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Books - समस्याएं अनेक- हल एक

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Language: HINDI
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समस्याएं अनेक, हल एक

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बात आश्चर्य की-सी लगती है कि सुविधा-साधनों से भरापूरा, बुद्धिमान, सुरक्षा साधनों से सम्पन्न मनुष्य अनेकानेक समस्याओं से घिरा हुआ क्यों रहता है? जबकि पशु-पक्षी कुदकते-फुदकते आनन्द भरा जीवन जी लेते हैं, तो मनुष्य पर ही क्या विपत्ति आई, जिसके कारण वह जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ और संकटग्रस्त दीख पड़ता है?

शारीरिक दृष्टि से वह पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक दुर्बल और रुग्ण होता चला जाता है। बीमारियां पीछा नहीं छोड़तीं। अपच और जुकाम से बचा हुआ तो कोई बिरले ही दिखता है। गहरी नींद, कड़ाके की भूख का आनन्द तो कदाचित् ही किसी को आता होगा।

मानसिक क्षेत्र में उसकी उद्विग्नता का ठिकाना नहीं, चिन्ताएं, उद्विग्नताएं, महत्वाकांक्षाएं, ईर्ष्या, द्वेष, लालच, तृष्णा आदि से मस्तिष्क को बचाकर जो हंसती-हंसाती जिन्दगी जी सके, ऐसा कदाचित् ही कोई भाग्यवान दीख पड़े। मनोविकारों में कामुकता, सम्पन्नता, विलासिता, प्रतिद्वन्द्विता, अपराध, अनाचार की ओर धकेलने वाले दुष्प्रवृत्तियों ने कदाचित् ही किसी का मस्तिष्क अछूता छोड़ा हो। तनाव, सनक और अर्द्धविक्षिप्तता हर किसी के सिर पर चढ़ी रहती है। हंसती-हंसाती, खिलती-खिलाती जिन्दगी जो लोग जी रहे हैं, ऐसे भाग्यवान उंगलियों पर ही गिने जा सकते हैं।

आर्थिक तंगी में महंगाई और बेरोजगारी तो कारण हैं ही, जो काम धन्धे में लगे हैं, ‘‘ऊपर की आमदनी’’ भी कर लेते हैं, उन्हें अपव्यय और दुर्व्यसनों की लत इस प्रकार पड़ गई है कि वे भी सदा पैसों की तंगी अनुभव करते रहते हैं। कर्ज लेते और चतुरता के छल-छद्म के इतने चित्र विचित्र तरीके अपनाते हैं कि आश्चर्य होता है। फिर भी वे पैसे की रट लगाये ही रहते हैं। जो पास में है, जो सहज उपलब्ध होता है, उससे उनका समाधान ही नहीं होता।

परिवार कदाचित् ही हिलमिल कर रहते हों। सदस्यगण पूर्ण संतुष्ट रहते हों, ईर्ष्या-द्वेष और मनोमालिन्य की भरमार न हो, किसी को किसी से शिकायत न हो, जब इतना तालमेल तक नहीं बैठ पाता, तो वे एक दूसरे की सहायता में योगदान दे सकें, ऐसा कैसे बन पड़े? उत्तराधिकार की छीना-झपटी बनी ही रहती है। बड़ों की अवज्ञा की, छोटों की उपेक्षा की शिकायत बनी ही रहती है। ऐसी दशा में ‘घर में स्वर्ग अवतरित होने’ की उक्ति किस प्रकार कहां सार्थक हो। जिसका जितना बड़ा परिवार है उसे उतनी ही चिन्ताएं घेरे रहती हैं। रोजगार, दाम्पत्य जीवन में तालमेल, दुर्व्यसन और कुसंग बचाव, हारी-बीमारी, परस्पर कलह की समस्याएं घर में ही इतनी अधिक होती हैं कि उनके सामने व्यापारिक, सामाजिक, उतार-चढ़ावों के प्रश्न पीछे पड़ जाते हैं।

समाज में सहकार-सद्भाव के नाम पर उथला उल्लू बनाने वाला चापलूसी शिष्टाचार ही शेष रह गया है। मित्र बनकर शत्रु के काम करने की आदत अधिकांश लोगों की पड़ गई है। किसी को उधार देना उसके साथ सदा के लिए सम्बन्ध तोड़ लेना है। परिवार के सदस्यों तक से जब किसी को किसी से कोई आशा नहीं तो बाहर वाले लोगों से तो कुछ अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यहां तक कि सत्परामर्श तक की नहीं।

लोक व्यवहार में कुरीतियां इतनी बाधक हैं कि भलमनसाहत का जीवन दुर्लभ हो रहा है। विवाह-शादियों में लेन-देन, धूम-धाम का जो दबाव पड़ता है, उससे घर की आर्थिक स्थिति बुरी तरह लड़खड़ा जाती है। शिक्षा कितनी महंगी और खर्चीली है, इसे बच्चों को पढ़ाने वाले भुक्त भोगी ही जानते हैं। जिनके साथ भी घनिष्ठता बनायी जाय, वही जेब पर हाथ साफ करता है। चिकित्सा अब इतनी महंगी हो गई है कि मामूली से दुःख-दर्द में सैकड़ों, हजारों का बजट बैठता है। बाजार से ठीक दाम पर ठीक चीज खरीद सकना किसी असाधारण चतुर का ही काम है, अन्यथा दुकानदारों से निपटना एक अन्य टेढ़ी खीर है। पुलिस न्यायालयों में फरियाद करने पर वर्षों तक कोई सुनवाई नहीं होती। धर्म के नाम पर भ्रम जंजाल और लूट-खसोट का ही व्यवसाय चलता है। धूर्त और मूर्ख का एक जोड़ा उस क्षेत्र में बन गया है कि मूर्ख थोड़ा खर्च करके मनचाही मनोकामनाएं पूरी करने की फिराक में रहता है, और धूर्त के चंगुल में जो कोई भावुक प्रकृति का फंस जाय, उसकी हजामत उल्टे उस्तरे से बनाता है। दृष्टि पसार कर जिधर भी देखा जाय पाखण्ड और विडम्बना की तूती बोल रही है। सीधी और सही बात कहने वालों को कोई टके सेर नहीं पूछता। असली भगवान और असली धर्म- अध्यात्म तत्त्वज्ञान का स्वरूप समझाने वाले तक दृष्टिगोचर नहीं होते। उस क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को भटकाव ही हाथ लगता है।

हर स्तर के अपराध आकाश चूम रहे हैं। मांसाहार और मद्यपान अब प्रगतिशीलता के, बड़प्पन के, चिह्न बन गये हैं। छल-प्रपंच तो एक प्रकार का प्रचलन है। लूट, डकैती, हत्या जैसे कुकृत्य संगठित व्यवसाय बन गये हैं। पैसे देकर किसी भी निर्दोष की रास्ता चलते नृशंस हत्या करायी जा सकती है। व्यभिचार, गर्भपात, तलाक के बढ़ते हुए उभार ने दाम्पत्य जीवन की पवित्रता, वफादारी और निष्ठा मटियामेट कर दी है। इस सम्बन्ध में पुरुष ही अग्रगामी है; पर दंड कुचक्र में फंसी महिलाओं को सहना पड़ता है।

मनुष्य, जिसे ईश्वर का युवराज, ज्येष्ठ पुत्र कहा जाता था, जिसकी आत्मा में परमात्मा की ज्योति जलती थी, जो आत्म कल्याण और लोक-मंगल की प्रतिज्ञाएं लेकर आया था, जिसमें प्रत्यक्ष और परोक्ष विभूतियों के भण्डार भरे पड़े बताये जाते हैं, जो अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पार उतारने में समर्थ है, उसकी यह दयनीय, खेदजनक और विस्मयभरी स्थिति कैसे बन गई? साधनों से, संसार में कुबेर के भण्डार भरे पड़े हैं; पर असंख्यों को आधे पेट क्यों सोना और अकाल मृत्यु क्यों मरना पड़ता है? यह विडम्बनाएं ऐसी हैं, जिनका कारण ढूंढ़ने में असमंजस होता है। समर्थ पर असमर्थता का घेरा क्यों? प्रतिभावान पर पतन और पराभव का आक्रमण किसलिए?

इस प्रकार से असंख्य गुत्थियों से घिरे सृष्टि के मुकुटमणि मनुष्य की अन्तरंग और बहिरंग दुर्दशा देखकर चकित रह जाना पड़ता है कि कबीर की उलटवासी जैसी असंभव के साथ जुड़ा हुआ संभव किस प्रकार इतना प्रबल हो रहा है? संसार की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति इस प्रकार निकृष्टता के दलदल में फंस कर आत्महत्या करने जैसी स्थिति की दशा में क्यों दौड़ रही है?

अनेकानेक विपत्तियों का एक कारण है- आस्था का उल्लंघन, मर्यादाओं का व्यतिरेक। इस सृष्टि के सभी प्राणी अपनी-अपनी निर्धारित क्रम-व्यवस्था के अनुकूल आचरण करते हैं और उस अनुशासन निर्वाह के फलस्वरूप जीवन को सरलतापूर्वक जीते और उपलब्ध परिस्थितियों में मोद मनाते हैं। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था सभी जीवधारियों के लिए की है। मनुष्य को तो वरिष्ठ होने के कारण उसने कुछ अतिरिक्त ही दिया है, कोताही नहीं की।

वर्जनाओं का उल्लंघन ही इस बात का दण्ड है कि वह दुःख भोगे और अशांत उद्विग्न रहे। संयम अपनाने पर इन सभी विभीषिकाओं से बच सकता है, जो आये दिन हैरानी में डालती और चित्र-विचित्र व्यथाएं सहने के लिए विवश करती है।

सभी प्राणी अपना नियत आहार करते हैं। शाकाहारी घास-पात पर गुजारा करते हैं और मांसाहारी अपने पेट, दांत, नख आदि के अनुरूप मांस खाते हैं। किसी को पकाने की जरूरत नहीं पड़ती। पेट भर जाने पर वे स्वाद वश अतिरिक्त ठूंसने का प्रयत्न नहीं करते। सिंह पेट भरा होने पर उसे पचाने के लिए पड़ा रहता है। पास से अनेकों हिरन, सुअर, आदि घूमते रहते हैं किसी की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखता। गाय को मांस खिलाया जाय तो भूखी मर जाने पर भी उस अखाद्य का भक्षण न करेगी। कुत्ता बीमार होता है तो मिली हुई रोटी को कहीं अन्यत्र पंजों से गड्ढ़ा खोद कर बाद के लिए छिपा आता है; पर मनुष्य है जो पेट द्वारा भूख की तीखी मांग होने की अपेक्षा किये बिना स्वादवश मनचाही वस्तुएं उदरस्थ करता है। यह नहीं सोचता कि पेट की मांग है या नहीं, उनकी स्थिति पचाने की है या नहीं। जायकों पर मन लहराता है और जो भी चटोरे पन की पूर्ति करने के लिए मिलता है, उसे खाता रहता है। यह पेट पर प्रत्यक्ष अत्याचार है। जानवरों पर उतना ही बोझ लादा जाता है, जितना कि वे ले चलने में समर्थ हैं। इससे अधिक लादने पर वे असक्त घायल होते और समय से पूर्व ही मर जाते हैं। यह दया-भाव, विवेक-आचरण, न्याय-निर्वाह यदि पेट के साथ भी चलता रहे तो किसी को बीमार न पड़ना पड़े, पेट विद्रोह पर उतारू न हो, अपच के कारण उसमें विषों की उत्पत्ति न हो, और उसके कारण भीतरी अवयवों का गलना शुरू न हो, रक्त में विकृति भर जाने पर जहां-तहां रोगों का उभार देखने को न मिले। सूजन, दर्द, वर्ण, आदि और कुछ नहीं, पेट पर किये गये अत्याचारों का ही प्रतिफल हैं। विषाक्तता जहां भी रुक जाती है, वहीं बीमारियां उत्पन्न करती है। यदि हम पेट को मित्र मानें, उसके साथ शत्रु जैसा व्यवहार न करें, तो निश्चय ही हम 80 प्रतिशत लोगों से बचे रहते हैं। इसके लिए बहुत बड़ा रहस्य नहीं ढूंढ़ना न कोई बहुमूल्य दवाएं ही खरीदनी हैं, मात्र इतना भर करना है कि जीभ पर अंकुश लगाना है। विवेक द्वारा सुपाच्य पदार्थों का चयन करना है और पेट का परामर्श मानते हुए उस पर उतना ही बोझ लादना है, जितना वह ले चलने की स्थिति में हो और जितना ले चले। यह बात कुछ भी कठिन नहीं है। अपने ऊपर थोड़ी कड़ाई करके खाने सम्बन्धी बुरी आदतें छोड़ देने और जिह्वा को स्वाद का नहीं, औचित्य का ध्यान रखने भर के लिए सहमत कर लिया जाय तो समझना चाहिए कि शारीरिक कष्टों में से अधिकांश से छुटकारा मिला। रक्त शुद्ध होने की दशा में बाहर के रोगों का आक्रमण भी अधिक समय नहीं ठहरता। शुद्ध रक्त बीमारियों से सहज ही शरीर की रक्षा करता है और जो आक्रमण होते हैं, उनसे सहज ही निपट लेने में समर्थ होता है। शरीर क्षेत्र में आदर्शों का उल्लंघन ही उसे बीमारियों के कुचक्र में फंसाता है। मानसिक उद्विग्नता भी चिन्तन में अवांछनीयताएं भर लेने के कारण उत्पन्न होती है। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ का सिद्धान्त मन में गहराई तक बैठा लिया जाय तो व्यक्ति न तो तृष्णाग्रस्त हो, न लालची अहंकारी। औसत भारतीय स्तर का जीवन इतना खर्चीला नहीं है जिसे मनुष्य सामान्य श्रम से पूरा न कर सके। स्वभाव में नम्रता और मिलनसारी हो तो अहंकारवश किसी से उलझने की नौबत न आये। दूसरा कोई गरम हो रहा हो तो उसे आवेश ज्वर से ग्रस्त समझकर वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा किसी ज्वर पीड़ित, तपते हुए आदमी को ठंडा पानी पिला कर या पंखा झल कर शांत किया जाता है। अपने को उत्तेजित न होने देना और सामने वाले को स्नेह-सम्मान मिश्रित शैली से तर्क, तथ्य, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गलतफहमी का समाधान प्रस्तुत कर देने से लड़ाई-झगड़ों की जड़ कट जाती है। झंझटों में प्रायः बड़े स्वार्थ बाधक कम ही होते हैं। अधिकतर गलतफहमियां ही काम करती है। शान्तचित्त से दूसरे की मान्यता को समझ लिया जाय, उसे प्रेमपूर्वक समझा दिया जाय, तो बात बढ़ती नहीं है। विग्रहों का मतभेद और मनोमालिन्यों का सहज समाधान निकल आता है। यहां इस बात के लिए भी तैयार रहना है कि झंझटों के बढ़ने में अपनी ओर से जो गलती हुई हो, उसे मान लिया जाय और खुले मन से उसे स्वीकार करते हुए भूल के लिए खेद प्रकट कर दिया जाय।

बाहर के लोग अपने दुर्व्यवहार से जितना हैरान है, उसमें प्रायः अपने ही कटुवचन या अभिष्ट व्यवहार काम करते हैं। शान्त, सुशील, सभ्य, सौजन्य युक्त व्यवहार करने के लिए अपने को प्रशिक्षित—अभ्यस्त कर लिया जाय तो कीचड़ में ईंट डालने से छींटे पड़ने की उक्ति चरितार्थ न हो।

मानसिक उद्विग्नताओं में एक बड़ा कारण है अपनी बढ़ी-चढ़ी भौतिक महत्वाकांक्षाएं। यदि औसत भारतीय स्तर का, संतोषी जीवन जीने तक की इच्छा सीमित कर ली जाय तो उस मर्यादा परिसीमन के रहते न तो कामुकता की कल्पनाएं मन को उद्विग्न करें, न कुदृष्टि पनपे और न अपराधी स्तर के कुकृत्य कर बैठने का अवसर आये। ठीक इसी प्रकार बहुत धन संग्रह करने की, सज-धज, ठाट-बाट दिखाने और आतंक जताने का उद्वेग भीतर से न उठे तो मनुष्य सच्चे अर्थों में नीतिनिष्ठ, चरित्रवान बन सकता है और सज्जनों की पंक्ति में अग्रणी रह सकता है। ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, कुचक्र, षड्यंत्र दूसरों के प्रति परायापन मानने से उठते हैं और उन्हें अकारण नीचा दिखाने के षड्यंत्र रचते हैं; पर यदि सबके प्रति स्नेह सौजन्य भरी आत्मीयता हो तो इस प्रकार के अनावश्यक अवांछनीय उद्वेग मन में न उठें।

कर्त्तव्यपालन में संतोष किया जाय और परिस्थितिवश जिस भी प्रकार गुजारा करने में काम चला लिया जाय तो उद्वेगों के जंजाल में श्रम और शक्ति का अनावश्यक अपव्यय न होगा। गुजारे भर से संतुष्ट रहने के उपरान्त जो सामर्थ्य बचती है उसे यदि परमार्थ प्रयोजन में लगाते रहा जाय तो लोगों के हृदय जीते जा सकते हैं और श्रद्धा भरा सम्मान प्रचुर परिणाम में अर्जित किया जा सकता है।

सज्जनोचित जीवन निर्वाह न तो जटिल है, न कठिन। यदि अपने भीतर सज्जनता, सादगी, मिलनसारी, शिष्टता, उदारता, जैसे गुण हों, तो अनायास ही मित्रों की संख्या बढ़ती जायेगी और शत्रुओं के उत्पन्न होने का प्रश्न ही न उठेगा। कोई व्यक्ति एक पक्षीय शत्रुता देर तक चलाता नहीं रह सकता। यदि अपने मन में सद्भावना न सही उपेक्षा भर हो तो शत्रु ठंडे पड़ जाते है। आग ईंधन डालने से भड़कती है। शत्रुता का भी यही हाल है। अपनी ओर से छेड़छाड़ न चलती रहे, तो वह स्वाभाविक रूप से शान्त हो जायेगी।

परिस्थितिवश आंशिक उद्वेग जितने उत्पन्न होते हैं उसकी तुलना में विकृत मनःस्थिति असंख्य गुने विग्रह खड़े करती और मनःक्षेत्र में अशांति भरे आवेश उत्पन्न करती है। अपने से सम्पन्नों के साथ तुलना करने पर हर व्यक्ति अपने को पिछड़ा और दरिद्र अनुभव करता है; किन्तु यदि वह तुलना अपने से छोटों के साथ की जाने लगे तो प्रतीत होगा कि जहां हम हजारों से पीछे हैं, वहां लाखों से अच्छे-ऊंचे भी हैं। मन को संतोष देने का सही तरीका सर्वोत्तम है। कुविचारों को सद्विचारों से काटा जा सकता है। इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। तृष्णाओं का स्वभाव ऐसा है कि वे गहरी खाई की तरह जिन्दगी भर के प्रयत्नों से भी पटती नहीं। जिस प्रकार सुरसा के बढ़े हुए मुंह से हनुमान छोटा रूप बनाकर बाहर निकल आये थे, उसी प्रकार तृष्णाओं में मन भटकाने की अपेक्षा यही उत्तम है कि हम भौतिक जीवन की महत्वाकांक्षाओं को सीमित करें और उनके स्थान पर आध्यात्मिक महत्वाकांक्षाओं का स्तर बढ़ायें। उनकी पूर्ति भी सरल है और श्रेय भी अधिक। आत्म-परिष्कार का पुण्य और लोकमंगल के लिए किये गये पुरुषार्थ का परमार्थ हर किसी से बन पड़ सकता है। इच्छा होने पर ऐसे प्रयास आर्थिक कठिनाइयों या व्यस्तताओं के बीच बन सकती है। यह मात्र उत्कंठा का विषय है। अवसर तो हर घड़ी चारों ओर खड़े रहते हैं। जितना श्रम और मनोयोग लिप्सा-लालसाओं में लगाया जाता है, उतना यदि सदुद्देश्यों के निमित्त लगाया जा सके, तो व्यक्ति आत्म सम्मान और लोक सम्मान की दृष्टि से कहीं अधिक ऊंचा उठ सकता है।

स्वार्थी व्यक्ति भले ही अधिक शौक-मौज के साधन जुटा लें; पर उसकी अन्तरात्मा कोसती ही रहती है कि मनुष्य जीवन जैसा सुर दुर्लभ सुयोग पाकर भी पेट-प्रजनन जैसी पशु-प्रवृत्तियों से ऊंचा न उठ जा सका, आगे न बढ़ा जा सका। इस आत्म-प्रताड़ना से बचने का एक ही उपाय है कि आरम्भ में ही भौतिक महत्वाकांक्षाओं की निरर्थकता और लक्ष्य पूर्ति का प्रयोजन सिद्ध करने वाली सत्प्रवृत्तियों का महत्व समझा जाया और जीवनयापन की एक सुनिश्चित रूपरेखा बना ली जाय। उद्देश्यरहित जीवन सदा भटकावों में मारा-मारा फिरता है, जो न करना चाहिए था, वह करता रहता है और जो करना चाहिए था उसे भुला बैठता है। यही मूलभूत कारण मानसिक उद्विग्नता का है। यदि इस प्रलोभन जंजाल से बचा जा सके, तो व्यक्ति हर स्थिति में हंसती-हंसाती, खिलती-खिलाती जिन्दगी जी सकता है।

लोगों में से अधिकांश को आर्थिक तंगी की शिकायत करते सुना जाता है। इसके दो ही उपाय हैं कि या तो आमदनी बढ़ायी जाय या खर्च घटाया जाय। अपने देश की स्थिति ऐसी नहीं है, जिसके अनुपयुक्त तरीके अपनाये बिना प्रचुर धन कमाया जा सके। श्रमिक शोषण, कर-चोरी, मुनाफा खोरी जैसे अवलम्बन लेकर ही व्यवसायियों में से अधिकांश सम्पन्न बनते हैं। व्यवहार में यह बातें एक प्रचलन बन गई हैं जिससे अखरती नहीं; किन्तु वास्तविकता यही है कि सम्पन्नता सीधे तरीके से हस्तगत नहीं हो सकती। नौकरी में भी उतना ही पैसा मिलता है, जिससे स्तर के अनुरूप गुजारा हो सके। रिश्वत आदि के सहारे ही फालतू पैसा जमा होता है। एक स्थान पर ऊंची दीवार खड़ी करने के लिए यह आवश्यक है कि कहीं दूसरी जगह उतना ही गहरा गड्ढ़ा किया जाता है। एक की अमीरी अनेकों की गरीबी का कारण बनती है। बड़े कारखाने, बड़ी मशीनें, अनेकों के हाथ से गृह कुटीर उद्योगों के अवसर छीन लेते हैं। यदि वे ही कार्य व्यक्तिगत रूप से या सहकारी समितियों की तरह किये या कराये गये होते तो जापान की तरह अपना देश भी कुटीर उद्योगों में सुसम्पन्न बन जाता। व्यावसायिक सम्पन्नता देखने भर में ही निर्दोष मालूम पड़ती है, वस्तुतः वैसी है नहीं। नौकरी भी गुजारा ही दे सकती है। भारत, अमेरिका नहीं है, जहां श्रम के बदले पर्याप्त पैसा पाया जा सकता है। इन सब बातों में विचार करते हुए यही उचित है कि मध्यवर्ती औसत स्तर के भारतीय जैसा जीवन क्रम अपनाया जाय और सस्ते निर्वाह में काम चलाने की योजना बनायी जाय। जितना कमाया जा सकता हो, उसी के भीतर खर्च का बजट बनाकर चला जाय। यदि आमदनी नहीं बढ़ सकती तो खर्च घटाने का तरीका सरल है। खर्चों में बहुत बड़ा भाग विलासिता और ठाठ-बाठ का रहता है। इसमें बड़ी कसौटी की जा सकती है। ठाटबाट और शान-शौकत का व्यामोह छोड़ा जा सकता है। सबसे बड़ी बात परिवार को न बढ़ाना। नये बच्चे न पैदा करने की आवश्यकता हर नर-नारी को समझाया जाय। जो सदस्य घर में हैं, उन्हीं को पर्याप्त मान कर संतोष किया जाय। उनमें से बूढ़ों का ऋण चुकाने के लिए उनको सम्मान सहयोग दिया जा सकता है। समर्थों और वयस्कों में से हर एक को कुछ कमाने के लिए प्रेरित किया और मार्गदर्शन दिया जा सकता है। मुफ्तखोरी दरिद्रता से भी बुरी है। हर किसी के मन में यह लगन पैदा करनी चाहिए कि वह कुछ कमाने लगे। अल्पवयस्कों को छोड़कर हर किसी में यह उत्साह भरना चाहिए कि वह सुसंस्कारी और स्वावलम्बी बने। परिवार का वातावरण और व्यवस्था क्रम ऐसा बनाना चाहिए, जिससे प्रत्येक सदस्य को इन दोनों उपलब्धियों के लिए अवसर मिलता रहे।

खर्चे बढ़ाने में कुरीतियों का जंजाल और भी भारी है। विवाह शादियों में दोनों पक्षों का इतना पैसा बर्बाद होता है कि उनमें परिवार की आर्थिक कमर टूटी जाती है। अन्य सदस्यों को जो स्वास्थ्य संरक्षण, स्वास्थ्य संवर्धन आदि का अवसर मिलना चाहिए उस अपव्यय के कारण सभी की प्रगति का रास्ता बन्द हो जाता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि खर्चीली शादियां दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। उसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे का शोषण करता है। बेटे वाला दहेज, उपहार लम्बी बारात की आव भगत मांगता है और बेटी वाला बदले में कीमती कपड़ों और जेवरों की अपेक्षा अपनी बेटी के निमित्त करता है। दोनों पक्षों को समझाड़ना और समझाया जाना चाहिए कि गरीब लोगों द्वारा अमीरी का स्वांग बनाया जाना नितान्त कृत्रिम, फूहड़पन और ओछे दृष्टिकोण का चिह्न है। विवाहों के बाद भी अलन-चलन चलते रहते हैं और उसमें ढेरों पैसा खराब होता रहता है। मृतक भोज भी ऐसी ही बेतुकी प्रथा है। जिस घर में मृत्यु हो चुकी है, आंसू बहाना और विलाप होना बन्द नहीं हुआ, उसी घर में खर्चीली दावत का प्रबन्ध किया जाय और लोग हाय-शर्म छोड़कर उस मुर्दे के मांस जैसी दावत को खाने जा पहुंचें तो कितनी बुरी बात है।

ऐसी-ऐसी अनेकों खर्चीली कुरीतियां अपने समाज में प्रचलित हैं। उनका उन्मूलन किया ही जाना चाहिए, भले ही सड़े दिमाग के रूढ़िवादी इस परिवर्तन का, सुधार का विरोध करते रहें। बड़ों के कुटुम्बी-संबंधियों के परामर्श को उसी सीमा तक माना अपनाया जाना चाहिए, जिस सीमा तक कि विवेकयुक्त हो; मात्र रूढ़ियों की लकीर पीटने की बात हो और उसके लिए विवश किया जा रहा हो, तो प्रह्लाद की तरह तन कर खड़ा हो जाना चाहिए और अनीति को स्पष्टता अमान्य कर देना चाहिए।

मितव्ययिता के और भी कई तरीके हैं। मात्र वे ही चीजें खरीदी जायें जिनके बिना काम न चलता हो। ऋण लेने की आदत तो डालनी ही नहीं चाहिए। उससे फिजूलखर्ची बढ़ती है और व्यक्ति की दरिद्रता उजागर होती है।

तंगी से निपटने और अर्थ संतुलन बनाने के यह सीधे और सरल तरीके हैं। मनुष्य को दरिद्रता के पाश में जकड़ कर दुःखी और बदनाम कराने से बचाने के लिए इसी मार्ग को अपनाया जाना चाहिए। इंद्रिय संयम, मानसिक संयम की तरह परिवार संयम और अर्थ संयम भी नितान्त आवश्यक है। जो इन अंकुशों को नहीं अपनाते उनका जीवन क्रम कहावत रहित हाथ की तरह, बेलगाम घोड़े की तरह कुमार्ग पर चल कर अपना और दूसरों का अनर्थ करता है।

प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध आलस्य और प्रमाद का है। जो अपने शरीर को श्रमशीलता में व्यस्त नहीं रखते वे इस संसार में सर्वत्र भरी हुई उपलब्धियों में से किसी को भी हस्तगत नहीं कर पाते। ईश्वर का दिया हुआ सबसे बड़ा वरदान मनुष्य जीवन है। जीवन एक जंजीर है, जो समय की कड़ियों को जोड़-जोड़ कर बनी है। बुद्धिमत्ता इसमें है कि समय के एक एक क्षण का श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाय सामाजिक व्यवस्था में कुछ वर्जनाएं हैं और कुछ मान्यताएं। इनमें से जो शाश्वत सनातन हैं वे उपयोगी भी हैं और न्यायनिष्ठ भी किन्तु प्रचलनों में से सभी ऐसे नहीं हैं। इनमें से बहुत से अंधकार भरे मध्यकालीन सामन्त युग की देन है। हमें देखना चाहिए कि उसमें से कितनी उपयुक्त हैं कितनी अनुपयुक्त। घपले में इन दिनों सभी गुड़ गोबर एक हो गया है। इसका विवेचन विश्लेषण करते हुए हमें औचित्ययुक्त मर्यादाओं का पालन करना चाहिए और जो अनुचित तत्व आ मिले हैं उन्हें कूड़े करकट की तरह बुहार फेंकना चाहिए।

दाम्पत्य जीवन की वफादारी ऐसी है जो पति पत्नी को समान रूप से पालन करनी चाहिए। स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करें और पुरुष पत्नीव्रत धर्म का। मनुष्य जाति के दोनों अविच्छिन्न अंग हैं। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक जैसे हैं। नारी को दबाया जाय और नर को उच्छृंखल छोड़ दिया जाय- इसमें न न्याय और न औचित्य। पर्दे से यदि शील सदाचार की रक्षा होती है तो स्त्रियों की तरह उसे पुरुषों को भी पहनना चाहिए। नारी के लिए वैधव्य पालन उपयुक्त है तो नर पर भी वही प्रतिबन्ध लागू होना चाहिए।

इसी प्रकार वंश और जाति के आधार पर ऊंच-नीच का चलना किसी प्रकार औचित्य की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता। गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर व्यवसाय की एकता के कारण सभी वर्ग-भेद चला था उसमें यह सोचा गया था कि वंश परम्परा के आधार पर व्यवसाय अपनाये जाते रहेंगे पर अब व्यवसाय परिवर्तन को कोई प्रतिबन्ध नहीं रहा तो जातियों का आधार ही समाप्त होता है। फिर मनुष्य-मनुष्य के बीच वंश के आधार पर ऊंच-नीच की मान्यता किस कारण चलती रहे? दुष्कर्मियों को हेय ठहराया जा सकता है और उनका बहिष्कार किया जा सकता है। सुधारने पर उस दण्ड को समाप्त हुआ समझा जा सकता है, किन्तु कोई व्यक्ति अमुक वंश में जन्म लेने के कारण सदा ऊंचा या सदा नीचा माना जाता रहे, इसके पीछे न कोई तर्क है, न कारण।

नीति-सदाचार की समर्थक मर्यादाओं को हर किसी को पालन करना चाहिए। नागरिकता और समाजनिष्ठा के अन्तर्गत आने वाली सभी मर्यादाएं मान्यता देने योग्य हैं, पर जिनके पीछे न्याय, औचित्य आदि की कोई पृष्ठभूमि नहीं है, उन्हें गले से पत्थर की तरह बांधे रहने का— उनके लिए दूसरों को उकसाने का कोई कारण नहीं। सच्चाई, समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी, उदारता और न्यायनिष्ठा— यह मानवी सत्परम्पराओं में आती है। संयम और सदाचार सनातन हैं। पिछड़ों को उठाना और पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाना यह सज्जनोचित सद्व्यवहार है। इन्हीं मान्यताओं को अपनाया जाना चाहिए। रोटी के प्रकरण में स्वच्छता ही परखने योग्य है। किस वर्ण के व्यक्ति ने उसे बनाया, किसने छुआ- इसका औचित्य सिद्ध नहीं होता। यह सफाई और स्वच्छता का विषय है। इसमें प्रथाओं को महत्व देने की क्या आवश्यकता है? यदि प्रतिबंध लगाने हों, तो नशेबाजी जैसे कुप्रचलनों को अमान्य ठहराया जाना चाहिए और उन दुर्व्यसनों से ग्रसित लोगों के प्रति सामाजिक आक्रोश उभारना चाहिए। इसी प्रकार व्यवसाय में छल प्रपंच और कर्मचारियों में रिश्वत जैसे प्रचलनों के विरुद्ध वातावरण बनाया जाना चाहिए। समाज को सुव्यवस्था के लिए ऐसे ही नीति और सदाचार परक कार्यों की प्रशंसा और अनाचारों की भर्त्सना का क्रम चलाना चाहिए। समाज का गौर व ऐसे ही आधार अपनाने से बनता है न कि हानिकारक रूढ़ियों के परिपोषण से। यही कारण है कि लोगों ने समाज का दबाव मानना अस्वीकार कर दिया और मनमर्जी बरतने का स्वेच्छाचार आरंभ कर दिया है। इसमें समाजगत रूढ़िवादिता और मूढ़-मान्यता ही प्रधान कारण हैं। जहां मानवी कर्तव्यों और अधिकारों में प्रचलित परिपाटियों का उल्लंघन होता है, वहां किसी को भी बुरा मानने या उनका अनुगमन करने की आवश्यकता नहीं है। हमें ऐसे नये समाज का गठन करना चाहिए, जिनमें न्याय और विवेक को मान्यता मिले और रूढ़ियों के कारण किसी को मानवी अधिकारों से वंचित नहीं रहना पड़े। वर्तमान काल में सामाजिक कुरीतियों के कारण भी लोगों को अनीति का कम शिकार नहीं बनना पड़ता है। इन्हें पुरातन प्रचलन के नाम पर अपनाने के लिए बाधित होने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। हमारा संयम विवेक पर आधारित होना चाहिए।

दिनचर्या के प्रसंग में हमारा कोई क्षण आलस्य-प्रमाद में नहीं बीतना चाहिए। विश्राम के नाम पर आलस्य को कहीं भी आश्रय नहीं मिलना चाहिए। कार्यरत रहना हर मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए। काम जो भी हाथ में लिया गया हो उसमें तत्परता और तन्मयता का समुचित समावेश होना चाहिए। काम की अच्छाई और पूर्णता को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना चाहिए और उसे इस प्रकार समग्रता के साथ सम्पन्न करना चाहिए कि किसी को उंगली उठाने का साहस न पड़े। अपना मन भी न धिक्कारे। यदि समय पर सही काम ढंग से किया गया होता, तो उसके बिगड़ने या घटिया कहलाने का लांछन क्यों लगता।

कामों को बीच-बीच में बदलते रहने से दिनचर्या में नवीनता आ जाती है। उससे विश्राम की आवश्यकता भी पूरी हो जाती है। थकान सताने लगे तो थोड़ा सुस्ताने में भी हर्ज नहीं; पर वह भी नियत अवधि के अन्तर्गत ही होना चाहिए। थकान और विश्राम के बहाने बहुत समय तक आलस्य में पड़े समय बिताना किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। स्मरण रखने योग्य बात है कि जो समय को गप-शप में, आवारागर्दी में, यारबाजी में, दुर्व्यसनों में गंवाते हैं, वे अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। संसार के प्रगतिशील और समुन्नत व्यक्तियों में से प्रत्येक अपने समय का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की योजना बनाते और उस पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहते हैं। जो समय को बर्बाद करते हैं, वे स्वयं बर्बाद हुए हैं।

आलस्य में पड़ा मनुष्य अवांछनीय चिंतन और अनुपयुक्त कार्यों का आश्रय लेता है; उसे कितने ही दुर्गुण और दुर्व्यसन घेर लेते हैं, जबकि व्यस्त व्यक्ति को अपने नियोजित कार्यों से ही फुरसत नहीं मिलती और अनुपयुक्त आदतों से, अनुपयुक्त व्यक्तियों से सहज ही बच जाते हैं। अच्छे व्यवसायी अपना बही-खाता ठीक रखते हैं। बैंकों में हिसाब तक बंद होता है, जब मार्जन सही मिल जाता है। सरकारें और संस्थाएं बजट के अनुरूप व्यय करती हैं। समय के सम्बन्ध में भी हमारी दृष्टि ऐसी ही पैनी रहनी चाहिए जिसमें अस्तव्यस्तता और अव्यवस्था के लिए कहीं कोई गुंजाइश न रहे। आधे-अधूरे मन से बेगार भुगतने की तरह जो काम किये जाते हैं, उनमें समय भी बहुत बर्बाद होता है और परिणाम या परिमाण देखने पर यही प्रतीत होता है कि समय का अधिकांश भाग अस्तव्यस्तता में ही नष्ट हो गया। ऐसे लोग उपहासास्पद ही बनते हैं और गये, गुजरे, पिछड़े, प्रमादी माने जाते हैं।

ईश्वर की दी हुई सम्पदाओं में समय, श्रम के अतिरिक्त विचार भी एक बड़ी शक्ति एवं सम्पदा है। आमतौर से लोग विचारों को किसी ऊंचे लक्ष्य पर नियोजित नहीं करते और बेतुके, बेहूदे, अनावश्यक असंगत विचारों की कल्पनाओं से मस्तिष्क भरे रहते हैं, भूतकाल की गई-बीती बातों का स्मरण करते हैं, उनकी चर्चा करते और अकारण कथा-गाथाएं सुनाते रहते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि जो बीता, सो बीता। उसके वापिस लौटने की कोई संभावना नहीं। उनका इतना ही लाभ है कि ठोकर खाकर जो हानि उठायी हो, उसे आगे न दुहरायें। जिस प्रयास को योजनाबद्ध रूप से क्रियान्वित करने पर लाभ उठाया हो, उसे अगले दिनों अपनी कार्यव्यवस्था में सम्मिलित रखें। गई-बीती बातों की स्मृति मस्तिष्क में भरे रहने से उसकी वह क्षमता नष्ट होती है, जिसके सहारे आज की समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता था या भविष्य के लिए कोई उपयोगी ताना-बाना बुना जा सकता था, ढांचा खड़ा किया जा सकता था।

विचारों को व्यर्थ की कल्पना उड़ाना नहीं मानना चाहिए। उनकी रचनात्मक शक्ति से अवगत होना चाहिए। विचार बीज है और प्रयास उससे उत्पन्न हुआ अंकुर। प्रयास ही पथ-प्रशस्त करते हैं और अनुरूप परिस्थितियां सामने ला खड़ी करते हैं। विचार वस्तुतः सूक्ष्म रूप से कर्म ही हैं। जो जैसा सोचता है, समयानुसार वैसा ही बन जाता है। संसार के इतिहास में जिनने भी जिस दिशा में प्रगति की है उनने अपने निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय को नियोजित रखा है। शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि मात्र 35-36 वर्ष से भी कम जी सके पर उतने ही समय में उनने इतने काम कर दिखाये जिनकी गाथा सुनकर आश्चर्य होता है। इसके विपरीत शतायु व्यक्तियों में भी कितने ही ऐसे हैं जो इतनी लम्बी अवधि को भी भारभूत होकर जी सके। विदेशों में प्रचलन है कि श्रमिक लोग भी रात्रि पाठशालाओं में दो घंटे रोज पढ़ते हैं और अपने अभीष्ट विषय में ऊंची डिग्रियां प्राप्त कर लेते हैं। ऐसी सफलताएं आसमान से नहीं टपकती। समय का ठीक विभाजन कर लेने और नियमित समय पर नियत काम में जुट जाने पर काम काजी लोग भी आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त कर लेते हैं। जिस दिशा को व्यक्ति पकड़ता है उसी में प्रगति करता जाता है।

उद्देश्यपूर्ण विचार मात्र कल्पना की रंगीली उड़ाने बन कर नहीं रह जाते वरन् जो अभीष्ट है उसके उपाय खोजते हैं, सहायक ढूंढ़ते हैं, साधन जुटाते हैं, श्रम करते हैं, अपने संकल्प साहस के बल पर अभीष्ट प्रयोजन तक पहुंचकर रहते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपतियों में अब्राहम लिंकन जैसे कई ऐसे हुए हैं जो गरीबी की स्थिति में जन्में, उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक के साधन न जुटा सके किन्तु संकल्प के धनी होने के कारण अनेकों कठिनाइयों से जूझते हुए प्रगति पथ पर आगे बढ़े और उन्नति के चरम शिखर पर पहुंच कर रहे।

औसत आदमी न लक्ष्य निर्धारित करता है और न किसी दिशा धारा में आगे बढ़ने के लिए प्रयास करता है, फलस्वरूप हवा के साथ उड़ते रहने वाले पत्ते की तरह कभी इधर कभी उधर उड़ता रहता है और दिशा विहीन रहकर किसी प्रकार अस्त-व्यस्त जीवन पूरा कर लेता है। सफलता के नाम पर अंधे के हाथ बटेर पड़ने की तरह किसी प्रकार की कुछ उपलब्धियां प्राप्त हो सकें तो बात अलग है पर ऐसी योजनाबद्ध प्रगति नहीं कर पाता जिससे अपने को भी संतोष हो और दूसरे भी प्रेरणा ग्रहण कर सकें। व्यावहारिक जीवन में संयम ही अध्यात्म है। तत्वज्ञान की दृष्टि से उसकी परिभाषा दूसरी भी हो सकती है पर व्यावहारिक रूप में इतना समझ लेना ही पर्याप्त है कि अभिनन्दनीय अनुकरणीय लक्ष्य निर्धारित किया जाय और उनमें बिना विचारों के इधर-उधर छितराये अर्जुन के मत्स्यवेध की तरह नियत क्रिया कलापों में जुट जायें। जिनने एकाग्रता एकनिष्ठा का महत्व समझा उनने अभीष्ट प्रयोजन में सफलता भी पाई। जो एक दिशा को अपना नहीं सकते, कभी पूरब कभी पश्चिम, कभी उत्तर कभी दक्षिण चलते छितराते रहते हैं, भरपूर प्रयत्न नहीं करते। ऐसे लोग हर काम में असफलता मिलने की शिकायत करें तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए।

अधूरा चिन्तन करने वाले मात्र ब्रह्मचर्य को ही संयम कहते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि उसे जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश देना पड़ता है। इन्द्रिय संयम ऐसा है जो विचारों की विश्रृंखलता पर आरंभिक अंकुश लगाता है। स्वाद और कामुकता पर नियन्त्रण कर लेने से शरीर और मन की डावांडोल स्थिति में स्थिरता आती है। बेतुके विचारों पर एक सीमा का नियंत्रण होता है। यह शुरुआत है। समग्रता का अन्त नहीं। संयम को— जिसे व्यावहारिक जीवन का अध्यात्म ही कहा जा सकता है, उसे इन्द्रिय संयम तक सीमित न रखकर समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम, तक विकसित करना पड़ता है। यह वह छिद्र है जिनमें होकर मनुष्य की विशिष्टता फूटे घड़े में भरे हुए पानी की तरह बिखर जाती है और मनुष्य मात्र छूंछ रह जाता है। जो इन पर नियन्त्रण कर सका उसे आत्मजयी कहना चाहिए। शास्त्रकारों ने आत्मजयी की तुलना विश्वविजय से की है। जो अपने को नियन्त्रित अनुशासित रख सकता है उसी के लिए यह संभव है कि दूसरों को भी दिशा और प्रकाश दे सकें- उपयुक्त मार्ग पर चला सके।

यों समय, साधन, श्रम, कौशल आदि सभी का अपना महत्व है और कार्य की प्रगति एवं सफलता में इन सभी का योगदान अपने-अपने स्थान पर रहता है। किन्तु मनोयोग की समग्रता के बिना यही सभी उतने काम नहीं आते जितना आना चाहिए। मनोयोग का सर्वोपरि महत्व जो समझ सकें उन्हें यह भी समझना चाहिए कि उसे बढ़ाना और लक्ष्य के लिए नियोजित कर सकना तभी संभव है जब अन्य लुभावने विषयों से उसे हटाने का प्रयास पूरा कर लिया जाय। पानी की ढलान नीचे की दशा है। छोटे बच्चे रंगीन खिलौनों पर मचलते देखे गये हैं। मन की भी यही स्थिति है उसे इन्द्रियों विषयों में आसक्ति होती है। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति में जो बड़प्पन अनुभव होता है वह आकर्षक लगता है। समझा जाता है कि सभी लोग हमारी इन सफलताओं पर मुग्ध होंगे, बड़प्पन का लोह मानेंगे और प्रशंसा के ढेर लगा देंगे। पर सच बात तो यह है कि हर व्यक्ति अपने-अपने कामों में इतना व्यस्त है कि उसे दूसरे की प्रगति या अवगति से कुछ लेना-देना नहीं। शहरों की सड़कों पर नित्य बरातें निकलती रहती हैं। उन पर ढेरों खर्च होता रहता है। सज-धज में न जाने कितना ध्यान दिया जाता है और न जाने कितना पैसा खर्च किया जाता है पर दुकानदारों या निकलने वाले मुसाफिरों को इनमें कोई लगाव नहीं होता सिर्फ यह सोचते हैं कि यह बला कब आगे बढ़े और हमारे ऊपर जो घेरा बंदी लग गई है व टले। किन्तु इस स्थिति को ओछे लोग भांप नहीं पाते और यही अनुमान लगाते रहते हैं कि हमारी सजधज की छाप सारे शहर पर पड़ेगी और हमारे बड़प्पन में चार चांद लगेंगे। इसी भ्रम जंजाल में मन की बाल बुद्धि ओछे बचकाने कामों में भटकती रहती है और यह नहीं सोच पाती कि यदि समय, श्रम, कौशल और मन को इस बचकानी खिलवाड़ में से बचाया जा सके और किसी सारगर्भित प्रयोजन के लिए उनका उपयोग किया जा सके तो इसका सत्परिणाम कितना महत्वपूर्ण एवं संतोषप्रद हो सकता है।

जिन लोगों ने महत्वपूर्ण सफलताएं— जिस भी दिशा में पाई हैं उन्हें मन को व्यर्थ के जाल जंजालों में समेट कर एक लक्ष्य पर केन्द्रीभूत करना पड़ा है। पहलवान, विद्वान, विज्ञानी, शोधकर्ता, कलाकार आदि किसी विषय में प्रवीण पारंगत होने वालों से उनकी सफलता का रहस्य पूछा जाय तो वे एक ही उत्तर देंगे कि हमने अपने निर्धारित कार्य में पूरा मन लगाया और वह लग सका तभी जब उसे अनेक भटकावों से रोक कर निगृहीत किया गया। एकलव्य बाण विद्या में इसलिए प्रवीण हो सका कि उसने उस प्रयोजन में अपने को तन्मय कर दिया। प्रत्यक्ष द्रोणाचार्य जो कुशलता अपने वास्तविक शिष्यों को- कौरव पाण्डवों को न उपलब्ध करा सके वह उसने प्राप्त कर ली। यह गुरु भक्ति का या एकाग्रता तन्मयता का चमत्कार समझा जा सकता है।

व्यक्तिगत समस्याओं की तरह ही सामूहिक समस्याओं का दौर है। उसके कारण समूचे समाज की स्थिति डावांडोल है। हर किसी को उनके कारण भय, आतंक, अविश्वास एवं अनिश्चय की स्थिति त्रास दे रही है। कल किसके ऊपर क्या स्थिति आ पड़े इसके संबंध में कोई निश्चित नहीं है। युद्ध, अपराध, छल, भ्रष्टाचार से विश्व का कोई कोना सुरक्षित नहीं। अपने आप को सज्जन, शान्तिप्रिय रखने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि अनाचारियों का आतंक उसकी शान्ति भंग न कर देगा। इन सब कारणों को भी सामूहिक रूप से उसी अनाचार में गिना जाता है जिस असंयम या आतंक कहा जा सकता है। शिकायत की जाती है कि सरकारी कर्मचारी रिश्वत के बिना कोई काम नहीं करना चाहते। गुण्डे संगठित रूप से आक्रमण करते हैं और अगला व्यक्ति पिटता रहता है और अन्य लोग हिमायत में नहीं आते। युद्ध और महायुद्ध होते हैं। उनके आक्रमणकर्ता जनता में से आये हुए जन साधारण ही होते हैं। भ्रष्टाचार बरतने वाले अपने ही लोग होते हैं, कहीं आसमान से नहीं टपकते। व्यवसाय क्षेत्र में चलने वाली जालसाजी करने वाले भी अपने ही लोग हैं। अपने-अपने आरंभिक जीवन में जो देखा, सुना, समझा है वही बड़े होने पर इस रूप में कार्यान्वित होता है जिसे हम सामूहिक अनाचार कहते हैं।

समूह कोई अलग वस्तु नहीं है वह जन समुदाय से मिलकर बनता है। जनता का स्तर जिस प्रकार का होगा उसी में से निकले व्यक्ति कोई भिन्न प्रकार का चिन्तन या आचरण कर सकेंगे इसकी आशा नहीं की जा सकती। सरकारी कर्मचारी पद संभालने से पूर्व नवयुवक और किशोर या विद्यार्थी ही थे उनने अपने चारों ओर जिस प्रकार का प्रचलन देखा उसे ही स्वाभाविक मानकर अपना लिया। इसी प्रकार व्यवसायी, चोर, उचक्के भी आरम्भ में सामान्य बालक, विद्यार्थी या युवक ही थे। उनको उचित प्रशिक्षण एवं वातावरण न मिला तो उन कामों पर उतारू हो गये जिसे दुष्टता कहा जा सकता है और जिसके कारण उनको अपराधी कहा जाता है। राजनेता उन्हीं के वोटों से चुने जाते हैं जो जाति बिरादरी के नाम पर या व्यक्तिगत लोभ लालच से प्रभावित होकर वोट देते हैं। यदि उनमें औचित्य का बोध नहीं है तो प्रजातंत्र के रहते ऐसी सरकार कैसे पा सकते हैं जो सर्वथा स्वच्छ और लोकहित के अतिरिक्त और कुछ न सोचे? लड़ाकू, विग्रही, आतंकवादी, डाकू, हत्यारे यह कलाएं कहीं अन्यत्र से नहीं सीखते। वातावरण में संव्याप्त उच्छृंखलता ही अपने बालकों में आरम्भ से ही छोटी दुष्प्रवृत्तियां अपनाने की गुंजाइश छोड़ती है जो आगे चलकर ऐसा अनर्थ करें जिसका त्रास जन समुदाय को सहना पड़े। एक बार होने वाले अत्याचार का विरोध करने के लिए समीपवर्ती लोग ही उठ खड़े हों तो मुट्ठी भर गुण्डे अपने से हजारों गुने लोगों को आतंकित न कर सकें। युद्धोन्माद उत्पन्न करने में सरकारों के विरुद्ध वहीं की जनता बगावत कर दे तो फिर किस बलबूते वे समीपवर्ती देशों पर आक्रमण करने का साहस कर सकें?

सामूहिक अनाचारों के विरुद्ध समाचार पत्र जनता की आवाज बुलन्द करते रहें तो उन्हें दबा देने या करते रहने वालों का भी भण्डा फोड़े हुए बिना न रहेगा और वे मनमानी करने से बाज आयें। साहित्यकार उसी प्रकार की रचनाएं करें जो पाठकों के मन में दया, करुणा, मैत्री एवं सहकारिता की भावना भरें। अनाचारों के विरुद्ध लड़ मरने के लिए शौर्य साहस उत्पन्न करें। तो जिस तेजी से आज अनाचारी वर्ग बढ़ रहा है उस सीमा तक पहुंचने की नौबत न आये। धर्माचार्य यदि कथापुराणों के मन गढ़न्त किस्से कहानियां कहकर भ्रमजंजाल न फैलाएं और छुटपुट कर्मकाण्डों के फलस्वरूप स्वर्ग में स्थान रिजर्व होने का प्रलोभन देना बन्द कर दें। इसके स्थान पर संयम, सदाचार, सहयोग, अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने की सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने की विधि व्यवस्था बनाने की चेष्टा करें तो धर्मश्रद्धा का समुचित प्रतिफल जन साधारण को मिल सकता है और नागरिकों की धर्म प्रेमियों की नीति निष्ठा परिपक्व हो सकती है।

समाज में मूर्धन्य लोग अपनी प्रतिभा को नीति निष्ठा को उभारने वाले आयोजनों के निमित्त नियोजित करें। अध्यापक आरम्भ से ही निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा कराने के अतिरिक्त छात्रों से अपने व्यक्तिगत चरित्र और प्रयत्न के आधार पर उत्कृष्ट स्तर की नागरिकता उत्पन्न करें तो कोई कारण नहीं कि बड़े होने पर वे लोग अपनी प्रवृत्तियों को रचनात्मक दिशा न दे सकें। समाज में सुख शान्ति और सुरक्षा उत्पन्न करने वाले क्रिया-कलापों को बल न दें।

अपराधों की-अपराधियों की भर्त्सना की जानी चाहिए और साथ ही बड़ी प्रताड़ना की व्यवस्था भी की जानी चाहिए पर यह भूल न जाना चाहिए कि स्वास्थ्य और शिक्षा की तरह नैतिक मान्यताओं की गहरी प्रतिष्ठापना जन मानस में करने के प्रयासों को बढ़ाया जाना भी आवश्यक है। दान दक्षिणा के नाम पर निठल्ले लोगों का पोषण होता है। पर यह प्रयत्न, नहीं किया जाता कि चरित्र निष्ठा को प्रधानता देने वाले साहित्य का सृजन, प्रशिक्षकों का उत्पादन एवं उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए नमूने के केन्द्र बनाने के लिए उस धर्म चेतना को नियोजित किया जाय।

संयम ही सदाचार है और उसी को अध्यात्म कहा जा सकता है। इस दिशा में काम करने वालों को सम्मानित किया जाय और भ्रष्टाचार फैलाने वालों को मात्र जेल जुर्माने की सजा देकर ही कर्तव्य को समाप्त न किया जाय वरन् उनकी बदनामी का भी ऐसा प्रयत्न और प्रदर्शन किया जाय ताकि उनके स्वभाव एवं चरित्र की जन साधारण को जानकारी मिले और अनजान भी जानकारी प्राप्त करके सावधान रहें।

जिस प्रकार इन दिनों अर्थ उपार्जन की दिशा में हर किसी का मन और प्रयास लगा हुआ है उसी प्रकार चिन्तन ही ऐसी प्रचन्ड प्रेरणा भी मिलनी चाहिए कि लोग नीतिनिष्ठा को धन उपार्जन की तुलना में किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण न समझें।
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