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Books - गायत्री की परम कल्याणकारी सर्वांगपूर्ण सुगम उपासना विधि

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


महिलाओं के लिए गायत्री उपासना

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गायत्री उपासना का अर्थ है- ईश्वर को माता- पिता मानकर उसकी गोदी में चढ़ना, उसका लाड़- दुलार और प्रेम- वात्सल्य प्राप्त करना। संसार में जितने भी सम्बन्ध हैं उन सबमें माता का रिश्ता अधिक प्रेमपूर्ण और घनिष्ठ है। प्रभु को जिस दृष्टि से हम देखते हैं, हमारी भावना के अनुरूप वैसी ही वे प्रत्युत्तर देती हैं। जब ईश्वर की गोदी में जीव मातृ- भावना के साथ चढ़ता है तो निश्चय ही उधर से वात्सल्यपूर्ण उत्तर मिलता है।

स्नेह, वात्सल्य, दया, ममता, उदारता, कोमलता आदि तत्व नारी में नर की अपेक्षा स्वभावतः अधिक होते हैं। ब्रह्म का अर्ध- वामांग ब्राह्मी तत्व अधिक कोमल, आकर्षक एवं शीघ्र द्रवीभूत होने वाला है, इसलिए अनादिकाल से महर्षिगण भी ईश्वर की मातृ- भावना के साथ उपासना करते रहे हैं और उन्होंने प्रत्येक भारतीय धर्मावलम्बी को इसी सुखसाध्य एवं शीघ्र सफल होने वाली उपासना प्रणाली अपनाने का निर्देश दिया ।। गायत्री उपासना को इसीलिए प्रत्येक भारतीय का अनिवार्य धार्मिक कृत्य माना गया है। संध्या- वंदन किसी पद्धति से किया जाता हो, उसमें गायत्री का होना आवश्यक है। विशेष लौकिक या पारलौकिक प्रयोजन के लिए विशेष रूप से गायत्री उपासना की जाती है, पर उतना न हो सके तो नित्य कर्म की साधना तो दैनिक- कर्तव्य है, उसे न करने से धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करने का बड़ा दोष है।

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राण- प्रिय सन्तान हैं। ईश्वर को नर- नारी दोनों ही दुलारे हैं। कोई भी निष्पक्ष और न्यायशील माता- पिता अपने बालकों में इसलिए भेदभाव नहीं करते कि वे कन्या हैं या पुत्र हैं ।। ईश्वर ने धार्मिक कर्तव्यों एवं आत्म- कल्याण के साधनों की नर और नारी दोनों को ही सुविधा दी है। यह समता, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से उचित है, तर्क और प्रमाणों से सिद्ध है। इसे सीधे- सीधे तथ्य में कोई विघ्न डालना असंगत ही होगा। वह बात अलग है कि अशिक्षित, अपवित्र, हीनमति और मूढ़ स्त्रीया स्वयं ही इस दिशा में प्रवृत्त न हों लेकिन स्त्रीयाँ गायत्री साधना से वंचित रहें ऐसा कोई प्रतिबन्ध या शास्त्रीय निर्देश नहीं है।

प्राचीनकाल में अनेक महिलाएँ उच्चकोटि की साधिकायें हुई हैं और उन्होंने गायत्री की साधना की है। आध्यात्म कार्य में वे पुरूष से कभी भी पीछे नहीं रही हैं। नारी का तप ही उसकी कुक्षि से महान आत्माओं का प्रसव कराने में समर्थ होता है। तपस्विनी अदिति ने भावना वामन को जन्म दिया, रोहिणी और यशोदा के आँगन में उन्हें बाल- लीला करनी पड़ी। समस्त देवताओं की जननी अदिति माता है, भगवती कात्यायनी असुरों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ हुई। माता शतरूपा के गर्भ से मानव प्राणी का जन्म हुआ। अधिक उदाहरण क्यों दिये जायें, संसार में जितने भी विभूतिवान व्यक्ति हुए हैं उनके जन्म और निवास का श्रेय माताओं को ही तो है।

बच्चों के स्वास्थ्य,ग्रहस्थ जीवन में सुख- शान्ति के लिए गायत्री उपासना का संबल सदैव मंगलमाय रहता है। प्राचीनकाल की नारियाँ इस तप- शक्ति से ओत- प्रोत होने के कारण ही यशस्वी सन्तान को जन्म देती थीं और तब यह देश नर- रत्नों की खान हुआ करता था। बीच में नारी को प्रतिबन्धित कर हमने पाया कुछ नहीं, खो सब कुछ दिया। हमें अपना प्राचीन गौरव अभीष्ट हो तो अन्ततः महिलाओं को भी गायत्री उपासना करने के प्रति समान रूप से प्रेरित करना होगा और उसी से हमारे पारिवारिक जीवन समर्थ होंगे।

गायत्री ईश्वर की सर्वोत्तम प्रार्थना है। वेद भगवान की अमृतमयी वाणी है। ऐसे उपयोगी तत्त्व से स्त्रियों को वंचित रखा जाना न्याय- विवेक के तथा भारतीय संस्कृति की मूलभूत भावना के प्रतिकूल है, इसलिए इस प्रकार के भ्रमों में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्राचीनकाल की भाँति आज भी असंख्यों भारतीय महिलायें ऐसी हैं जो गायत्री मंत्र द्वारा उपासना करती हैं और उनके महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांसारिक लाभों को प्राप्त करती हैं।

गायत्री माता का श्रेय लेना स्त्रियों के लिए हर प्रकार से आवश्यक है। पिता की अपेक्षा माता अपनी कन्या पर अधिक प्यार करती है। गायत्री माता बड़ी कल्याणमयी है, उनका हृदय वात्सल्य से परिपूर्ण है। अपनी गोदी में चढ़ने वाली किसी पुत्र को वे निराश नहीं करतीं ।।

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