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वैज्ञानिक अध्यात्म के क्रान्ति दीप

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Reading: उच्चस्तरीय आध्यात्मिक अनुभवों के प्रयोगदृष्टा : विवेकानन्द · Page 23

उच्चस्तरीय आध्यात्मिक अनुभवों के प्रयोगदृष्टा : विवेकानन्द

         वैज्ञानिक ऋषि स्वामी विवेकानन्द ध्यानलीन थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि वह किसी महान् अन्तप्रर्योग में पूरी तरह विलीन हो गए हों। ब्रह्मबेला के धुंधलके से ही  वह इस कक्ष में थे और अब तो सांझ का धुंधलका भी घिरने लगा था। इस बीच सूर्यदेव भी  अपने कितने ही सौम्य व उग्र रूप दिखा कर विदा ले चुके थे। मेरी हेल अपने इस संन्यासी  भाई को देखने कितनी ही बार इस कक्ष में आ चुकी थीं। हर बार उन्होंने यही देखा कि उनकी आँखें मुंदी हुई हैं, देह एकदम शान्त, स्थिर एवं निःस्पन्द है। मेरी हेल की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह उस कक्ष में कुछ बोले अथवा उन्हें ध्यान से उठाने की कोशिश करे। बस वह इस कक्ष में चुपके से आती और पुनः चुपचाप वापस लौट जातीं। ऐसा कई बार हो  चुका था। इस बार जब वह वापस हुई तो बाहर हैरियट हेल खड़ी थी। उन्होंने मुस्कराते हुए  मेरी से पूछा- क्यों अपने भ्राता अभी तक ध्यान में लीन हैं। हाँ- तनिक खीझ ओर निराशा  के साथ मेरी ने कहा- सम्भवतः वह भूल चुके हैं कि इस समय वह भारत देश में हिमालय  की किसी गुफा में नहीं बल्कि अमेरिका के न्यूयार्क शहर के इस भवन के एक कमरे में हैं।

          और शायद यह भी कि अभी थोड़ी ही देर बाद श्रीमती सारा ओलीबुल- उनकी प्रिय धीरामाता प्रो. विलियम जेम्स को लेकर यहाँ आने वाली हैं। साथ में यह भी कहो मेरी  कि हम बहनें भी इतनी दूर से चलकर यहाँ केवल अपने इन संन्यासी भ्राता का सान्निध्य पाने के लिए आयी हुई हैं। हैरियट ने मेरी के कथन के साथ अपनी बात जोड़ी। थोड़ी देर तक वे दोनों एक दूसरे को देखती हुई चुप रहीं। फिर वे दोनों एक साथ ही उस कमरे मेंघुसीं जहाँ स्वामी विवेकानन्द ध्यान कर रहे थे। अब तक उस कक्ष में सांझ का धुंधलकागहरा हो चुका था। परन्तु आश्चर्य! उस धुंधलके में हल्का मद्धम सा श्वेत प्रकाश फैल रहा था। जब उन्होंने ध्यान से देखा तो यह अनुभव हुआ कि मद्धम प्रकाश उनके संन्यासी भ्राता के शरीर से निकल रहा था। अभी भी उनके नेत्र मुंदे हुए थे, परन्तु मुख पर इस स्वर्गीय प्रकाश की स्पष्ट दीप्ति थी। यह देखकर वे दोनों आश्चर्य जड़ित रह गयी। कुछ भी न  बोल सकीं बस शान्त कदमों से वापस लौट आयीं।

        इसके तकरीबन एक घण्टे बाद श्रीमती सारा ओलीबुल प्रो. विलियम जेम्स के साथ  वहाँ आ पहुँची। उनके साथ ब्रुकलिन की मिस एस.ई. वाल्डो एवं प्रो. जान राइट भी थे। ये सभी स्वामी विवेकानन्द से पूर्व परिचित थे। प्रो. जेम्स की स्वामी विवेकानन्द से पहली मुलाकात श्रीमती ओलीबुल ने ही करायी थी। उस समय स्वामी जी का हार्वर्ड विश्वविद्यालय   में व्याख्यान हो रहा था। उस व्याख्यान का विषय था- ‘द फिलॉसफी ऑफ वेदान्त’। इस व्याख्यान ने और व्याख्यान से भी बढ़कर स्वामी जी के व्यक्तित्व ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। स्वामी जी के व्याख्यानों में एक बात जो उन्हें ही नहीं सभी को अनुभव हुई कि ये महान् संन्यासी जब व्याख्यान देते थे तो उनकी देह से हल्के नीले रंग की विद्युत् लहरें निकलती थीं और उन्हें सुनने वालों को कभी हल्के कभी तीव्र झटके अनुभव होते थे। जेम्स सुविख्यात चिकित्सा वैज्ञानिक थे और अब मनोविज्ञान पर गहन अनुसन्धान कर रहे थे। उनका वैज्ञानिक मन स्वामी जी के आध्यात्मिक रहस्यों को जानने के लिए जिज्ञासु था।

         इस जिज्ञासु जेम्स एवं उनके साथ आए सभी को ड्राइंग रूप में बिठाने के साथहेल बहनों ने श्रीमती ओलीबुल के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर वह मुस्कराने लगीं। इतने में अन्दर वाले कक्ष से बाहर आते हुए स्वामी विवेकानन्द ने इस कक्ष में प्रवेश करते  हुए कहा- आपका स्वागत है मिस्टर विलियम। इसी के साथ उन्होंने अन्य सभी के हाल पूछे। साथ ही उन्होंने कहा- धीरामाता क्यों न हम सब भोजन के लिए डानिंग रूम चलें। मेरी बहनों ने तो आज मुझे खाना ही नहीं खिलाया। सम्भवतः आप सबको ये लोग भोजन  कराएँ और आपके साथ मैं भी भोजन कर लूँ। उनकी इस बात को सुनकर सब हँसने लगे। मेरी हेल एवं हेरियट हेल थोड़ा गुस्सा हुई, फिर वे भी हँसने लगी। थोड़ी देर बाद वे सभीडानिंग रूप में भोजन की टेबल पर इकट्ठे थे। इन सबमें अन्य सभी तो शान्त थे, परन्तु विलियम जेम्स के मुख पर उनकी जिज्ञासा की त्वरा स्पष्ट थी।

        इसलिए उनकी ओर देखते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा- योग एवं अध्यात्म की प्रारम्भिक क्रियाएँ व्यावहारिक एवं शारीरिक होती हैं। शरीर पर इनके प्रभाव सकारात्मक होते हैं। हठयोग की प्रक्रियाएँ एवं राजयोग की आसन- प्राणायाम क्रियाएँ इसलिए हैं। विलियम जेम्स स्वामी जी के राजयोग को पढ़ चुके थे। इन प्रवचनों का संकलन करने वाली मिस एस.ई.वाल्डो से वार्तालाप के आधार पर भी उन्होंने बहुत कुछ जाना था। इन स्मृतियों को याद करते हुए उन्होंने हामी में सिर हिलाया। स्वामी जी ने उनसे कहा- इन प्रारम्भिक योग क्रियाओं के शरीर क्रिया वैज्ञानिक प्रभाव की वैज्ञानिक परख सम्भव है। लेकिन इसके बाद जब योग साधक अध्यात्म की उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश करता है, तब स्थिति बदल जाती है। समाधि की उन्नत अवस्था में जब व्यक्ति एवं विराट् अथवा यूंकहें कि योग साधक की व्यक्तिगत चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना से, ईश्वरीय चेतना से मिलती है  तो सब कुछ वैसा नहीं रह जाता। 
    
  ऐसी स्थिति में प्रचण्ड आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाह मन एवं देह में अवतरित होते हैं। इनका अध्ययन करने में शरीर क्रियाविज्ञान समर्थ नहीं है। इसके अध्ययन के लिए मनोविज्ञान एवं परामनोविज्ञान की वैज्ञानिक अध्ययन विधियाँ चाहिए। इन विधियों के प्रयोग के बावजूद भी इसका आंशिक अध्ययन ही सम्भव है। स्वामी विवेकानन्द की इन बातों को प्रो. जेम्स ध्यान से सुन रहे थे। अभी तक उन्होंने भोजन करना प्रारम्भ नहीं किया था। इसे देखकर स्वामी जी ने उनसे आग्रहपूर्वक कहा- बातें करते हुए भोजन करना  भी प्रारम्भ करें। अवश्य ऐसा कहते हुए उन्होंने खाना शुरू किया। उन्हें खाते हुए देख स्वामी जी ने मुस्कराते हुए कहा- चेतना की उच्चस्तरीय कक्षाओं से अवतरित होने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा मानसिक क्रियाओं एवं भावनात्मक स्थिति में व्यापक परिवर्तन करते हुए उसमें अतीन्द्रिय बोध के द्वार खोलती है। तब व्यक्ति- व्यक्ति नहीं रह जाता, वह बन जाता है- विराट् का अभिन्न हिस्सा। तभी उसके अनुभवों में भविष्य दर्शन, दूर बोध- अन्तर्बोध के नए द्वार खुलते हैं।

        इसके बाद के आध्यात्मिक अनुभव इतने उच्चस्तरीय होते हैं कि उनके वैज्ञानिक अध्ययन का प्रयास दर्शन बन जाता है। यह ठीक उसी तरह से है जैसे कि भौतिक विज्ञान  की प्रारम्भिक प्रायोगिक क्रियाएँ प्रयोगशालाओं में कैद रहती हैं। लेकिन बाद में उनके उच्चतम रूप गणितीय मॉडल बन जाते हैं। यही बात अध्यात्म के उच्चतम अनुभवों के बारे में है। इस अवस्था में सृष्टिज्ञान एवं आत्मज्ञान इतने रहस्यात्मक ढंग से मिलते हैं कि इन्हें वैज्ञानिक रीति से समझने का प्रयास दर्शन बन जाता है। ऐसा दर्शन जो काल्पनिक विचारों की उथली भूमि पर नहीं बल्कि अनुभवों की गहराई में अंकुरित होता है। वेदान्त ऐसा ही दर्शन है। स्वामी जी जब बोल रहे थे तब हेल बहनों को उनकी ध्यानलीन अवस्था याद आ रही थी। अब उन्हें जैसे अनुभव होने लगा कि उस अवस्था में अवश्य स्वामी जी की आत्मचेतना सृष्टि चेतना के साथ एकाकार हो रही होगी।

         सन् १८९६ ई. की शुरूआत में ठण्ड के दिनों में स्वामी विवेकानन्द से हुई इस भेंट-  वार्तालाप ने विलियम जेम्स की विचार प्रक्रिया को गहराई से प्रेरित, प्रभावित एवंपरिवर्तित किया। इसी के बाद उन्होंने अपनी विख्यात् रचना ‘द वैराइटीज़ ऑफरिलीजियस एक्सपीरियेन्सेज़’ शब्दों में पिरोयी। इसमें उन्होंने स्वामी जी को उद्धृत भी किया। इसी घटना के बाद शरीर क्रिया वैज्ञानिक से मनोवैज्ञानिक हुए प्रो. विलियम जेम्स  दार्शनिक हो गए। और उस दिन किए गए अपने ध्यान के महान् प्रयोग के परिणाम का संकेत करते हुए बाद के वर्ष में स्वामी जी ने अपने अल्मोड़ा से लिखे गए पत्र में ९ जुलाई१८९७ ई. को लिखा- कम से कम भारत में मानव जाति के कल्याण का ऐसा यन्त्र स्थापित कर दिया है, जिसका कोई शक्ति नाश नहीं कर सकती। आगे के दिनों में उन्होंने अपने वाराणसी प्रवास के समय कहा- मैंने इतना कुछ कर दिया है, जो डेढ़ हजार साल तक बना रहेगा। उनके इन्हीं उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों के क्रम को मह्रर्षि अरविन्द  ने जारी रखा।