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Books - गायत्री की सिद्धियां

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गायत्री की सिद्धियां

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आत्म-कल्याण के लिए नाना प्रकार की साधनाएं की जाती हैं। अनेक प्रकार के तप, ध्यान, जप, योगाभ्यास, व्रत, संयम आदि किये जाते हैं, अनेक मन्त्रों का आश्रय लिया जाता है, इनमें साधारणतः अनेकता एवं भिन्नता दिखाई पड़ती है पर मूलतः इनका आधार गायत्री ही है। उस एक ही मूल के यह शाखा पल्लव हैं। गायत्री से 84 प्रकार के योगों का उद्भव हुआ है। देश, काल, पात्र की भिन्नता के लिए भिन्न-भिन्न मनोभूमि के साधकों के लिए अलग-अलग प्रकार के साधनों की आवश्यकता पड़ती है, इसी दृष्टि से इतने प्रकार के साधना विधानों का आविर्भाव हुआ है, अन्यथा इन सबका मूल एक ही है। जितना भी आत्म-ज्ञान एवं आध्यात्मिक साधना विधान है, उस सबका मूल आधार केवल गायत्री ही है।पत्तों का जड़ से अलग अस्तित्व नहीं, पत्ते जड़ पर आश्रित रहते हैं क्योंकि उनमें जीवन संचार वहीं से होता है। यदि जड़ कट जाय तो फिर पत्तों का क्या अस्तित्व रहेगा? जितने भी श्रौत, स्मार्त एवं कौल मन्त्र हैं उनकी आधार भूमि गायत्री है। उसी की शक्तियों का आश्रय लेकर विभिन्न मन्त्र विनिर्मित हुए हैं और इस महामन्त्र में सन्निहित गुप्त विज्ञान एवं विधान के ही सहारे राजयोग, हठयोग, लययोग, ऋजुयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, जपयोग, ध्यानयोग, प्राणयोग, तन्त्रयोग आदि 84 प्रकार के योगों का आविर्भाव हुआ है। कोई भी साधना ऐसी नहीं है जिसका आधार गायत्री न हो। छोटा कीड़ा जो पत्ते पर बैठा है वह भले ही न जानता हो कि जड़ से भी उसका कोई सम्बन्ध है, यह अपना घर पत्ते को ही मानता है पर जानकार लोग समझते हैं कि कीड़ा वृक्ष पर ही बैठा है। कीड़े वाला पत्ता भी उस विशाल वृक्ष का एक अंश मात्र है।इतिहास पुराणों से पता चलता है कि तप का आरम्भ गायत्री से ही हुआ है। विष्णु की नाभि से जो कमल-नालिका निकली वह गायत्री ही थी। सृष्टि निर्माण से पूर्व ब्रह्माजी को आकाशवाणी द्वारा गायत्री का ज्ञान मिला। उन्होंने एक हजार वर्ष तक गायत्री का तप करके सृष्टि-निर्माण की शक्ति पाई। शंकरजी की योगमाया गायत्री ही है। वे इसी महा समाधि में लीन रहते हैं। इस महाशक्ति का जब तीन गुणों में पदार्पण होता है तो उस पदार्पण से सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली का अवतरण होता है। सविता सूर्य की आत्मा गायत्री ही कही गई है। इसी प्रकार अन्यान्य देव शक्तियों को भी इसी महाशक्ति-सागर की तरंगें कहा गया है।प्राचीन युगों में प्रायः सभी ऋषियों ने इसी महामन्त्र के आधार पर अपनी योग-साधनाएं एवं तपस्याएं की हैं। सप्त ऋषियों को प्रधानता गायत्री द्वारा ही मिली। वृहस्पति इसी शक्ति की दक्षिण मार्गी साधना करके देवगुरु बने, शुक्राचार्य ने इस महामन्त्र का बाम मार्गी भाग अपनाया और वे असुरों के गुरु हुए। साधारण ऋषि, मुनि उन्नति करते हुए महर्षि, ब्रह्मर्षि एवं देवर्षि का पद प्राप्त करते थे तो इस उत्कर्ष का मूल आधार गायत्री ही रहती थी।वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विश्वामित्र, पाराशर, भारद्वाज, गौतम, व्यास, शुकदेव, नारद, दधीचि, वाल्मीकि, च्यवन, शंख, लोमश, तैत्तिरेय, जावालि, शृंगी, उद्दालक, वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, पुलस्त्य, दत्तात्रेय, अगस्त, सनत्कुमार, कण्व, शौनक आदि ऋषियों के जीवन-वृत्तान्त जिन्होंने पढ़े हैं वे जानते हैं कि उनकी महानता, शक्तियां एवं सिद्धियां जिस आधार-शिला पर अवस्थित थीं—वह गायत्री है। इन ऋषियों ने अपने ग्रन्थों में गायत्री की मुक्त कण्ठ से एक स्वर से महिमा गाई है और बताया है कि आत्मा को परमात्मा बनाने वाली, नरक से स्वर्ग पहुंचाने वाली, तुच्छ को महान् बनाने वाली शक्ति गायत्री ही है।प्राचीन काल की भांति अब भी वही मार्ग है। यद्यपि यवन राज्य के पिछले अज्ञानान्धकार युग में अगणित सम्प्रदाय, मत-मतान्तर उपज पड़े और उनमें अपनी-अपनी सूझ-बूझ के अनुसार नाना प्रकार के साधना-पन्थ बना लिए फिर भी ऐसी साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुंचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिनने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उनने गायत्री माता का आश्रय अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत, ग्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे पृथक भले ही हैं पर मूल आश्रय को किसी ने नहीं छोड़ा है।वर्तमान काल में भी जिनने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पयपान करने का सौभाग्य अवश्य मिला। योगी ही नहीं पिछले दिनों के हमारे सार्वजनिक नेता और युग-पुरुष भी इस महामन्त्र की शक्ति को पहचानते रहे हैं। लोकमान्य तिलक कहा करते थे कि—‘‘जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में भारतीय प्रजा जकड़ी हुई है उनका अन्त राजनैतिक संघर्ष मात्र से न हो जायगा। उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए। जिससे सत् और असत् का विवेक हो, कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मन्त्र में यही भावना विद्यमान है। महात्मा गान्धी का कथन है—‘‘गायत्री मन्त्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री को स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।महामना मदनमोहन मालवीय, कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर, योगी अरविन्द, महर्षि रमण, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि युग-पुरुषों ने भी अपने-अपने ढंग से गायत्री का प्रतिपादन किया है।आत्मा अनन्त शक्तियों और सिद्धियों का भण्डार है। वह ईश्वर का पुत्र और सत्चित् आनन्द स्वरूप है। अपने पिता के इस पुण्य उद्यान संसार में क्रीड़ा-कल्लोल का आनन्द लेने आता है पर माया के बन्धनों में फंस कर वह अपने स्वरूप को, अपने लक्ष को, अपने कार्यक्रम को भूल जाता है और विपन्न स्थिति में पड़ जाता है। इसी भूल का नाम माया बन्धन है। यह माया बन्धन जैसे-जैसे ढीले पड़ते जाते हैं वैसे ही वैसे वह अपने परम मंगलमय मूल रूप में अवस्थित होता चलता है। आत्मा स्वच्छ दर्पण के समान है पर माया मोह का मैल जम जाने के कारण उस पर धुंधलापन छा जाता है। आत्मा जलते हुए अंगार के समान है उस पर जब राख का पर्त चढ़ जाता है तो बुझी हुई सी दिखाई पड़ती है। यदि अंगार पर से राख के पर्त को हटा दिया जाय तो वह फिर प्रकाशवान् एवं उष्णता युक्त दीखने लगता है। दर्पण पर लगे हुए मैल को यदि मांज धो कर साफ कर दिया जाये तो पुनः उज्ज्वल हो जाता है। अज्ञानान्धकार में यदि ज्ञान का प्रकाश जल उठे तो अंधेरे में जो छिपा पड़ा था वह सब कुछ दीखने लगता है। यह सब काम गायत्री करती है। वह आत्मा पर चढ़े हुये सम्पूर्ण मलों, विक्षेपों, कषायों, कल्मषों एवं जन्म-जन्मान्तरों के चढ़े हुए कुसंस्कारों को धोकर उसे स्वच्छ एवं प्रकाशवान बनाती है। माया के बन्धनों को काटने में वह तेज छुरी सिद्ध होती है। इन बाधाओं से छूटकर आत्मा जब अपनी मूलभूत निर्मल स्थिति को पहुंच जाता है तो उसके सब त्रास दूर हो जाते हैं। आत्मा का परम निर्मल हो जाना ही परमात्मा की प्राप्ति है। इसे ही जीवनमुक्ति, ब्रह्मनिर्वाण परमपद, आत्म-साक्षात्कार एवं प्रभु-प्राप्ति कहते हैं। यह प्राप्त होना कठिन माना जाता है पर गायत्री माता इस महान् कठिन कार्य को भी सरल बना देती है।गायत्री साधक की दिन-दिन आत्मिक उन्नति होती है। वह जैसे-जैसे ऊंचा उठता है वैसे ही वैसे उसे अपने पिंड (देह) में छिपी हुई ब्रह्मांड गत ईश्वरीय महान शक्तियों का भान होने लगता है। हमारा जो यह स्थूल शरीर दिखाई पड़ता है—इसे ‘अन्नमय कोष’ कहते हैं। इसी प्रकार के सूक्ष्म अदृश्य देह इसी के भीतर चार और हैं। मरने पर यह अन्नमय कोष मर जाता है पर चार शरीर- प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष- जीवित रहते हैं। इनमें वासनाएं, इच्छाएं, भावनाएं, आदतें भरी रहती हैं और जन्म-जन्मान्तरों के चले हुए संस्कार जमा रहते हैं। जैसे यह स्थूल देह जब तक जीवित है तब तक मृत्यु हो गई ऐसा नहीं कहा जा सकता, इसी प्रकार जब तक यह भीतर वाले चार देह- चार कोष- जीवित हैं तब तक मुक्ति भी नहीं कहीं जा सकती। इन पांचों कोषों के आवरण एवं आच्छादन से छुटकारा पाने के लिए गायत्री की पंचमुखी साधना की जाती है। इसीलिए चित्रों में कहीं-कहीं गायत्री को पांच मुख वाली भी दिखाया जाता है। वह दशों दिशाओं में व्याप्त है, दशों इन्द्रियों की स्वामिनी है, दश महाशक्तियों की अधीश्वरी है, इसलिए इसे दशभुजी भी चित्रित किया जाता है। गायत्री का पंचमुखी और दशभुजी रूप इस बात का संकेत है कि इस महाशक्ति की सहायता से हम अपने पांचों शरीरों को समाप्त कर सकते हैं, पांच बन्धनों से छूट सकते हैं, दशों इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, दशों दिशाओं में अपना विस्तार कर सकते हैं और दश महाशक्तिओं के स्वामी बन सकते हैं। गायत्री माता की कृपा से हम क्या नहीं कर सकते है? जो कुछ इस लोक में तथा परलोक में हैं वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खण्ड में अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, आनन्दमय कोष, विज्ञानमय कोष को पार करने की गायत्री साधनाएं विस्तारपूर्वक लिखी जा चुकी हैं। उस विधान के अनुसार साधना करने से एक-एक केश खुलता जाता है। कोश का अर्थ देह भी है और खजाना भी। जहां पांचों देहों एवं बन्धनों का परिमार्जन होता है, वहां इन कोशों में जो अलौकिक दिव्य शक्तियों के खजाने भरे पड़े हैं वे भी सामने आते हैं। यह कोश ही ऋद्धि-सिद्धियों के भण्डार हैं। जिनके हाथ में यह खजाने होते हैं उन्हें इस संसार में और कुछ प्राप्त करना नहीं रह जाता।अन्नमय कोश की साधना में उपवास, आसन, तत्वशुद्धि और तपश्चर्या मुख्य हैं। जब इस कोश की साधना चलती है तो इन्धिका, दीपिका, मोचिका, आध्यायिनी, पूषा, चन्द्रिका, धूर्माचि, अमाया, असिता आदि 96 उपत्यिकाओं की शुद्धि होती है, जिससे नाना प्रकार के मल दूर होते हैं। शरीर की छैहों अग्नियां ऊष्मा, बहुवृच, ह्वादि, रोहिता, आप्ता और व्याप्ति जागृति होती हैं। उत्तरायण-दक्षिणायन की गोलार्ध स्थिति का, चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं का, नक्षत्रों से भूमि पर आने वाले प्रभाव का, सूर्य की अंश किरणों का, शरीर लाभ उठाने लगता है। पांचों प्रकार के उपवास, पाचक, शोधक, शामक, आतक, पावक—अपना-अपना प्रभाव दिखाने लगते हैं। सर्वांगासन, सिद्धासन, हस्तपादासन, उत्कटासन, सर्पासन, मयूरासन, धनुरासन, पद्मासन आदि आसनों पर अधिकार हो जाता है। तत्व-शुद्धि से शरीर में मिट्टी, पानी, वायु, अग्नि, आकाश की मात्रा व्यवस्थित हो जाती है। पंच तत्वों पर अधिकार हो जाता है और चारों वाणियां वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति, परा—अपना-अपना कार्य प्रभावशाली ढंग से करने लगती हैं। तप के मार्ग में सरलता होती है। आरवाद, तितीक्षा, कर्षण, कल्प, प्रदातव्य, निष्कासन, ब्रह्मचर्य, अर्जन आदि में कोई कठिनाई नहीं रहती। नेति, धोति, वस्ति, न्योली, बजोली, कपालभाति आदि हठ योग के षट्कर्मों की आवश्यकता, अन्नमय कोश की गायत्री साधनों से आसानी के साथ पूर्ण हो जाती है। अन्नमय शरीर में जो आश्चर्यजनक शक्तियां और सिद्धियां भरी पड़ी हैं उन विकास एवं जागरण इस प्रथम कोश की साधना से होता है।प्राणमय कोश का गायत्री द्वारा जब परिमार्जन किया जाता है तो प्राणशक्ति की अजस्रधारा उसमें से फूट निकलती है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान यह पांच प्राण और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय यह पांच उपप्राण ऐसे विद्युत् प्रवाह है जिनका सम्बन्ध प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों से है। इनसे दशों द्वारा प्रकृतिगत प्राण तत्व में से मनुष्य बहुत कुछ अपने लिए खींच सकता है। मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डियान बन्ध से श्वांस और नाड़ी तन्तुओं पर अधिकार प्राप्त होता है। महामुद्रा, खेचरी मुद्रा, विपरीत करणी मुद्रा, शांभवी मुद्रा, अगोचरी मुद्रा, भ्रूचरी मुद्रा मन को वश में करने और चित्त को स्थिर करने में अचूक हैं। लोम विलोम प्राणायाम, उज्जायी प्राणायाम, शीत्कारी प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, मूर्च्छा प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम तथा प्लावनी प्राणायाम—यह अपने-अपने क्षेत्र में बड़े ही महत्वपूर्ण हैं। इनसे मृत्यु तक पर विजय प्राप्त की जा सकती है।गायत्री द्वारा मनोमय कोष का बेधन अनेक विशेषताएं उत्पन्न करता है। मैस्मेरेजम, हिप्नोटिज्म, मेन्टल थ्रेपी, आकल्ट साइन्स आदि विद्याओं पर योरोपीय योगी बड़ा अभिमान करते हैं। यह मनोमय कोश के छोटे-छोटे खेल हैं। ध्यान योग की पांच श्रेणियां—स्थिति, संस्थिति, विगति, प्रगति, संस्थिति इष्ट देव का साक्षात्कार कराने में समर्थ होती हैं। त्राटक से पत्थर को तोड़ देने वाली वेधक दृष्टि पैदा होती है। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श, पंच तत्वों को इन पांच तन्मात्राओं पर अधिकार होने से जो कुछ सूक्ष्म जगत में अदृश्य है वह सब दृश्यमान हो जाता है।विज्ञानमय कोष को गायत्री द्वारा जब पार किया जाता है तो आत्मा के दिव्य प्रकाश का स्पष्ट अनुभव होने लगता है। गायत्री के अजपा जाप का ‘सोऽहम्’ मन्त्र अपने आप सिद्ध होता है। आत्मचिंतन, आत्म अनुभव, आत्म-दर्शन, आत्मविकास एवं आत्म-प्राप्ति के द्वार इसी कोष में खुलते हैं। स्वर योग को इड़ा पिंगला, सुषुम्ना, गांधरी, हस्त, जिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलंबुषा, कुहू, शंखनी यह छहों नाड़ियां क्रियाशील हो जाती हैं और साधक की पहुंच लोक-लोकान्तरों तक हो जाती। है। रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्म ग्रन्थि खुलने से सत, रज, तम तीनों गुणों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है।आनन्दमय कोष की साधना अन्तिम है। इसी में 27 प्रकार की समाधियां लगती हैं। शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, अनहद ध्वनि से देवी सन्देश सुनाई पड़ते हैं, विन्दु साधना से ऋण और धन विद्युत कणों की गतिविधि पर नियन्त्रण करने की सामर्थ्य पैदा होती है। आप्ति और व्याप्ति कला के अभ्यास से ओजस और रेतस तत्वों पर अधिकार हो जाता है। तुरीयावस्था में जो सत् चित्त आनन्द का अनुभव होता है उसके बारे में तैत्तिरेयोपनिषद् में कहा गया है कि—‘‘यदि कोई मनुष्य पूर्ण स्वस्थ, सुशिक्षित, गुणवान, सामर्थ्यवान् सौभाग्यवान एवं समस्त संसार की धन सम्पत्ति का स्वामी हो तो उसे जो आनन्द हो सकता है उसे एक मानुषी आनन्द कहेंगे। ऐसे करोड़ों गुने आनन्द को तुरीयावस्था का ब्रह्मानन्द कहते हैं। इस सुख का आस्वादन करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।’’इन पांचों कोशों को पार करना और पार करने की इस यात्रा के समय में प्राप्त होने वाले सुख एवं चमत्कारों का प्रत्यक्ष करना गायत्री साधना द्वारा ही होता है। अन्य अभ्यासों से साधना में बहुत समय तथा श्रम लगाना पड़ता है फिर भी पूर्ण सफलता नहीं मिलती। योगीजनों का कष्टसाध्य लम्बा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुये गृहस्थ व्यक्ति-वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है। पांचों बन्धनों से छुटकारा पाकर परम लक्ष को प्राप्त करना जितना इस मार्ग से सरल है उतना और किसी मार्ग से सम्भव नहीं है।
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