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Books - युगशक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण

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गायत्री की द्वितीय प्रेरणा-सद्विवेक, सत्साहस और स्वावलम्बन

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त्रिपदा गायत्री का दूसरा पाद है—‘भर्गो देवस्य धीमहि’ आठ अक्षरों के इस द्वितीय चरण में भी पहले पाद की तरह तीन शब्द हैं—‘भर्गः देवस्य धीमहि’ भर्ग कहते हैं तेजस्वी को, देव, दिव्य, उत्कृष्ट, आदर्श, धीमहि-अन्तरंग में धारण किया जाना—हृदयंगम होना—चेतना में घुल जाना। भावार्थ हुआ—दैवी तेजस्विता का अन्तःकरण में घुल जाना।

दैवी तेजस्विता क्या है? इसे सद्विवेक, सत्साहस और आत्म-गौरव के उत्कृष्ट चिन्तन के साथ समाविष्ट समझा जा सकता है। यह तीनों ही सत्प्रवृत्तियां सूक्ष्म शरीर में पाई जाती हैं। सूक्ष्म शरीर अर्थात् मनःसंस्थान—विचार क्षेत्र—चिन्तन की परिधि प्रक्रिया। इसे ज्ञान कक्षा भी कह सकते हैं। यह तीनों ही सत्प्रवृत्तियां इसी उद्यान में उगती हैं। ये जहां भी उगती हैं वह सारा क्षेत्र चन्दन के बगीचे की तरह महकने लगता है।

लोक व्यवहार इन दिनों सत्-असत् के परस्पर विरोधी तत्वों में इस कदर घुल गया है कि दूसरों के कथन, अनुकरण एवं प्रथा प्रचलन को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। विवेक पूर्वक इसका प्रथक करण कराना होगा। उचित-अनुचित को अलग करे मात्र उपयोगी को ही ग्रहण करने की दूरदर्शिता अपनानी होगी। इसके बिना जो कुछ चल रहा है उसी ढर्रे पर घूमने लगने से तो सब कुछ गुड़ ही होता रहेगा। गुड़ खाने के काम आता है और गोबर लीपने को। दोनों को मिला देने से वह मिश्रण किसी काम का नहीं रहता। पूर्णतया निरर्थक बन जाता है उसे न खाने के काम में लिया जा सकता है और न लीपने के। ठीक इसी प्रकार प्रचलित लोक-व्यवहार में सदाचार और भ्रष्टाचार का ऐसा सम्मिश्रण हो गया है कि उसमें से कुछ भी बेखटके ग्रहण करने योग्य नहीं बच गया है। इन खरे-खोटे सिक्कों के ढेर में ढालने के लिए परख कसौटी का उपयोग किये बिना कोई गति नहीं। यह आवश्यकता रहती तो प्राचीन काल में भी थी, पर आज की विषय परिस्थितियों में तो विवेक के द्वारा परीक्षण पृथक्करण किये बिना और कोई चारा है ही नहीं।

गायत्री का वाहन है—राजहंस। राजहंस की विशेषता है नीर-क्षीर विवेक। दूध और पानी के सम्मिश्रण में से पानी को पृथक करके मात्र दूध को ही ग्रहण करना। इसी प्रकार उसका एक और सहज स्वभाव माना जाता है, मात्र मोती ही चुगना—कीड़े-मकोड़े जैसी तुच्छ वस्तुओं को प्राण संकट आने पर भी ग्रहण न करना। गायत्री माता का वाहन राजहंस वस्तुतः विवेक का ही अलंकारिक चित्रण है। पक्षी वर्ग की इस आकृति को देखकर यही आदर्श अपनाया जाना चाहिए कि विवेकशीलता अपनाई जायगी। अनुचित को त्यागा और उचित को ग्रहण किया जायगा। विवेक की कसौटी है—दूरदर्शिता। अदूरदर्शी तात्कालिक लाभ को ही प्रधानता देते हैं भले ही उससे उनका भविष्य अन्धकारमय ही क्यों न होता हो। दूरदर्शी आज की कठिनाई सहकर भी कल का उज्ज्वल निर्माण करते हैं। किसान, विद्यार्थी, शिल्पी, कलाकार, श्रमिक, व्यवसायी, योगी, सभी को आरम्भ में कठिनाई सहने और हानि उठाने का मनोबल जुटाना पड़ता है तभी उनका भविष्य उज्ज्वल बन पाता है। अदूरदर्शी पुस्तकें और बीज बेचकर भी सिनेमा देख सकते हैं और भविष्य को अन्धकारमय बनाने का जोखिम उठा सकते हैं।

आज व्यक्ति और समाज के सामने जो अगणित समस्याएं और विपत्तियां मुंह बांये खड़ी हैं उनके मूल में अदूरदर्शिता ही उपद्रवों का सृजन करती देखी जा सकती है। स्वार्थ पर परमार्थ को निछावर किया जा रहा है। आस्थाओं का संकट, चरित्र का पतन और उदारता का अभाव ही विश्व संकट के रूप में मानवी अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। साधनों का बाहुल्य रहने पर भी मनुष्य को जिन सर्वभक्षी विभीषिकाओं का सामना करना पड़ रहा है उसे दृष्टिकोण में निकृष्टता का समावेश ही कहा जायगा। स्थिति को बदलने के लिए जन-मानस का परिष्कार ही एक मात्र उपाय है। युग-निर्माण मिशन को लाल मशाल की ज्योति इसी उद्देश्य के लिए जलाई गई है। ज्ञान-यज्ञ का धर्मानुष्ठान इसी प्रयोजन के लिए है। विचार क्रान्ति अभियान के अन्तर्गत बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक परिवर्तनों के लिए प्रचण्ड प्रयास चल रहा है। इस सुविस्तृत क्रिया-कलाप को संक्षेप में विवेकशीलता की अभिनव प्राण प्रतिष्ठा ही कहा जा सकता है। प्रियजनों के परामर्श एवं प्रस्तुत प्रचलनों के प्रभाव को निरस्त करके मात्र औचित्य को ही अपनाना। यही सत्याग्रह है। इसी को विवेक की अभ्यर्थना कह सकते हैं। सत्य के सही स्वरूप को समझना एवं उसे परिस्थितियों के अनुरूप सही रीति से अपनाना विवेक के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है। अन्यथा सत्य की अदूरदर्शी पकड़ कई बार असत्य से भी अधिक हानिकारक हो सकती है। इसी से विवेक को सत्य का पिता माना गया है और उसका माहात्म्य भी इसी आधार पर अधिक माना गया है। गायत्री को ऋतम्भरा प्रज्ञा, ब्रह्म विद्या आदि नामों से भी पुकारा जाता है। उसका सरल तात्पर्य आदर्शवादी विवेकशीलता ही समझा जा सकता है।

सूक्ष्म शरीर की—मनःसंस्थान की दूसरी गौरवशाली विशेषता है—सत्साहस। सद्विवेक के आधार पर किये गये निर्णय इसी आधार पर क्रियान्वित होते हैं। पानी का स्वभाव नीचे की ओर ढुलना है। मन के संचित कुसंस्कार भी सहज स्वभाव निष्कृष्टता की ओर ललचाते और दुष्प्रवृत्तियों के खड्ड में गिरने के लिए उकसाते हैं। उत्कृष्टता की ऊंचाई पर चढ़ने के लिए अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता होती है। कुंए से पानी निकालने के लिए, बोझा ऊपर चढ़ाने के लिए, गेंद को ऊपर उछालने के लिए, ऐसा अतिरिक्त मनोबल चाहिए जो आदर्शवादिता अपनाने के लिए प्रचण्ड साहस का परिचय दे सके। श्रेष्ठता की गतिविधियां अपनाने का न तो अपने को अभ्यास अनुभव होता है और न स्वजनों का प्रोत्साहन। समाज में वैसा प्रचलन भी नहीं है। हर दिशा में संकीर्ण स्वार्थपरता की नीति अपनाने का ही परामर्श, मार्ग-दर्शन मिलता है। ऐसी दशा में श्रेष्ठता का मार्ग अपनाने के लिए एकाकी साहस ही जुटाना होता है और ‘अकेला चलोरे’ का संकल्प करना पड़ता है। इस दिशा में चलते हुए स्वजनों और परिचितों का व्यंग, उपहास, असहयोग ही नहीं विरोध भी सहना होता है। वे इस प्रकार की साहसिकता को—मूर्खता-अव्यवहारिकता और घाटा देने वाली भूल के रूप में देखते हैं और अपने सहज मोह एवं अभ्यस्त प्रचलन के आधार पर ऐसी हिम्मत को अनुचित मानते हैं। फलतः वे निरन्तर बाधा ही पहुंचाते रहते हैं। दुर्बल मनःस्थिति रहने पर यह अवरोध देर तक सहन नहीं होता और आदर्शवादी उत्साह धीरे-धीरे ठण्डा होते होते समाप्त ही हो जाता है।

व्यक्ति में देवत्व का उदय और समाज में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण आदर्शवादी सिद्धान्तों की चर्चा करते रहने से नहीं उसे जीवन दर्शन के रूप में अपनाने और व्यवहार में उतारने से ही सम्भव है। इसके लिए ऐसी साहसिकता उभरनी चाहिए जो उत्कृष्टता के मार्ग पर चलते हुए पग-पग पर आने वाले अवरोधों से जूझ सके। एकाकी पर्वतारोहण का संकल्प लेने वालों की तरह शौर्य और पराक्रम का परिचय दे सके। महामानवों को यही रीति-नीति अपनानी पड़ी है। व्यक्तित्व में आदर्शवादिता का बीजारोपण और अभिवर्धन सत्साहस के बिना सम्भव ही नहीं हो सकता। इस आवश्यकता को पूरा किये बिना उस नवयुग के अवतरण की आधा नहीं की जा सकती जिसमें देव समाज की—उज्ज्वल भविष्य की अपेक्षा की गई है।

इन दिनों व्यक्तिगत अभिरुचियां एवं सामाजिक गतिविधियां जिस दिशा में बह रही हैं उन्हें उलटे बिना सर्वभक्षी विभीषिकाओं से, सामूहिक आत्म-हत्या जैसे महाविनाश से—बच सकना सम्भव नहीं। प्रवाह को उलटने के लिए ऐसी सामर्थ्य चाहिए जैसी पानी की धारा को चीरते हुए उलटी चल सकने वाली मछली में होती है। व्यक्ति की आदतें सुधारनी होंगी—उसकी आस्थाएं बदलनी होंगी—प्रचलनों को उलटना पड़ेगा। यह कार्य टूटे बर्तनों को आग में गलाकर नये सांचे में ढालने जैसा कठिन है। इसके लिए प्रचण्ड प्राण ऊर्जा चाहिए। यह कहां से आये? निश्चय ही यह प्रयोजन सत्साहस अपनाने से ही पूरा हो सकता है। वैयक्तिक और सामूहिक क्षेत्रों में ऐसी साहसिकता उभारने अपनाने की आवश्यकता पड़ेगी जो अभ्यस्त अवांछनीयता के झाड़-झंखाड़ उखाड़ने और उसके स्थान पर कल्प-वृक्षों का उद्यान लगाने जैसा दुहरे पराक्रम का परिचय दे सके। नये समाज का निर्माण युग का परिवर्तन अवलम्बन को अपनाये बिना और किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता।

गायत्री मन्त्र के द्वितीय चरण में इसी सत्साहस का आलोक भरा पड़ा है। देवत्व का भर्ग धारण करने की प्रेरणा प्रकारान्तर से आदर्शवादी सत्साहस अपनाने का शौर्य प्रदान करती है। इस सत्प्रवृत्ति को अपनाने से ही वे सुधारात्मक और रचनात्मक कार्य बन पड़ेंगे जिन्हें नव-निर्माण के लिए खड़ा करने और विस्तृत बनाने की आवश्यकता है। देवत्व शब्द की ध्वनि है—मनुष्य के दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का कूट-कूटकर भर जाना। इसका आधार एक ही हो सकता है—आत्म-गौरव, आत्म-सम्मान। उत्कृष्टता को आत्म-गौरव का प्रश्न बना लेने पर ही किसी के लिए ऐसा साहस कर सकना सम्भव हो सकता है कि अनुचित मार्ग पर चलने से प्राप्त होने वाले लाभों को अस्वीकार कर सके। कठिनाइयों को झेलते हुए भी चरित्रनिष्ठा के मार्ग पर चलते ही रहने की हिम्मत दिखा सके।

गायत्री मन्त्र के दूसरे चरण में तीन प्रेरणाएं सन्निहित हैं। सद्विवेक—सत्साहस के अतिरिक्त तीसरी प्रेरणा है स्वावलम्बन। इसे आत्म-गौरव की रक्षा भी कह सकते हैं। मनुष्य ईश्वर का राजकुमार है, उसे अपने पिता के राज्य की सुव्यवस्था का उत्तरदायित्व सम्भालना है और इसके लिए नितान्त आवश्यक उत्कृष्टता को अपनाये रहना है। जागरूक प्रहरी, उद्यान के माली, सुरक्षा सेनापति, सृजन संलग्न शिल्पी, प्राण संकट से उबारने वाले चिकित्सक, राज्याधिकारी, न्यायाधीश जैसे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन विशिष्ट व्यक्तियों को जिस पर अपने उत्तरदायित्व का-पद के गौरव का-ध्यान रखना पड़ता है वैसी ही हर मनुष्य को अपनी जन्म-जात गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने का प्रयास प्राण-प्रण से करना चाहिए। ईश्वर ने मानव जीवन जैसी महान धरोहर इसीलिए दी है कि उसका सदुपयोग कर व्यक्तिगत अपूर्णता को पूर्णता में बदला जा सके। विश्व उद्यान को सुविकसित बनाने के महान प्रयोजन में सृष्टा का हाथ बंटाया जा सके। सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो अतिरिक्त सुविधाएं मिली हैं उनका यही प्रयोजन है। बुद्धि और वैभव इसलिए नहीं मिला है कि उससे लोभ और मोह जैसे तुच्छ प्रयोजनों की ललक बढ़ाने और उसी कुचक्र में उलझे रहने की विडम्बना से उसे समाप्त कर दिया जाय।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। वह स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है। आत्म-नियन्त्रण की परिपूर्ण क्षमता उसमें विद्यमान है। इसका सदुपयोग करके वह अपने व्यक्तित्व को इतना शक्तिशाली बना सकता है कि कठिनाइयों का निराकरण और सुविधाओं के सम्वर्धन में कोई बाधा शेष न रहे। आत्म-बोध की महिमा अध्यात्म शास्त्रों में विस्तारपूर्वक गाई गई है इसे स्वावलम्बन एवं आत्म-निर्माण ही कह सकते हैं। गायत्री के द्वितीय चरण में इसी दिशा में बढ़ने की प्रेरणा है।
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