ऐसे बनें, जैसा दूसरों को बनाना है
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Reading: प्रवचन नहीं — आचरण बनायें · Page 3
प्रवचन नहीं — आचरण बनायें
जनमानस का परिष्कार करने की महती आवश्यकता को पूरा करने में जिनका मन उपयुक्त भूमिका निबाहने के लिए हुलसित हो, उन्हें प्रयास का आरंभ अपने आप से करना होगा। दूसरों से कुछ करने के लिए कहा जाय, तो यह आवश्यक नहीं कि वह परामर्श को मान ही ले और मार्गदर्शन के अनुरूप अपनी गतिविधियों को मोड़ ही ले; किन्तु उस अनुशासन का परिपालन अपने आप के लिए, हर मनस्वी के लिए तो सहज संभव हो सकता है। अपने ऊपर तो अपना अधिकार पूरी तरह है ही, फिर उसमें अवज्ञा का प्रश्न सामने आ ही नहीं सकेगा। अपने को सुधार लिया जाय, तो अन्यान्यों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रस्तुत वातावरण ही दबाने-दबोचने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। सांचे में ढल कर ही खिलौने और पुर्जे बड़ी संख्या में ढलते-विनिर्मित होते चले जाते हैं। दूसरों को उपदेश देकर उन्हें इच्छित दिशा में चलाया जा सका होता तो अब तक न जाने कब की सारी दुनिया सुधर गयी होती।
उपदेष्टाओं की कहां कमी है हर प्रवचन अतिरिक्त दर्शकों में से कोई ऐसा कुछ उपलब्ध नहीं करता, जिससे प्रभावित होकर आदर्शवादी रीति-नीति अपना सकना संभव हो सके। बुरी बात तो अपने संचित कुसंस्कार और अनाचारियों का समुदाय है, जो पतन-पराभव का कुयोग जुटा देता है।
बात ऊंचा उठने और आगे बढ़ने की है। इस प्रयास में सफलता मात्र उन्हीं को मिलती है जो प्रतिपादनों को अन्यान्यों पर थोपने से पहले अपने आप को तदनुरूप बनाने में समर्थ हो सके हैं। निष्णात अध्यापक ही छात्रों का समुचित अध्यापन कर सकने में समर्थ होते हैं। जो स्वयं ही बे पढ़े हों, वे दूसरों को क्या पढ़ाये? जो स्वयं ही संगीत-कला में प्रवीण नहीं, वह संगीत विद्यालय का अधिष्ठाता होने की घोषणा करे, तो उसे उपहासास्पद ही माना जायेगा।
उपदेष्टाओं की कहां कमी है हर प्रवचन अतिरिक्त दर्शकों में से कोई ऐसा कुछ उपलब्ध नहीं करता, जिससे प्रभावित होकर आदर्शवादी रीति-नीति अपना सकना संभव हो सके। बुरी बात तो अपने संचित कुसंस्कार और अनाचारियों का समुदाय है, जो पतन-पराभव का कुयोग जुटा देता है।
बात ऊंचा उठने और आगे बढ़ने की है। इस प्रयास में सफलता मात्र उन्हीं को मिलती है जो प्रतिपादनों को अन्यान्यों पर थोपने से पहले अपने आप को तदनुरूप बनाने में समर्थ हो सके हैं। निष्णात अध्यापक ही छात्रों का समुचित अध्यापन कर सकने में समर्थ होते हैं। जो स्वयं ही बे पढ़े हों, वे दूसरों को क्या पढ़ाये? जो स्वयं ही संगीत-कला में प्रवीण नहीं, वह संगीत विद्यालय का अधिष्ठाता होने की घोषणा करे, तो उसे उपहासास्पद ही माना जायेगा।

