शताब्दी नगर से पाषाणों का मौन संदेश
अवतारी सत्ता जब धरती पर अवतरित होती है, तब सृष्टि के जड़–चेतन सभी उसके सहयोगी और अनुयायी बनकर अपने सौभाग्य को उससे जोड़ लेते हैं। ऐसा ही एक अद्भुत दृश्य इन दिनों हरिद्वार के वैरागी द्वीप पर, गायत्री परिवार के युग-सृजन सैनिकों के भागीरथ पुरुषार्थ से आकार ले रहे शताब्दी नगर में देखने को मिल रहा है।
एक ओर, ठिठुरती शीत ऋतु की कठोरतम परीक्षा के बावजूद, हजारों हाथ एक साथ जुटकर परम वंदनीया माता जी एवं अखंड दीप के शताब्दी समारोह के लिए वैरागी द्वीप को सुसज्जित कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ पाषाण भी स्वयं को कलाकारों के कुशल हाथों में समर्पित कर, अनेक अतिमनोहारी आकृतियों में ढलते हुए शोभायमान हो रहे हैं।
ये पाषाण अब केवल जड़ पदार्थ नहीं रह गए हैं; इन्होंने विचार-क्रांति की लाल मशाल का स्वरूप धारण कर लिया है—जिसके सान्निध्य में असंख्य प्रतिभाशाली, विद्वान, एवं भावनाशील जन-सामान्य एकत्रित हैं। इन सभी की सम्मिलित शक्ति, विचार-क्रांति की इस लाल मशाल को थामे, युग-परिवर्तन का अग्रिम संदेश समूची मानवता तक पहुँचा रही है।
इन जड़ पाषाणों का चेतन जगत के प्राणियों के लिए सीधा और मौन संदेश है— “तुम्हारे पास ज्ञान है, विवेक है, समझ है। तो क्या युग-निर्माण में भूमिका निभाने का अधिकार केवल तुम्हारा ही है? मैं स्वयं कुछ नहीं कर सकता, किंतु गुरुदेव के किसी कलाकार शिष्य के हाथों स्वयं को सौंपकर, लाल मशाल की आकृति में ढलकर उनके संदेश का वाहक अवश्य बन सकता हूँ।” वह गीत सुना है न?
लाल ये मशाल पूज्य गुरुजी को प्यारा है ।
जिसकी जगमग ज्योति से सारा जग उजियारा है ।।
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