अलभ्य अवसर का लाभ लें
इन दिनों युग परिवर्तन की प्रभात वेला में असंख्यों को असंख्य प्रकार की उपलब्धियों से लाभान्वित होने का अवसर मिलने की संभावना बन रही है। सबसे अधिक नफे में वे रहेंगे, जो इन दिनों युग-धर्म के निर्वाह में दत्त-चित्त रहेंगे, नव सृजन के संदर्भ में कुछ बढ़-चढ़ कर काम करेंगे। जिनमें संवेदना, भाव-चेतना और दूरदर्शिता के तत्त्व किसी भी अनुपात में जीवन्त है, उन्हें संकीर्ण स्वार्थपरता में कटौती करके बचत को उस प्रयोजन में लगाना पड़ेगा, जिससे उज्ज्वल भविष्य की संरचना में कुछ महत्त्वपूर्ण योगदान बन पड़े। ऐसे लोगों के लिए प्रमुख कर्त्तव्य बनता है—लोक मानस का परिष्कार—दृष्टिकोण और क्रिया-कलापों में सतयुगी परम्परा का प्रतिष्ठापन।
मोटे शब्दों में विचार-क्रान्ति यही है, जिससे समूची मानवता को नये सिरे से, नये भाग्योदय का सौभाग्य उपलब्ध हो सके; आदिमकाल से चलती आ रही एक अस्त-व्यस्तता की दिशा-धारा को अभिनव सुनियोजन का अवसर मिल सके; जिसके कारण अब तक के इतिहास में एक नई श्रृंखला जुड़ सके। इस दृष्टि से, अपने समय के सर्वसाधारण को सामान्य स्तर की एवं प्रखर प्रतिभाओं को विशेष-अनुपम उपलब्धियां हस्तगत करने का अवसर मिल सकेगा। भविष्य में जब कभी भी इस ऐतिहासिक मोड़ वाले समय की समीक्षा-विवेचना होगी, तो एक शब्द में यही कहा जाता रहेगा कि युग संधि की वेला में, अन्तरिक्ष से असीम चेतना और ऊर्जा बरसी थी। धन्य थे वे लोग, जो उस समय कार्यरत रह सके और दिशाओं के दरवाजों पर अड़े हुए किवाड़ खोजने की भूमिका निभा सके। नामकरण की दृष्टि से उनका परिचय सृजन-शिल्पियों के रूप में भी कहा और लिखा जाता रहेगा।
‘विचार क्रान्ति’ अपने समय की सबसे बड़ी मांग है। जनमानस का परिष्कार किए बिना उसमें से कुछ भी संभव न हो सकेगा, जो भविष्य के संबंध में सोचा, चाहा और निर्धारित किया गया है। समस्त समस्याओं की जड़ एक ही केन्द्र—दुर्बुद्धि पर केन्द्रित है। दुर्गति के लिए वही पूरी तरह जिम्मेदार है। यदि मनुष्य को सही सोचने और सही करने भर की मानसिकता बनाने का अवसर मिल सके, तो समझना चाहिए कि प्रस्तुत अगणित समस्याओं, विभीषिकाओं और अवांछनीयताओं के घटाटोप—से छुटकारा पाने का सहज सुयोग हस्तगत हो गया।
यह सब अनायास ही घटित हो जाने वाला नहीं है। उसके लिए प्रमुख भूमिका सृजन-शिल्पियों की होगी, जिनके सम्मिलित प्रयास से समुद्र पर सेतु बांधने, गोवर्धन उठाने, स्वतंत्रता उपलब्ध करने और परिव्राजकों द्वारा समस्त संसार में धर्मचक्र-प्रवर्तन जैसे स्मरणीय अवसरों की नये सिरे से पुनरावृत्ति हुई समझी जा सके। अंधेरी रात्रि के अवसान और अरुणोदय के आगमन के बीच एक मध्यान्तर होता है जिसे ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं। युगशिल्पियों के प्रयास को उसी के समतुल्य माना जायेगा।
मोटे शब्दों में विचार-क्रान्ति यही है, जिससे समूची मानवता को नये सिरे से, नये भाग्योदय का सौभाग्य उपलब्ध हो सके; आदिमकाल से चलती आ रही एक अस्त-व्यस्तता की दिशा-धारा को अभिनव सुनियोजन का अवसर मिल सके; जिसके कारण अब तक के इतिहास में एक नई श्रृंखला जुड़ सके। इस दृष्टि से, अपने समय के सर्वसाधारण को सामान्य स्तर की एवं प्रखर प्रतिभाओं को विशेष-अनुपम उपलब्धियां हस्तगत करने का अवसर मिल सकेगा। भविष्य में जब कभी भी इस ऐतिहासिक मोड़ वाले समय की समीक्षा-विवेचना होगी, तो एक शब्द में यही कहा जाता रहेगा कि युग संधि की वेला में, अन्तरिक्ष से असीम चेतना और ऊर्जा बरसी थी। धन्य थे वे लोग, जो उस समय कार्यरत रह सके और दिशाओं के दरवाजों पर अड़े हुए किवाड़ खोजने की भूमिका निभा सके। नामकरण की दृष्टि से उनका परिचय सृजन-शिल्पियों के रूप में भी कहा और लिखा जाता रहेगा।
‘विचार क्रान्ति’ अपने समय की सबसे बड़ी मांग है। जनमानस का परिष्कार किए बिना उसमें से कुछ भी संभव न हो सकेगा, जो भविष्य के संबंध में सोचा, चाहा और निर्धारित किया गया है। समस्त समस्याओं की जड़ एक ही केन्द्र—दुर्बुद्धि पर केन्द्रित है। दुर्गति के लिए वही पूरी तरह जिम्मेदार है। यदि मनुष्य को सही सोचने और सही करने भर की मानसिकता बनाने का अवसर मिल सके, तो समझना चाहिए कि प्रस्तुत अगणित समस्याओं, विभीषिकाओं और अवांछनीयताओं के घटाटोप—से छुटकारा पाने का सहज सुयोग हस्तगत हो गया।
यह सब अनायास ही घटित हो जाने वाला नहीं है। उसके लिए प्रमुख भूमिका सृजन-शिल्पियों की होगी, जिनके सम्मिलित प्रयास से समुद्र पर सेतु बांधने, गोवर्धन उठाने, स्वतंत्रता उपलब्ध करने और परिव्राजकों द्वारा समस्त संसार में धर्मचक्र-प्रवर्तन जैसे स्मरणीय अवसरों की नये सिरे से पुनरावृत्ति हुई समझी जा सके। अंधेरी रात्रि के अवसान और अरुणोदय के आगमन के बीच एक मध्यान्तर होता है जिसे ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं। युगशिल्पियों के प्रयास को उसी के समतुल्य माना जायेगा।

