Positive Thoughts Sadvakya - Hindi
वेदमूर्ति
पं . श्रीराम शर्मा
आचार्य जी द्वारा रचित युग
निर्माण योजना के अधिकृत सद् वाक्य
१ . दूसरो
के साथ वह व्यवहार न करो ,
जो तुम्हें अपने
लिए पसंद नही
२ . जिन्हें
लम्बी जिंदगी जीनी हो , वे
बिना कड़ी भुख लगे कुछ भी न
खाने की आदत डालें ।
३ . जिसनें
जीवन में स्नेह , सौजन्य
का समुचित समावेश कर लिया
सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार
है ।
४ .
विपरीत परिस्थितियो
में भी जो ईमान , साहस
और धैर्य को कायम रख सके , वस्तुतः
वही सच्चा शूरवीर है
५ .
कायर मृत्यु से पूर्व
अनेको बार मर चुकता है , जबकि
बहादुर को मरने के दिन ही मरना
पड़ता है
६ .
ईष्या आदमी को उसी
तरह खा जाती है , जैसे
कपड़ो को कीड़।
७ .
ईमानदार होने का
अर्थ है हजार मनकों में से अलग
चमकने वाला हीरा ।
८ .
अपनी रोटी - मिल - बाँटकर
खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई
सुखी रह सके।
९ .
जीवन का अर्थ है
' समय ' जो
जीवन से प्यार करते हों , वे
आलस्य में समय न गवायें ।
१०गृहस्थ
एक तपोवन है , जिसमें
संयम , सेवा और
सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती
है ।
११ . पाप
अपने साथ रोग , शोक
पतन ओर संकट भी लेकर आता है
१२ . सार्थक
और प्रभावी उपदेश वह है , जो
वाणी से नहीं , अपने
आचरण से प्रस्तुत किया जाता
है ।
१३अपना
मूल्य समझो और विश्वास करो
कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण
व्यक्ति हो ।
१४ . मनुष्य
का जन्म तो सहज होता है , पर
मनुष्यता उसे कठिन प्रयत्न
से प्राप्त करनी पड़ती है ।
१५ . अनजान
होना उतनी लज्ज्ाकी बात नहीं ,
जितनी सीखने के लिए
तैयार न होना ।
१६असफलता
केवल यह सिद्व करती है कि सफला
का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ
।
१७ .
देवता आशीर्वाद
देने में तब गुँगे रहते हैं ,
जब हमारा ह्दय उनकी
वाणी सुनने में बहरा रहता है
।
१८ . सभ्यता
का स्वरूप है - सादगी ,
अपने लिए कठोरता और
दूसरों के लिए उदारता ।
१९ . योग्यता
और परिस्थिति को ध्यान में
रखकर महात्वाकांक्षाएँ न
गढने वाला दुखी रहता और उपहास
सहता है ।
२० . पढ़ने
योग्य लिखा जाय , इससे
लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें
योग्य किया जाय ।
२१ . दूसरो
के साथ वैसी ही उदारता बरतो
जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ
बरती है ।
२२ . बुद्विमान
वे हैं जो बोलने से पहले सोचते
हैं , मूर्ख वे हैं
जो बोलते पहले और सोचते बाद
में हैं ।
२३ . परमेश्वर
का प्यार केवल सदाचारी और
कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित
है ।
२४जो
बच्चों को सिखाते हैं उन पर
बड़े खुद अमल करे , तो
यह संसार स्वर्ग बन जाए ।
२५ . सबसे
बड़ा दीन दुर्बल वह है , जिसका
अपने ऊपर नियंत्रण नहीं ।
२६अच्छी
पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमाएँ
हैं । उनकी आराधना से तत्काल
प्रकाश और उल्लास मिलता है ।
२७ . मनुष्य
परिस्थितियों का दास नहीं , वह
उनका निर्माता , नियंत्रणकर्ता
और स्वामी है ।
२८ . आलस्य
से बढ़कर अधिक घातक और अधिक
समीपवर्ती शत्रु नहीं ।
२९ . आय
से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार
सहते और कष्ट भोगते हैं ।
३० . किसी
का सुधार उपहास से नहीं ,
उसे नये सिरे से
सोचने और अदलने का अवसर देने
से होता है ।
३१ . जो
जैसा सोचता और करता है , वह
वैसा ही बन जाता है ।
३२ .
सज्जन् आमीरी मे
गरीब जैसे नम्रऔर गरीबी में
अमीर जैसे उदार होते हैं ।
३३ . कुकर्मी
से बढ़कर अभागा कोई नहीं ,
क्योकि विपत्ति में
उसका कोई साथी नहीं रहता ।
३४ . बडप्पन
अमीरी में नहीं , ईमानदारी
और सज्जनता में सन्निहित
है ।
३५ . उन्हे
मत सराहो , जिनने
अनीतिपूर्वक सफलता पाई और
सम्पति कमाई ।
३६ . प्यार
और सहकार से भरा पूरा परिवार
ही धरती का स्वर्ग होता है ।
३७ . प्रसन्न
रहनें के दो ही उपाय है - आवश्यकताएँ
कम करें और परिस्थितियों से
तालमेल बिठायें ।
३८ . काम
की अधिकता से नहीं , आदमी
उसे भार समझकर अनियमित रूप
से करने पर थकता है ।
३९ . जो
अपनी सहायता आप करने को तत्पर
है , ईश्वर केवल
उन्हीं की सहायता करता है ।
४० . अपनें
को मनुष्य बनाने का प्रयत्न
करो , यदि इसमें
सफल हो गए , तो हर
काम में सफलता मिलेगी ।