आत्म-विकास के लिए व्रत पालन की आवश्यकता
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आत्म-ज्ञान या शाश्वत जीवन का बोध व्रताचरण के द्वारा होता है। ऊपर चढ़ने की जरूरत पड़ती है, तो सीढ़ी लगाते हैं। एक डंडे को हाथ से पकड़कर दूसरे पर पैर रखते हुए ऊपर आसानी से चढ़ जाते हैं। जीवन में क्रमिक रूप से छोटे-छोटे व्रतों से प्रारंभ करके अंत में उन्नत-व्रत की परिधि प्राप्त करना अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक सरल है। शास्त्रकार का कथन है—
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ।। —यजु0 19.30
‘‘उन्नत जीवन की योग्यता मनुष्य को व्रत से प्राप्त होती है। इसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा से दक्षिणा अर्थात् जो कुछ कर रहे हैं, उसके सफल परिणाम मिलते हैं। सफलता के द्वारा आदर्श और अनुष्ठान के प्रति श्रद्धा जाग्रत होती है और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। सत्य का अर्थ मनुष्य के जीवनलक्ष्य से है। यह एक क्रमिक विकास की पद्धति है। व्रत जिसका प्रारंभ और सत्यप्राप्ति ही जिसका अंतिम निष्कर्ष है।’’
व्रत का आध्यात्मिक अर्थ उन आचरणों से है, जो शुद्ध, सरल और सात्त्विक हों तथा उनका पालन विशेष मनोयोगपूर्वक किया गया हो। यह देखा गया है कि व्यावहारिक जीवन में सभी लोग अधिकांश सत्य बोलते हैं और सत्य का ही आचरण भी करते हैं, किंतु कुछ क्षण ऐसे आ जाते हैं, जब सच बोल देना स्वार्थ और इच्छापूर्ति में बाधा उत्पन्न करता है, उस समय लोग झूठ बोल देते हैं या असत्य आचरण कर डालते हैं। निजी स्वार्थ के लिए सत्य की अवहेलना कर देने का तात्पर्य यह हुआ कि आपकी निष्ठा उस आचरण में नहीं है। इसे ही यों कहेंगे कि व्रतशील नहीं है।
बात अपने हित की हो अथवा दूसरे की, जो शुद्ध और न्यायपूर्ण हो उसका निष्ठापूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है। संक्षेप में आचरण शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना व्रत कहलाता है। संकल्प का छोटा रूप व्रत है। संकल्प की शक्ति व्यापक होती है और व्रत उसका एक अध्याय होता है। वस्तुतः व्रत और संकल्प दोनों एक ही समान हैं।
विपरीत परिस्थितियों में भी हंसी-खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है। इससे मनुष्य में श्रेष्ठ कर्मों के संपादन की योग्यता आती है। थोड़ी-सी कठिनाइयों में कर्म-विमुख होना मनुष्य की अल्प-शक्ति का बोधक है, जो कठिनाइयों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहे, ऐसी शक्ति व्रत में होती है।
नियम-पालन से मनुष्य में आत्म-विश्वास और अनुशासन की भावना आती है। जीवन के उत्थान और विकास के लिए ये दोनों शक्तियां अनिवार्य हैं। आत्म-शक्ति या आत्म-विश्वास के अभाव में मनुष्य छोटे-छोटे भौतिक प्रयोजनों में ही लगा रहता है। अनुशासन के बिना जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। शक्ति और चेष्टाओं का केंद्रीकरण न हो पाने के कारण कोई महत्त्वपूर्ण सफलता नहीं बन पाती। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करना और उन्हें मनोयोगपूर्वक जीवन ध्येय की ओर लगाए रखना आचरण में नियमबद्धता से ही हो पाता है। नियमितता व्यवस्थित जीवन का प्रमुख आधार है। आत्म-शोधन की प्रक्रिया इसी से पूरी होती है। आत्मवादी पुरुष का कथन है—
उत्तरोत्तरमुत्कर्षं जीवने लब्धुमुत्सुकः ।
प्रतिजाने चरिष्यामि व्रतमात्मविशुद्धये ।।
मैं जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखता हूं। यह कार्य पवित्र आचरण या आत्मा को शुद्ध बनाने से ही पूरा होता है, इसलिए मैं व्रताचरण की प्रतिज्ञा लेता हूं।
व्रत-पालन से आत्म-विश्वास के साथ संयम की वृत्ति भी आती है। आत्म-विश्वास शक्तियों का संचय बढ़ाता है और संयम से, शक्तियों से कोष भर जाता है, तो आत्मा अपने आप प्रकट हो जाती है। शक्ति के बिना आत्मा को धारण करने की क्षमता नहीं आती। व्रत शक्ति का स्रोत है, इसलिए आत्म-शोधन की वह प्रमुख आवश्यकता है। अपनी शक्ति और स्वरूप का ज्ञान मनुष्य को न हो, तो वह जीवन में किसी तरह का उत्थान नहीं कर सकता है। शक्ति आती है तभी आत्म-विश्वास की भावना का उदय होता है और मनुष्य विकास की ओर तेजी से बढ़ता चलता है।
ऊंचे उठने की आकांक्षा मनुष्य की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया है। पूर्णता प्राप्त करने की कामना मनुष्य का प्राकृतिक गुण है, किंतु हम जीवन को अस्त-व्यस्त बनाकर लक्ष्य च्युत हो जाते हैं। हर कार्य की शुरुआत छोटी कक्षा से होती है, तब कठोरता की ओर बढ़ पाते हैं। आत्म-ज्ञान के महान लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रारंभिक कक्षा व्रत-पालन ही है, इसी से हम मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते हैं। व्रताचरण से ही मनुष्य महान बनता है, यह पाठ जितनी जल्दी सीख लें, उतना ही श्रेयस्कर है।
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*समाप्त*


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