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Books - शक्ति का सदुपयोग

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Language: HINDI
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शक्ति संचय की प्रणाली

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संसार में शक्ति की आवश्यकता और महत्त्व को समझकर बुद्धिमान व्यक्ति सदैव उसका संचय करने में तत्पर रहते हैं । कोई जप-तप करके आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करते हैं, कोई व्यायाम द्वारा शारीरिक शक्ति को बढ़ाते हैं, कोई तरह-तरह की विधाओं और कलाओं का अभ्यास करके बौद्धिक शक्ति को तीक्षा करते हैं । सारांश यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को संसार में सफलता प्राप्त करने के लिए शक्ति संचय की आवश्यकता पड़ती है । निर्बलता एक बहुत बड़ा पातक है । अशक्त व्यक्ति अपना बुरा प्रभाव जिन निकटवर्ती एवं कुटुबिंयों पर डालते हैं, उनकी मनोवृत्ति भी उसी सांचे में ढलती है । इस प्रकार यह छूत की बीमारी एक से दो में, दो से दस में और दस से सैकड़ों में फैलती चली जाती है । कायर, आलसी, निकम्मे, निर्बल, भिखारी, दीन, दासवृत्ति के लोग अपने समान औरों को भी बना लेते हैं ।

निर्बल व्यक्ति जीवन भर दु:ख भोगते हैं, जिसका शरीर निर्बल है, उसे बीमारियों सताती रहेंगी । सांसारिक सुखों से उसे वंचित रहना पड़ेगा । इंद्रियाँ साथ न देंगी तो सुखदायक वस्तुएँ पास होते हुए भी उनके सुख को प्राप्त न किया जा सकेगा । जो आर्थिक दृष्टि से निर्बल है, वह जीवनोपयोगी वस्तुएँ जुटाने में सफल न हो सकेगा, सुखी और सफल मनुष्यों के समाज में उसे दीन, हीन, गरीब समझकर तिरष्कृत किया जायगा । अनेक स्वाभाविक आकांक्षाओं को उसे मन मारकर मसलना पड़ेगा ।

संसार में पाप, अनीति एवं अत्याचार की वृद्धि का अधिकांश दोष निर्बलता पर है । कमजोर भेड़ और बकरियों को मांसाहारी मनुष्य और पशु उदरस्थ कर जाते हैं । पर भेड़िये का मांस पकाने की किसी की इच्छा नहीं होती । कमजोरी में एक ऐसा आकर्षण है कि उससे अनुचित लाभ उठाने की हर एक को इच्छा हो आती है । नन्हें-नन्हें अदृश्य रोग कीटाणु जो हवा में उड़ते फिरते हैं उन्हीं पर आक्रमण करते हैं, जिन्हें कमजोर देखते हैं । हम अपने चारों ओर आँख फैलाकर देख सकते हैं कि कमजोर पर हर कोई हमला करने की सोचता है । जैसे गंदगी इकट्ठी कर लेने से मक्खियाँ अपने आप पैदा हो जाती हैं या दूर-दूर से इकट्ठी होकर वहीं आ जाती हैं । इसी प्रकार कमजोरों से अनुचित लाभ उठाने के लिए घर के पास-पड़ोस के तथा दूर देश के व्यक्ति एकत्रित हो जाते हैं या वैसे लोग पैदा हो जाते हैं । यदि कमजोरी का अंत हो जाय तो अत्याचार या अन्याय का भी अंत निश्चित है ।

दुर्बल मनुष्य स्वयं अपने आप में स्वस्थ विचारधारा नहीं कर सकता । कारण कितने ही है जैसे- (१) शारीरिक दृष्टि से कमजोर व्यक्ति के मस्तिष्क में पर्याप्त खून नहीं पहुँचता, इसीलिए वह जरा सी बात में उत्तेजित, चिंतित, भयभीत, कातर एवं किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है । ऐसी अस्थिर अवस्था में मस्तिष्क सही निर्णय नहीं कर सकता, वह अंधकारपूर्ण पथ की ओर अग्रसर हो जाता है । (२) पुरुषार्थ शक्ति के अभाव में वह अभीष्ट वस्तुओं को बाहुबल से प्राप्त नहीं कर सकता, पर इच्छा उसे सताती है । इस इच्छापूर्ति के लिए वह अधर्म पूर्वक भोग वस्तुओं, संपदाओं को प्राप्त करने के लिए प्रवृत्त होता है । (३) अपनी हीन दशा और दूसरों की अच्छी दशा देखकर उसके मन में एक कसक, आत्मग्लानि, कुढ़न एवं ईर्ष्या उत्पन्न होती है । ऐसी स्थिति में दुर्भाग्य वे निराशाजनक भाव या प्रतिहिंसा के घातक भाव मस्तिष्क में उठते रहते हैं । (४) अभावों के कारण जो कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं, उनसे विचलित होकर मनुष्य अधर्म पर उतारू हो जाता है । (५) निर्बलता एक प्रकार का रोग है । उस रुग्ण अवस्था में विचार भी रोगी हो जाते हैं, उच्चकोटि के आध्यात्मिक विचार उस अवस्था में नहीं रह पाते । शास्त्रकार कहते हैं- "क्षीणानरा: निष्करुणा भवन्ति" अर्थात दुर्बल मनुष्य निर्दयी हो जाते हैं ।

इन कारणों से स्पष्ट हो जाता है कि भौतिक उन्नति ही नहीं, आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी बलवान बनना आवश्यक है । एक प्रसिद्ध कहावत है कि "शक्ति का प्रयोग करने के लिए शक्ति का प्रदर्शन जरूरी है ।" प्रकृति का, मनुष्यों का, रोगों का, शैतान का आक्रमण अपने ऊपर न हो, इसको रोकने का एकमात्र तरीका है कि हम अपने शारीरिक बौद्धिक आत्मिक बल को इतना बढ़ा लें कि उसे देखते ही आक्रमणकारी पस्त हो जाएँ । बल का संचय अनेक आने वाली विपत्तियों से अनायास ही बचा देता है । सबलता एक मजबूत किला है जिसे देखकर शत्रुओं के मनसूबे धूल में मिल जाते हैं ।

शाक्त लोग अष्टभुजी दुर्गा की पूजा करते हैं । भवानी शक्ति की मूर्तियों में हम उनकी आठ भुजाएँ देखते हैं । इनका तात्पर्य है कि आठ साधन हैं- (१) स्वास्थ्य, (२) विद्या, (३) धन, (४) व्यवस्था, (५) संगठन (६) यश, (७) शौर्य, (८) सत्य, इन आठों के सम्मिलन से एक पूर्ण शक्ति बनती है । इन शक्तियों में से जिसके पास जितना भाग होगा, वह उतना ही शक्तिवान समझा जाएगा ।

(१) स्वास्थ्य की महत्ता हम सब जानते हैं कि वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल है । अस्वस्थ मनुष्य तो इस पृथ्वी का एक भार है जो दूसरों के कष्ट का कारण बनकर अपनी सांस पूरी करता है, सच्चे जीवन का स्वाद लेने से और मनुष्यता के उत्तरदायित्वों को पूरा करने से वह सर्वथा वंचित रह जाता है । किसी मार्ग में उन्नति करना तो दूर, उसे प्राणधारण किए रहना भी बड़ा कठिन हो जाता है । स्वास्थ्य सर्वप्रथम और सर्वोपरि बल है । इस बल के बिना अन्य सब बल निरर्थक है । इसलिए स्वस्थता की ओर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है ।

अस्वस्थ होने के थोड़े से कारण हैं । यदि हम उनकी ओर सतर्क रहें तो बीमारी और कमजोरी से बचकर स्वाभाविक स्वस्थता प्राप्त कर सकते हैं । स्वास्थ्य की ओर पर्याप्त ध्यान न देना, निरोगता में पूरी दिलचस्पी न लेना, तंदुरुस्ती के खराब होने का सबसे बड़ा मूल कारण है । रुपया कमाने में, कारोबार-व्यापार में या अन्यान्य अनेक कामों में जितनी पैनी दृष्टि से होशियारी और दिलचस्पी से काम करते हैं यदि उसका दसवां भाग भी तंदुरुस्ती की ओर ध्यान दिया जाय तो दुर्बल होने की नौबत ही न आवे । आमतौर से लोग शरीर को आराम देने और सजाने की तो फिकर करते हैं, इंद्रिय भोगों के साथ धन जुटाते हैं, पर यह नहीं सोचते हैं कि चिरस्थायी स्वास्थ्य और दीर्घजीवन किस प्रकार प्राप्त हो सकता है । यदि हम धनी बनने की इच्छा की भाँति स्वस्थ एवं दीर्घजीवी बनने की भी इच्छा करें तो अवश्य ही सफल मनोरथ हो सकते हैं । धनी बनने से स्वस्थ बनना सुगम है ।

स्वाद, फैशन या आराम की ओर ध्यान न देकर आरोग्य की दृष्टि से हमें अपना जीवनक्रम बनाना चाहिए । प्रात: काल जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, नियमित व्यायाम, त्वचा को खूब रगड़-रगड़कर पूरा स्नान, मालिश, मलों की भली प्रकार सफाई, चटोरपन को तिलांजलि देकर सात्विक मन से खूब चबाकर, प्रसन्नतापूर्वक कम भोजन करना । सामर्थ्य के अनुसार श्रम, चिंता से बचाव, वीर्य रक्षा आदि बातों में सावधानी बरती जाय तो स्वस्थता परछांई की भाँति साथ रहेगी । तंदुरुस्ती हकीम, डाक्टरों की दुकानों में या रंग-बिरंगी शीशियों में नहीं है वरन आहार-विहार की सात्विकता एवं सावधानी में है । आडंबरी, कृत्रिम, चटोरे, प्रकृति विरुद्ध, आलसी रहन-सहन से हम रोगी बनते हैं, उसका परित्याग करके यदि सीधा, सादा, सरल और प्रकृति अनुकूल जीवनक्रम बनाया जाय तो स्वस्थता निश्चित हमारे साथ रहेगी ।

(२) विद्या के दो विभाग हैं -एक शिक्षा, दूसरी विद्या । सांसारिक जानकारी को शिक्षा कहते हैं जैसे- भाषा, भूगोल, गणित, इतिहास, चिकित्सा, व्यापार, शिल्प, साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, नीति, न्याय व्यवस्था आदि । विद्या मनुष्यता के कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व को हृदयंगम करने को कहते हैं ।

धर्म, अध्यात्म, शिष्टाचार, सेवा, पुण्य, परमार्थ, दया, त्याग, सरलता, सदाचार, संयम, प्रेम, न्याय, ईमानदारी, ईश्वरपरायणता, कर्त्तव्य भावना प्रभूति वृत्तियों का जीवन में घुल-मिल जाना विद्या है । शिक्षा और विद्या दोनों को ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए । शिक्षा से सांसारिक जीवन की श्रीवृद्धि होती है और विद्या से आत्मिक जीवन में सुसंपन्नता आती है ।

बौद्धिक विकास के लिए जिज्ञासा की सबसे अधिक आवश्यकता है जिसके मन में जानने की इच्छा होती है, उसके मन में अनेकों तर्क-वितर्क उठते हैं । चिंतन, मनन और विवाद करने में जिसे रस आता है, जो अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहता है, जिसे ज्ञान संग्रह का शौक है, जो ज्ञानवान बनने के महत्त्व और आनंद से परिचित है, वह नित्यप्रति अधिक ज्ञानवान होता चला जाएगा । ज्ञानवान बनने के अनेकों साधन उसे पग-पग पर प्राप्त होते रहेंगे । मूढ़मति मनुष्यों को जहाँ कोई खास बात दिखाई नहीं पड़ती, जिज्ञासु व्यक्ति की सूक्ष्म दृष्टि वहाँ भी बहुत सी जानने योग्य बातें दूढ़ निकालती है । ज्ञानवान बनने की तीव्र आकांक्षा हुए बिना मस्तिष्क की वे सूक्ष्म शक्तियाँ जाग्रत नहीं हो सकती, जिनके आधार पर शिक्षा और विद्या की प्राप्ति हुआ करती है । "आथातो ब्रह्म जिज्ञासा" के सूत्रकार ने ज्ञान साधना का प्रथम उपाय जिज्ञासा को बताया है । जिज्ञासु होना विद्वान होने का पूर्व रूप है ।

पर्यटन, यात्रा, समाचार पत्रों को पढ़ना, विचारपूर्ण पुस्तकों का अध्ययन, सत्संग, आमलोगों की मनोवृत्तियों का अध्ययन, घटनाओं पर विचार और उनका निरूपण एवं अनुभव संपादन में रुचि लेने वाले मनुष्य बुद्धिमान हो जाते हैं । जो अपनी भूलों को ढूढ़ने और सही निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए हठधर्मी से बचाकर अपने मस्तिष्क को खुला रखते हैं, वे आवश्यक एवं उपयोगी ज्ञान को पर्याप्त मात्रा में एकत्रित कर लेते हैं। समर्थक और विरोधी दोनों तथ्यों को समझने और उनकी विवेचना करने के लिए जो लोग प्रस्तुत रहते हैं । वे श्रम से, अज्ञान से बचकर वास्तविकता तक पहुँच जाते हैं । अपनी जानकारी की अल्पता को समझना और अधिक मात्रा में एवं अधिक वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने की निरंतर चाह रखना मनुष्य को क्रमश: ज्ञानवान बनाती जाती है । ज्ञानवृद्धि को प्राप्त करने के अवसरों को जो लोग तलाशते रहते हैं और वैसे अवसर मिलने पर उनका समुचित लाभ उठाते हैं, उनकी विद्या बढ़ती जाती है ।

(३) धन-समय के प्रभाव से आज पैसे का मनुष्य जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है । मनुष्य की लघुता, महानता अब पैसे के पैमाने से नापी जाने लगी हैं । पैसे के द्वारा सब सुख-सामग्रियाँ, सब प्रकार की योग्यता और शक्तियाँ खरीद ली जाती हैं । आज जो अनुचित और अत्यधिक महत्त्व पैसे को प्राप्त है, उसकी ओर ध्यान न दिया जाय तो इतना तो मानना ही पड़ेगा कि पैसे की आवश्यकता हर एक को है । भोजन, वस्त्र एवं मकान के लिए पैसे की जरूरत पड़ती है । अतिथि सत्कार, परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा, विवाह, चिकित्सा, दुर्घटना, अकाल, आपत्ति, यात्रा आदि के लिए थोड़ा-बहुत पैसा हर सद्गृहस्थ के पास रहना आवश्यक है ।

धन उपार्जन की अनेकों प्रणाली संसार में प्रचलित हैं । उनमें से व्यापार, उत्पादन एवं निर्माण की प्रणाली सबसे उत्तम है । शिल्प, वाणिज्य, कला- कौशल, कृषि, गौपालन, दलाली के द्वारा आसानी से पैसा पैदा किया जा सकता है । नौकरी बिना पूँजी वाले और ढीले स्वभाव वालों का सहारा है । ऐसे ही किसी उत्तम कार्य से जीविका उपार्जित करनी चाहिए । न्यायोचित आधार पर समुचित जीविका प्राप्त कर लेना कुछ कठिन नहीं है ।

थोड़े प्रयत्न में अधिक धन कमाने के लिए चोरी, डकैती, लूट, रिश्वत, ठगी, उठाईगीरी, बेईमानी, धोखा, मिलावट, विश्वासघात, जुआ, सट्टा, लाटरी, अन्याय, शोषण, अपहरण आदि नीच-निंदित मार्गों का आश्रय ग्रहण करते हैं । इस प्रकार का धन कमाने में लोकनिंदा, राजदंड, शत्रुता, घृणा, प्रतिहिंसा का भय तो प्रत्यक्ष ही है । इसके अतिरिक्त इस प्रकार झटके का पैसा बुरी तरह अपव्यय होता है । जो पैसा पसीना बहाकर, किफायतशारी से नहीं जमा किया गया है, उसके खरच होने में कुछ दरद नहीं होता । चोर, जुआरी, ठग इस हाथ विपुल धन कमाते हैं और उस हाथ होली में जलाकर स्वाहा कर देते हैं । इस प्रकार के अपव्यय से अनेक पाप, दुर्गुण एवं बुरे उदाहरण उत्पन्न होते हैं ।

इन सब बातों पर ध्यान रखते हुए परिश्रमपूर्वक ईमानदारी के साथ उचित मार्गों से धन कमाना चाहिए और किफायतशारी से कुछ बचाने का प्रयत्न करना चाहिए । सही मार्ग से धनी बनना प्रशंनीय है । धन को जोड़-जोड़कर विशाल राशि जमा करने में नहीं वरन उसका ठीक समय पर आवश्यक एवं उचित उपयोग कर लेने में बुद्धिमानी है । धन को विवेकपूर्वक कमाना चाहिए और विचारपूर्वक खरच करना चाहिए । तभी धन की शक्ति का वास्तविक लाभ प्राप्त किया जा सकता है ।

(४) व्यवस्था-बहुत बड़ी शक्ति है । बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अच्छा व्यवस्थापक होना चाहिए । जो व्यक्ति कार्य को करने का समुचित प्रबंध कर सकता है, वह बहुत बड़ा जानकार है । धनी, विद्वान और स्वस्थ पुरुष अनेक स्थानों पर असफल रहते देखे गए हैं, पर चतुर प्रबंधक स्वल्प साधनों से बड़े-बड़े कार्यों के लिए सरजाम जुटा डालते हैं और अपनी हिम्मत, चतुरता, बुद्धिमत्ता एवं व्यवस्था के बल पर उन्हें पूरा कर लेते हैं ।

(१) दूसरों पर प्रभाव डालना, (२) उपयोगी मनुष्यों का सहयोग एकत्रित करना, (३) काम की ठीक योजना बनाना, (४) नियमित कार्य प्रणाली का संस्थापन करना, (५) रास्ते में आने वाली कठिनाइयों का निराकरण करना ।

यह पाँच गुण व्यवस्थापकों में देखे जाते हैं । वे मधुर भाषण, शिष्टाचार, सद्व्यवहार, लोभ, भय आदि से दूसरों को प्रभावित करना जानते हैं । अनुपयोगी अयोग्य लोगों की उपेक्षा करके काम के आदमियों को सहयोग में लेते हैं, लाभ और हानि के हर एक पहलू का वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अनुभव और आकड़ों के आधार पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के पश्चात वे अपने काम की योजना बनाते हैं । समय की पाबंदी, नियमितता, ठीक समय पर ठीक कार्य करना, स्वच्छता, निरालस्यता एवं जागरूकता उनके स्वभाव का एक अंग बन जाती है । दोषों को वे बारीकी से ढूँढ़ लेते हैं और उन्हें दूर हटाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं । बदलती हुई परिस्थितियों के कारण जो खतरे आते हैं उन्हें रोकने एवं शमन करने पर उनका पूरा ध्यान रखते हैं । सफल व्यवस्थापक में इस प्रकार के गुण होते हैं, उनकी सूझ-बूझ व्यावहारिक होती है ।

निरालस्यता, जागरूकता, स्वच्छता, नियमितता, पाबंदी, मर्यादा का ध्यान रखने से मनुष्य के विचार और कार्य व्यवस्थित होने लगते हैं और वह धीरे- धीरे अपने क्षेत्र में एक व्यवस्थापक बन जाता है । ऐसे आदमी का दुनियाँ लोहा मानती है, सफलता उसका पानी भरती है ।

(५) संगठन-शास्त्रकारों ने "संघेशक्ति कलौयुगें" सूत्र में वर्तमान समय में संघशक्ति, संगठन, एकता को प्रधान शक्ति माना है । जिस घर में, कुटुंब में, जाति में, देश में एकता, वह शत्रुओं के आक्रमण बचा रहता है एवं दिन-दिन समुन्नत होता है । फूट के कारण जो बरबादी होती है, वह जग जाहिर है । अच्छे मित्रों का, सच्चे मित्रों का समूह एकदूसरे की सहायता करता हुआ आश्चर्यजनक उन्नति कर जाता है । तनबल, धनबल, भुजबल की भाँति जन-बल भी महत्त्वपूर्ण है । जिसके साथ दस आदमी हैं, वह शक्तिशाली है । जन शक्ति द्वारा बड़े कठिन कार्यों को आसान बना लिया जाता है ।

घर में और बाहर हर जगह मित्रता बढ़ानी चाहिए । समानता के आधार पर परस्पर सहायता करने वाला, गुण अपनाना चाहिए, उसे बढाया और मजबूत करना चाहिए । संघशक्ति से, जनबल से, जीवन विकास में असाधारण सहायता मिलती है । संगठित गौओं का झुंड सामूहिक हमला करके बलवान बाघ को मार भगाता है ।

आप सामूहिक प्रयत्नों में अधिक दिलचस्पी लीजिए । अकेले माला जपने की अपेक्षा संध्या, भजन, कीर्तनों में सामूहिक रूप से सम्मिलित होना पसंद कीजिए । अकेले कसरत करने की अपेक्षा सामूहिक खेलों में भाग लेना और अखाड़ों में जाना ठीक समझिए । सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, बौद्धिक एवं मनोरंजन संस्थाओं में भाग लीजिए । यदि आपके यहाँ वे न हों तो स्थापित कीजिए अपने जैसे समान विचारों के लोगों की एक मित्र-मंडली बना लीजिए और आपस में खूब प्रेमभाव बढ़ा लीजिए । घर में और बाहर सच्ची मैत्री का, एकता का बढ़ाना एक महत्त्वपूर्ण वास्तविक लाभ हैं ।

(६) यश-नीतिकारों का कहना है कि जिसका यश है उसी का जीवन- जीवन है । प्रतिष्ठा का, आदर का, विश्वास का, श्रद्धा का संपादन करना सचमुच एक बहुत बड़ी कमाई है । देह मर जाती है पर यश नहीं मरता । ऐतिहासिक सत्पुरुषों को स्वर्ग सिधारे हजारों वर्ष बीत गए परंतु उनके पुनीत चरितों का गायन कर असंख्यों मनुष्य अब भी प्रकाश प्राप्त करते हैं ।

जो व्यक्ति अपने अच्छे आचरण और अच्छे विचारों के कारण, सेवा, साहस, सचाई एवं त्याग के कारण लोगों की श्रद्धा एकत्रित कर लेता है, उसे बिना मांगे अनेक प्रकार से प्रकट और अप्रकट सहायताएँ प्राप्त होती रहती हैं ।

यशस्वी व्यक्ति पर कोई संकट आता है तो उसका निवारण करने के लिए अनेकों व्यक्ति आश्चर्यजनक सहायता करते हैं, इसी प्रकार उन्नति के लिए अयाचित सहयोग प्राप्त करते हैं । सुख्याति द्वारा जिन्होंने दूसरों के हृदयों को जीत लिया है, इस संसार में यथार्थ में वे ही विजयी हैं ।

प्रतिष्ठा आत्मा को तृप्त करने वाली दैवी संपत्ति है । बाजार में ईमानदारी एवं सचाई के लिए जिसकी ख्याति है, वही व्यापारी स्थायी लाभ कमाता है । यशस्वी पर हमला करके अपने आप को सबकी निगाह में गिरा लेने के लिए कोई बिरले ही दुस्साहस करते हैं । यह यश सद्गुणों से, सत्कार्यों से, सद्विचारों से एवं भीतर-बाहर से विश्वस्त रहने वालों को ही प्राप्त होता है ।

(७) शौर्य-साहसी बाजी मारता है । हिम्मत वालों की खुदा मदद करता है । आपत्ति में विचलित न होना, संकट के समय धैर्य न रखना, विपत्ति के समय विवेक को कायम रखना मनुष्य की बहुत बड़ी विशेषता है । बुराइयों के विरुद्ध लड़ना, संघर्ष करना और उन्हें परास्त करके दम लेना शौर्य है । शांति अच्छी है परंतु अशांति का अंत करने वाली अशांति भी शांति के समान ही अच्छी है । कायरता की जिंदगी से मर्दानगी की मौत अच्छी । स्वाभिमान, धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए मनुष्य को बहादुर होना चाहिए ।

खतरे में पडने का चाव, निर्भीकता, बहादुरी, जोश, यह सब आंतरिक प्रेरक शक्ति के-गरम खून के चिह्न हैं । जो फूँक-फूँककर पाँव धरते हैं, वे सोचते और मौका ढूँढ़ते रह जाते हैं । पर साहसी पुरुष कूद पड़ते हैं और तैरकर पार हो जाते हैं । दब्बू, डरपोक, कायर, कमजोर, शंकाशील मनुष्य सोचते और डरते रहते हैं, उनसे कोई असाधारण कार्य नहीं हो पाता, यह पृथ्वी वीर भोग्या है । वीर पुरुषों के गले में ही जयमाला पहनाई जाती है । उद्योगी सिंह पुरुष ही लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं ।

मनुष्य को साहसी होना चाहिए । विपत्ति आने पर शोक, चिंता, भय, घबराहट को हटाकर विवेकपूर्वक उस संकट को समाधान करने के लिए ठीक- ठीक सोच सकने का साहस होना मनुष्यता का लक्षण है । आततायियों से मुठभेड़ करने की बहादुरी होना चाहिए । आगे बढ़ने के मार्ग में जो खतरे हैं उनसे उलझने में जिसे रस आता है, वह शूरवीर है । जो साहसी, पराक्रमी, कर्मठ और निर्भीक है, वह शक्तिवान है, क्योंकि साहसरूपी प्रचंड शक्ति उसके हृदय में विद्यमान है ।

(८) सत्यता- में अकूत बल भरा हुआ है, साँच को कहीं आँच नहीं । सत्य इतना मजबूत है कि उसे किसी भी हथियार से नष्ट नहीं किया जा सकता । जिसके विचार और कार्य सच्चे हैं, वह इस संसार का सबसे बड़ा बलवान है, उसे कोई नहीं हरा सकता । सत्यतापूर्ण हर एक कार्य के पीछे दैवी शक्ति होती है । असत्य के पैर जरा सी बात में हड़बडा जाते हैं और उसका भेद खुल जाता है, किंतु सत्य अडिग चट्टान की तरह सुस्थिर खड़ा रहता है । उस पर चोट करने वालों को स्वयं ही परास्त होना पड़ता है ।

सदुद्देश्य, सद्भाव, सद्विचार, सत्कर्म, सत्संकल्प चाहे कितने ही छोटे रूप में सामने आवें, यथार्थ में उनमें बडी भारी प्रभावशाली महानता छिपी होती है । हजार आडंबरों से लिपटा हुआ असत्य जो कार्य नहीं करता वह कार्य सीधी और सरल सत्यता द्वारा पूरा हो जाता है । सत्यनिष्ठ पुरुष प्रभावशाली, तेजस्वी और शक्तिशाली होता है । जो सत्यनिष्ठ है, मन, कर्म और वचन से सत्यपरायण रहते हैं, उनके बल की किसी भी भौतिक बल से तुलना नहीं की जा सकती है ।

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