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Books - सपने झूठे भी सच्चे भी

Media: TEXT
Language: HINDI
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चेतना की दूर-संचार व्यवस्था और स्वप्न

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आध्यात्मिक स्वप्नों को मुख्यतः दो भागों में बांट सकते हैं। एक तो स्वप्नों के माध्यम से होने वाली टेलीपैथिक अनुभूतियां, जो उसी समय दूर कहीं हो रही घटना की सूचना देते हैं। दूसरे दिव्यानुभूति वाले स्वप्न जो भविष्य का आभास देते हैं। यों दिव्यानुभूतिपरक स्वप्नों की भी तीन श्रेणियां हो सकती हैं—

(1) दिव्य प्रेरणाएं जो भविष्य की जीवन-दिशा स्पष्ट करें और उसी राह पर चल पड़ने की प्रेरणा दें।

(2) दिव्य प्रकाश जो प्रस्तुत अन्धकार को समाप्त कर दे, समस्या का समाधान प्रस्तुत कर दे।

(3) दिव्यज्ञान-जो दिक्कालातीत जानकारी दे, अतीत का या भविष्य का पूर्ण यथार्थ ज्ञान करा दे। अनागत भविष्य और विगत अतीत की सही-सही सूचना दे, बोध दे। सर्व प्रथम दूर-दर्शन या दूर-संचार किस्म के स्वप्नों पर विचार किया जाय।

प्रालेप का प्रलयंकर विस्फोट

28 अगस्त 1883 की बात है। बोस्टन से छपने वाले दैनिक समाचार-पत्र ‘बोस्टनग्लोब’ के संवाददाता श्री एड सैमसन ने उस दिन काफी देर तक काम किया था। उसे कई दिन की थकावट थी सो रात पूरी तरह विश्राम करना चाहता था। प्रेस के चपरासी को उसने हिदायत दी—‘‘मुझे 3 बजे से पहले न जगाया जाये’’ और यह कहकर वह अपने बिस्तर पर लेट सो गया।

उस रात उसने एक स्वप्न देखा—‘महाभयंकर हृदय को कंपा देने वाली मानवीय इतिहास की एक जबर्दस्त दुर्घटना जिसने लोगों को यह सोचने के लिये विवश किया कि संसार में स्थूल हलचलें ही सब कुछ नहीं, जो दिखाई नहीं देता, उस सूक्ष्म आकाश में भी ऐसी अनेक सूक्ष्म शक्तियां क्रियाशील हैं, जो मनुष्य की अपेक्षा अधिक संवेदनशील, शक्ति और सामर्थ्य से परिपूर्ण हैं। इस घटना ने ही एक छोटे से सम्वाददाता की प्रतिष्ठा सारे विश्व में फैला दी।

एड सैमसन ने देखा—एक भयंकर पहाड़—उससे लाल रंग का लावा फूट पड़ा, जिससे उस द्वीप में महा भयंकर विनाशलीला प्रारम्भ हो गई। टापू अग्नि ज्वालाओं में बदल गया है। पृथ्वी कांप रही है और सब कुछ जलता हुआ स्वाहा होता जा रहा है। स्वप्नावस्था में ही उसने किसी से पूछा—‘इस द्वीप का क्या नाम है’—‘प्रालेप’ किसी ने स्वप्न में ही सन्देश दिया और सैमसन की नींद टूट गई।

स्वप्न इतना वीभत्स था कि वह दृश्य सैमसन के मस्तिष्क में ज्यों का त्यों उभरे तब तक आन्दोलन मचाते रहे, जब तक उसने पूरे स्वप्न को एक लेख के रूप में तैयार नहीं कर लिया। उसने सोचा यह था कि यह लेख किसी दिन समाचार में छापेंगे—इसलिए उस पर इम्पोर्टेन्ट (महत्वपूर्ण) की चिट लगाई और वह चला गया।

प्रातःकाल सम्पादक आया, उसने महत्वपूर्ण की चिट लगे इस समाचार को पढ़ा, उसे लगा, यह किसी संवाददाता का समाचार है सो ‘वोस्टन-ग्लोज’ में मुख पृष्ठ पर प्रमुख समाचार के रूप में दोहरा शीर्षक देकर छाप दिया। 29 अगस्त को समाचार सारे संसार में फैल गया। जबकि संसार के और किसी भी अखबार में ऐसा कोई समाचार नहीं छपा था। दिन भर ‘वोस्टन ग्लोब’ कार्यालय से पूछ-ताछ चलती रही। सम्पादक अपनी भूल के लिये स्वयं भी हैरान था।

मैक्सिको, आस्ट्रेलिया, अमेरिका से आकाश में गड़गड़ाहट, समुद्री तूफान, भूकम्पनों के संक्षिप्त समाचार तो मिले पर उतने से सम्पादक और पाठकों में से किसी की जिज्ञासाओं का समाधान न हुआ। आखिर सम्पादक को सारी घटना का ‘भूल सुधार’ छापना पड़ा।

सचमुच जिस समय युवक संवाददाता एड सैमसन यह स्वप्न देख रहा था, पृथ्वी के दूसरे छोर पर ‘क्राकातोआ’ द्वीप पर भयंकर भूकम्प और तूफान आया था। इस भयंकर ज्वालामुखी के कारण सम्पूर्ण द्वीप समुद्र के गर्त में ऐसे समा गया था, जैसे विशाल घड़ियाल की दाड़ में मानव अस्ति पिंजर। घटना की पुष्टि कई दिन बाद उधर से लौटने वाले जहाजों ने की। तब फिर ‘भूल सुधार का—भूल सुधार’ छापा गया। सैमसन के बड़े-बड़े फोटो समाचार-पत्रों में छपे।

इस स्वप्न की गहरी छान-बीन की गई तो कई ऐसे सूक्ष्म रहस्यों का पता चला जो मनुष्य के लिये अकारण कभी सम्भव ही नहीं हो सकते थे। लोगों ने अनुभव किया, वस्तुतः कोई शाश्वत और साक्षी सत्ता है, जिससे सम्बन्ध जोड़ने या अनायास जुड़ जाने से ऐसी विलक्षण अनुभूतियां हो सकती हैं। पहले लोगों को इस द्वीप के प्रालेप नाम पर टिप्पणी करने का अवसर मिला अवश्य पर पीछे कई दस्तावेजों से यह रहस्य प्रकट हुआ कि डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ‘क्राकातोआ’ का नाम ‘प्रालेप’ ही था। मानवीय इतिहास में संकलित किये जायें तो इस तरह के दुस्संचारों वाले स्वप्नों के समाचारों से एक दो नहीं हजारों पुस्तकें लिखी जा सकती हैं।

प्रियतम आन मिलो

स्वप्नों के संदर्भ में एकबार पोलैंड में व्यापक हलचल उठ खड़ी हुई थी तब से वहां के सैकड़ों लोग इस जिज्ञासा में हैं कि वह कौन-सा तत्व है, जो मनुष्य को गहन एकाकीपन में भी समीपता का दिग्दर्शन कराता है। कौन-सी चेतना है जो निद्रा में भी सच्ची घटनाओं का आभास कराती है।

जिस घटना ने इस जिज्ञासा को जन्म दिया वह अपने आप में बड़ी रोचक है। मेरना नामक एक पोलिश युवती का एक युवक के साथ विवाह सम्बन्ध निश्चित किया गया युवक सेना का सिपाही था। विवाह होने से कुछ दिन पूर्व ही जब वह छुट्टी पर घर आया हुआ था, एकाएक युद्ध छिड़ गया और उसे जेरनैक नगर छोड़कर अपनी बटालियन के लिए प्रस्थान कर जाना पड़ा, मेरना ने अश्रुपूरित हृदय से विदाई तो दी पर उसके हृदय में युवक के प्रति प्रेम की घनिष्ठता छा गई थी। उसने सच्चे हृदय से आत्म-समर्पण किया था, इसलिये उसे हर क्षण अपने भावी पति की याद आती रहती।

युवक स्टैनिस्लास आमेंस्की लौट तो आया पर प्रेम की पीड़ा उसे भी बार-बार मेरना तक खींच ले जाती, वह भी सदैव मेरना की याद किया करता। एक दिन वह शत्रु सेना में बुरी तरह घिर गया और सैकड़ों अन्य सिपाहियों के साथ युद्ध की विभीषिका में न जाने कहां खो गया। काफी दिनों तक उसके बारे में कुछ भी पता न चला। पहली बार 1918 के अक्टूबर महीने में युवती को एक दिन रात में एक भयंकर स्वप्न दिखाई दिया, उसने देखा स्टेनिस्लास एक सुरंग में फंस गया है। उसके पास मोमबत्ती जल रही है और वह बाहर निकलने के लिये पत्थर निकाल रहा है, साथ ही सहायता के लिये वह मेरना का नाम लेकर चिल्ला रहा है। इस भयंकर स्वप्न के बाद जैसे ही नींद टूटी मेरना ने पाया कि उसकी हृदय गति तीव्र हो उठी है और मस्तिष्क में थकावट सी है।

डा. क्लीटमन के सहायक यूगेन एसेरिन्स्की ने स्वप्नों पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत करते समय एक स्थान पर लिखा है कि मनुष्य निद्रावस्था में स्वप्न देखता है तो स्वप्न की तीव्रता के अनुपात में उसकी पुतलियां भी घूमती हैं, एक रात में पांच-पांच वह पुतलियां घूमती हुई पाई गई हैं, और घंटों तक वह क्रिया होती रहती है, साथ ही स्वप्न के दृश्यों में उठने वाले संवेग हृदय आदि मर्मस्थलों को भी प्रभावित करते हैं, उससे भी स्पष्ट है कि स्वप्न का मनुष्य से घनिष्ठ सम्बन्ध बना रहता है। आत्मा शरीर में भी होती है और वह किसी विलक्षण गति या स्वरूप में उस दृश्य वाले स्थान में भी होती है। मेरना जब भी यह स्वप्न देखती शारीरिक संवेग इसी तरह की अवस्था में होते। आश्चर्य कि प्रति दिन उसे रात्रि के अन्तिम प्रहर यही स्वप्न दिखाई देता।

गर्मी के दिन थे एक दिन स्वप्न में एकाएक परिवर्तन हुआ। रात मेरेना ने एक विशाल किला देखा। धीरे-धीरे चेतना एक ऐसे स्थान पर पहुंची जहां एक दीवार टूटी पड़ी थी। ईंटों के मलबे के नीचे उसे फिर वही परिचित चेहरा दिखाई दिया। मोमबत्ती के क्षीण प्रकाश में, चिथड़ों में लिपटा हुआ स्टेनिस्लास पत्थर के टुकड़े हटाता है और बीच-बीच में कातर स्वरों में सहायता के लिये चिल्लाता भी है। मेरेना की चेतना जैसे ही सम्मुख जाती है, मेरेना चिल्ला उठती है, ओस्टेनिस्लास और उस आवाज के साथ ही नींद टूट गई। मां घबड़ाई घर वाले चिंतित हुये। डॉक्टर को बुलाया गया। उसने कहा यह एक प्रकार का प्रेमोन्माद है। और लोग हंसे। चर्च के पादरी को भी लड़की ने सब कुछ बताया तो उसने भी हंसकर कहा लड़की, यह प्रेम-वेम का आवेश तुझे किसी दिन पागल कर देगा। चल यहां से भाग जा।

मेरेना ने दूसरे दिन भी वही स्वप्न देखा। तीसरे दिन भी और लगातार वही स्वप्न। उसकी आंखों में दिन रात वही किला और स्टेनिस्लास का निराश दृश्य घूमता, वह जिससे भी मिलती एक ही चर्चा करती। इस घटना का वर्णन प्रकाश में लाने वाले डा. फ्रैंक एडवर्ड्स ने लिखा है, अन्त में इस युवती को पागल की संज्ञा दे दी गई। कुछ लोगों को उससे सहानुभूति भी हुई पर पोलैण्ड शाही किलों का सुप्रसिद्ध देश है। किस किले में खोज की जाती है। सहानुभूति के अतिरिक्त और कोई सहयोग भी क्या करता। एक दिन मेरना घर से निकल पड़ी। उसने निश्चय किया कि वह अपने स्वन को सच्चा साबित करेगी और अपने भावी पति को ढूंढ़ निकालेगी। कई महीने पैदल यात्रा करती हुई मेरना ने अनेक किलों के दर्शन कर लिये पर स्वप्न के किले से संगति खाने वाला किला अभी दूर था। मार्ग में उसे लोग गरीबनी समझकर जो कुछ खाने को दे देते वह खा लेती। भगवान् के भरोसे मेरना इसी तरह चलती रही।

दक्षिण पूर्व पोलैण्ड के ज्लोटा नामक नगर के पास एक पहाड़ी से गुजर रही थी कि उसकी दृष्टि एक किले पर गई। ‘हां हां यह वही किला है, जिसे वह प्रति दिन स्वप्न में देखती है।’ यह चिल्लाते हुए वह हर्षातिरेक से मूर्छित होकर गिर पड़ी। अनेक ग्रामवासियों के साथ स्थानीय पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंचा। लोगों ने पानी के छींटे मारे तब कहीं मेरना होश में आई। उसने अपने स्वप्न का सब विवरण सुनाया तो लोग हंस पड़े। पुलिस अधिकारी ने चिढ़ाते हुए कहा—अरी छोकरी मैं कई महीने से किले की देख-भाल कर रहा हूं, इसमें कहीं भी कोई नहीं है। यह पागलपन छोड़ और घर लौट जा।

पर मेरना पर उसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ा। वह उठ खड़ी हुई और किले की ओर दौड़ी। लोग उसके पीछे हो लिये। मेरना किले के उस भाग में जा पहुंची, जहां सचमुच ईंटों का मलबा भरा पड़ा था, वह तेजी से उसके पत्थर हटाने लगी। उन लोगों में कुछ समझदार भी थे, उन्होंने मेरना का साथ दिया। आधे से ज्यादा पत्थर निकल गये तो सचमुच भीतर जाने का एक दरवाजा निकल आया और अब तक भीतर किसी आदमी की आवाज स्पष्ट सुनाई देने लगी। एक आदमी को निकलने योग्य दरवाजा खुल गया, लोगों ने आश्चर्य चकित होकर देखा कि उसमें दबा हुआ व्यक्ति बाहर निकल आया, वह स्टेनिस्लास ही था। इतने दिन तक अन्धकार में दबे रहने के कारण वे प्रकाश में चुंधियां रहा था। कपड़े फट गये थे। शरीर क्षीण हो गया था।

उसने बताया कि जिस समय वह स्टोर की रक्षा कर रहा था, शत्रु सेना के एक गोले से यह स्थान धराशायी हो गया था, वह इसमें मोमबत्तियां जलाकर रहा। खाने के लिये सूखे बिस्कुट और पीने के लिए शराब थी, उसी के सहारे वह किसी तरह जिन्दा बना रहा। इस घटना का सैनिक अधिकारियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उन्होंने स्टेनिस्लास को ससम्मान सेना से निवृत्त कर दिया और मेरना के साथ उसका विवाह भी करा दिया गया। इस घटना ने सारे पोलैण्ड को यह सोचने के लिये विवश किया कि जीवन में कुछ गहराई और तथ्य भी हैं, स्वप्न उसका दिग्दर्शन कराते रहते हैं, इन तथ्यों की किसी भी स्थिति में उपेक्षा नहीं की जा सकती।

बरूआसागर (झांसी) के ‘पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन विद्यालय’ के प्रचारक श्री हुकुमचन्द मथुरा आये थे। गांधी-पार्क में घूमते हुए उनको एक सांप ने काट लिया। कुछ व्यक्तियों उनको राम-कृष्ण मिशन अस्पताल (वृन्दावन) में दाखिल करा दिया। किसी प्रकार उनकी प्राण रक्षा हो गई। जब वे अस्पताल में पड़े थे तो उन्होंने स्वप्न में देखा कि कोई सफेद दाड़ी वाला व्यक्ति उनको साथ ले गया और एक स्थान को बतलाकर वहां से भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति खोदकर निकालने का संकेत किया। अस्पताल से छुट्टी पाने पर वे उस स्थान पर गये और तीन दिन तक खुदाई होने पर वहां से उक्त मूर्ति प्राप्त हो गई जो बाद में स्थानीय कलक्टर की आज्ञा से स्थानीय जैन-मन्दिर को दे दी गई।

एक और घटना सुनिये—‘कप्तान स्प्रूइट अताकाम्बा नामक जहाज में अपने कुछ साथियों सहित पत्थर का कोयला लादकर रवाना हुए। दुर्भाग्यवश जहाज में छेद हो गया और जहाज में पानी भरने लगा। 7 फरवरी को जहाज डूबने लगा तो कप्तान और उसके साथ एक नाव में बैठ गये जो इधर उधर ऐसे ही बहती रही। 16 फरवरी को इन्डस्ट्री नामक एक अन्य जहाज वालों ने इनको बचा लिया। 17 फरवरी को कप्तान की 13 वर्षीय कन्या ने घर पर स्वप्न में जहाज को प्रत्यक्ष डूबते और अपने पिता को फटे कपड़ों में घर आते देखा। उसने अपनी माता को अपने स्वप्न के बारे में बताया। माता ने इस बारे में कोई ध्यान नहीं दिया। आठ दिन पश्चात् जब उसका पिता घर आया तो उसने कन्या के स्वप्न की घटना की पुष्टि की।

‘वाशिंगटन हैराल्ड’ की प्रकाशिका स्वर्गीया इलेग्नर मेरिट एक मध्यान्ह विश्राम करने के लिए बिस्तर पर झपकी ले रही थी। लगभग अर्धनिद्रा की स्थिति में उसने अपने पति कैस्सी को चारपाई के पास खिन्न मुद्रा में खड़े देखा। वे पुलिस के बड़े अफसर थे। पदों के अनुरूप पदक प्रतिष्ठा प्रतीक उनकी वर्दी में टंके हुए थे। लगता था बहुत उतावली में थे। कुछ ही क्षण वे दिखाई दिये और उसके बाद वे मुड़ अचानक हवा में गायब हो गये।

यह अर्ध स्वप्न श्रीमती मेरिट के लिए हड़बड़ा देने वाला था। वे समझ नहीं सकीं कि यह सब क्या था। सामान्य स्वप्न ऐसे ही हलकी फुलकी स्मृति छोड़ते हैं पर इस अनुभूति ने तो उन्हें हिला ही दिया। भागी हुई दफ्तर में गई और उस दृश्य का विवरण सुनाया। कार्यकर्त्ताओं ने इसे मात्र एक घटना भर समझा और उसे विशेष महत्व नहीं दिया।

दूसरे दिन तार आया कि उनके पति की अचानक मृत्यु हो गई। मृत्यु ठीक उसी समय हुई जब उन्हें झपकी लेते समय उस आत्मा के आगमन की अनुभूति हुई थी। असाधारण ज्ञान, असाधारण कार्य प्रणाली मस्तिष्क की विलक्षण रचना से जहां जीवात्मा के अनेक रहस्यों का ज्ञान होता है वहां उसकी दूर-दर्शन और इन्द्रियातीत ज्ञान के भी अनेक प्रमाण पाश्चात्य देशों में संकलित और संगृहीत किये गये हैं। ‘‘दि न्यू फ्रान्टियर्स आफ माइन्ड’’ के लेखक श्री जे.बी. राइन ने दूर-दर्शन के तथ्यों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह से अध्ययन किया और यह पाया कि कुछ मामलों में अभ्यास के द्वारा ऐसे प्रयोग 50 प्रतिशत से अधिक सत्य पाये गये।

एक घटना का उल्लेख इस प्रकार है—मेरे पड़ौस में एक सज्जन रहते थे। एक रात उनकी धर्मपत्नी ने स्वप्न देखा कि उनका भाई जो वहां से काफी दूर एक गांव में रहता था, अपने खलिहान जाता है। खलिहान पहुंच कर उसने घोड़ा-गाड़ी खोल दी। फिर न जाने क्या सोचकर भूसे के ऊपर बने मचान पर चढ़ गया और वहीं खड़े होकर उसने पिस्तौल चलाकर आत्म-हत्या कर ली। गोली लगते ही भाई भूसे पर लुढ़क गया। इस स्वप्न से वह स्त्री इतनी घबड़ा गई कि उसने अपने पति से तुरन्त गांव चलने को कहा। वे सज्जन मेरे घर आये और मेरे पिताजी से घोड़ागाड़ी देने को कहा। पिताजी ने गाड़ी देदी। वह स्त्री अपने पति को लेकर गांव गई और लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने खलिहान में जाकर पाया कि उसके भाई की मृत्यु ठीक वैसे ही स्थान और परिस्थितियों में हुई पड़ी थी।

स्वप्नावस्था में हमारे शरीर के सारे क्रिया-कलाप अन्तर्मुखी हो जाते हैं। उस समय भी मस्तिष्क जागृत अवस्था के समान ही क्रियाशील रहता है। यदि उस स्थिति में देखे हुए दृश्य सत्य हो सकते हैं तो यह मानना ही पड़ेगा कि आत्म-चेतना का भी अन्त नहीं होता वह एक सर्वव्यापी और अतीन्द्रिय तत्व है पर सम्पूर्ण तन्मात्राओं की अनुभूति उसे होती है।

उक्त घटना श्री राइन महोदय के एक प्रोफेसर द्वारा बताई गई जब वे स्नातक थे। बाद में वह लिखते हैं कि मैं जब पेन्सलवेनिया के पहाड़ों पर रहता था तो मुझे भी अनेक निर्देश और सन्देश इसी प्रकार अदृश्य शक्तियों द्वारा भेजे हुए मिलते थे। जब कभी किसी अपवित्र स्थान में चला जाता तब मुझे वैसी अनुभूतियां नहीं होती थीं इससे पता चलता है कि मस्तिष्क मानव-जीव की शुद्धता और पवित्रता की अपेक्षा में रहता है या यही उसका यथार्थ गुण है और जैसे-जैसे लोग इन गुणों के विपरीत बुराइयों और दुर्गुणों की गांठें मस्तिष्क में पैदा करते जाते हैं शक्तियों का ह्रास होने लगता है। मनुष्य की जड़ता के साथ तो वे बिलकुल समाप्त हो जाती हैं।

एक अन्य प्रोफेसर की धर्मपत्नी का भी इसी पुस्तक में उल्लेख है और यह बताया है कि वह जब अपनी एक सहेली के घर ब्रिज खेल रही थीं तो उन्हें एकाएक ऐसे लगा जैसे उनकी बालिका किसी गहरे संकट में हो। उन्होंने बीच में ही उठकर टेलीफोन में घर से पूछना चाहा पर सहेली के आग्रह पर वे थोड़ी देर खेलती रहीं इस बीच उनकी मानसिक परेशानी काफी बढ़ जाने से वह खेल बीच में ही छोड़ कर टेलीफोन पर गईं और अपनी नौकरानी से पूछा—लड़की ठीक है? उसने थोड़ा रुककर कहा, हां ठीक है। इसके बाद वे फिर खेल खेलने लगीं खेल समाप्त कर जब वे घर लौटीं तो पता चला कि एक बड़ी दुर्घटना हो गई थी। उनकी लड़की पिता के साथ कार में आ रही थी वह खेलते-खेलते शीशे के बाहर लटक गई और काफी सफल उसने उस भयानक स्थिति में पार किया। जब एक पुलिस वाले ने गाड़ी रोकी तब पता चला कि लड़की मजबूती से कार की दीवार पकड़े न रहती तो किसी भी स्थान पर वह कार से कुचल कर मर गई होती। नौकरानी ने कहा चूंकि बच्ची सकुशल थी इसलिये आपको परेशानी से बचाने के लिये झूठ बोलना पड़ा। यह घटनायें यह बताती हैं कि मस्तिष्क में वह तत्व हैं जो जीवात्मा की अमरता, शुद्धता और सर्वव्यापकता से सम्बन्धित है।

बहुत समय पहले की बात है मैनचेस्टर के एक दम्पत्ति के दो लड़के खो गये। बहुत पता लगाने पर भी पुलिस उन्हें खोज नहीं पाई। एक रात की बात है कि उसने एक स्वप्न देखा कि उसके पति ही उन दोनों लड़कों को लेकर एक ऐसे स्थान पर गये जो बहुत ही सघन भीड़ वाला है एक स्थान पर उसके चेस्टर सिटी लिखा देखा। उसने देखा इसके बाद उसका पति बच्चों को लेकर एक खंडहर मकान में घुसा और वहां जाकर उनकी हत्या कर दी। हत्या करते देखकर स्त्री चीख पड़ी नींद टूटी उसे पूरा शक हो गया कि हत्या उसके पति ने ही की है जो आज कई दिन से ही बाहर है। उसने पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखाई पर स्वप्न की बात मानने के लिये पुलिस वाले बिलकुल भी तैयार न हुये। स्त्री ने जोर डालकर कहा मैंने स्वप्न में जो जो स्थान देखे हैं उन सब को पहचान जाऊंगी आप हमें चेस्टर ले चलिये। इससे पहले वह कभी वहां गई नहीं थी। पुलिस वाले मान गये। स्त्री को लेकर वहां पहुंचे तो एक स्थान को पहचान कर स्त्री तंग गलियों में गुजरती हुई उसी खंडहर में जा पहुंची। वहां जले शव के निशान तथा गड़ी हुई हड्डियां मिलीं पीछे बाप पकड़ा गया तो उसने सारी बातें अक्षरशः वैसे ही स्वीकार कीं जैसी स्वप्न के आधार पर रिपोर्ट लिखाई थी। लोग छुप कर पाप करते हैं और यह मानते हैं कि उन्हें तो कोई नहीं देख रहा पर यह घटना बताती है कि कोई एक जागृत देवता सब कुछ देखता सुनता रहता है भले ही उसका विधान लोग न समझ पायें पर वह कष्ट देने और दिलाने से चूकता नहीं।

‘मैन्चेस्टर की एक स्त्री ने एक रात में तीन बार एक ही स्वप्न देखा कि उसकी लड़की मोटर एक्सीडेन्ट का शिकार हो गई है। प्रातःकाल यह स्वप्न सच निकला जब इस आशय का समाचार मिला कि रात लड़की एक्सीडेन्ट में मर गई। स्वप्न और एक्सीडेन्ट के समय में विचित्रता यह थी कि पहली बार का स्वप्न भविष्य सूचक था दूसरी बार जा स्वप्न आया ठीक उसी समय दुर्घटना हुई तीसरी बार का स्वप्न भविष्य दर्शी स्वप्न था। यह घटना यह प्रमाणित करती है कि हमारे कितने ही स्वप्न ऐसे होते हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते पर जो वस्तुतः किन्हीं की घटनाओं से सम्बन्धित होते हैं चित्त शान्त और निर्मल हो तो न समझ में आने पर भी घटनाओं के पूर्वाभास द्वारा आत्म-शोधन प्रक्रिया का संचालन किया जा सकता है।

आये दिन ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते रहते हैं कि कोई व्यक्ति मरा और मरने के घंटे दो घंटे बाद जीवित हो गया। जीवित होने पर उसने बताया कि उसे यमराज के सामने ले जाया गया। यमराज ने मुस्करा कर कहा भाई गलत आदमी को ले आये। इसी नाम का दूसरा व्यक्ति अमुक स्थान में है उसे लाओ। जिस समय यह व्यक्ति जी कर उठा ठीक उसी समय वह दूसरा व्यक्ति मर गया।

ऐसी घटनायें काल्पनिक उड़ान जैसी लगती और मृत्योत्तर जीवन को उपहासास्पद बनाने जैसी लग सकती हैं किन्तु क्राडिफ में एक ऐसी घटना घटी जिसने उक्त दावे को पुष्ट करते हुये यह सिद्ध कर दिया कि अतीन्द्रिय जगत में दैवी विधानों की बात बिलकुल झूठ नहीं हो सकती। भले ही कुछ लोग इसे अन्ध विश्वास मानते हों अथवा अन्ध विश्वास बना देते हैं। उक्त घटना प्रसिद्ध लेखक जे.बी. प्रीस्टले द्वारा वर्णित सत्य घटना है। प्रीस्टले लिखते हैं कि एक रात एक परिचित स्त्री ने स्वप्न देखा कि वह सड़क दुर्घटना की शिकार हो गई। वह जब जागी तो उसने शरीर के अंग अंग में चोट जैसा दर्द था और वह अपने आप को बिलकुल मृत जैसी अनुभव कर रही थी।

दूसरे दिन अखबार में एक घटना छपी थी। इस स्त्री की एक हमनाम स्त्री दुर्घटना की शिकार हो गई थी। दुर्घटना का स्थल दुर्घटना का कारण बना वाहन दोनों बिलकुल वही थे जैसा कि इस स्त्री ने स्वप्न में देखा था। लगता था स्वप्न भूल कर गया नाम की। जिसे स्वप्न दिखाना था, उसे न दिखाकर उसी नाम की उसी शहर की अन्य स्त्री को दिखाया गया।

विलियम हंटर नामक एक अंग्रेज की बहन अपने गांव में रहती थी और हन्टर दूर किसी शहर में सर्विस करता था। एक दिन बहन रात में सो रही थी उसने स्वप्न में देखा कि एक रेल आ रही है उसका भाई पटरी पर आ गया, रेल उसे कुचलने वाली है, बहन भयंकर चीत्कार करके भाई को बचाने के लिये दौड़ी पर वह तो स्वप्न था, भंग हो गया। न वहां कोई रेल थी और न कोई भाई।

दूसरे दिन सवेरे ही सूचना मिली कि उसका भाई रेल से कट कर मर गया है।

अंग्रेजी दैनिक इन्डियन रिपब्लिक के सम्पादक रमेश चौधरी आरिगपूडि की अपनी जवानी कही और धर्मयुग 10 फरवरी 1963 अंक में छपी घटना—प्रथम निर्वाचन के दिन थे। श्री आरिगपूडि की एक दिन इच्छा हुई आंध्र के किसी निर्वाचन को अपनी आंखों से देखना चाहिए। वे मद्रास से नेल्लूर होते हुए अपनी ससुराल तेनाली पहुंचे। सायंकाल वे स्वस्थ चित्त सोये—लोग कहते हैं—फ्रायड ने भी लिखा है कि मनुष्य दिन भर जो कल्पनाएं करता है वह दमित कल्पनाएं ही स्वप्न में उभरती हैं पर श्री अरिगपूडि के इस स्वप्न ने फ्रायड के तर्क को काट दिया। उसके मस्तिष्क में पिताजी का उस दिन स्मरण भी नहीं था।

रात गहरी नींद आई। प्रातःकाल होने को थी तभी उन्होंने एक स्वप्न देखा—पिताजी बीमार हैं और एक तख्त पर लेटे हैं उनको हल्का दौरा आया और वे अचेत हो गये। हाथ तख्त से नीचे लटक गये। आंखें बन्द, ओठों से झाग बह निकला उन्होंने सुना कोई कह रहा है—‘‘अब वे इस संसार में नहीं रहे।’’ स्वप्न टूट गया। सामान्य स्वप्न लोगों को इतना कचोटते नहीं। न जाने क्या बात थी कि श्री आरिगपूडि स्वप्न की बात जितना भुलाना चाहते वह उतना ही तेजी से उभरता और उन्हें किसी अज्ञात आशंका से भर देता है।

पिताजी विजयवाड़ा रहते थे। श्री अरिगपूडि ने उसी दिन तेनाली से कलकत्ता का टिकट कटाया। मार्ग में विजयवाड़ा पड़ता था पर वहां उतरने का उनका कोई इरादा नहीं था। विजयवाड़ा आया—श्री अरिगपूडि प्लेटफार्म पर उतरे एक बार फिर वही स्वप्न मस्तिष्क में झंकृत हुआ। न जाने किस प्रेरणा से उन्होंने अपना सामान उतरवा लिया और घर की ओर चल पड़े। घर जाकर जो दृश्य उन्होंने देखा और सुना, उसमें और स्वप्न में देखे दृश्य में पाई-पैसे का अन्तर नहीं था। इस घटना ने आरिगपूडि को झकझोर कर रख दिया आखिर जिसे लोग स्वप्न कहते हैं और जिनके बारे में मनोवैज्ञानिक कोई उचित निष्कर्ष नहीं दे पाते, उनमें इस सत्य आभाओं का क्या रहस्य है?

मन की दूर-संचार-क्षमता तथा दूर-दर्शन-सामर्थ्य का परिचय देने वाली ये घटनायें यही स्पष्ट करती हैं कि वर्तमान परिस्थितियों का सूक्ष्म प्रभाव जो वातावरण में दूर-दूर तक फैल जाता है, उसे पकड़ सकने की सामर्थ्य व्यक्ति-चेतना में उसी प्रकार विद्यमान है, जैसे रेडियो-तरंगों, बेतार के तार, टेलीविजन की तरंगों आदि को रेडियो यन्त्र-ट्रान्जिस्टर, टेलीविजन द्वारा घर बैठे पकड़ा, देखा-सुना जा सकता है। चेतना की यह दूर-संचार दूर-दर्शन व्यवस्था नैशस्वप्नों ही नहीं, दिवास्वप्नों के रूप में भी सामने आती रहती है और यह स्पष्ट करती रहती है कि चेतना की सामर्थ्य प्रकृति से अनेक गुनी अधिक है और दृश्य-जगत से परे का अदृश्य जगत वास्तविक भी है तथा व्यक्ति चेतना का उससे निरन्तर सम्पर्क भी बना रहता है।

विज्ञान की भाषा में आत्मा को एक सर्वव्यापी विद्युत (यूनिवर्सल वायटैलिटी) और मन जो कि शरीर के स्थूल अंश की चेतना है सीमाबद्ध विद्युत कह सकते हैं। रेडियो की विद्युत को यन्त्रों के द्वारा, (एक फ्राक्वेन्सी पर) किसी भी रेडियो स्टेशन की तरंगी से मिलाकर वहां की गतिविधियों का ज्ञान कर लेते हैं उसी प्रकार मन द्वारा भी विश्व-व्यापी चेतना का परिभ्रमण दर्शन और ज्ञान की अनुभूति का नाम स्वप्न है मन विद्युत को जितना सूक्ष्म और उच्च स्तर का बनाया जा सकता है उतनी ही सत्य अनुभूतियां उपलब्ध की जा सकती है इस सिद्धान्त में कोई सन्देह नहीं।

स्वप्न द्वारा मन का आत्मा से मेल-मिलाप

रेडियो की सुई 340 किलो साइकिल्स पर लगाते ही हमारा रेडियो—रेडियो स्टेशन दिल्ली की शब्द तरंगों पकड़ने लगता है ऐसा इसलिए हुआ कि छोटे से रेडियो की विद्युत का रेडियो स्टेशन की विद्युत से सम्बन्ध जुड़ गया। मन और आत्मा भी ऐसी ही दो छोटी और बड़ी विद्युत शक्तियां हैं। केनोपनिषद में मन को विद्युत कहा है—यन्मनः सहा इन्द्रः (गो. उ. 4।11) में भी मन को विद्युत शक्ति कहा है। विद्युत का वेग एक सेकेण्ड में सवा लाख मील तक का है यही बात ऋग्वेद के 10।58 सूत्र के 1 से 11 मन्त्रों में देते हुए बताया है ‘यत् ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम् दूरकम् यत् ते पराः पारवतो मनो जगाम दूरकम’—अर्थात् यह मन संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक क्षण भर में पहुंच जाता है।

मन अपने सीमित क्षेत्र में ब्रह्माण्ड के प्रकाश-वर्षों की सीमायें नाप सकने में समर्थ है वैदिक व्याख्यान माला में ‘‘मन का प्रचण्ड वेग’’ नामक प्रवचन में पंडित दामोदर सातवलेकर जी ने एक घटना का वर्णन किया है वह इस तथ्य को प्रकट करती है कि हम यदि ध्यान और विविध योग साधनाओं द्वारा अपने मन को सूक्ष्म पवित्र और नियन्त्रित कर सकें तो वेद के अनुसार संसार के किसी भी क्षेत्र में होने वाली गतिविधि को संजय की दिव्य दृष्टि की तरह देख सकते हैं।

पं. सातवलेकर जी लिखते हैं—वर्धा की अंग्रेजी पाठशाला में भ. गोविन्द राव बाबले अध्यापन का कार्य करते थे। उनकी धर्मपत्नी चन्द्राबाई अपने बच्चे कमल के साथ सतारा जिले के ग्राम औंध अपने पिता के घर गईं थीं। 1918 का अक्टूबर मास उन्होंने पति को चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा कि मैं अमुक दिन वर्धा पहुंच रही हूं। सामान्य अवस्था में श्री बाबले का पत्नी की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं था पर जब उनके आने की बात का पता चला तो स्वभावतः प्रेम और मिलन की इच्छा उत्पन्न हुई। यही बात उनकी पत्नी के मन में भी हुई दोनों एक दूसरे का ध्यान और स्मरण करने लगे। ध्यान दो मनों को जोड़ता है, यही उसकी वैज्ञानिकता है गायत्री उपासक सूर्य का ध्यान करने से मेधा बुद्धि, प्रज्ञा आत्म-बल, शक्ति, शरीर में लाल कणों की वृद्धि, आरोग्य और दूसरों के मन की आने वाली घटनाओं के पूर्वाभास पाने लगता है उसका भी यही कारण है कि सविता—सूर्य सारे सौर मंडल का नियामक है उसके लिए सौर मंडल का कोई भी क्षेत्र समय, गति और अपने ब्रह्माण्ड से परे नहीं। उसका प्रकाश समस्त सौर मंडल को आवृत्त किये है इसलिए वह सभी क्षेत्र की गतिविधियों को एक ही दृश्य में देखता है। बुध उसके सबसे पास 36000000 मील की दूरी पर है पर हम पृथ्वी वासी उसी को देखना चाहें तो बड़ी-बड़ी दूरदर्शी मशीनों की आवश्यकता होगी पर उसके लिए तो बुध से भी 800 गुना अधिक दूरी वाला ने न्यून भी ऐसे ही हैं जैसे परिवार के बच्चे। पर जब कोई व्यक्ति ध्यान द्वारा सूर्य को अपने अन्दर धारण करने लगता है तो उसकी मानसिक शक्ति आत्मिक व्यापकता में परिणत होने लगती है। यह घटना उसका उदाहरण है।

एक दूसरे को याद करने और मिलन की सुखद कल्पनाओं का क्रम दो तीन दिन चला एक दिन एकाएक श्री वाबले जी के मन में अनायास भयानक उदासी छा गई और उदासी बढ़ती गई। मित्रों के समझाने का भी कुछ असर न हुआ जबकि न तो कोई अशुभ पत्र आया था न अशुभ सम्वाद। उनका मन अत्यन्त निरामय और सूक्ष्म होता तो वह सारी बातें जो व्याकुलता के रूप में व्यक्त हो रही थीं तभी जान लेते पर ऐसा न हुआ। रात सोने पर उन्हें ऐसा लगा पत्नी कह रही है—आप आकर मुझे ले जाते तो क्यों ऐसा होता, अब जा रही हूं, रात में स्वप्न में मिला यह संकेत कितना स्पष्ट था यह उन्हें तब मालूम पड़ा जब अत्यधिक बेचैनी के कारण वे स्थिति सहन न कर सके और अपनी ससुराल गये वहां उन्होंने अपनी पत्नी को मृत पाया।

मन सामान्य स्थिति में अपने शरीर अपने विषयों के सुखों तक सीमित रहते-रहते इतना स्थूल और संकीर्ण हो गया है कि वह दूरदर्शी घटनाओं का दृश्य और अनुभूति तो दूर, विचार और कल्पना भी नहीं कर पाता पर स्वप्न की अवस्था में उसके इन्द्रियों आदि के विषय सिमट कर आत्मभूत हो जाते हैं भले ही स्वप्न में अधिकांश समय मन की कल्पनायें ही प्रधान रहती हों। पर रात के किसी भी क्षण यदि वह आत्मा की ‘फ्रीक्वेंसी’ पर पहुंच जाता है तो वह व्यापक क्षेत्र की अनुभूतियां प्राप्त कर लेता है स्वप्नों का भविष्य में सत्य होना उसका स्पष्ट प्रमाण है। ‘‘सरवाइवल आफ मैन’’ पुस्तक के पेज 112 में सर ओलिवर लाज ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि कोई माध्यम है अवश्य जिसके कारण अलौकिक ज्ञान हम तक पहुंचता है भले ही हम उसे न जान पाते हों उन्होंने इसी पुस्तक के 106-107 पेज में अपने कथन की पुष्टि में एक घटना भी दी है, वह यों है—

पादरी इ.के. इलियट अटलांटिक समुद्र पर समुद्री यात्रा में थे 14 जनवरी 1887 की रात उन्होंने एक स्वप्न देखा कि उनके चाचा का पत्र आया है जिसमें छोटे भाई की मृत्यु की सूचना है। उन्होंने अपनी डायरी में इस घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि मैंने जब स्विटजरलैंड छोड़ा तब भाई को सामान्य बुखार था पर वह मर जायेगा इसकी तो मन में कल्पना भी न आई थी, पर मैं जब इंग्लैंड पहुंचा तो मुझे जो सूचना मिली वह बिलकुल वही और वैसी ही थी जैसी समुद्र में स्वप्न में देखी थी इसका कारण परोक्ष दर्शन (क्लेयर वायेंस) के अतिरिक्त क्या हो सकता है?

इस सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विज्ञान सम्मत जानकारियां हमारे भारतीय आचार्यों, योगियों तथा तत्वदर्शियों की हैं। माण्डूक्य उपनिषद् में बताया है— स्वप्न स्थानोहुतः प्रज्ञाः सप्तांग एकोनविंशति मुखः प्रविविक्त भुक् तैजसो द्वितीयः पादः ।4। स्वप्न स्थान स्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वा द्वोत्कर्षति हं वै ज्ञान संततिं समानश्च भवति ।10।

अर्थात्—स्वप्न अवस्था में मन जाता है तब उसकी प्रज्ञा बुद्धि अन्दर ही काम करने लगती है और आत्मा रूप हो जाता है। इस समय उसके साथ अंग (अर्थात् पांचों तत्वों की सूक्ष्म अवस्थायें या सूक्ष्म शरीर अहंकार और महत्तत्व), उन्नीस मुख (7 ज्ञानेन्द्रियां, 7 कर्मेन्द्रियां तथा पांच प्राण) भी उसी में लीन हो जाते हैं जिनसे आत्मा का तेजस द्वितीय पाद है अर्थात् यह जागृति और सुषुप्ति के बीच की अन्तर्दशा है उसकी अनुभूति आत्म तत्व की खोज में बड़ी सहायक हो सकती है।

शास्त्रों में सूर्य को इस जगत का आत्मा कहा है। आत्म पूजितोपनिषद में—‘‘सूर्यात्मकता ही दीप या सूर्य तेज में मन के विलय की स्थिति ही आत्म-साक्षात्कार है। समस्त सूर्य मंडल एक प्रकार से सूर्य की प्रकाश-तरंगों का विद्युत् सागर है। देखने में ऐसा लगता है कि आकाश पोला और अन्धेरा है पर यह बात सन् 1800 में ही यूरेनस की खोज करने वाले वैज्ञानिक विलियम हर्शल ने बता दी थी कि अन्धकार नाम की कोई सत्ता संसार में है ही नहीं कण-कण में प्रकाश घुला हुआ है भले ही हमारी बाह्य आंखें उसे न देख पाती हों। अंधेरे में फोटो ‘‘फिल्में’’ धोने का आविष्कार इसी वैज्ञानिक सिद्धान्त पर आधारित है फिर भी हम उस सर्वव्यापी प्रकाशवान् विद्युत—आत्मा की अनुभूति क्यों नहीं कर पाते उसका कारण है कि उसी माप, पवित्रता, प्रकाश, पूर्णता, शुद्धता और तत्व की विद्युत हमारे पास नहीं हमारा मन दूषित रहता है। अस्पष्ट स्वप्न, स्वप्नों में भय और विकार इसी बात के प्रतीक हैं कि हमारा मन अस्त-व्यस्त, अपवित्र है ऐसे बुरे स्वप्नों का कारण—

यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते । —अथर्व 20।96।16 अर्थात्—हमारे अज्ञान और पाप-मन के कारण दुःस्वप्न आते हैं। उनके परिहार का कारण बताते हुये ऋषि लिखते हैं—

स्वप्नं सुप्त्वा यदि पश्यसि पापं। अथर्व 10।3।6 पर्यावर्ते दुःष्वप्नात्पापात्स्वप्न्याद भूत्या । ब्रह्माहमंतरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः ।। —अथर्व 7।100।1

अर्थात्—यदि स्वप्न में बुरे भाव आते हैं तो उन्हें अज्ञान, पाप और आपत्ति सूचक समझ कर उनके परिष्कार के लिए ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये जिससे मन के अन्दर सतोगुणों की वृद्धि होकर अच्छे स्वप्न दिखाई देने लगें और आत्मा की अनुभूति होने लगे।

ऊपर दी शास्त्रीय व्याख्यायें अब वैज्ञानिक सत्यता की ओर अग्रसर हो रही हैं इसलिए आत्मा की शोध, स्वप्न परिष्कार और विकास के विज्ञान की सम्भावनायें भी बढ़ चली हैं। सत्य स्वप्नों की क्षणिक अनुभूति का कारण मन का शरीर में आत्मा के प्रतिनिधि सुषुम्ना शीर्षक में पात या मिलाप है। जागृत अवस्था में शरीर और मन का नियन्त्रण मस्तिष्क से होता है। मस्तिष्क के उभरे हुए भाग को ‘‘गायराई’’ कहते हैं दो ‘‘गायराई’’ के बीच एक दरार होती है इसे ‘‘सलकस’’ कहते हैं मस्तिष्क के बीच (फोर ब्रेन) में एक बड़ा गहरा ‘‘सलकस’’ होता है इसे केन्द्रीय (सेन्ट्रल सलकस) कहते हैं इसी के सामने गालरस में सारे शरीर को आज्ञा देने वाले कोष होते हैं। इन कोषों का शरीर की हर क्रिया पर नियन्त्रण होता है। आने वाली नसें (अफरेन्ट नर्व्स) सूचना लाती और जाने वाली (इफरेन्ट) सूचना ले जाती हैं। जटिल से जटिल समस्यायें यह कोष ही सुलझाते हैं किन्तु जब मनुष्य सो जाता है तब सुषुम्ना के अन्दर का ‘ग्रे मैटर’ मस्तिष्क जैसे कार्य करने लगता है उस समय मस्तिष्क को इन सूचनाओं से अवगत रहना आवश्यक नहीं। उदाहरण के लिये सोते हुये मनुष्य के शरीर पर मक्खी बैठे तो हाथ उसे हटा देंगे पर जागने पर मस्तिष्क को उसका ज्ञान नहीं होगा क्योंकि यह कार्य सुषुम्ना ने किया। सुषुम्ना इड़ा और पिंगला (इड़ा—बांई नाड़ी है जिससे सारे शरीर के बांये अंगों को नाड़ियां जाती हैं योग शास्त्रों में 72864 नाड़ियां बताई हैं—के मध्य की स्थिति अर्थात् ऋण व धन दोनों विद्युत कणों का—या विद्युतातीत अवस्था है वह इनसे सम्बद्ध होने के कारण शारीरिक प्रपंचों से भी सम्बन्ध रखती है पर उसका मुख्य सम्बन्ध आकाश से है। इसमें आकाश की सी ही पोलाई और वही द्रव्य प्रकाशवान् है इसे ही वह सुई कह सकते हैं जो सूर्यात्मकता आकाश या ब्रह्माण्ड के रहस्यों से मन का सम्बन्ध जोड़कर उसे व्यापक बनाती है। आत्मा से सम्बन्ध जोड़ती है। गायत्री उपासना या योग-साधनाओं से नाड़ी शोधन क्रिया होती है शुद्ध हुई सुषुम्ना में मन का प्रवाहित होना ही दिव्य स्वप्न दिखाता है उस समय एक विराट क्षेत्र में हमारी चेतना तैर रही होती है इसीलिये दिव्य आकृतियां ग्रह नक्षत्र, पर्वत नदी, हरे-भरे स्थान दिखाई देते हैं। हमारे संस्कारों में अनेक जन्मों की स्मृतियां होने के कारण मन की चंचलता रेडियो की खड़खड़ाहट की तरह तब भी रहती है पर इन अनुभूतियों का लाभ कठिन परिस्थितियों में भी निरन्तर आत्म-विकास की ओर उन्मुख रहने में लिया जा सकता है।

स्वप्नों का सत्य होना उसका स्पष्ट प्रमाण है। उनकी सार्थकता तभी है जबकि हम आत्मा की प्राप्ति में मन के महत्व को समझें और उसे शुद्ध पवित्र बनाने के संकल्प और साधनाओं का अभ्यास करें।
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