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युगगीता - (भाग-२)

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Reading: उठो भारत स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो · Page 18

उठो भारत स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो

गीता के शाश्वत सत्य को प्रभु श्रीकृष्ण अपने अंतिम दो श्लोकों में कही गयी बात द्वारा अधिक प्रभावशाली ढंग से वर्णित कर ‘‘ज्ञान कर्म संन्यास योग’’ नामक इस महत्वपूर्ण अध्याय चार का समापन कर देते हैं।

योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्रन्ति धनंजय॥ ४/४१

भावार्थ- ‘‘हे धनंजय। जिसने कर्मयोग की विधि द्वारा समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और ज्ञान द्वारा (विवेक के माध्यम से) जिसके सभी संशय नष्ट हो गये हैं, उस आत्म पारायण पुरुष को (वश में किये हुए अंतःकरण वाले को) कर्म बाँधते नहीं है।’’

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥ ४/४२

भावार्थ- ‘‘इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय को विवेकज्ञान रूपी तलवार द्वारा काटकर समत्वरूपी योग में स्थित हो जा एवं युद्ध के लिये खड़ा होजा।’’

संशयों से मुक्त हों

पहले भगवान् ने यह कहा कि श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, एवं फिर यह बताया कि अज्ञानी श्रद्धाहीन व्यक्ति जो संशयों से ग्रस्त रहता है, अंततः विनाश को प्राप्त होता है। उसे किसी भी काल में सुख की प्राप्ति नहीं होती। यह एक प्रकार की दुखद नकारात्मक स्थिति है। ऐसी मनःस्थिति में हमें बहुत से लोग प्रायः सारे समाज के सभी वर्गों में छाए दिखाई देते हैं। उनका एक ही काम है निरन्तर संशय करना। तर्क और श्रद्धा में तर्क को अधिक महत्व देना। वे अपने परिकर के सभी व्यक्तियों की नियत कर्म भावना एवं प्रयोजन पर अविश्वास रखते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक शब्द पर बिना किसी विचार के संदेह रखते हैं। भगवान के अनुसार उनके संशय उनके अज्ञान के कारण गैर जिम्मेदारी से भरी भ्रान्तियों के कारण ही होते हैं। जब व्यक्ति का न तो अपने आप में और न अपने आसपास के संसार में ही विश्वास होता है तो उसे इस संसार में कोई महत्त्वपूर्ण उपलब्धि नहीं मिलती। साथ ही परलोक में भी उसे दुर्गति का ही सामना करना होता है। उसे कहीं भी किसी भी काल में सुख न मिलने का कारण मात्र यही है कि वह निरन्तर शंकाओं से घिरा रहता है। इसीलिये भगवान कहते हैं कि श्रद्धावान पुरुष ही ज्ञान लाभ प्राप्त करते हैं, अन्य कोई और नहीं।

गीता : एक मानव शास्त्र

गीता वस्तुतः मनोविज्ञान की एक पाठ्यपुस्तिका है। यह एक प्रकार का मानव शास्त्र है, जो वातावरण और परिस्थितियों से बिना प्रभावित हुए एक श्रेष्ठ कर्मों में निरत कर्मठ जीवन जीने हेतु हम सभी को प्रेरित करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निस्सृत हुआ है। हमारा प्रतिनिधित्व यहाँ अर्जुन कर रहा है। वह बड़ा संशय में है और यह संशय अज्ञान से जन्मा है। उसे लगता है कि जीतने के कोई अवसर नहीं हैं। कहाँ उसकी अपनी सात अक्षौहिणी सेना और कहाँ शत्रु की विराट सेना का बल! उसके मन में अपने ही प्रति अविश्वास है कि जीत नहीं पायेंगे। इस आत्मविश्वास के अभाव में जो स्वर उसके मुँह से निकल रहे हैं, वे अज्ञानजनित हैं। लौकिक दृष्टि से विवश अर्जुन देखकर भी एक तथ्य जो नकार रहा है, वह यह कि सब कुछ प्रतिकूल होते हुए भी श्रीकृष्ण उसके साथ हैं। यदि इतना मात्र दृढ़ विश्वास वह कर ले तो वह सारी ग्लानियों- उदासीनताओं पर विजय प्राप्त कर युद्ध क्षेत्र में पूरे संकल्प बल के साथ खड़ा हो सकता है। यहाँ अर्जुन की पग- पग पर परीक्षा है।

गीता के हर श्लोक के साथ उसकी ही नहीं हम सबकी भी परीक्षा हो रही है कि जीवन संग्राम में हम स्वयं को कितना तैयार रख पाते हैं। कर्मठता- कर्त्तव्यपारायणता बिना श्रद्धाजन्य ज्ञान के नहीं आ सकती और उसके लिये अपनी गुरुसत्ता पर दृढ़विश्वास- उनके दिये ज्ञान को ग्रहण करने के लिये पात्रता का विकास- साधन पारायणता एवं संयमशीलता का कड़ा अभ्यास चाहिए। जो व्यक्ति शुद्ध अंतःकरण वाले हैं वे तो स्वतः उस ज्ञान को अपने आप ही यथा समय अपनी आत्मा में पा लेते हैं पर सामान्य पुरुष जो संशयों में भटकते रहते हैं, तरह- तरह के तर्कों द्वारा सत्य को पाने का प्रयास करते हैं, श्रद्धा उनके अन्दर से उपज ही नहीं पाती, वे तो मानो निरन्तर भटकते रहते हैं। वे इस लोक में नाश को प्राप्त होते हैं और फिर इसी प्रकार जन्म जन्मान्तरों तक ८४ लाख योनियों में भटकते रहते हैं।

 रखें गुरु के ज्ञान पर दृढ़ विश्वास

हम अपनी गुरुसत्ता के वचनों पर यदि दृढ़ विश्वास रखते हैं, हमारे मन में उनके निर्धारणों- युगनिर्माण की उनकी भविष्यवाणी तथा घोषणाओं पर विश्वास है तब हमारी दुर्गति क्यों हो। हमने तो यह मान लिया है कि हम अकेले हैं। हमें ही सब कुछ करना है। औरों के आचरण हमें जल्दी दिख जाते हैं तो हम संशयों से घिर जाते हैं। हम अपने आपको देखने- अपनी श्रद्धा संवर्धन करने का- ज्ञान प्राप्ति के परम पुरुषार्थ में तत्पर होने का प्रयास नहीं करते, इसीलिये हमारी भी स्थिति वही होती है जो अर्जुन की हो रही है। ज्ञान कर्म सन्यास योग नामक चौथा अध्याय भगवान की ‘‘संभवामि युगे- युगे’’ के आश्वासन से व उनके द्वारा सूर्य को बताए गये योग की चर्चा से आरंभ हुआ था। कर्म, अकर्म, विकर्म की परिभाषा समझाते हुए- पण्डितजनों की व्याख्या तथा यज्ञ के दार्शनिक पक्ष का विवेचन करते हुए ज्ञान कैसे प्राप्त होगा, किसको प्राप्त होगा व इस ज्ञान की महिमा कितनी बड़ी है- इन सब विवरणों के साथ अर्जुन का युद्धक्षेत्र में खड़े होने की गर्जना भरी लताड़ पर समाप्त होने जा रहा है। कैसे- कैसे उतार चढ़ाव आए हैं, इस अध्याय में, पर यह अध्याय कर्मयोग पर आरूढ़ एक महापुरुष के लिए- एक संकल्पित अनुष्ठान लिये कार्य कर रहे संगठन के लिये एक निर्देश पुस्तिका है। कर्मयोगी को कैसा होना चाहिए; उसके कर्म दिव्य कब बनेंगे तथा बिना श्रद्धा व ज्ञान के कर्मों को दिशा कैसे मिलेगी? इन्हीं सब प्रतिपादनों पर टिका है यह अध्याय, जिसकी पराकाष्ठा पर हम पहुँच चुके हैं। यहाँ बार- बार भगवान कहते हैं कि अर्जुन! तेरे मन में कोई संशय हो तो निकाल दे। यदि संशय लेकर जियेगा, कर्म योग के पथ पर आरूढ़ नहीं होगा तो तेरी आत्मा विनाश को प्राप्त होगी। इसीलिये संशयों से मुक्त होना अनिवार्य है।

भगवान् कह रहे हैं- हे धनञ्जय! आत्मावान को कर्म नहीं बाँधते, ऐसे व्यक्ति को जिसने विवेक द्वारा अपने समस्त संशयों को नष्ट कर दिया है, ऐसे व्यक्ति को जिसका अन्तःकरण उसके वश में है, कर्मों के बंधन से मुक्ति मिलती चली जाती है। (आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्रन्ति धनंजय )। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे जिसे नाचना आ जाए, उसके पाँव गलत नहीं पड़ते। तो जिस आत्मा ने स्वयं को परमात्मा को अर्पित कर दिया है, जिस दिव्यकर्मी के सभी कर्म परब्रह्म को समर्पित हैं, उससे कभी कोई गलत काम हो ही नहीं सकता। उसके मन में ऐसा कोई भाव भी कभी पैदा नहीं होता। वह कर्मबंधन से मुक्ति पाकर जीवन्मुक्त हो जाता है। परम पूज्य गुरुदेव कभी मौज में आते थे तो एक गीत सुनाते थे- ‘‘मेरे पैरों में घुँघरू बँधा दे तो फिर मेरी चाल देखले।’’

इस गीत की एक पंक्ति सुनाकर वे कहते थे कि ऐसे व्यक्ति की चाल फिर गलत हो ही नहीं सकती। लय और ताल के साथ ही वह चलेगी। ऐसा व्यक्ति कभी गलती नहीं करता। क्योंकि परमात्मा उसका हर क्षण संचालन करते हैं- वह कर्मयोग में सिद्धि प्राप्त कर चुका है। जो बात ठाकुर ने कही है कि नाचना सीखने पर गलत पाँव नहीं पड़ते, वही भाव इस पंक्ति से भी निकलता है कि उपास्य- इष्ट के अनुशासन में ही फिर कर्मों का संपादन होने लगता है- परमसत्ता के अनुशासन रूपी घुँघरू बँध जाने पर समर्पित साधक फिर वही चाल चलता है जो कि एक कुशल कर्म योगी को चलना चाहिए। पूर्णतः त्रुटिहीन, सर्वांगपूर्ण कौशल से भरी हुई।

क्रांतिकारी गर्जना

भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि यहाँ समस्याओं से भागने को नहीं कहा जाता अपितु दृढ़तापूर्वक डटे रहने और बुद्धिमत्तापूर्वक अपनी मनःस्थिति से परिस्थिति को नियंत्रण करते हुए कर्म करते रहने हेतु प्रेरित किया जाता है। गीता शुभ शक्तियों के नायक- देव पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्जुन के प्रति संबोधित है एवं ‘‘हे भारत ! उठो- युद्ध करो- अनीति को जड़ से उखाड़ फेंको- ’’ यही योगेश्वर का अन्तिम उपदेश है। क्रान्तियाँ जब कभी भी होती हैं तो भगवान का यही आदेश है कि कन्दराओं में मत भागो- डट कर मोर्चा लो, अनीति से कुरीतियों से- वैचारिक प्रदूषण से एवं सतत सम्यक कर्म करते रहो, यही तुमसे अपेक्षा है।

इकतालीसवें श्लोक में भगवान यही कहते हैं कि जब विषयों व स्वार्थों की कामना से युक्त कर्मों का दिव्य योग भावना द्वारा त्याग कर दिया जाता है तो अशान्तिदायक वासनाएँ समाप्त होती चली जाती हैं। अध्ययन- मनन द्वारा इससे आंतरिक ज्ञान में वृद्धि होती है जो गुरु समर्पण से मिलता चला जाता है। वासनायुक्त अंतःकरण में, ऐसे ज्ञान की वृद्धि होती जाती है जिसके प्रकाश में हमारी बुद्धि पर घने घटाटोप बादलों की तरह छाये संशय निवृत्त हो जाते हैं। (ज्ञानसंछिन्न संशयम्)। ज्ञानसूर्य मानों उन बादलों को, अज्ञानजन्य भ्रान्तियों को अपने प्रकाश से छाँट देता है, नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति स्वतः आत्मपारायण हो जाता है (आत्मवन्तं), वह परम चैतन्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है। फिर इस लौकिक जगत और उसकी क्रियाएँ उसे वासनाओं की बेड़ियों में नहीं जकड़ पातीं (न कर्माणि निबध्रन्ति धनंजय)।

ऐसी स्थिति में मनुष्य भीतर योग में स्थित रहकर बाहर सभी बुद्धिमत्तापूर्वक किये जाने वाले कर्मों का संपाादन कर लेता है। जैसे माँ का ध्यान घरेलू कामकाज में लगा होते हुए भी पालने में पड़े अपने शिशु की ओर निरन्तर लगा रहता है, आकाश में उड़ती चिड़िया घोंसले से दूर होते हुए भी अपने बच्चे का ध्यान बराबर रखती है, हमारी गुरुसत्ता सूक्ष्म रूप में विद्यमान युग निर्माण के कार्यों का सम्पादन करते हुए भी- हमारी ओर ध्यान निरन्तर ‘‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’’ के भाव से बनाए रखती है। योगी भी- दिव्यकर्मी भी परमसत्ता से कभी भी विमुख नहीं होते- बहिरंग जगत में कर्म करते हुए भी वे वस्तुतः अकर्म में लीन रहते हैं। इस तरह कर्म करते रहने से मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व को जकड़ने वाली नई वासनाएँ उत्पन्न नहीं हो पातीं। ‘‘कर्म नहीं बाँधते’’ शब्द से भगवान का वही आशय है। अज्ञान और उससे जन्य भ्रान्तियों से मुक्ति ही वह राजमार्ग है जो व्यक्ति को सही अर्थों में कर्मयोगी बनाता है।

संशय को काटें ज्ञान की खड़ग से

जब मनुष्य को वास्तविक आत्मतत्व का अनुभव हो गया, जो अहंकार और कामोद्वेगों से ढका हुआ था तो उसकी समस्त भ्रान्तियाँ भी मिट जाती हैं। तब भगवान यह कहकर उपसंहार करते हैं- ‘‘हृदयस्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मा संबंधी संशय को ज्ञान की खड़ग से काटकर योग में स्थित हो जा। उठ! हे भारत तू युद्ध के लिये तैयार हो जा।’’
(४/४२)

कितना ओजस्वी उद्बोधन है कितना मर्म से भरा ज्ञानोपदेशों से भरा, कर्मयोग के प्रतिपादन का समापन है। अगले अध्याय (पाँचवे) जो कर्म संन्यास योग नाम से प्रसिद्ध है के पूर्व भगवान ने अर्जुन को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। आत्मा के तात्कालिक और अपरोक्ष अनुभव (अपरोक्षानुभूति द्वारा) इसके स्वरूप के संबंध में जो भी संशय से व्याप्त हों, उनसे निवृत्त हो जाना ही उचित है। यही संशय हमें अहंभाव में पकड़े रहते हैं और ये अज्ञान से जन्मते हैं। प्रभु कहते हैं इस अज्ञान जनित संशयों को अपरोक्षानुभूति की- विवेक ज्ञान की खड़ग से नष्ट कर दो- काट डालो (तस्मादज्ञान संभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः छित्वैनं संशयं- ४/४२)। यदि हम प्रभु को निरन्तर अपने आसपास विद्यमान मानकर निरन्तर जागरूक बने रहकर उनके प्रति अपने कर्मों के अर्पण का भाव रखें तो हम योग में स्थित हो जाते हैं- यज्ञीय भाव से कर्म करने लगते हैं (योगमातिष्ठ)। सारे अध्याय का सार संक्षेप यहाँ आ गया है।

कितनी विचित्र बात है। गीता युद्धक्षेत्र में कही जा रही है। मोहग्रस्त अज्ञानी अर्जुन को योगेश्वर कर्मयोग का संदेश दे रहे हैं एवं बार- बार यही कह रहे हैं कि तू युद्ध कर। हमें लगता है कहाँ योग जैसा उच्चस्तरीय दर्शन एवं कहाँ युद्ध। पर यही तो काव्य के लालित्य की विलक्षणता है। चाहे वह महाभारत का युद्धक्षेत्र हो- चाहे हमारे अन्तर्जगत् का देवासुर संग्राम- हमें सदैव इसी प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। चाहे हम लौकिक जीवन जी रहे हों व रैदास की तरह- रैक्य की तरह, सदन कसाई की तरह निर्लिप्त भाव से कर्मयोगी की भाँति जीना चाह रहे हों- हमें उसी उच्चतर कर्मयोग की आवश्यकता होगी। युग निर्माण का कार्य, नयी दुनिया बनाने- नया इंसान बनाने का ज्ञानयज्ञ वाला विचार क्रांति का महापुरुषार्थ इसीलिये तो हमारे लिये एक उच्चस्तरीय कर्मयोग बन जाता है। इस प्रक्रिया का संपादन करते- करते हमारी चेतना विस्तृत होती चली जाती है, जागरूकता बढ़ती है, प्रतिकूल परिस्थितियाँ बदलती हैं तथा आत्मविश्वास बढ़ता चला जाता है। हम सभी समस्याओं का सामना श्रद्धा से भरे हृदय- विवेकजन्य ज्ञान तथा त्यागभाव से करने को तैयार हों तो सफलता मिलती चली जाती है।

उठो भारत! योग का आश्रय लो

मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। (न मानुषात् हि श्रेष्ठतरं किंचित्) संसार उसके लिए एक क्रीड़ास्थली है। सांसारिक समस्याओं से एक बुद्धिमान एवं संतुलित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। गीता युवाशक्ति को संबोधित करती हुई कहती है- अज्ञान से बाहर निकलो- एक ऐसे जीवन की तैयारी करो जिसमें तुम उद्यमपूर्वक प्रयत्नरत हो सको। भावीपीढ़ियों के लिये महानतम उपलब्धियाँ अर्जित कर सको। जब भी कोई जाति- समाज ऐसे यज्ञीय कर्म अधिकाधिक परिमाण में व्यापक स्तर पर सेवाभाव से करने को तैयार हो जाते हैं तो युग बदलने- महाभारत के निर्माण की संभावनाएँ साकार होने लगती हैं। गीता का यह आह्वान है ‘‘उत्तिष्ठ भारत’’। हम सबके लिए, ऊर्जा से भरी युवाशक्ति के लिये- संवेदना से भरी मातृशक्ति के लिये यह आह्वान। मात्र भारत नाम से यह संबोधन अर्जुन को ही नहीं है- पाण्डव राजकुमार के लिये ही नहीं है- अपितु सभी कालों व युगों के सभी मानवों के लिये है- चाहे वे किसी भी जाति धर्म- संस्कृति से जुड़े हों। प्राचीन राजा भरत के वंशज होने के नाते अर्जुन को भारत सम्बोधन किया जा रहा है।

संस्कृत में ‘भा’ का अर्थ है प्रकाश, दीप्ति। रत का अर्थ है जो रमण करता है। इस प्रकार ‘‘भारत’’ का अर्थ हुआ जो ज्ञान के प्रकाश में रमण करता है- ऐसा हमारा गौरवशाली देश है, जिसके नाम से ही ज्ञान का माहात्म्य प्रतिपादित होता है। वास्तविक ज्ञान के प्रकाश में- भास्कर देवता के आभामण्डल में- कर्मठ जीवन जीने वाले देवदूतों का देश है भारत। इस देश की कोई सीमा नहीं- यह तो एक विश्व राष्ट्र की परिभाषा है। जैसे- जैसे देव संस्कृति का ज्ञान प्रकाश दिग- दिगन्त तक फैलता चला जाएगा- सारा विश्व भारत बनता चला जायेगा। पहले भी ऐसा रहा है और ऐसी क्रान्तिकारी बेला में ही यह युगगीता लिखी जा रही है, जब यजुर्वेद का ‘‘सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा’’ वाला संकल्प पुनः जीवन्त होने जा रहा है। श्रीकृष्ण की परिभाषा के अनुसार सच्चा भारतीय वही है जो साहसपूर्वक- ज्ञान के प्रकाश में कर्मपारायण जीवन जीने और परमात्म तत्व की अनुभूति पाने हेतु तत्पर हो। कर्मयोग में स्थित हो। हम सभी को चिन्तन करना चाहिए कि क्या हम इस परिभाषा पर खरे उतरते हैं। हम अपने विश्वासों को व्यवहार में लाने का साहस दिखाने की स्थिति में हैं कि नहीं? हम अपनी निम्रगामी प्रवृत्तियों और विषय वासनाओं से लड़ने के लिये गतिशील हैं कि नहीं। यदि हैं तो हम सभी को संबोधन है परम सत्ता का, भगवान श्रीकृष्ण का कि उठो भारत, भारतवासी देवपुत्रों- अमृतपुत्रों गरिमा को पहचानो एवं स्वयं को योग में प्रतिष्ठित करो। बस इसी एक विलक्षण बिन्दु पर गीता का यह महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो जाता है।