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Books - सुख-शांति की साधना

Media: TEXT
Language: HINDI
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अपना मूल्य, आप ही न गिरायें

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First 27 29 Last
अनेक लोगों का स्वभाव होता है कि वे अपने को अकारण ही दीन-हीन और क्षुद्र समझा करते हैं। सदैव ही अपना कम मूल्यांकन किया करते हैं। साथ ही इसे एक आध्यात्मिक गुण मानते हैं। उनका विचार रहता है कि ‘‘अपने को छोटा मानते रहने से, अपना महत्व कम करते रहने से मनुष्य अहंकार के पाप से बच जाता है। उसकी आत्मा में बड़ी शान्ति और सन्तोष रहता है। यह एक विनम्रता है। छोटे बनकर चलने वाले समाज में बड़ा बड़प्पन पाते हैं।’’

यह विचार यथार्थ नहीं। मनुष्य को संसार में वही मूल्य और वही महत्व मिलता है, जो वह स्वयं अपने लिए आंकता है। उससे कम तो मिल सकता है लेकिन अधिक नहीं। सीधी-सी बात है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं ही अपनी किसी वस्तु का एक पैसा मूल्य आंकता है तो समाज अथवा संसार को क्या गरज पड़ी कि वह उसका दो-पैसा मूल्य लगाये। बाजारों में किसी समय भी मूल्यांकन की यह रीति देखी जा सकती है। जो दुकानदार अपनी किसी वस्तु का एक निश्चित मूल्यांकन कर लेता है और यह विश्वास रखता है कि उसकी वस्तु का उचित मूल्य यही है, जो समाज से अवश्य मिलेगा, तो वह उतना पाने में सफल भी हो जाता है। यदि कोई उसके बतलाये मूल्य का अवमूल्यन भी करता है तो वह उससे सहमत नहीं होता। इसके विपरीत वह दुकानदार जो कहने-सुनने पर अपने बतलाये मूल्य को कम कर देता है कभी भी ठीक मूल्य नहीं पाता और उसी मूल्य पर सन्तोष करना पड़ता है जो ग्राहक से मिलता है।

आत्म-अवमूल्यन आत्म-हत्या जैसी क्रिया है। जो लोग आवश्यकता से अधिक दीन-हीन, क्षुद्र और नगण्य बनकर समाज में अपनी विनम्रता और शिष्टता की छाप छोड़ना चाहते और आशा करते हैं कि इस आधार पर यश मिलेगा, वे मूर्खों के स्वर्ग में विचरण करते हैं। समाज में किसी को उतना ही मूल्य, उतना ही यश, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है, जितना वह स्वयं अपने व्यक्तित्व का लगाते और ठीक समझते हैं। आत्म-निर्धारित मूल्य से अधिक किसी को अपने व्यक्तित्व का मूल्य नहीं मिलता। नगण्यता के मार्ग से अपने लिये सम्मान अर्जन की विधि एक छल है, विडम्बना है और आवश्यकता से अधिक अपने मूल्य का दुराग्रह दम्भ है। यह दोनों बातें गलत हैं। ठीक यह है कि विनम्रता प्रदर्शन के लिए नगण्यता न व्यक्त कीजिये वरन् अपना उचित महत्व प्रकट किया जाये और हमारा जो वास्तविक महत्व है उससे अधिक दम्भ न किया जाये। इस नीति पर चलने वालों का समाज में सदैव ही उचित मूल्य और महत्व मिलता रहता है।

इस प्रकार के व्यक्तियों के अतिरिक्त एक प्रकार के व्यक्ति और भी होते हैं। जिन्हें दीन मनोवृत्ति वाला कह सकते हैं। ऐसे व्यक्ति यथार्थ रूप में अपने को दीन-हीन और नगण्य समझते हैं। उनकी दृष्टि में अपना कोई मूल्य महत्व नहीं होता। हर समय इसी क्षोभ में घुला करते हैं कि वे बड़े ही निर्बल, निराश, अयोग्य और सार हीन व्यक्ति हैं। न संसार में कोई उल्लेखनीय काम कर सकते हैं और न समाज में अपना स्थान बना सकते हैं। उनके जीवन का न कोई मूल्य है न महत्व। वे धरती पर एक बोझ के समान जिए चले जा रहे हैं।

इस दीन-हीन मनोवृत्ति के लोग निश्चय ही बड़े दयनीय होते हैं। ऐसे जीवन को यदि आत्म-हत्या मान लिया जाय तब भी अनुचित नहीं। किसी शस्त्र से अपना घात कर लेने अथवा अपने विचारों, भावों और कल्पनाओं से अपनी आत्मा का तेज उसकी श्रेष्ठता नष्ट करते रहने में कोई अन्तर नहीं। वह शास्त्रीय हनन है, यह वैचारिक आत्म हनन। ऐसे आदमी मनोरोगी होते हैं। जो भी अपने अन्दर इस दीन-वृत्ति का आभास पाएं उन्हें अपना उपचार करने में तत्पर हो जाना चाहिये। अन्यथा उनका सारा जीवन योंही रोते-झींकते, कुढ़ते-कलपते बीत जायेगा और उसका कोई लाभ उन्हें प्राप्त न होगा।

यह एक निश्चित नियम है कि जिस प्रकार का हम अपने को मानते रहते हैं, यदि वैसे नहीं हैं तो भी वैसे बन जायेंगे। संसार भी उसी के अनुसार हमें मानेगा। संसार में अनेक ऐसे धनवान्, बलवान्, विद्वान् और प्रतिभावान् व्यक्ति हैं जिन्हें समाज बड़े ही निम्न दृष्टि से देखता है। न कोई उन्हें महत्व देता है और न किंचित मूल्यांकन करता है। वे स्वयं भी अपने व्यवहारों, बातों और व्यक्तित्व में दीन-हीन और मलीन बने रहते हैं। न हृदय में कोई उल्लास होता है, न मुख पर कोई तेज, ओज और न आत्मा में अपनी विशेषताओं का विश्वास। बहुत कुछ होकर भी नगण्यतम जीवन का भार ढोते रहते हैं। इसका कारण और कुछ नहीं उनकी अपनी आत्म-हीनता और अवमूल्यन ही होता है। उनके दीन-मलीन और मिथ्या विचार ही प्रेत की तरह उनकी विशेषताओं का रक्त चूस लेते हैं। हीन व्यक्ति-मानव आकार में एक चलते डोलते कंकाल के सिवाय और कुछ नहीं होते। ऐसा धिक्कारपूर्ण जीवन बिताने में क्या सुख और क्या सन्तोष हो सकता है—नहीं कहा जा सकता है।

यदि आपका स्वभाव दैन्यपूर्ण है तो उसे बदलिये अन्यथा आपकी सारी शक्तियां, सारी विशेषतायें और सारी महानतायें नष्ट हो जायेंगी और तब समाज आपका मूल्य दो कौड़ी का भी लगाने को तैयार न होगा। आप एकान्त में शान्त और निष्पक्ष-चित्त होकर बैठिए और विचार करिये कि आप क्या हैं और अपने को क्या मानते हैं? ऐसा करते समय यदि आपकी विचारधारा दीनता की ओर जाती है और आप यही सोचने लगते हैं कि आप तो बड़े गरीब, कमजोर और अयोग्य हैं तो तुरन्त ही अपनी विचारधारा पर प्रतिबन्ध लगा दीजिये और सोचिये कि आप वस्तुतः वैसे हैं भी या अपने प्रति वैसा होने का भ्रम ही है।

निश्चय ही यह आपका भ्रम ही है। क्योंकि संसार में कोई भी मनुष्य मूल रूप से न तो निर्बल होता है और न निर्धन। उसका अपना दृष्टिकोण ही उसे वैसा बना देता है। मनुष्य परमात्मा का अमर पुत्र है। वह अपने पिता के दिव्य गुणों से विभूषित है। उसके अन्दर अपरिमित आध्यात्मिक सम्पदायें भरी हुई हैं। उनका दीन-हीन और निर्बल होना सम्भव नहीं। उसका आत्म-विस्मरण ही उसे वैसा बनाये रहता है। अपने सत्य-स्वरूप को पहचानिये उसका चिन्तन करिये आपका सारा दैन्य दूर हो जाएगा और आप अपने को संसार में सर्वशक्तिमान् परमात्मा का उत्तराधिकारी अनुभव करेंगे। आप संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं। आपकी शक्तियों और सम्पदाओं का पारावार नहीं। आप अखण्ड और अनन्त भौतिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक शक्तियों से सम्पन्न कर संसार में अवतरित किए गये हैं। जैव-विज्ञान का नियम है कि किसी जीवन के पिता में जो गुण होते हैं, वही उसकी सन्तान में आते हैं। स्वस्थ पिता की सन्तान स्वस्थ, गुणी पिता की सन्तान गुणी और अयोग्य पिता की सन्तान का अयोग्य होना स्वाभाविक है। तब आप परमात्मा की सन्तान होकर दीन-हीन और मलीन किस प्रकार हो सकते हैं? यह भ्रम आपको तभी तक रहता है, जब तक आप अपनी पैतृकता को भूले हुए हैं। अपनी पैतृकता याद कीजिये और आप में सारे ईश्वरीय गुण स्फुरित हो उठेंगे। यहां पर इतना और स्पष्ट हो जाय कि केवल पैतृकता स्मरण करने से ही काम नहीं चलेगा। उसमें विश्वास करना होगा उसे अपने अन्दर अनुभव भी करना होगा। विश्वास रहित स्थिति नकारात्मक ही होती है। जब तक जो पुत्र अपने पिता की परम्परा में विश्वास नहीं करेगा, वह उसका उत्तराधिकारी किस प्रकार बन सकता है और बिना उत्तराधिकार के उसकी सम्पदाओं का स्वामी भी कैसे बनेगा। आत्मस्फुरण के लिए अपने में और अपनी पैतृक परम्परा में प्रतीति करना नितान्त आवश्यक है। ऐसा करने पर ही आप अपने मन्तव्य में कृत-कृत्य हो सकेंगे अन्यथा नहीं।

दैन्य का रोग दूर करने के लिए अपनी चिन्तन धारा बदलनी पड़ेगी। मनुष्य की आत्मा में अद्भुत शक्तियां छिपी पड़ी हैं। उनका चिन्तन करने से वे जाग पड़ती हैं और मनुष्य के चरित्र में समाविष्ट होकर अपना चमत्कार दिखलाने लगती हैं। आत्म-निन्दा के स्थान पर यदि आत्म-प्रशंसापूर्वक अपना चिन्तन किया जाय तो पता चलेगा कि हम एक उदात्त चरित्र और महान् शक्तियों वाले व्यक्ति हैं। हम भी उन दैवी गुणों और विभूतियों के भण्डार हैं, जिनका कोई दूसरा है या हो सकता है। इस प्रकार के अनुकूल चिन्तन अभ्यास से निश्चय ही आपका चरित्र चमक उठेगा, आपकी शक्तियां विकसित हो उठेंगी और आप संसार में बहुत से उल्लेखनीय कार्य कर सकेंगे।

आत्म-चिन्तन एक अद्भुत कला है। इससे जहां आपको अपने गुणों का आभास होगा वहां उन न्यूनताओं का भी पता चलेगा, जो आपको दैन्य की ओर ले जाती हैं। आत्म-चिन्तन करने पर आप जिस किसी समय ऐसी कमी अपने में पायें, जो आपको दीनता अथवा हीनता की ओर ले जाती हो उसे तुरन्त दूर करने का प्रयत्न करिये। यदि आपका धनाभाव आपको दीन बनाता है तो या तो संतोष और सादगी में सुख लीजिए अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में उद्योग कीजिए, जिसमें धन प्राप्ति के लिए अवसर हो। यदि अज्ञान के कारण आपमें हीन-भावना घर किये है तो अध्ययन, मनन और सत्संग का क्रम चलाइये। ऐसा पुरुषार्थ करिये जिससे आपको ज्ञान की उपलब्धि हो। यदि आप अपने को निर्बल अनुभव करते हैं तो अपने में साहस, स्वास्थ्य और विश्वास की अभिवृद्धि करिए। साहसपूर्ण साहित्य पढ़िए और साहसी और वीर पुरुषों का संग करिए। तात्पर्य यह है कि जो अभाव अथवा त्रुटि आपको दीनता की ओर ढकेलती हो उसे उपायपूर्वक दूर करने लग जाइये।

संसार में कोई जन्मजात महान् अथवा शक्तिवान् पैदा नहीं होता। सभी एक जैसी क्षमताओं और विशेषताओं को लेकर पैदा होते हैं। अन्तर केवल यह होता है कि जो अपनी आत्मा में निहित शक्तिओं में विश्वास करके आत्म-चिन्तन द्वारा उन्हें जगाते और उपयोग में लाते हैं वे आगे बढ़ जाते हैं और जो अपने प्रति हीन भावना के शिकार बने रहते हैं, यथास्थान जीवन का बोझ ढोते रहते हैं। संसार में जितने भी वैज्ञानिक, तत्ववेत्ता, विचारक, विद्वान्, विजयी, दर्शन-शास्त्री, कलाकार और राजनेता अथवा जननेता हुए हैं, उन्होंने अपनी शक्तियों में विश्वास किया, अपने अस्तित्व को पहचाना, उसे विकसित किया और उसके आधार पर संसार में बड़े-बड़े काम कर दिखलाएं। उन्होंने स्वयं अपना उचित मूल्यांकन किया और संसार से वही मूल्य प्राप्त कर लिया।

निश्चय ही आप भी महान् हैं। आपमें भी एक महापुरुष छिपा हुआ है। अपनी हीन भावना त्यागिये, अपनी पैतृक-परम्परा में विश्वास कीजिये। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी महानताओं, विशेषताओं और क्षमताओं का द्वार खोलिये और देखिये कि आपके अन्दर सोया महापुरुष जाग पड़ा है। अपने को दीन-हीन और मलीन माने रहना अपनी हत्या करनी है।

इस पातक से बचिए और परमात्मा की दी हुई शक्तियों का आदर करिये, उन्हें उन्नत और प्रखर बनाइए, आप शीघ्र ही एक उन्नत चरित्र के असाधारण व्यक्ति बनकर समाज में अपना मूल्य और स्थान पा लेंगे। याद रखिए जो मनुष्य अपने को जैसा मानता है, वह वैसा ही बन जाता है और तब समाज उसका उसी मान-दण्ड द्वारा मूल्यांकन करता है। आप भी दूसरों की तरह संसार के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, उपाय कीजिए और समाज से अपना पूरा मूल्यांकन कराने में सफल हो जाइये।
First 27 29 Last


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Shantikunj, Haridwar

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