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ऐसे बनें, जैसा दूसरों को बनाना है

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Reading: उपदेशक की पात्रता · Page 4

उपदेशक की पात्रता

उपदेश इन दिनों प्रायः सर्वथा असफल इसी कारण हो रहे हैं कि उपदेशक जो दूसरों से कराना चाहते हैं, उसे निजी जीवन में समाविष्ट करके यह सिद्ध नहीं कर पाते कि जो कहा गया है, वह व्यावहारिक भी है। यदि उचित, व्यवहारिक और लाभप्रद रहा होता, तो उपदेशों के अनुरूप प्रवक्ता ने सर्वप्रथम उस विधा को अपनाकर अपने को लाभान्वित किया होता। इस संदेह-असमंजस का निराकरण न कर पाने पर ही उपदेशकों के द्वारा बार-बार दिये जाने वाले भाषण भी विडम्बना बनकर रह जाते हैं, श्रवण कर्त्ताओं के गले नहीं उतरते।

ऐसे भाषण, परामर्शों से भावुकों को अवांछनीयता की दिशा में भड़काना, उत्तेजित करना तो संभव है; पर वह संभावना बनेगी ही नहीं कि उत्कृष्टता अपनाकर संयम बरतने और परामर्श व्यवहार में लाने के लिए किसी को अग्रणी किया जा सके। यही कारण है कि इन दिनों तथाकथित नेताओं को अभिनेताओं की संज्ञा देकर लोक कौतुक-कौतूहल जैसा मजा लेते हैं और इस कान सुनकर, उस कान निकाल देते हैं, पल्ले झाड़ कर चल देते हैं। बाद में उस कौतुक का उपहास करते हुए, ऐसा मजमा जमाने की खूबी को बहुरूपिया स्तर की संज्ञा देते हुए निन्दा तक करते देखे जाते हैं। विशेषतया यह प्रक्रिया तब तेजी से उभरती देखी जाती है, जब आदर्शवादिता अपनाने के लिए, सिद्धांतों को अपनाने के लिए लोगों से कहा जा रहा हो। लोग बहुधा वक्ताओं के परामर्श में से निजी स्वार्थ या वर्ग स्वार्थ के प्रतिपादन ही चुन लेते हैं और आदर्श निष्ठ अपनाने से सम्बन्धित बात पर ध्यान नहीं देते। हड़तालों और प्रदर्शनों के लिए, विग्रह-उपद्रव के लिए आक्रोश उत्पन्न करने, एवं अड़ंगेबाजी में नेतागिरी अपना काम कर जाती है; पर जहां सृजन और उपयोगी सुधार-परिवर्तन की बात कही जाय, वहां लोग ऊंघने या उठ कर चलने लगते हैं।

इस विडम्बना में दोष जनमानस का नहीं, वरन् प्रवक्ताओं की अनाधिकार चेष्टा का है। वे दूसरों से वह कराना चाहते हैं, जिसे वे स्वयं तक कर सकने में समर्थ नहीं हो सके। अच्छाई तो कुछ समय छिपी भी रह सकती है; पर बुराई की विडम्बना में एक खूबी यह जुड़ी हुई है कि वह हींग की तीखी गंध की तरह अनायास ही दूर-दूर तक फैल जाती है। आचार निष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं। अनाधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं।

यहां यह ऊहापोह इसलिए किया जा रहा है कि नव सृजन के हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में आदर्शवादिता का संपुट लगता है; लोगों को अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियों को छोड़ने के लिए कहा जाता है; जो उचित-उत्कृष्ट है उसे अपनाने के लिए अनुरोध-आग्रह किया जाता है। यह नीचे गिरे को ऊपर उठाने जैसा असाधारण प्रयत्न हुआ। इसे सम्पन्न करने के लिए ऊपर उठाने की ऐसी समर्थता संचित की जानी चाहिए, जैसी कि गिरे इंजन को फिर से सीधा खड़ा करने के लिए सशक्त क्रेनों के लिए आवश्यक होती है। कुएं से पानी खींचने के लिए भी भुजाओं का बल तो चाहिए ही। अन्तरिक्ष में उपग्रह फेंकने वाले केन्द्रों में शक्तिशाली रॉकेट लगाने पड़ते हैं। ऊपर उठाने के लिए असाधारण समर्थता की, सक्रियता की आवश्यकता पड़ती है, और लोगों को अनगढ़पन से विरत होने और उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत करने के लिए, अनिवार्य रूप से ऐसी ही प्रतिभाएं चाहिए, जो परीक्षा की कसौटी पर कसे जाने और आग में तपाये जाने के उपरान्त खरी उतरी हों।

बुराई बढ़ाने में तो नशेबाजों के, व्यभिचारियों के, गुण्डागर्दी अपनाने वाले आवाराओं तक के गिरोह, अनेकों को प्रभावित करने और चंगुल में फंसा लेने में आये दिन सफल होते रहते हैं; पर उत्कृष्टता की दिशा में सहमत और प्रेरित कर सकना मात्र उन्हीं के लिए संभव होता है, जो लोक-शिक्षण के लिए, जो निर्धारण विनिर्मित किया गया है, उसका प्रयोग-परीक्षण अपने ऊपर कर के दिखा चुके हों। जो ऐसा कर सके हैं, उनके परामर्श, उपदेशों और आह्वानों को शिरोधार्य करने वालों की भी कमी नहीं पड़ी है।

इतिहास उक्त तथ्य को सदैव उजागर करता रहता है। बुद्ध, ईसा और गांधी के उपदेशों का न तो उपहास हुआ और न उन्हें ऐसी शिकायत करनी पड़ी कि अनुगमन के लिए कोई तैयार न हुआ। जमाने को, समाज को, लोक मानस को दोषी ठहराने की भी आवश्यकता नहीं पड़ी। विनोबा का अनुरोध असंख्यों ने स्वीकारा और भूदान के लिए लाखों एकड़ भूमि प्रस्तुत कर दी। दयानन्द, विवेकानन्द, शंकराचार्य आदि को ऐसी निराशा का सामना नहीं करना पड़ा कि उनकी बात कोई सुनता, मानता ही नहीं। मध्यकालीन सन्तों के इतने अधिक अनुयायी समवेत हुए कि उनका अपना-अपना सम्प्रदाय ही बन गया। यदि उनके संस्थापक ओछे, खोटे और प्रवक्ता भर रहे होते तो नियम-संयम के साथ बंधे हुए, किसी न किसी सीमा तक असुविधा उत्पन्न करने वाले उनके अनुबंधों को कोई क्यों स्वीकार करता? पुरातन काल के मुट्ठी भर ऋषि-मनीषी अपने समय में धरती पर स्वर्ग उतारने और मनुष्य में देवत्व उभारने का असंभव जैसा दीखने वाला कार्य संभव बनाने में किस आधार पर सफल हुए थे?

सतयुग आसमान से नहीं टपका था; वरन् ऋषि-मनीषियों के प्रचण्ड और प्रखर व्यक्तित्वों ने ही उसे उभारा और व्यापक बनाया था। अपने आत्मबल की असाधारण सामर्थ्य पर अटूट विश्वास होने पर ही वे मनुष्य समुदाय की उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाये रहने की प्रतिज्ञा को देश-देशान्तरों में गुंजायमान करते रहते थे। उनकी प्रतिज्ञा थी ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ हम पुरोहित राष्ट्र को जागृत और जीवन्त बनाये रहेंगे। राष्ट्र शब्द से उनका अभिप्राय किसी छोटे क्षेत्र विशेष से नहीं, वरन् विश्वराष्ट्र से था। इसे जीवित, जीवन्त, समर्थ और प्रखर बनाये रहने की जिम्मेदारी उठा सकना, उन्हीं के लिए संभव हो सकता था, जो अपने को इसके लिए आवश्यक आत्मशक्ति से सम्पन्न बना चुके थे।