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Books - गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा

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हमारा वैवाहिक जीवन कैसे सुखी हो सकता है ?

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विवाह को आत्मविकास और चरित्र विकास का एक बड़ा साधन माना गया है । इसमें संदेह नहीं कि विवाह हमारी जीवनयात्रा में एक बहुत बड़े मोड़ या परिवर्तन की तरह होता है । इसलिए यदि उसे पूर्ण सफल और सुखी बनाना है तो उसके संबंध में पहले ही वे पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर लेना हमारा कर्तव्य है । खेद है कि आजकल अनेक नवयुवक और नवयुवतियाँ इस नियम पर ध्यान न देकर केवल क्षणिक आवेश में अथवा ऊपरी टीम-टाम को देखकर विवाह सूत्र में आबद्ध हो जाते हैं, जिसका अंतिम परिणाम स्वभावत: दुःखदाई होता है ।

सफल विवाहित जीवन मनुष्य के सुख की एक आधारशिला है । यदि सच्चा दाम्पत्य प्रेम हुआ तो वह दोनों की अंतरात्मा का केवल विकास ही नहीं करता, वरन उसमें निहित उस अमूल्य भावना की सिद्धि का कारण होता है जो पुरुष नारी के प्रति तथा जो नारी पुरुष के प्रति अनुभव करती है । वास्तव में सच्चे दाम्पत्य प्रेम का आधार ही सुखी वैवाहिक जीवन है । अब हमें देखना है कि इस सुखी वैवाहिक जीवन के मूल तत्व क्या है ? सच तो यह है कि वैवाहिक आनंद का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है और न कोई ऐसा निरपेक्ष नियम है जिसके अनुसार इस अत्यंत कलापूर्ण क्षेत्र में मानवीय संबंधों का नियंत्रण होता हो । अनेक स्त्री और पुरुष ऐसे जीवन में भी सुखी रहते हैं जो अन्य स्त्री-पुरुषों के दुःख और निरुत्साह का कारण बन जाता है । कई दंपती संतान के अभाव में दुखी हैं, तो कई बिना संतान के ही पूर्ण सुखी हैं । कई अपनी गरीबी में सुखी हैं तो कईयों की आर्थिक अवस्था ही उनके दुःख की जड़ है । शारीरिक प्रतिकूलता जहाँ एक दंपती के दुःख का कारण है, वहीं दूसरे के सुंदर सहयोग का आधार है । अनेक बातें ऐसी हैं जिनको वैवाहिक जीवन के आरंभ में कोई महत्त्व नहीं दिया जाता परंतु समय बीतने पर वे ही सुख या दुःख का कारण बन जाती हैं । अनेक दंपती जो आरंभ में सब प्रकार से सुखी होते हैं बाद को दुखी रहने लगते हैं, क्योंकि मनुष्यों का मानसिक और आध्यात्मिक विकास विभिन्न गतियों से होता है ।

उपरोक्त बातों के होते हुए भी सुखी वैवाहिक जीवन की कुछ मौलिक आवश्यकताएँ हैं और वे इस प्रकार हैं- वैवाहिक बंधन में बँधने वाले दोनों साथियों में एकदूसरे के आत्मसम्मान की ठोस बुद्धि, मानसिक परिपक्वता, शारीरिक स्वास्थ्य, दृष्टिकोण में मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता, प्रेमकला तथा लैंगिक ज्ञान, पारिवारिक उत्तरदायित्व की परिपक्व भावना, वस्तुस्थिति के अनुकूल आचरण करने की योग्यता, काल्पनिक आदर्श से मुक्ति, विस्तृत एवं उदार मानवीय प्रवृत्ति तथा सहयोग के आधार पर आगे बढ़ने, कष्ट उठाने और जीवन-सुख में भाग लेने की क्षमता आदि । वे ही दिन-प्रतिदिन की वैवाहिक समस्याओं की सफलतापूर्वक सुलझाने के मूल मंत्र है । अपने वैवाहिक साथी की परिस्थिति से पूर्ण आत्मीयता तथा उसे निरंतर उत्साहित करते रहने की तत्परता, दाम्पत्य जीवन की साधारण बाधाओं को सहज ही में दूर कर देती है । साथ ही यदि दोनों समान रूप से शिक्षित हुए और दोनों में समाज के लिए उपयोगी काम-धंधों में लगने की समान भावना व समानता हुई तो सोने में सुगंध आ जाती है । अंत में थोड़ी-बहुत आर्थिक स्वतंत्रता और धार्मिक तथा सामाजिक साम्यता यदि उपलब्ध हो, तो वह वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने में बड़े ही सहायक होते हैं ।

परंतु बहुत कम ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जो उपरोक्त आदर्श साधनों के साथ विवाह-संबंध में प्रवेश करते हैं । यही कारण है कि जीवन में हमें अनेक बेजोड़ गठबंधन जैसे किसी निर्दयी पुरुष और अबला स्त्री में, किसी जबरदस्त मरदानी और स्त्रैण पुरुष में, किसी स्वतंत्र एवं साहसी पुरुष तथा कायर एवं मूर्ख स्त्री में, किसी स्वस्थ और मोटी स्त्री और सूखे हुए किताबी कीड़े पुरुष में, किसी बालिका और वृद्ध में, किसी अशिक्षित और गँवार स्त्री तथा शिक्षित पुरुष में, किसी सुंदर युवक और कुरूप स्त्री या सुंदर स्त्री और कुरूप पुरुष में देखने को मिलते हैं ।

अब यदि हम वैवाहिक असफलता के कारणों पर किंचित दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि बेजोड़ विवाह न होने पर भी लैंगिक विज्ञान और प्रेम कला की अनभिज्ञता वैवाहिक असफलता का एक प्रधान कारण है । जीवन के आरंभ से ही हमें चलने बोलने अभिवादन करने तथा कायदे के कपड़े पहनने आदि की शिक्षा दी जाती है । हमारी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ हमें खेलने-कूदने, लोगों से मिलने-जुलने तथा अन्य सामाजिक शिष्टाचारों की शिक्षा दी जाती है । जीविकोपार्जन करके हम अपना निर्वाह कर सकें, इसके लिए कुछ उद्योगों की भी शिक्षा हमें दी जाती हैं परंतु शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री हो, जिसे किसी कुशल शिक्षक द्वारा इस बात की शिक्षा दी गई हो कि सफल प्रेमी, आदर्श पति अथवा पत्नी कैसे बना जा सकता है ?

हमारे आधुनिक जीवन का अभिशाप यह है कि अश्लील आख्यानों से भरे हुए उपन्यासों, कामोद्दीपक चित्रों और लेखों से पूर्ण समाचारपत्रों तथा लंपटतापूर्ण दृश्यों में भरे हुए नाटकों और चलचित्रों की प्रबल धारा में बहकर हम अपने नौजवानों का दिमाग अनेक गलत धारणोओं से भर ही नहीं देते वरन उनकी स्वाभाविक एवं सामान्य कामवृत्ति को बुरी तरह उत्तेजित और विकृत भी बना देते हैं । जहाँ एक तरफ हम अपने हाथों इतने उत्तेजित वातावरण की सृष्टि करते हैं, वहाँ दूसरी तरफ लैंगिक ज्ञान (सैक्स) के ऊपर एक गुप्त और अपवित्रता का झूँठा परदा डालकर अपने बच्चों को जीवन की इस अमूल्य जानकारी से वंचित रखते हैं । जिस समय लड़की को यह विश्वास कराया जाता है कि उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य विवाह को सफल बनाना तथा एक सुंदर घर बसाना है, कामवृत्ति और गर्भाधान संबंधी अत्यंत उपयोगी जानकारी उससे छिपाकर रखी जाती है । वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिए इस अज्ञान को दूर करना आवश्यक है ।

वैवाहिक नैराश्य का दूसरा प्रधान कारण स्त्री और पुरुष के बीच प्रभुता और शान के लिए प्रतिद्वंद्विता है । इस प्रतिद्वंद्विता को आज हम बड़े स्पष्ट रूप में विशेषकर शिक्षित दंपत्तियों में देख सकते हैं । कुछ अंशों में हम इसे उस आंदोलन की शाखा कह सकते हैं, जिसे आधुनिक शिक्षित नारी आज के शक्तिशाली पुरुष की निरंकुशता के विरुद्ध चला रही है । व्यक्तिवादी समाज के व्यापारिक कार्यों में एक जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रतिद्वंद्विता को चाहे हम जो भी महत्त्व दें, परंतु प्रेम और वैवाहिक जीवन के लिए तो प्रतिद्वंद्विता मृत्यु के समान है अथवा छिपी हुई चट्टान है जिससे टकराकर अनेक विवाह विचूर्ण हो चुके हैं ।

लोग इसे एक मनोवैज्ञानिक आदेश की भाँति ग्रहण करें कि जिस भी व्यक्ति ने अपने स्त्री या पुरुष साथी पर प्रभुत्व जमाना चाहा या उसकी निंदा की तथा उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई उसने सदा के लिए अपने वैवाहिक आनंद पर कुठाराघात कर लिया ।

वास्तव में लोगों का वैवाहिक जीवन अधिक सफल होता यदि दंपती बाह्य आकर्षण और सुंदरता पर आधारित प्रेम की बात कम सोचते तथा अपनी आर्थिक परिस्थिति, संतान पालन के सिद्धांत, खाली समय का पारस्परिक सदुपयोग, एकदूसरे की भावनाओं का समुचित ध्यान, साथ मिलकर जिम्मेदारी उठाने की योग्यता आदि आवश्यक विषयों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर अपनी जीवननौका को कुशलता के साथ खेते । कितनी विचित्र बात है कि यदि कोई आदमी व्यापार या साझेदारी में केवल इसलिए शामिल होने को लालायित हो उठता है कि उस व्यवसाय विशेष के दफ्तर की कुरसी और मेज उसे बहुत पसंद है तो लोग उसे बेवकूफ बनाते हैं, परंतु यदि वही आदमी एक लड़की से केवल इसलिए शादी कर ले कि वह देखने में सुंदर है, नाच अच्छा करती है तथा पार्टियों में जाने की शौकीन है तो उसके मित्र उसे बधाई देते नहीं थकते । ऐसे गुणों तथा बाह्य सुंदरता और आकर्षण पर आधारित प्रेम बिलकुल अस्थाई रहता है । अवस्था के साथ-साथ यौवन ढलने पर ऐसा प्रेम प्रायः हवा हो जाता है । प्रेम का सच्चा बंधन तो आंतरिक सुंदरता पर अवलंबित है । प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई गुण अवश्य होता है । दंपती को एकदूसरे की आंतरिक सुंदरता और विशिष्ट गुणों की खोज कर प्रेमपूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए । हाँ विवाह-बंधन में फँसने से पूर्व इस बात का ध्यान रहे कि स्त्री और पुरुष दोनों में प्रत्येक दृष्टिकोण से अधिक से अधिक साम्य रहे । शुरू की जरा सी भी जल्दबाजी और असावधानी सारे वैवाहिक जीवन को दुःखद बना देती है ।

अंत में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि विवाहित जीवन को सुखमय बनाने का सबसे सुंदर नियम वास्तव में यह है कि विवाह करने के पहले अपने साथी को भलीभाँति समझ लीजिए तथा विवाह के बाद उसे वही समझिए जो वह वास्तव में है और आदर्श कल्पना को त्यागकर उसी का संतोषपूर्वक प्रसन्नता के साथ उत्तम से उत्तम उपयोग कीजिए ।
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