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गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां

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Reading: तपश्चर्या से आत्मबल की उपलब्धि · Page 62

तपश्चर्या से आत्मबल की उपलब्धि

तप का अर्थ है- उष्णता, गति, क्रियाशीलता घर्षण, संघर्ष, तितिक्षा, कष्ट सहना। किसी वस्तु को निर्दोष पवित्र एवं लाभदायक बनाना होता है तो उसे तपाया जाता है। सोना तपने से खरा हो जाता है। डाक्टर पहले अपने औजारों को गरम कर लेते हैं तब उनसे आपरेशन करते हैं। चाकू को शान पर न घिसा जाय तो काटने की शक्ति खो बैठेगी। हीरा खराद पर न चढ़ाया जाय तो उसमें चमक और सुन्दरता पैदा न होगी।

व्यायाम- कष्टसाध्य श्रम किये बिना कोई मनुष्य पहलवान नहीं हो सकता। अध्ययन का कठोर श्रम किये बिना विद्वान बनना सम्भव नहीं। माता बच्चे को गर्भ में रखने एवं पालन पोषण का कष्ट सहे बिना मातृत्व का सुख लाभ नहीं कर सकती। कपड़ों को धूप में न सुखाया जाय तो उनमें बदबू आने लगेगी। कोठी बन्द रखा हुआ अन्न धूप में न डाला जाय तो घुन जायेगा। ईंट यदि भट्टे में न पके तो उनमें मजबूती नहीं आ सकती। बिना पके भोजन प्राण की रक्षा नहीं कर सकता।

प्राचीनकाल मे पार्वती ने तप करके मनचाहा फल पाया था। भागीरथ ने तप करके गंगा को भूलोक में बुलाया था। ध्रुव के तप ने भगवान को द्रवित कर दिया था, तपस्वी लोग कठोर तपश्चर्या करके सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर आदि ने भी जिस किसी को जो कुछ प्राप्त हुआ है वह तप के ही प्रभाव से प्राप्त हुआ है।

ईश्वर तपस्वी पर प्रसन्न होता है और उसे ही अभीष्ट आशीर्वाद देता है। जो धनी, सम्पन्न, सुन्दर स्वस्थ्य, विद्वान, प्रतिभाशाली, नेता, अधिकारी आदि के रूप में चमक रहे हैं, उनकी चमक अब के या पिछले तप के ऊपर ही अवलम्बित है। यदि वे नया तप नहीं करते और पुरानी तपश्चर्या की पूँजी को खा रहे हैं तो उनकी चमक पूर्व पूँजी चुकाते ही धुँधली हो जायेगी।

जो लोग आज गिरे हुए हैं, उनके उठने का एकमात्र मार्ग है- तप। बिना तप के कोई भी सिद्धि, कोई भी सफलता नहीं मिल सकती न सांसारिक न आत्मिक। कल्याण की ताली तप की तिजोरी में रखी है। जो उसे खोलेगा, वही अभीष्ट वस्तु पावेगा।

दोनों हथेलियों को रगड़ा जाय तो वे गरम हो जाती हैं। दो लकड़ियों कों घिसा जाय तो अग्नि पैदा हो जायेगी | गति, उष्णता, क्रिया, यह रंग का परिणाम है। मशीन को चलाने के लिये उसके किसी भी भाग में धक्का या धचका लगाना पड़ेगा अन्यथा कीमती से कीमती मशीन भी बन्द ही पड़ी रहेगी।

शरीर को झटका लगाने के लिये व्यायाम या परिश्रम करना आवश्यक है। आत्मा में तेजस्विता सामर्थ्य एवं चैतन्यता उत्पन्न करने के लिये तप करना होता है। बर्तन माँजे बिना, मकान झाड़े बिना, अशुद्धि और मलीनता पैदा हो जाती है। तपश्चर्या छोड़ देने पर आत्मा भी अशक्त, निस्तेज एवं विकारग्रस्त हो जाती है। आलसी और आराम तलब शरीर में अन्नमय कोष की स्वस्थता स्थिर नहीं रह सकती। इसलिये उपवास, आसन, तत्व शुद्धि के साथ ही तपश्चर्या को प्रथम कोश की सुव्यवस्थ का आवश्यक अंग बताया गया है।

प्राचीनकाल में तपश्चर्या को बड़ा महत्त्व दिया जाता था। जो व्यक्ति जितना परिश्रमी, कष्टसहिष्णु, साहसी, पुरुषार्थी एवं क्रियाशील होता था, उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। गरीब, अमीर, राजा-महाराजा सभी के बालक गुरुकुलों में भेजे जाते थे ताकि वे कठोर जीवन की शिक्षा (प्राप्त करके अपने को इतना सुदृढ़ बना लें कि आपत्तिग्रों से लड़ना और सम्पत्ति को प्राप्त करना सुगम हो सके।

आज तप के, कष्ट सहिष्णुता के महत्त्व को लोग भूल गये हैं और आरामतलबी, आलस्य, नजाकत को अमीरी का चिन्ह मानने लगे हैं। फलस्वरूप पुरुषार्थ घटता है, योग्यता द्वारा उपार्जन करने की अपेक्षा लोग छल, धूर्तता एवं अन्याय द्वारा बड़े बनने का प्रयत्न कर रहे हैं।

गायत्री साधकों को तपस्वी होना चाहिये। अस्वाद व्रत, उपवास ऋतु-प्रभावों का सहना, तितिक्षा, घर्षण, आत्मकल्प, प्रदातव्य, निष्कासन, साधन, ब्रह्मचर्य, चान्द्रायण, मौन अर्चन आदि तपश्चर्या की विधियों का विस्तार से आगे वर्णन किया गया है। यहाँ तो इतना कहना पर्याप्त होगा कि अन्नमय कोश को स्वस्थ रखने के लिए श्रम, कर्तव्यपरायणता, जागरुकता और पुरुषार्थ को सदा साथ रखना चाहिये। समय को बहुमूल्य सम्पत्ति समझकर एक क्षण को भी निरर्थक न जाने देना चाहिए।

परोपकार, लोक सेवा, सत्कार्य के लिये दान, यज्ञ भावना से किये जाने वाला परमार्थी जीवन प्रत्यक्ष तप है दूसरों के लाभ के लिये अपने स्वार्थों का बलिदान करना तपस्वी जीवन का प्रधान चिन्ह है। आज की स्थिति में प्राचीनकाल की भाँति तो तप नहीं किये जा सकते, अब शारीरिक स्थिति भी ऐसी नहीं रह गयी कि भागीरथ, पार्वती या रावण के जैसे उग्र तप किये जा सकें। दीर्घकाल तक निराहार रहना या बिना विश्राम किये लम्बे समय तक साधनारत रहना आज सम्भव नहीं है। वैसा करने से शरीर तुरन्त पीड़ा ग्रस्त हो जायेगा।

सतयुग में लम्बे समय तक दान, तप होते थे। क्योंकि उस समय शरीर में वायु तत्व प्रधान था। त्रेता में शरीरों में अग्नि-तत्व की प्रधानता थी। द्वापर में जल-तत्व अधिक था। उन युगों में जो साधनायें हो सकती थी, आज नहीं हो सकतीं क्योंकि आज कलियुग में मानव देहों में पृथ्वी-तत्व प्रधान है। पृथ्वी-तत्व अन्य सभी तत्वों से स्थूल है इसलिए आधुनिक काल के शरीर उन तपस्याओं को नहीं कर सकते जो सतयुग, त्रेता आदि में आसानी से होती थी।

दूसरी बात यह है कि वर्तमान समय में सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन हो जाने से मनुष्य के रहन-सहन में बड़ा अन्तर पड़ गया है। बड़े नगरों में निवासियों को यांत्रिक सभ्यता के बीच में रहने के फलस्वरूप शरीरिक-श्रम बहुत कम करना पड़ता है और अधिकांश में कृत्रिम वातावरण के कारण शुद्ध जलवायु से भी वञ्चित रहना पड़ता है। ऐसी अवस्था में शरीर को पूर्वकालीन तप योग्य रहना कहाँ सम्भव हो सकता है ?

कुछ समय पूर्व तक नेति, धोति, वस्ति, न्योली, वज्रोली, कपाल, भेति आदि क्रियायें आसानी से हो जाती थी। उनके करने वाले अनेक योगी देखे जाते थे, पर अब युग प्रभाव से उनकी साधना कठिन हो गयी है। कोई बिरले ही हठयोग में सफल हो पाते हैं। जो किसी प्रकार इन क्रियाओं को करने भी लगते हैं वे उनसे वह लाभ नहीं उठा पाते जो इन क्रियाओं से होना चाहिए।

अधिकांश हठयोगी तो इन कठिन साधनाओं के कारण किन्हीं कष्टसाध्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। रक्त, पित्त, अन्त्रदाह, मूलाधार, कफ, अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित होते हुए हमने अनेक हठयोगी देखे हैं। इसलिये वर्तमान काल की शारीरिक स्थितियों का ध्यान रखते हुए तपश्चर्या में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है, आज, तो समाज सेवा, ज्ञान-प्रचार, स्वाध्याय, दान,  इन्द्रिय संयम आदि के आधार पर ही हमारी तप साधना- होनी चाहिए।