DHARMA
अब दर्शन की बारी है, उसे कुछ करने दिया जाए
विज्ञान का तात्पर्य— “प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं है, वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत, तथ्यपूर्ण एवं सत्यनिष्ठ बनाने तक चली जाती है।” विज्ञान का उपयोग भौतिक सुख-सुविधाओं के संवर्द्धन अथवा जानकारियों का क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं है, वरन् वास्तविक उपयोग यह है कि हम तथ्य और सत्य को प्रश्रय दें। परंपराएँ कितनी ही पुरानी अथवा बहुमान्य क्यों न हों, यदि वे यथार्थता और उपयोगिता की कसौटी पर सही नहीं उतरतीं तो उन्हें बदलने के लिए सदा तत्पर रहें। नए या पुराने के झंझट में न पड़कर विज्ञानी सत्य को ही मान्यता प्रदान करता है।
विज्ञान न केवल एक प्रक्रिया है, वरन् एक प्रवृत्ति भी है। जिसका फलितार्थ है— साहसपूर्ण विवेचनात्मक एवं तथ्य...
धर्म और दर्शन की उत्क्रांति भी आवश्यक
भावी पीढ़ी को मानसिक दिग्भ्रांति से बचाने के लिए यह प्रश्न सुलझाना आवश्यक है। धर्म के गिरते हुए मूल्य को देखकर ऐसा लगता है कि कहीं आने वाली पीढ़ियाँ पूर्णतया पदार्थवादी होकर अपनी आध्यात्मिक शक्तियाँ नष्ट न कर डालें।
हमारी तरह से ऐसे विचार दुनिया के अनेक मनीषियों के मस्तिष्क में आए और उन्होंने अपनी-अपनी तरह के विचार भी दिए। किसी भी ठोस निर्णय के लिए उनके विचारों का बड़ा भारी महत्त्व हो सकता है। एक अमरीकी स्नातक श्री हेरोल्ड केशेलिंग के मस्तिष्क में भी यह प्रश्न उठा था। उन्होंने “विज्ञान और धर्म में क्या संबंध है?” इस संबंध में विस्तृत अध्ययन किया और अपने निर्णयों को एक ‘थीसिस’ के रूप में ‘साइंस एंड रिलीजन’ (विज्ञान और धर्म) के नाम से पेन्सिलवेनिया यूनीवर्सिटी को प्रस्तुत किया। थीसिस के मध्यपृ...
धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता रहा है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एकदूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता रहा है। इसलिए दोनों की दिशा विपरीत मान ली गई और माना गया कि किसी धार्मिक के लिए विज्ञान को समझना एवं किसी वैज्ञानिक को धर्म के बारे में जानना आवश्यक नहीं।
इतने पर भी यह शाश्वत सत्य यथास्थान है, धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई हैं। एक ही पर्वत से निकलने वाले दो महानिर्झर हैं। क्षेत्र-भिन्नता की दृष्टि से उनका स्वरूप भिन्न है, तो भी वे एक ही महाप्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उनकी उपयोगिता मनुष्य के कंधों में जुड़ी हुई दो भुजाओं जैसी हैं। वे एकदूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। धर्म और विज्ञान दोनों एक ही ...
विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य
पदार्थ के रूप में विज्ञान भी आंतरिक सत्ता का ही तो उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्वव्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण हैं। सच तो यह है कि शक्ति के अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। धर्म उसे अंतर्चेतना के रूप में देखता है। वह उदाहरण देता है कि गांधी जी का आत्मबल ही था, जिसने ब्रिटिश सत्ता को बिना लड़े निकाल दिया और विज्ञान कहता है, एक छोटे से शस्त्र ने जो हिरोशिमा के 70 हजार नागरिक पल भर में भून डाले, वह क्या कम जबर्दस्त शक्ति थी। भले ही एक का स्वरूप रचनात्मक हो और दूसरे का स्वभाव ध्वंस, पर विज्ञान और धर्म दोनों ने ही शक्ति के एक ही स्वरूप की जानकारी दी है। दोनों में कोई विरोध नहीं है।
यह झगड़ा तो राम और शिव की तरह का है। राम, शिव के उपासक हैं और शिव, राम के...
धर्म की उपेक्षा से पछतावा ही हाथ लगेगा
जीवन उतना जटिल नहीं है, जितना कि बन गया है या बना दिया गया है। हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है। अति स्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्थाक्रम चलाते रहते हैं। न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता। यदि उन्हें सताया न जाए तो शरीरयात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन-सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हँसी-खुशी के दिन काटते हैं।
मनुष्य को यह सुविधा और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री, वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्...
धर्म और विज्ञान को मिलकर चलना होगा
धर्म को पूजा-प्रक्रिया तक और विज्ञान को शिल्प व्यवसाय तक सीमित रखा जाए, तो दोनों की गरिमा बढ़ेगी नहीं, गिरेगी ही। दोनों अपंग-अधूरे रह जाएँगे। इन दोनों का परस्पर पूरक होकर रहना उचित ही नहीं, आवश्यक है। पदार्थ में सौंदर्य निखारने का यही तरीका है। कारीगर कलाकार तब बनता है, जब अपने क्रियाकलाप में भावपूर्ण मनोयोग को नियोजित करता है। भावपूर्ण मनोयोग तब कल्पना मात्र बनकर रह जाएगा, जब उसमें श्रेष्ठ निष्ठा जुड़ी न होगी। इसी प्रकार मात्र श्रम की कोल्हू के बैल से— भारवाही गधे से तुलना की जाती रहेगी। दोनों का समन्वय ही कर्मकौशल बनकर सामने आता है।
समग्र ज्ञान को दो भागों में बाँटा जा सकता है— एक अंतर्बोध पर आधारित अध्यात्म अथवा धर्म। दूसरा तर्क, परीक्षण, अनुभव तथा बताए गए तथ्यों के आधार पर भौतिक जगत संबं...
धर्म और विज्ञान के समन्वय में ही कल्याण है
नर और नारी का कार्यक्षेत्र भिन्न है। नारी गृह-व्यवस्था में संलग्न रहती है। गर्भधारण और शिशुपालन यह दोनों काम उसी को करने होते हैं। नर का कार्यक्षेत्र भिन्न है। वह खेत, दफ्तर, कारखाने आदि में काम करता है और उस उपार्जन से गृह-व्यवस्था के लिए नारी की आवश्यकताएँ पूरी करता है। देखने में दोनों के बीच भारी भिन्नता दिखाई पड़ती है। शरीर की रचना की दृष्टि से भी कई अवयवों में प्रतिकूल दीखने वाला भारी अंतर भी रहता है। सहज स्वभाव में भी थोड़ा, किंतु महत्त्वपूर्ण अंतर रहता है। इतने पर भी वे दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। दोनों के सम्मिलित प्रयत्न से ही गृहस्थ की गाड़ी इन दो पहियों के सघन सहयोग से ही गतिशील रहती और आगे बढ़ती है।
जागृति और सुषुप्ति का अंतर स्पष्ट है। जागते समय मनुष्य सक्रिय रहता है और सोते समय...
ज्ञान ही नहीं, मनुष्य को धर्म भी चाहिए
आत्मा है या नहीं? इसका उत्तर हाँ और ना में दोनों ही तरह दिया जा सकता है। हाँ, उनके लिए ठीक है, जो ज्ञान के आधार पर सूक्ष्म विषयों पर विचार कर सकने और निष्कर्ष निकाल सकने में समर्थ हैं। ना, उनके लिए जो मात्र इंद्रियों के सहारे ही चेतनसत्ता का दर्शन करना चाहते हैं। चेतन सूक्ष्म है। वह चेतनसत्ता की ज्ञानानुभूति के द्वारा समझा और देखा जा सकता है।
सूर्य की रोशनी और फूल की शोभा की अनुभूति उन्हीं को हो सकती है, जिनकी आँखें सही हों। यदि दृष्टि समाप्त हो जाए तो अपने लिए संसार के सभी दृश्य समाप्त हो जाएँगे; भले ही वे अन्य लोगों के लिए यथावत् बने रहें। दृश्यों की अनुभूति में जितना महत्त्व पदार्थों के अस्तित्व का है, उससे अधिक अपनी दृष्टि का है। यह ज्ञान ही है, जो हमें दृश्य या श्रव्य के स्थूल रूप की तु...
बुद्धि पर धर्म का अंकुश रखा जाए
चेतना के क्षेत्र में मन और बुद्धि का एक क्षेत्र है और श्रद्धा एवं सुसंस्कारिता का दूसरा। मन भौतिक साधनों के सहारे इंद्रियतृप्ति तथा अहंता की पूर्ति चाहता है। अर्थसंचय तथा बड़प्पन प्रदर्शित करने वाले दूसरे प्रसंग मन के प्रिय विषय हैं। बुद्धि यदि सामान्य स्तर की है और नरपशुओं जैसी है तो फिर उसे मन की इच्छाएँ पूरी करने में ही अभिरुचि होगी। वह उसी का तर्क-प्रमाण ढूँढ़कर समर्थन करेगी तथा उन कामनाओं की पूर्ति का ताना-बाना बुनेगी। क्षुद्र प्राणियों में न धर्म होता है, न आदर्श। शरीरयात्रा एवं सुख-साधनों के लिए जो भी मार्ग सरल दीखता है, सामने होता है। उसी को वे अपना लेते हैं। मनुष्य शरीर में भी पशुस्तर की अविकसित चेतना रहती है। वन-मनुष्य इस स्तर के होते हैं।
मानव शरीर में मनुष्यस्तर की चेतना विकसित ह...
विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ चलना होगा
विज्ञान और अध्यात्म अन्योन्याश्रित हैं। एकदूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। विज्ञान हमारे साधनों को बढ़ाता है और अध्यात्म आत्मा को। आत्मा को खोकर साधनों की मात्रा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, उनसे मनुष्य भोगी, व्यसनी, अहंकारी और स्वार्थी ही बनेगा। महत्त्वाकांक्षाएँ मनुष्य को नीति तक सीमित नहीं रहने देतीं। आकुल-व्याकुल व्यक्ति कुछ भी कर गुजरता है। उसे अनीति अपनाने और कुकर्म करने में भी कोई झिझक नहीं होती। अध्यात्म चिंतन को— आकांक्षाओं को— क्रिया को— उन मर्यादाओं की परिधि में बाँधकर रखता है, जिसमें व्यक्ति का चरित्र और समाज का व्यवस्थाक्रम अक्षुण्ण बना रह सके। अस्तु, दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से उपयोगी हैं।
ईसा कहते थे— “मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जी सकता। सा...
