बुद्धि पर धर्म का अंकुश रखा जाए
चेतना के क्षेत्र में मन और बुद्धि का एक क्षेत्र है और श्रद्धा एवं सुसंस्कारिता का दूसरा। मन भौतिक साधनों के सहारे इंद्रियतृप्ति तथा अहंता की पूर्ति चाहता है। अर्थसंचय तथा बड़प्पन प्रदर्शित करने वाले दूसरे प्रसंग मन के प्रिय विषय हैं। बुद्धि यदि सामान्य स्तर की है और नरपशुओं जैसी है तो फिर उसे मन की इच्छाएँ पूरी करने में ही अभिरुचि होगी। वह उसी का तर्क-प्रमाण ढूँढ़कर समर्थन करेगी तथा उन कामनाओं की पूर्ति का ताना-बाना बुनेगी। क्षुद्र प्राणियों में न धर्म होता है, न आदर्श। शरीरयात्रा एवं सुख-साधनों के लिए जो भी मार्ग सरल दीखता है, सामने होता है। उसी को वे अपना लेते हैं। मनुष्य शरीर में भी पशुस्तर की अविकसित चेतना रहती है। वन-मनुष्य इस स्तर के होते हैं।
मानव शरीर में मनुष्यस्तर की चेतना विकसित हो सके, तो उसे उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता कहते हैं। इनका समन्वित चिंतन-दृष्टिकोण— अध्यात्म कहलाता है और इनकी प्रेरणा से अपनाया गया क्रियाकलाप— धर्म कहलाता है। मानवी गरिमा को धर्म संस्कृति के आधार पर परखा जाता है। इसका विकास होने पर व्यक्ति आदर्शों की बात सोचता है। कर्त्तव्य को समझता है और शालीनता की जीवन-नीति अपनाने के लिए तत्पर होता है। स्पष्टतः श्रेष्ठता का मार्ग अपनाने में उन लोगों की तुलना में घाटा ही रहता है, जो नीति-अनीति का भेद किए बिना जो कुछ भी सुखद प्रतीत होता है, उसी को कर गुजरते हैं। अंतिम परिणाम की बात दूसरी है। वह प्रत्यक्ष तो होता नहीं और तत्काल मिलता भी नहीं है। बीज को वृक्ष बनने में देर लगती है। उसी प्रकार सदाचरण के सत्परिणाम भी समयसाध्य होते हैं। उनका अनुमान लगाना दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने पर ही संभव होता है।
आवश्यक नहीं कि जिसमें तत्काल का लाभ दीखता है, वह कुछ समय उपरांत भी वैसा ही सुखद बना रहे, जैसा कि तुरंत के उपयोग में दीखता है। इसी प्रकार यह भी निश्चित नहीं कि जो इस समय कष्टकर लगता है, वह कुछ समय बाद भी वैसा ही बना रहे। ऐसा कभी-कभी ही होता है, जो आरंभ और अंत में एक जैसा बना रहे। बहुत करके तात्कालिक-लाभ जिसमें प्रतीत होता है, वे अपनी प्रतिक्रिया दुःखद उपस्थित करते हैं और अनेक बार आरंभ में कठिनाई सहने पर पीछे उसके सत्परिणाम चिरकाल तक उपलब्ध होते रहते हैं। मन अदूरदर्शी है। वह तत्काल के लाभ पर मचलता है। बुद्धि को अंधा पक्षपात करने वाले वकील की उपमा दी जाती है। सनक की ललक और लिप्सा— वासना और तृष्णा— पूरी करने के लिए उपाय सोचना और सरंजाम जुटाना, वह तत्काल आरंभ कर देती है। अवांछनीयता के विरोध में भीतर से या बाहर से विरोध हो, तो वह ऐसे-ऐसे तर्क गढ़ती है कि अपने निश्चय और प्रयत्न को किसी न किसी प्रकार सही सिद्ध किया जा सके। विवादों में प्रायः यही होता है। न उनका अंत आता है, न कोई निर्णय होता है। प्रतिपक्षी वर्गों में से कोई हार मानने को तैयार नहीं होता। शास्त्रार्थ होते रहे हैं। उनसे चिढ़ भर बढ़ती है। आक्रमण-प्रत्याक्रमण का सिलसिला चल पड़ता है और मतभेद बढ़कर विद्वेष और आक्रमण का रूप धारण कर लेता है। भले-से-भले और बुरे-से-बुरे कार्य एवं विचार के पक्ष में कोई चतुर व्यक्ति इतने तर्क और प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है कि सामान्य व्यक्ति हतप्रभ होकर रह जाए। उसे यह निर्णय करते ही न बने कि दोनों में से कौन पक्ष सही है। वकीलों के बुद्धिकौशल का चमत्कार इसी स्तर का देखा जा सकता है। एक वकील के पास एक ही तरह के दो मुकदमे हैं। दोनों की स्थिति बिलकुल एक जैसी हो। उसे एक में वादी की— दूसरे में प्रतिवादी की पैरवी करनी पड़े, तो वह एक पक्ष में एक प्रकार के— दूसरे के पक्ष में दूसरे प्रकार के तर्क एवं प्रमाण उपस्थित करता है। दोनों अवसरों पर उसके जो दो प्रकार के प्रतिपादन होते हैं, उससे इस निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन होता है कि सही क्या और गलत क्या है? तर्क के आधार पर यदि निर्णय निकल सके होते तो अब तक शास्त्रों के आधार पर धार्मिक, दार्शनिक, एवं सामाजिक समस्याएँ कब की सुलझ गई होतीं। तब राजनैतिक एवं दूसरे विवाद भी सहज ही हल हो जाया करते। तर्क से जो जिसको परास्त कर देता, वही विजयी बन जाया करता।
यहाँ तर्क का प्रतिवाद नहीं किया जा रहा है और न उसे निरर्थक बताने की बात चल रही है। उसकी उपयोगिता-आवश्यकता तो रहेगी ही। उसकी सहायता के बिना तो किसी निष्कर्ष पर पहुँचना ही संभव न होगा। यहाँ तो यह कहा जा रहा है कि शुष्क तर्क मात्र से तात्कालिक-लाभ के पक्ष में जो आतुरता उत्पन्न होती है, उससे आवेश की रोक-थाम नहीं हो सकती। उसकी रोक-थाम के लिए न केवल विवेक की, वरन् आदर्शों के प्रति श्रद्धा की भी आवश्यकता पड़ती है। उसका अभाव हो, तो भी तात्कालिक-लाभ ही सर्वोच्च हितसाधन प्रतीत होगा और उसी की पूर्ति में सर्वोपरि बुद्धिमानी प्रतीत होगी। अनैतिक आचरणों में— विलासिता के असंयम में— यही मनःस्थिति रहती है। स्वार्थी और अपराधी प्रकृति के मनुष्यों पर तात्कालिक-लाभ ही छाया रहता है। अवांछनीय मार्ग पर चलने से पीछे पश्चात्ताप करना पड़ सकता है, यह बात वे जानते हैं, पर क्षेत्र में दूरदर्शी, विवेक और नीतिसम्मत धर्म का प्रभाव कम रहने से किया वही जाता रहता है, जिसमें तत्काल लाभ मिले। पीछे उसका परिणाम भले ही हानिकारक बनता रहे। तर्क के साथ नीति का जुड़े रहना आवश्यक है। बुद्धि का उपयोग किया जाए, पर उसके पीछे मानवी आदर्शों के प्रति सघन श्रद्धा का समावेश हो। यदि ऐसा न हो सका तो निरंकुश बुद्धि भी उतनी ही हानिकारक होगी, जितनी कि दुष्ट के हाथ में पहुँचने पर धन, शस्त्र, अधिकार आदि का दुरुपयोग होता है और उससे करने वाले तथा भुगतने वालों को समान रूप से कष्ट सहना पड़ता है। इसलिए मनीषियों ने मन और बुद्धि की उपयोगिता स्वीकार करते हुए भी विवेक एवं धर्म का उन पर अंकुश रखने के लिए कहा है।
शुष्क तर्क की दृष्टि से प्रत्येक आदर्शवादी कार्य हानिकारक प्रतीत होता है। पुण्य परमार्थ में प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं; उलटे समय, श्रम, धन की हानि ही होती है। संयम बरतने में मन मारना पड़ता है और असुविधाएँ सहनी पड़ती हैं। दूसरों को सुखी बनाने के लिए सेवाधर्म अपनाने में स्वयं को कष्ट सहना पड़ेगा। अनीतिकर्त्ताओं का असहयोग करने पर अपने ऊपर आक्रमण होने का भय रहता है। इस प्रत्यक्ष को देखते हुए कोई सदाशयता क्यों अपनाए? तर्क के आधार पर बूढ़े बैल को कसाई के हाथों बेचने से स्थान और चारे की बचत तथा नकद पैसा मिलने का लाभ प्रत्यक्ष है। उसकी पुरानी सेवा का ध्यान रखते हुए— पेंशन के रूप में जीवित रहने तक चारा देते रहने में कोई लाभ नहीं। हर तर्क की दृष्टि से कसाई के हाथों बेचने में ही समझदारी प्रतीत होती है। ठीक इसी तर्क के आधार पर बूढ़े माता-पिता से भी इसी प्रकार पिंड छुड़ाने के पक्ष में अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को प्रस्तुत करते हुए दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन हो सकता है। इसी दृष्टि को अपना लें तो फिर कोई नारी प्रसव-वेदना सहने और बच्चे के पालन में यौवन का क्षरण एवं सुविधाओं में अड़चन पड़ने की बात को स्वीकार क्यों करेगी? उसमें उसे प्रत्यक्षतः घाटा-ही-घाटा है।
मानवी उत्कर्ष के पीछे आदर्शवादी सिद्धांत ही काम करते रहे हैं। यदि वे न होते तो आपस में लड़ते-मरते रहने वाले हिंस्र पशुओं की तरह ही मनुष्य भी स्वार्थ-संघर्ष में एकदूसरे पर घात-प्रतिघात चलाते हुए कब के मर-खपकर समाप्त हो गए होते। स्नेह, सहयोग, सद्भाव, सेवा, उदारता, संयम जैसे आदर्शवादी सिद्धांतों को अपनाने वाले आरंभ में थोड़े घाटे में रहते हैं, पर प्रकारांतर से उन्हें उस सज्जनता का लाभ असंख्य गुना होकर मिल जाता है। इस तथ्य को हृदयंगम कराने के लिए आदर्शवादी नीतिमत्ता की— धर्मनिष्ठा की— आवश्यकता पड़ेगी। इसका समर्थन तात्कालिक-लाभ पर आधारित शुष्क तर्क नहीं कर सकते। संकीर्ण बुद्धि उसकी पक्षधर नहीं हो सकती है। क्षुद्र मन और क्षुद्र बुद्धि अपनाए रहकर मनुष्य नरपशुओं के स्तर का ही बना रहेगा। उसकी चतुरता कौए और शृंगाल के स्तर की ओछी एवं कुटिल ही बनी रहेगी। तात्कालिक-लाभ के लिए ललचाने वाले तर्क आरंभ में अति मधुर लगते हुए भी अंततः नितांत अहितकर सिद्ध होंगे।
मन को दसवीं इंद्रिय माना गया है। बुद्धि उसी का एक अंग है। शरीर में जिस प्रकार ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय भौतिक जानकारियाँ देने, अनुभूतियाँ कराने तथा साधन जुटाने के काम आती हैं, उसी प्रकार मन का कार्य भी भौतिक-क्षेत्र की व्यवस्था जुटाना ही होता है। शरीर और मन पंचभौतिक हैं। उनकी आवश्यकता, अभिरुचि एवं चेष्टा अपने सजातीय भौतिक-क्षेत्र में ही सीमित रह सकती है। चेतना का अंश इससे ऊँचा है। आत्मा की आवश्यकता साधनों तक सीमित नहीं है। उसका संतोष अपने स्तर की उपलब्धियों पर अवलंबित है। उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व से ही उसका समाधान एवं उत्कर्ष होता है। इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा, उमंग एवं साहसिकता उत्पन्न करने की क्षमता मात्र धर्मधारणा में ही है। धर्म का तात्पर्य यहाँ अध्यात्म से है— सांप्रदायिक प्रचलन से नहीं। उसे अपनाकर ही मनुष्य सच्चे अर्थों में बुद्धिमान सिद्ध होता है। ऋतंभरा प्रज्ञा ही मानवी उत्कृष्टता का समर्थन करती और आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाती है। क्षुद्र बुद्धि से नहीं, हमारा वास्तविक हितसाधन प्रज्ञायुक्त श्रद्धा के सहारे ही संभव हो सकता है। शुष्क तर्क भरे विकृत बुद्धिवाद को अपनाकर हम चतुर भर बन सकते हैं, किंतु वह चतुरता दाने के लोभ में जाल में फँसकर जान गँवाने वाले पक्षी की तरह अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है।
विज्ञान-बुद्धि से हम चित्र की लंबाई-चौड़ाई नाप सकते हैं। उसमें लगे रंगों का विश्लेषण कर सकते हैं। यहीं उसकी सीमा समाप्त हो जाती है। चित्र में जो सौंदर्य है; जो भाव-अभिव्यंजना है, उसका लेखा-जोखा प्रस्तुत कर सकने का कोई मापदंड विज्ञान के पास नहीं है। ऐसी दशा में चित्रों का मूल्यांकन— क्या उसमें प्रयुक्त हुए पदार्थों को नाप-तौलकर करना ही ठीक रहेगा?
आँसुओं के पानी का वैज्ञानिक विश्लेषण पानी, खनिज, श्लेष्मा, क्षार, प्रोटीन का सम्मिश्रण भर किया जा सकता है। प्रयोगशालाएँ आँसुओं का स्वरूप इतना ही बता सकेंगी। ऐसी दशा में क्या उनके साथ जुड़े हुए— स्नेह, ममता, करुणा, व्यथा, वेदना आदि के अस्तित्व से इनकार कर दिया जाए? अथवा इन संवेदनाओं को इसलिए अमान्य ठहरा दिया जाए; क्योंकि उसका कोई प्रमाण पदार्थ-विश्लेषण द्वारा उपलब्ध नहीं हो सका।
मनुष्य का शरीर, विज्ञान की दृष्टि से, कुछ रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्रण मात्र है। उसकी गतिविधियों का आधार अन्न, जल और वायु से मिलने वाली ऊर्जा है। मस्तिष्कीय चिंतन को शरीरगत संवेदनाओं से प्रभावित आवेश मात्र कहकर विज्ञान दूर जा बैठता है। आत्मा का, निष्ठा का, भाव-संवेदना का, आदर्शों के लिए कष्ट सहने का— त्याग करने की उमंगों का— विज्ञान के पास कोई समाधान नहीं? ऐसी दशा में क्या मनुष्य को, आत्मा और भावना से रहित एक रासायनिक-यंत्र कहकर संतोष कर लिया जाए?
देहात के अशिक्षित लोग अपेक्षाकृत सुखी, संतुष्ट और निश्चिंत पाए जाते हैं, जबकि शिक्षित और संपन्न वर्ग के लोग अधिक चिंतन, उद्विग्न और असंतुष्ट रहते हैं। इसका कारण बुद्धि का एकांगी विकास है। उसके ऊपर से आस्थाओं का आवरण हट जाने से मानसिक उच्छृंखलता न केवल अचिंत्य-चिंतन के आधार प्रस्तुत करती है, वरन् उन दुष्कर्मों को करने के लिए भी छूट देती है, जो मनुष्य के गौरव और समाजगत अनुशासन को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देते हैं। उद्धत महत्त्वाकांक्षाएँ मनुष्य को एक प्रकार से ऐसा अर्द्ध-विक्षिप्त बना देती हैं, जो कामनापूर्ति के लिए उचित-अनुचित का भेद त्यागकर कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर हो जाता है। असीम उपभोग की ललक सीमित क्षमता और सामान्य परिस्थिति में पूर्ण नहीं हो सकती। असीम उपलब्धि के साधन नहीं जुटते, ऐसी दशा में हर समय मनुष्य पर खीज चढ़ी रहती है और उसकी अभिवृद्धि से मनःक्षेत्र विषाक्त हो जाता है। ऐसे लोग अपराध-कृत्यों में निरत, उद्धत, अशांत और हत्या अथवा आत्महत्या के लिए उतारू दीखते हैं। उन्हें अपने चारों ओर का वातावरण प्रतिकूल दीखता है। प्रतिकूलता को पचा सकने का संतुलन भी आध्यात्मिक विवेकदृष्टि से ही बनता है। चूँकि दर्शन को पहले ही तिलांजलि दी जा चुकी थी। इसलिए तथाकथित मरघट के प्रेत-पिशाचों से भी गई-गुजरी मनःस्थिति में लोगों को अपने दिन गुजारने पड़ते हैं। शिक्षा, धन, पद, वैभव और परिवार की उपलब्धियाँ निरर्थक सिद्ध होती हैं। उनसे कोई समाधान नहीं निकलता। आकांक्षाओं के तूफान में उपलब्धियों के तिनके अस्त-व्यस्त छितराए उड़ते-फिरते हैं। मनुष्य पर अभाव और असंतोष ही छाया रहता है। हर घड़ी बेचैनी अनुभव होती है।
शांति, संतोष और विश्वास की छाया यदि देखनी हो तो पिछड़े अशिक्षित, देहाती और निर्धन क्षेत्र में किसी न किसी मात्रा में अवश्य मिल जाएगी, किंतु सुसंपन्न वर्ग में उसके दर्शन भी दुर्लभ होंगे। मित्रता के नाम पर चापलूसी ही बिखरी दिखाई देगी। क्या गहन घनिष्ठता, आत्मीयता एवं सघन निष्ठा के दर्शन दुर्लभ होंगे। परिवार एवं मित्रमंडली में मित्रता के चोचले तो बहुत चल रहे होंगे, पर जिस वफादारी में एक दूसरे के लिए मर-मिटता है, उसका कहीं पता भी न होगा। यह बात आंतरिक स्थिति के बारे में निश्चिंत और निर्द्वंद मनोभूमि कदाचित् ही किसी को मिलेगी। मनोविकारों के तूफान उठ रहे होंगे और उनकी जलन से उद्विग्नता इस कदर बढ़ी हुई होगी कि जीवन का रस उसमें जल-भुनकर नष्ट ही हो चलेगा।
इसमें निर्धनता को श्रेय और संपन्नता को निकृष्ट होना कारण नहीं है, वरन् यह है कि तथाकथित पिछड़े वर्ग ने अपने विश्वासों में उन तत्त्वों का किसी कदर समावेश करके रखा, जिन्हें अध्यात्म के वर्ग में रखा जा सकता है। भाग्यवाद, ईश्वर पर विश्वास, संतोष, वचन का पालन, वफादारी का निर्वाह जैसी आस्थाएँ तथाकथित विज्ञसमाज में दकियानूसी कही जा सकती है, पर जिनने उन्हें हृदयंगम किया है, वे अज्ञ इन विज्ञों की अपेक्षा अधिक हर्षोल्लास लेकर जा रहे होंगे। दूसरी ओर संपन्नता का लाभ केवल शरीर पाता है। वे सुविधा-साधनों का उपयोग अधिक कर लेते हैं। इससे शारीरिक-सुविधा में कमी नहीं रहती, फिर भी अंतःकरण अतृप्त और क्षुब्ध ही बना रहता है; क्योंकि उसे आस्थाओं का आहार नहीं मिल सका। प्यार और विश्वास के अभाव में मनःस्थिति मरघट जैसी वीभत्स ही बनी रहेगी। बहिरंग सुविधा-साधन उस अभाव की पूर्ति न कर सकेंगे, भले ही वे कितने ही बढ़े-चढ़े क्यों न हों।
देखते हैं कि आस्था खोकर संपन्न वर्ग ने कुछ नहीं पाया, जबकि आस्था को अपनाए रहकर तथाकथित पिछड़ा वर्ग लाभ में रहा। आस्थाएँ गँवाकर भटकाव और विक्षोभ के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। वैभव अपने साथ जो उत्तेजनाएँ लेकर आता है, उनके कारण उपलब्ध होने वाले दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों की बहुलता— न शरीर को स्वस्थ रहने देती है और न मन को संतुलित। चढ़ाव-उतार और प्रतिस्पर्द्धा की जटिल प्रतिक्रियाएँ इतनी दुर्धर्ष होती हैं कि उनके सामने हर्षोल्लास का वह वातावरण भी नहीं टिक पाता, जिसे सरल और सौम्य प्रकृति का सामान्य मनुष्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करता हुआ अपने पिछड़ेपन को भी सराहता रहता है। संपन्नता और सुशिक्षा लोक और परलोक दोनों ही गँवा बैठती है, जबकि वैभव रहित व्यक्ति कम-से-कम एक को तो हथियाये ही रहते हैं। हत्या और आत्महत्या जैसे कुकृत्य अनास्था के बूचरखाने में ही होते हैं। आस्थावान सहन भी कर लेता है और भविष्य के प्रति विश्वासी भी रहता है, पर जिसने इन निष्ठाओं को उखाड़ फेंका है, उनके लिए मन को समाधान कर सकने वाला संबल ही हाथ से निकल जाता है। संयम और सत्कर्म के लिए— औचित्य और विवेक के लिए— उन्हीं के जीवन में स्थान रहता है, जिन्होंने आस्थाओं को मजबूती से पकड़कर रखा है। अनात्मवान “खाओ-पियो, मजा करो” से आगे की कोई बात सोच ही नहीं सकता। ऐसा वर्ग जिस समाज में बढ़ता है, उसका भविष्य अंधकारमय बनकर ही रहेगा। संशय और अविश्वास की मनोभूमि में विक्षोभ के विषवृक्ष ही उगते हैं।
स्थिरता तभी तक रहेगी, जब तक बुद्धि और धर्म का समन्वय रहेगा। बुद्धि से शक्ति अर्जित की जाए और धर्म का परामर्श लेकर उसका उपयोग किया जाए, तो ही दुरुपयोग से बचा जा सकता है और तज्जनित दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। बुद्धि पर से धर्म का नियंत्रण हट जाने से ऐसी भयावह उच्छृंखलता उत्पन्न होती है, जिसके सामने बुद्धि के सुखद उपार्जन का कोई महत्त्व ही नहीं रह जाता। विज्ञान, शिक्षा, कला, तकनीकी शिल्प आदि के क्षेत्र में इन दिनों भारी प्रगति हुई है, किंतु उससे मानवी सुख-शांति में कोई वृद्धि नहीं हुई। आंतरिक स्तर तनिक भी नहीं बढ़ा, वरन् आदिमयुग की जंगली सभ्यता की ओर लौट पड़ा। जबकि बढ़े हुए सुविधा-साधनों के सहारे व्यक्ति और समाज को अधिक परिष्कृत स्थिति का लाभ मिलना चाहिए था। बौद्धिक-विकास और तज्जनित उपलब्धियों का परिवार भस्मासुर की तरह सर्वनाश का आयोजन करने में जुटा हुआ है। परमाणु को तोड़कर प्रचंड शक्ति को हस्तगत तो कर लिया गया, पर अब वही मनुष्य के अस्तित्व को चुनौती देने पर तुल गई है। बुद्धि पर धर्म का नियंत्रण रहना इन परिस्थितियों में अनिवार्य हो गया है। निरंकुश स्वेच्छाचार तो हमें नष्ट करके ही छोड़ेगा।
बुद्धि का महत्त्व कितना ही क्यों न हो, वह चेतना के स्वरूप को समझाने और उसकी समस्याओं को सुलझाने में असमर्थ ही रहेगी। बुद्धि से तात्पर्य— “यहाँ उस मस्तिष्कीय चेतना से है, जो शरीर की आवश्यकताएँ तथा मन की लालसाएँ पूरी करने के लिए ताना-बाना बुनती रहती है। उसके माध्यम से प्रकृति की गहराई में उतर सकना संभव है।” पदार्थ के उपयोग एवं उपभोग में भी बुद्धि का भरपूर प्रयोग हो सकता है। व्यावहारिक जीवन की क्रिया-कुशलता का लाभदायक स्वरूप क्या हो सकता है, इस संबंध में मस्तिष्कीय चेतना का बुद्धिपक्ष अपना काम ठीक तरह पूरा कर सकता है, पर मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने के लिए— आत्मा की प्रखरता, तुष्टि एवं प्रगतिशीलता के लिए— जिस दृष्टिकोण का अपनाया जाना आवश्यक है, उसके संबंध में सामान्य बुद्धि का विशेष उपयोग नहीं है। शरीर और आत्मा दोनों साथ-साथ गुँथे हुए हैं, फिर भी दोनों का स्वरूप और स्तर भिन्न है। ठीक इसी प्रकार जानकारी करने वाली लौकिक बुद्धि और उत्कृष्टता का उद्देश्य पूरा कराने वाली विवेक-बुद्धि का अंतर भी स्पष्ट है। विवेक के साथ उत्कृष्टता की भाव-संवेदना मिल जाने पर जो समझदारी जाग्रत होती है, उसी को प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा ही धर्म-बुद्धि है। उसी का उदय मनुष्य का सौभाग्य माना गया है। ईश्वरीय अनुकंपा का आविर्भाव इसी ऋतंभरा प्रज्ञा के रूप में होता है। यही है वह उपलब्धि, जिसके लिए गायत्री मंत्र के रूप में आत्मा ने परमात्मा से भाव भरी प्रार्थना एवं याचना की है।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं, पूरक हैं, बुद्धि पर धर्म का अंकुश रखा जाए , पृष्ठ 44-54
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