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Books - समयदान ही युग धर्म

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समयदान-महादान

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दान करने से पुण्य प्राप्त होता है, इस कथन के पीछे यह मान्यता रही है कि उसे श्रद्धा भरी भाव- संवेदना से, सत्प्रयोजनों के लिए ही देने की मर्यादा का ध्यान तो रखा ही गया होगा। यदि ऐसा नहीं है एवं उसके साथ दुरभिसंधियाँ जुड़ी रहें, तो प्रतिक्रिया एवं परिस्थिति के अनुरूप वह पाप के समकक्ष है और देने तथा लेने वाले दोनों को ही बदनाम करने के साथ- साथ उनके लिए अनर्थ भी उत्पन्न कर सकता है। इसलिए दान भावना को चरितार्थ करने के साथ- साथ उत्कृष्टता और विवेकशीलता की शर्त भी पूरी कर ली गई होगी, यही अपेक्षा रखी जाती है। ऐसा होने पर ही यह आशा की जाती है कि दान के साथ जुड़ा हुआ पुण्यपरमार्थ, सभी के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर होगा।

            दान के साथ इन दिनों अनेकानेक संदेहों का समावेश हो गया है, जिनका संकेत इस पुस्तिका के आरंभिक पृष्ठों पर ही किया जा चुका है। इतने पर भी, धन का इतना संचय किन्हीं विरलों के पास ही होता है, कि किसी महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा कर सकने में जितनी मात्रा दी जा सके। भामाशाह जैसे धनवान् में राणा प्रताप जैसों को विपुल राशि दे सकने की सामर्थ्य थी। दानी हरिश्चंद्र कर्ण बनने के लिए पूर्व संचित संपदा के साथ- साथ ऊँचे स्तर की विवेकशीलता एवं उदारता भी तो होनी चाहिए। ऐसे संयोग कदाचित् ही किन्हीं विरलों को हस्तगत होते हैं। अन्यथा ‘‘मूर्खों का माल मसखरे खाते है।’’ की उक्ति चरितार्थ होती और अपयश के साथ ही दुष्परिणाम भी उपार्जित करती है।

       धन भौतिक पुरुषार्थ और सुयोगों के संयोग का प्रतिफल है। इस स्थिति को प्राप्त कर सकना इन दिनों सभी के लिए संभव नहीं है। ऐसी दशा में पुण्य- परमार्थ के लिए धन दान को गौण मानकर, दृष्टि उस संपदा पर जमानी होगी, जो हर किसी को सृष्टा ने उदारतापूर्वक प्रदान की है वह है- समय समय की कड़ियों से जुड़कर ही जीवन शृंखला विनिर्मित होती है। उसका उदार उपयोग तभी बन पड़ता है जब प्रयोजन में गहरी रुचि हो। अरुचिकर काम चाहे कितने ही अच्छे समझे जाते हों, उनके लिए मन में इच्छा ही नहीं होती। जिस कार्य में मन नहीं लगता वह या तो प्रारंभ ही नहीं होता; या फिर आधा- अधूरा कुबड़ा भर रहकर बीच में ही छूट जाता है।

     दान- परिवार में, धन के उपरांत दूसरे पदार्थ ‘‘समय’’ की ही गणना होती है। वह सर्व साधारण के लिए सुलभ भी है और उसके सदुपयोग की जाँच- पड़ताल मोटी बुद्धि से भी करते बन पड़ती है। विचारशीलों से परामर्श करने पर, उसके लिए सहज मार्गदर्शन भी मिल जाता है। स्वार्थी बहुत देर तक उसका अनुचित शोषण भी नहीं कर पाते।

श्रम जनित स्वेदकणों की तुलना मणि-मुक्तकों से की गई है। महामानवों के श्रेष्ठ सत्कार्य इसी आधार पर बन पड़े हैं। समयदान के साथ-साथ श्रद्धा का गहरा पुट लगा रहना आवश्यक है, अन्यथा व्यस्तता जैसे अनेकों बहाने सहज अभ्यास के अनुरूप बन जाया करते हैं।

    महान् मनीषियों की साधना ‘‘समय’’ की तपशिला पर बैठकर ही संभव हुई है। उन्होंने जो सोचा जो सृजा है, उसके पीछे उनकी तन्मयता भरी समय साधना ही रही है। वैज्ञानिकों-आविष्कारों ने अपना मानस और समय, प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केंद्रित न किया होता, तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोक सेवियों ने अपने समयदान के सहारे एक से एक बड़े कार्य सम्पन्न कर दिखाए हैं। धन न सही, पर समय को साथ लेकर तो फरहाद जैसे साधनहीन भी अपनी साधना के बल पर बत्तीस मील लंबी नहरें खोदकर ला सकने में सफल हो सकते हैं।

    भारत की पुरातन गरिमा पर दृष्टिपात करते हैं तो उसके मूल में एक ही तथ्य उजागर होता है- साधु-ब्राह्मणों का, वानप्रस्थ पुरोहितों का वर्ग न्यूनतम निर्वाह में अपने काम चलाता रहा और शेष सारा समय परिपूर्ण लगनशीलता के सहारे, लोक-मंगल की सामयिक आवश्यकताओं को पूरा करने में जुटाता रहा। उनकी सेवा-साधना ने जन-जन का मन जीता, इसीलिए उन्होंने उनके परामर्शों-प्रतिपादनों को जीवनक्रम में उतारने में कुछ उठा न रखा। व्यक्तित्वों में सन्निहित प्रतिभा इसी आधार पर, प्रसुप्ति से विरत होकर जागृतकर्म निष्ठा में परिणति हुई और सर्वतोमुखी प्रगति का वातावरण बन गया। यही है, सतयुग में समुन्नत वातावरण बने रहने का प्रमुख कारण।

    अनाचारों की रोकथाम के लिए शासन का राजदंड भी काम करता है, पर सद्भाव संवर्धन के लिए धर्मतंत्र की भाव संवेदनाएँ ही समर्थ हो सकती हैं। सुख-शांति उसके ही अवलंबन से बन पड़ती है। उत्कर्ष, अभ्युदय और विकास का आधार भी इसी के सहारे खड़ा होता है। इतिहास साक्षी है कि भारतीय परिव्राजकों ने, विश्व के कोने-कोने में पहुँचने की कष्ट साध्य यात्राएँ संपन्न की और वहाँ के पिछड़ेपन को हटाने एवं उत्कर्ष का बहुमुखी सरंजाम जुटाकर, परिस्थितियों में जादुई परिवर्तन कर दिखाया। देशव्यापी आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को अक्षुण्य बनाए रखने में, इसी साधु-ब्राह्मण वर्ग का ही अथक प्रयास कार्यरत रहा है। उपयोगिता और गरिमा का मूल्यांकन करने वालों ने उन्हें भूसुर-देव मानवों की पंक्ति में प्रतिपादित किया है।

    भारतीय धर्मतंत्र का एक अनिवार्य पक्ष रहा है-वानप्रस्थ सांसारिक प्रयोजनों में जीवन की आधी अवधि लगाने के उपरांत, शेष आधी को लोकमंगल के लिए लगाया जाना आवश्यक माना जाता था। गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ हलकी-फुलकी रखी जाती थीं। कोई बुद्धिमान ऐसे परिवारों का सृजन नहीं करता था, जिनका भार वहन करते-करते ही जिंदगी का कचूमर निकल जाए। जो गृहस्थ में प्रवेश करते थे, वे भी न्यूनतम संख्या में संतानोत्पादन आरंभिक दिनों में ही पूरा कर लेते थे; ताकि अधेड़ होते-होते घर-परिवार के बंधन से छूट सकें। स्वावलंबन और सुसंस्कारिता के लिए समुचित मार्ग दर्शन ही अभिभावकों का कर्तव्य रहता था। उत्तराधिकार में धन छोड़कर मरने की बात तो कोई सोचता तक न था। कमाऊ व्यक्ति मिल-जुलकर असमर्थ, अविकसितों का भरण-पोषण कर लेते थे। हर घर पीछे एक व्यक्ति, पूरे समय के लिए लोक मंगल के लिए समर्पित होता था।

इसी में किसी गृहस्थ की शान समझी जाती थी। राजपूतों में से हर घर के पीछे एक व्यक्ति सेना में भर्ती होता था। सिखों में से एक को गुरु कार्यों के लिए समर्पित होकर रहना पड़ता था। उसके हिस्से में आने वाली जिम्मेदारियों को घर के अन्य लोग मिल-जुलकर पूरी कर लिया करते थे। यही थी वह महान परंपरा, जिसके कारण भारत भूमि ‘‘स्वर्गादपि गरीयसी’’ रही और यहाँ के नागरिक, देवमानव के रूप में समस्त संसार में प्रसिद्ध हुए। इन देव मानवों की साधना ने ही इसको ज्ञान क्षेत्र में जगद्गुरु, विज्ञान क्षेत्र में चक्रवर्ती, शासन और व्यवस्था क्षेत्र में स्वर्ण संपदाओं का स्वामी बनाया था। इतिहास आज भी तुमुल नाद के साथ उद्घोष करता है कि उन पुरातन परंपराओं को यदि किसी प्रकार फिर जीवंत किया जा सके, तो सतयुग लौट आने की संभावना फिर सुनिश्चित हो सकती है। दुर्बुद्धि के दावानल में जलती हुई दुनिया को, फिर से नए वातावरण में साँस लेने की सुखद संभावनाएँ हस्तगत हो सकती हैं।

इन दिनों असल की नकल बनाने में मनुष्य की चतुरता ने कमाल हासिल कर लेने जैसी प्रवीणता प्राप्त कर ली है। खिलौने वाले की दुकान पर खड़े होकर जानकारी के सभी नमूने थोड़े-से पैसे खर्च करके खरीदे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, जिस देवता की भी चाहें मिट्टी की मूर्तियाँ बिना किसी कठिनाई के खरीदी जा सकती हैं। इतने पर भी असली और नकली का अंतर लोग समझ ही लेते हैं। खिलौना-गाय दूध कहाँ देती है? खिलौना-हाथी की पीठ पर बैठकर लंबा सफर कहाँ किया जा सकता है? खिलौना-मुर्गी अंडे कहाँ देती है?

    यही बात सुखी और समुन्नत संसार में सतयुगी वातावरण बनाये रखने वाले देव-मानवों के संबंध में भी है। इन दिनों धर्मोंपदेशक संख्या में साठ लाख के लगभग है। धर्म प्रचारक की आड़ में जिस-तिस बहाने अनुदान और सम्मान बटोरने वालों की इतनी बड़ी संख्या है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इतने धर्म सेवकों के रहते विश्व का न सही तो देश का अभ्युदय तो चरम स्तर का रहा ही होता, पर दीख इससे ठीक उल्टा पड़ता है। जिन्हें देश का, विश्व का भार उठाना चाहिए था, वह उलटे भारभूत बन कर रह रहे हैं।

    यहाँ दानधर्म की विवेचना करते हुए, सर्वसुलभ समयदान की चर्चा की जा रही है और इस विचारणा में सम्मिलित होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को आमंत्रित किया जा रहा है। देखना है कि लोक-मंगल के लिए समयदान की प्राचीन परंपरा को किसी प्रकार पुनर्जीवित कर सकना क्या संभव हो सकता है? उज्ज्वल भविष्य की संरचना में प्रमुख भूमिका निभा सकने में समर्थ इस महान प्रचलन को अपनाने के लिए, विचारशील पीढ़ी में क्या नया उल्लास-आवेश उपजाया जा सकता है?

    वस्तुत: सच्चे अर्थों में समयदान करते तभी बन पड़ता है, जब अंतराल की गहराई से आदर्शों पर चलने के लिए बेचैन करने वाली टीस उठती हो। ऐसे लोग अपने प्राणप्रिय लक्ष्य की दिशा में बढ़ चलने के लिए आकुल-व्याकुल होकर तीर की तरह सनसनाते हुए चलते हैं। प्रलोभन और अवरोध उनके मार्ग में न आते हों सो बात नहीं है, पर उस ओर उपेक्षा बरते जाने पर उसका दबाव अनुभव नहीं होता। लगता है कि यह मच्छर काटने जैसा दिनचर्या का अंग है, जो ध्यान भर बँटाता है, पर ऐसा कुछ नहीं कर पाता जिससे मार्ग बदलने जैसी कुछ सोच आड़े आए। ऐसी दशा में उन अवरोधों और आकर्षणों का उनकी दृष्टि में कुछ महत्त्व ही नहीं रह जाता है, जो संकल्पहीन व्यक्तियों को बहकाने, बरगलाने, फुसलाने और रास्ता भुला दने के लिए पर्याप्त होते हैं।

    पूर्व संचित कुसंस्कार, प्रचलन का प्रभाव, लालच का दबाव तथा कथित हितैषियों का प्रभाव मिलकर एक ही सूझ सुझाते हैं कि जिस तरह भी संभव हो, अधिकाधिक सुविधा-साधन जुटाना और उनका मनमौजी उपयोग करना ही, प्रसन्नता का मार्ग है। स्वार्थ ही सर्वोपरि है। अपनी सुविधा के बारे में ही सोचना चाहिए। इसके लिए दूसरों को असुविधा हो तो परवाह नहीं करनी चाहिए। औसत आदमी का मन इस दुहरी चाल को चलने में ही अपनी चतुरता अनुभव करता है और जब तब न्यूनाधिक सफलता भी उस दुरंगी चाल से प्राप्त कर लेता है।

    पर यह सब एक प्रकार का प्रहसन-अभिनय भर है, जो मंच पर क्रीड़ा कौतुक दिखाकर पानी के बुलबुले की तरह समाप्त हो जाता है। छल छिपता नहीं। वस्तुस्थिति कल नहीं तो परसों प्रकट होकर रहती है। ऐसी दशा में यह बहुरूपियापन, विचारशीलों की दृष्टि में उपहासास्पद बनकर ही रह जाता है। बच्चे ही उस छलावे को न समझ पाने के कारण कुछ देर तक तालियाँ बजा सकते हैं। इस अर्थ प्रधान युग में किसी को भी खरीदकर, उससे कुछ भी कहलाया, कराया या लिखवाया जा सकता है। पर इस समूचे गठजोड़ में इतना दम नहीं होता कि प्रस्तुत प्रपंच को लंबे समय तक जीवित रख सके। उस खिलवाड़ से बालू के महल सजाए भले ही जाएँ , पर वे कुछ ही क्षणों में गिरकर धराशायी हो जाते हैं। ऐसी विडंबनाएँ आए दिन रची जाती और उजड़ती देखी जा सकती हैं। इसे कौतुक - कौतूहल के अतिरिक्त और क्या कुछ कहा जाए? ऐसों का व्यक्तित्व उपाहासास्पद बन जाता है और पता चलने पर निकटवर्तियों से लेकर सहयोगियों तक सभी पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं। सूक्तिकार ने ठीक ही कहा है कि ‘‘पाखंडी से बढ़कर अभागा और कोई नहीं, जिसका बुरे दिन में भी साथ दे सकने वाला कोई साथी सहयोगी नहीं बचता।’’

    यहाँ बड़े, महत्त्वपूर्ण, नि:स्वार्थी, उपयोगी और प्रेरणाप्रद कार्यों की बातें चल रही हैं। वे मात्र उन्हीं से बन पड़ती हैं जिनकी आदर्शवादिता से जुड़ी हुई लगन, टीस बनकर हर घड़ी कसकती रहती है और समय ही नहीं कौशल और साधनों को भी अभीष्ट के प्रति समर्पित करने में गर्व-गौरव अनुभव कराती है। संसार भर के इतिहास का एक ही निष्कर्ष है कि आदर्शवादी घटनाक्रम, अभियान, आंदोलन चलाने और व्यापक बनाने में, मात्र वे ही लोग सफल हुए हैं, जिन्होंने उत्कृष्टता को अपनी जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाया और आदर्शों को प्रतिष्ठापित करने में अपना सर्वस्व दाँव पर लगाया।

समयदानी इन्हीं को कहते हैं। उनका प्रयास न तो बीच में रुकता है, न पथभ्रष्ट होता है, न गड़बड़ाता है। श्रेयाधिकारी ऐसे ही लोग बनते हैं। महादानी इन्हीं को कहना चाहिए। छुटपुट दान की चिह्न पूजा करते रहने वाले तो हर गली-कूचे में कुछ न कुछ आडंबर पहने, जहाँ-तहाँ घूमते देखे जा सकते हैं।

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