन पापी नहीं, परम पवित्र निर्विकार आत्मा मानिए ।

