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Positive Thoughts Sadvakya - Hindi


वेदमूर्ति पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा रचित युग निर्माण योजना के अधिकृत सद् वाक्य

. दूसरो के साथ वह व्यवहार न करो , जो तुम्हें अपने लिए पसंद नही

. जिन्हें लम्बी जिंदगी जीनी हो , वे बिना कड़ी भुख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें । 

. जिसनें जीवन में स्नेह , सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया सचमुच वह सबसे बड़ा कलाकार है । 

. विपरीत परिस्थितियो में भी जो ईमान , साहस और धैर्य को कायम रख सके , वस्तुतः वही सच्चा शूरवीर है 

. कायर मृत्यु से पूर्व अनेको बार मर चुकता है , जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है

. ईष्या आदमी को उसी तरह खा जाती है , जैसे कपड़ो को कीड़। 

. ईमानदार होने का अर्थ है हजार मनकों में से अलग चमकने वाला हीरा । 

. अपनी रोटी - मिल - बाँटकर खाओ ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सके। 

. जीवन का अर्थ है ' समय ' जो जीवन से प्यार करते हों , वे आलस्य में समय न गवायें ।

१०गृहस्थ एक तपोवन है , जिसमें संयम , सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है । 

११ . पाप अपने साथ रोग , शोक पतन ओर संकट भी लेकर आता है 

१२ . सार्थक और प्रभावी उपदेश वह है , जो वाणी से नहीं , अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है । 

१३अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो । 

१४ . मनुष्य का जन्म तो सहज होता है , पर मनुष्यता उसे कठिन प्रयत्न से प्राप्त करनी पड़ती है । 

१५ . अनजान होना उतनी लज्ज्ाकी बात नहीं , जितनी सीखने के लिए तैयार न होना । 

१६असफलता केवल यह सिद्व करती है कि सफला का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ । 

१७ . देवता आशीर्वाद देने में तब गुँगे रहते हैं , जब हमारा ह्दय उनकी वाणी सुनने में बहरा रहता है ।

१८ . सभ्यता का स्वरूप है - सादगी , अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता । 

१९ . योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में रखकर महात्वाकांक्षाएँ न गढने वाला दुखी रहता और उपहास सहता है ।

२० . पढ़ने योग्य लिखा जाय , इससे लाख गुणा बेहतर यह है कि लिखनें योग्य किया जाय । 

२१ . दूसरो के साथ वैसी ही उदारता बरतो जैसी ईश्वर ने तुम्हारे साथ बरती है । 

२२ . बुद्विमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं , मूर्ख वे हैं जो बोलते पहले और सोचते बाद में हैं । 

२३ . परमेश्वर का प्यार केवल सदाचारी और कर्तव्य परायणों के लिए सुरक्षित है । 

२४जो बच्चों को सिखाते हैं उन पर बड़े खुद अमल करे , तो यह संसार स्वर्ग बन जाए । 

२५ . सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है , जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं । 

२६अच्छी पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमाएँ हैं । उनकी आराधना से तत्काल प्रकाश और उल्लास मिलता है । 

२७ . मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं , वह उनका निर्माता , नियंत्रणकर्ता और स्वामी है । 

२८ . आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और अधिक समीपवर्ती शत्रु नहीं । 

२९ . आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं । 

३० . किसी का सुधार उपहास से नहीं , उसे नये सिरे से सोचने और अदलने का अवसर देने से होता है । 

३१ . जो जैसा सोचता और करता है , वह वैसा ही बन जाता है । 

३२ . सज्जन् आमीरी मे गरीब जैसे नम्रऔर गरीबी में अमीर जैसे उदार होते हैं । 

३३ . कुकर्मी से बढ़कर अभागा कोई नहीं , क्योकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं रहता । 

३४ . बडप्पन अमीरी में नहीं , ईमानदारी और सज्जनता में सन्निहित है । 

३५ . उन्हे मत सराहो , जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई और सम्पति कमाई । 

३६ . प्यार और सहकार से भरा पूरा परिवार ही धरती का स्वर्ग होता है । 

३७ . प्रसन्न रहनें के दो ही उपाय है - आवश्यकताएँ कम करें और परिस्थितियों से तालमेल बिठायें । 

३८ . काम की अधिकता से नहीं , आदमी उसे भार समझकर अनियमित रूप से करने पर थकता है ।

३९ . जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर है , ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है । 

४० . अपनें को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो , यदि इसमें सफल हो गए , तो हर काम में सफलता मिलेगी । 


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