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कृपया कथा : एक शिष्य की कलम से गुरुदेव ने कहा - तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेगी।
मेरे नाना जी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते थे, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर आसनसोल जेल में बंदी बना दिया गया।
जेल के बैरक में प्रवेश करते ही एक दुबला-पतला किंतु ऊँची कद-काठी वाला तेजस्वी युवक उनके पास आया। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति और नेत्रों में विलक्षण तेज था। वह हाथ में पानी का गिलास लिए हुए बोला—
“आओ मित्र, पानी पी लो।”
नाना जी ने पानी ग्रहण किया। कुछ क्षण बाद सहज जिज्ञासा से कहा—
“आपने मुझे मित्र कहा, जबकि मैं आपको जानता तक नहीं।”
युवक मंद मुस्कान के साथ बोला—
“तुम नहीं समझ पाओगे। तुम्हारी तो कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेंगी।”
समय बीत गया। जेल से मुक्ति मिली, देश स्वतंत्र हुआ और जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता गया।
वर्ष 1953 में नाना जी को एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र में लिखा ...
शताब्दी नगर से पाषाणों का मौन संदेश
अवतारी सत्ता जब धरती पर अवतरित होती है, तब सृष्टि के जड़–चेतन सभी उसके सहयोगी और अनुयायी बनकर अपने सौभाग्य को उससे जोड़ लेते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत दृश्य इन दिनों हरिद्वार के वैरागी द्वीप पर, गायत्री परिवार के युग-सृजन सैनिकों के भागीरथ पुरुषार्थ से आकार ले रहे शताब्दी नगर में देखने को मिल रहा है।
एक ओर, ठिठुरती शीत ऋतु की कठोरतम परीक्षा के बावजूद, हजारों हाथ एक साथ जुटकर परम वंदनीया माता जी एवं अखंड दीप के शताब्दी समारोह के लिए वैरागी द्वीप को सुसज्जित कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ पाषाण भी स्वयं को कलाकारों के कुशल हाथों में समर्पित कर, अनेक अतिमनोहारी आकृतियों में ढलते हुए शोभायमान हो रहे हैं।
ये पाषाण अब केवल जड़ पदार्थ नहीं रह गए हैं; इन्होंने विचार-क्रांति की लाल मशाल का स्वरूप धारण कर...
कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से । भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी वंदनीया माता जी के गीतों से
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई.." — मीराबाई की ये अमर पंक्तियाँ अनन्य कृष्ण-भक्ति, विरह और आत्मविसर्जन का साक्षात प्रतीक हैं। कहा जाता है कि मीरा जब गाती थीं, तो उनके भावों के वशीभूत होकर स्वयं नटवर नागर थिरकने लगते थे। युग बीत गए, आज भी ये भजन गाए जाते हैं, किंतु वह 'मीरा सा अंतस' और वह 'अगाध भाव' दुर्लभ हो गया है।
किंतु, मैं स्वयं को उन विरले सौभाग्यशाली व्यक्तियों में गिनता हूँ, जिन्हें साक्षात एक ऐसी दिव्य चेतना के समक्ष बैठने का अवसर मिला, जिनके हृदय से अपने आराध्य के लिए भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी। वे थीं—परम वंदनीया माता जी।
उन दिनों मैं माता जी के 'प्रज्ञा-गीतों' की रिकॉर्डिंग करने वाली टीम का एक सदस्य था। जब माता जी रिकॉर्डिंग के लिए गीत की पंक्तियाँ गुनगुनाती थीं, तो वे केवल गा...
कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से चिकित्सा विज्ञान नतमस्तक हुआ माता जी की कृपया के आगे
वर्ष 1994 के आरंभ का समय था। शांतिकुंज के कैंटीन के समीप स्थित खुले मैदान में समयदानी भाई पूरे उत्साह से कबड्डी खेल रहे थे। वातावरण में युवापन, ऊर्जा और आत्मीयता घुली हुई थी। उन्हें खेलते देख मेरा मन भी उमंग से भर उठा और मैं भी सहज भाव से खेल में सम्मिलित हो गया। प्रारंभ में खेल आनंदपूर्वक चलता रहा, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
एक रेड के दौरान विपक्षी टीम ने मुझे घेर लिया। उसी संघर्षपूर्ण क्षण में किसी का पैर मेरे पैर पर आ पड़ा। अगले ही पल हड्डी टूटने की तीक्ष्ण और भयावह आवाज़ गूँज उठी। असहनीय पीड़ा के साथ मैं भूमि पर गिर पड़ा। अगले दिन BHEL अस्पताल में एक्स-रे कराया गया। चिकित्सक ने गंभीरता से बताया कि पैर की टिबिया और फिबुला—दोनों हड्डियाँ टूट चुकी हैं, और केवल टूटी ही नहीं, बल्कि ...
दिव्य अखंड दीप शताब्दी समारोह: शताब्दी नगर का पथ: साधना और संकल्प का प्रतीक
दिव्य अखंड दीप शताब्दी समारोह की मौन तैयारी
परम वंदनीया माता जी एवं दिव्य अखंड दीप शताब्दी समारोह में पधारने वाली विभूतियों के स्वागत हेतु जिस पथ का निर्माण हो रहा है, वह केवल पत्थर और रेत से बना एक साधारण मार्ग नहीं है। यह पथ श्रद्धा, तप और समर्पण से सुसंस्कृत एक ऐसा जीवंत साधना-पथ है, जिस पर चलते हुए हर कदम गुरु-चेतना से जुड़ने का अनुभव कराएगा।
शताब्दी नगर का पथ: साधना और संकल्प का प्रतीक
शताब्दी नगर में आकार ले रहा यह पथ पूज्य गुरुदेव और परम वंदनीया माता जी के उन अनन्य शिष्यों का अभिनंदन करेगा, जिन्होंने युगनिर्माण योजना अभियान को केवल एक कार्य नहीं, बल्कि अपने जीवन का ध्येय माना है। जिनके लिए समय, श्रम और धन—तीनों का अर्पण कोई त्याग नहीं, बल्कि सौभाग्य है।
यह पथ उन तपस्वी जीवनों की कहानी...
कृपा कथा: एक शिष्य की कलम से वंदनीया माता जी की कृपा का चमत्कार
परम वंदनीया माता जी की दिव्य वाणी से उद्घोषित देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत चलाए जा रहे अश्वमेध महायज्ञों की शृंखला गुजरात के वरोडा तक पहुँच गई। मैं और मेरे जैसे हजारों कार्यकर्ता इस महायज्ञ में सेवा को अपना सौभाग्य मानकर, अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर तत्परता से जुटे हुए थे।
महायज्ञ हेतु साधन जुटाने के लिए मैं बलसाड़ से वरोडा आता-जाता रहता था। मेरा परिवार भी वरोडा अश्वमेध में उपस्थित था। मेरी बड़ी बेटी भोजनालय में अचानक किसी कारणवश वह धक्का खाकर खौलते हुए कड़ाहे में गिर गई। तुरंत ही आसपास उपस्थित लोगों ने तत्परता दिखाते हुए उसे कड़ाहे से बाहर निकाला, लेकिन तब तक वह गंभीर रूप से जल चुकी थी।
मैं उस समय अश्वमेध के काम से बलसाड़ गया हुआ था। रात दो बजे जब मैं लौटा और बेटी की हालत देखी, तो मै...
जब नेतृत्व स्नेह बनकर सामने आता है शताब्दी नगर में पीढ़ियों का आत्मीय संगम
जब नेतृत्वकर्ता अपने सहयोगियों और साधकों के सुख–दुःख, सुविधा–अभाव तथा गर्मी–सर्दी की चिंता करते हुए अचानक उनके बीच उपस्थित हो जाएँ, तो थकान स्वतः ही विलीन हो जाती है और चेहरे पर सहज मुस्कान खिल उठती है। ऐसा सान्निध्य मन को नई ऊर्जा देता है और अगले दिन दुगुने उत्साह व संकल्प के साथ कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करता है।
ऐसा ही एक आत्मीय दृश्य उस समय देखने को मिला, जब परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी की जन्मशताब्दी एवं अखंड दीप शताब्दी समारोह स्थल—हरिद्वार के वैरागी द्वीप पर स्थित भव्य टेंट नगरी में—छत्तीसगढ़ ज़ोन के टेंट में शांतिकुंज महिला मंडल की प्रमुख, आदरणीया श्रीमती शेफाली पंड्या दीदी का अचानक आगमन हुआ।
आत्मीय स्वागत, सजीव संवेदना
दीदी के आगमन पर वहाँ उपस्थित युवा बेटियों ने हृदय की ...
पूज्य गुरुदेव की लेखनी साहित्य ही नहीं भाग्य भी रचती है
कुछ व्यक्तित्व केवल इतिहास नहीं रचते, वे जीवन गढ़ते हैं। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ऐसे ही दिव्य अवतारी पुरुष थे, जिनकी लेखनी, दृष्टि और आशीर्वाद से असंख्य जीवनों की धारा बदल गई। यह कथा मेरे जीवन की एक ऐसी ही अनुभूति है, जो आज भी श्रद्धा और कृतज्ञता से हृदय को भर देती है।
मेरे पति पहले से ही पूज्य गुरुदेव माता जी की सेवा में गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज में निवास कर रहे थे। मैं अपने छोटे बेटे और परिवार के साथ गाँव में रहती थी। कुछ समय बाद मैं और मेरा छोटा बेटा कुछ दिनों के लिए शान्तिकुंज आए। बेटे का मन अपने पिता के साथ रहने को बहुत करता था और जैसे ही वह शान्तिकुंज के दिव्य वातावरण में पहुँचा, उसका मन यहाँ गहराई से रम गया।
एक स्टीकर और एक बाल-हठ
एक दिन मेरा बेटा पूज्य गुरुदेव के सद...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 130): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
सूक्ष्मशरीरधारियों का वर्णन और विवरण पुरातन ग्रंथों में विस्तारपूर्वक मिलता है। यक्ष और युधिष्ठिर के मध्य विग्रह तथा विवाद का महाभारत में विस्तारपूर्वक वर्णन है। यक्ष, गंधर्व, ब्रह्मराक्षस जैसे कई वर्ग सूक्ष्मशरीरधारियों के थे। विक्रमादित्य के साथ पाँच ‘वीर’ रहते थे। शिव जी के गण ‘वीरभद्र’ कहलाते थे। भूत-प्रेत, जिन्न, मसानों की अलग ही बिरादरी थी। ‘अलादीन का चिराग’ जिनने पढ़ा है, उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों की जानकारी होगी। छायापुरुष-साधना में अपने निज के शरीर से ही एक अतिरिक्त सत्ता गढ़ ली जाती है और वह एक समर्थ अदृश्य साथी-सहयोगी जैसा काम करती है।
इन सूक्ष्मशरीरधारियों में अधिकांश का उल्लेख हानिकारक या नैतिक दृष्टि से हेयस्तर पर हुआ है। संभव है, उन दिनों अतृप्त, विक्षुब्ध स्तर के योद्धा रण...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 129): स्थूल का सूक्ष्मशरीर में परिवर्तन— सूक्ष्मीकरण
यह स्थिति शरीर त्यागते ही हर किसी को उपलब्ध हो जाए, यह संभव नहीं। भूत-प्रेत चले तो सूक्ष्मशरीर में जाते हैं, पर वे बहुत ही अनगढ़ स्थिति में रहते हैं। मात्र संबंधित लोगों को ही अपनी आवश्यकताएँ बताने भर के कुछ दृश्य कठिनाई से दिखा सकते हैं। पितरस्तर की आत्माएँ उनसे कहीं अधिक सक्षम होती हैं। उनका विवेक एवं व्यवहार कहीं अधिक उदात्त होता है। इसके लिए उनका सूक्ष्मशरीर पहले से ही परिष्कृत हो चुका होता है। सूक्ष्मशरीर को उच्चस्तरीय क्षमतासंपन्न बनाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। वे तपस्वी स्तर के होते हैं। सामान्य काया को सिद्धपुरुष स्तर की बनाने के लिए अगला कदम सूक्ष्मीकरण का है। सिद्घपुरुष अपनी काया की सीमा में रहकर जो दिव्य क्षमता अर्जित कर सकते हैं; कर लेते हैं, उसी से दूसरों की सेवा-सहायत...
