‘हमारी मातृभूमि क्या है? वह एक भूमि का टुकड़ा ही तो नहीं है,
न वाणी का एक अलंकार है और न मस्तिष्क की कल्पना की एक
उड़ान मात्र है।’ ‘वह एक महान् शक्ति है, जिसका निर्माण उन
करोड़ों एककों की शक्तियों को मिलाकर हुआ है, जो राष्ट्र का
निर्माण करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे सारे करोड़ों-देवताओं की
शक्ति को एकत्र कर एक बल राशि संचित की गयी और उस
परस्पर जोड़ पर एकता स्थापित की गयी। जिसमें से भवानी
महिषासुर मर्दिनी प्रकट हुई। वह शक्ति जिसे हम भारतीय
भवानी भारतमाता कहकर पुकारते हैं। करोड़ों लोगों की
शक्तियों की जीती जागती एकता है।’
महृषी अरविन्द घोष
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