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शांति और सौंदर्य को अपने अंदर खोजो
उनसे प्यार करो, जिन्हें लोग पतित, गर्हित और हेय समझते हैं। जिन्हें केवल निंदा और भर्त्सना ही मिलती है। जो अपने ऊपर लदे हुए पिछड़ेपन के कारण न किसी के मित्र बन पाते हैं और न जिन्हें कोई प्यार करता है। प्यार करने योग्य वही लोग हैं, जिन्हें स्नेह-सद्भाव देकर तुम अपने को गौरवान्वित करोगे। माँगो मत। चाहो मत। देकर ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करो।
उन्हें देखने के लिए मत दौड़ो, जिनकी त्वचा चमकीली और गठन में सुंदरता भरी है। ऐसा तो तितलियाँ और भौंरे भी कर सकते हैं। तुम उन्हें निहारो, जो दरिद्रता और रुग्णता की चक्की में पिसकर कुरूप लगने लगे हैं। अभावों के कारण जिनकी अस्थियाँ उभर रही हैं और आँखों की चमक छिन गई है। निराशों में आशा का संचार करके तुम अपने को धन्य अनुभव करो।
कोलाहल और क्रंदन के साथ जुड़...
समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर
प्रौढ़ता को प्राप्त करता हुआ विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, जिन पर सदियों पूर्व भारतीय तत्त्ववेत्ता ज्योतिर्विद् पहुँच चुके थे। समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है, जिसका प्रत्येक स्पंदन हर घटक को प्रभावित करता है, जिसमें पृथ्वी और संबंधित वातावरण, वनस्पति एवं जीवधारी भी सम्मिलित हैं। प्राचीनकाल में ज्योतिष विज्ञान इसी दिशा में अनुसंधान करने, प्रमाण जुटाने और अंतर्ग्रही तथ्यों की खोज-बीन करने में सचेष्ट था, जिसकी अनेकानेक उपलब्धियों से समय-समय पर मानवजाति लाभान्वित होती रहती थी। विज्ञान का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और अंतर्ग्रही टोह लेने का सिलसिला आरंभ हुआ है। यह शुभ चिह्न है। फिर भी ज्योतिर्विज्ञान के बिना अंतरिक्षीय खोज-बीन करने में विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। इस दिशा में प्राची...
संवेदना की समस्या को कौन सुलझाएगा?
ज्ञान के दो पक्ष हैं— एक विचारणा, दूसरा संवेदना। विचार मस्तिष्क की देन हैं। वे बाहर से होते हैं; प्रशिक्षण एवं अनुभव के सहारे। भाव भीतर से उठते हैं। वे अंतःकरण के उत्पादन हैं। विचारों से जानकारी तो बढ़ती है और बुद्धि में परिपक्वता आती है, पर उनका प्रभाव अंतस् पर नहीं के बराबर पड़ता है। बहुत पढ़ने और बहुत सुनने से भी आंतरिक उत्कृष्टता उभरने का कोई निश्चय नहीं।
अंतस् तो भावों का भंडारगार है। वहाँ से निस्सृत होते हैं और वहीँ के चुंबकत्व से उन्हें बाह्य जगत में से आकर्षित एवं ग्रहण किया जाता है। विचार की गति, तर्क और तथ्य के सहारे होती है और वे बढ़ते-बढ़ते विज्ञान का स्वरुप धारण कर लेते हैं। विचार के आधार पर यह संसार— पदार्थ गुच्छक या गुलदस्ता मात्र है। अथवा विभिन्न प्रकार की तरंग-प्रवाह का अंधड़-क्...
विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय निश्चित
अध्यात्म और विज्ञान को पिछले दिनों परस्पर विरोधी माना जाता रहा है। नवीनतम शोधें उन्हें पूरक ही नहीं, एकीभूत भी सिद्ध कर रही हैं। चेतना के क्षेत्र में वैज्ञानिक चिंतन का योग अगले दिनों शोध के नए आधार प्रस्तुत करेगा। यह विश्वास किया जाना चाहिए, विज्ञान के बढ़ते हुए चरण पदार्थ की मूलसत्ता की नवीन व्याख्या करेंगे, जिसका प्रतिपादन भारतीय दर्शन सदा से करता चला आ रहा है।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, क्या धर्म अफीम की गोली है?, विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय निश्चित, पृष्ठ 46
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असीम पर निर्भर ससीम जीवन
“धरती पर जीवनोपयोगी परिस्थितियों का आधार जिन रासायनिक हलचलों और आणविक गतिविधियों पर निर्भर है, वे अंतरिक्ष से आने वाले रेडियो-तरंगों पर अवलंबित हैं। शक्ति के स्रोत उन्हीं में हैं। विविध विधि हलचलों की अधिष्ठात्री इन्हीं को कहना चाहिए। हमारा परिवार— हमारा शरीर— हमारा अस्तित्व सब कुछ प्रकारांतर से इन रेडियो-तरंगों पर निर्भर है, जिन्हें हम आत्मा की तरह जानते भले ही नहीं, पर निश्चित रूप से अवलंबित उन्हीं पर हैं। जीवन लगता भर अपना है, पर उसमें समाविष्ट प्राण इसी दृश्य सत्ता पर निर्भर हैं, जिन्हें विज्ञान की भाषा में ‘रेडियो तरंग पुंज’ कहते हैं।
चेतन जगत में जिस तरह ब्रह्म की सत्ता व्याप्त है, उसी तरह पदार्थों के अस्तित्व और क्रियाकलाप में इन रेडियो-तरंगों की सत्ता प्राण की तरह समाई हुई है।
यह तर...
अब दर्शन की बारी है, उसे कुछ करने दिया जाए
विज्ञान का तात्पर्य— “प्रकृति के कुछ रहस्यों का उद्घाटन अथवा कुछ उपकरणों का निर्माण कर लेना मात्र नहीं है, वरन् उसकी व्यापकता मानवी दृष्टिकोण को अधिक सुविस्तृत, तथ्यपूर्ण एवं सत्यनिष्ठ बनाने तक चली जाती है।” विज्ञान का उपयोग भौतिक सुख-सुविधाओं के संवर्द्धन अथवा जानकारियों का क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं है, वरन् वास्तविक उपयोग यह है कि हम तथ्य और सत्य को प्रश्रय दें। परंपराएँ कितनी ही पुरानी अथवा बहुमान्य क्यों न हों, यदि वे यथार्थता और उपयोगिता की कसौटी पर सही नहीं उतरतीं तो उन्हें बदलने के लिए सदा तत्पर रहें। नए या पुराने के झंझट में न पड़कर विज्ञानी सत्य को ही मान्यता प्रदान करता है।
विज्ञान न केवल एक प्रक्रिया है, वरन् एक प्रवृत्ति भी है। जिसका फलितार्थ है— साहसपूर्ण विवेचनात्मक एवं तथ्य...
धर्म और दर्शन की उत्क्रांति भी आवश्यक
भावी पीढ़ी को मानसिक दिग्भ्रांति से बचाने के लिए यह प्रश्न सुलझाना आवश्यक है। धर्म के गिरते हुए मूल्य को देखकर ऐसा लगता है कि कहीं आने वाली पीढ़ियाँ पूर्णतया पदार्थवादी होकर अपनी आध्यात्मिक शक्तियाँ नष्ट न कर डालें।
हमारी तरह से ऐसे विचार दुनिया के अनेक मनीषियों के मस्तिष्क में आए और उन्होंने अपनी-अपनी तरह के विचार भी दिए। किसी भी ठोस निर्णय के लिए उनके विचारों का बड़ा भारी महत्त्व हो सकता है। एक अमरीकी स्नातक श्री हेरोल्ड केशेलिंग के मस्तिष्क में भी यह प्रश्न उठा था। उन्होंने “विज्ञान और धर्म में क्या संबंध है?” इस संबंध में विस्तृत अध्ययन किया और अपने निर्णयों को एक ‘थीसिस’ के रूप में ‘साइंस एंड रिलीजन’ (विज्ञान और धर्म) के नाम से पेन्सिलवेनिया यूनीवर्सिटी को प्रस्तुत किया। थीसिस के मध्यपृ...
धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता रहा है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एकदूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता रहा है। इसलिए दोनों की दिशा विपरीत मान ली गई और माना गया कि किसी धार्मिक के लिए विज्ञान को समझना एवं किसी वैज्ञानिक को धर्म के बारे में जानना आवश्यक नहीं।
इतने पर भी यह शाश्वत सत्य यथास्थान है, धर्म और विज्ञान जुड़वाँ भाई हैं। एक ही पर्वत से निकलने वाले दो महानिर्झर हैं। क्षेत्र-भिन्नता की दृष्टि से उनका स्वरूप भिन्न है, तो भी वे एक ही महाप्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उनकी उपयोगिता मनुष्य के कंधों में जुड़ी हुई दो भुजाओं जैसी हैं। वे एकदूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। धर्म और विज्ञान दोनों एक ही ...
विज्ञान और धर्म में समन्वय अनिवार्य
पदार्थ के रूप में विज्ञान भी आंतरिक सत्ता का ही तो उद्घाटन करता है। धर्म के क्षेत्र में परमात्मा एक विश्वव्यापक शक्ति है और पदार्थ भी शक्ति के ही कण हैं। सच तो यह है कि शक्ति के अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। धर्म उसे अंतर्चेतना के रूप में देखता है। वह उदाहरण देता है कि गांधी जी का आत्मबल ही था, जिसने ब्रिटिश सत्ता को बिना लड़े निकाल दिया और विज्ञान कहता है, एक छोटे से शस्त्र ने जो हिरोशिमा के 70 हजार नागरिक पल भर में भून डाले, वह क्या कम जबर्दस्त शक्ति थी। भले ही एक का स्वरूप रचनात्मक हो और दूसरे का स्वभाव ध्वंस, पर विज्ञान और धर्म दोनों ने ही शक्ति के एक ही स्वरूप की जानकारी दी है। दोनों में कोई विरोध नहीं है।
यह झगड़ा तो राम और शिव की तरह का है। राम, शिव के उपासक हैं और शिव, राम के...
धर्म की उपेक्षा से पछतावा ही हाथ लगेगा
जीवन उतना जटिल नहीं है, जितना कि बन गया है या बना दिया गया है। हँसी-खुशी की संभावनाओं से वह भरा-पूरा है। शरीर और मन की संरचना इस प्रकार हुई है कि वह बाहर के तनिक से साधनों की सुविधा प्राप्त हो जाने पर सहज ही स्वस्थ और सुखी रह सकता है। अति स्वल्प साधनों से अन्य जीवधारी अपना संतोषपूर्ण व्यवस्थाक्रम चलाते रहते हैं। न उन्हें रुग्णता सताती है और न खिन्नता। यदि उन्हें सताया न जाए तो शरीरयात्रा की प्रचुर परिमाण में उपलब्ध साधन-सामग्री से ही अपना काम चला लेते हैं और हँसी-खुशी के दिन काटते हैं।
मनुष्य को यह सुविधा और भी अधिक मात्रा में उपलब्ध है। उसका अस्तित्व एवं व्यक्तित्व इतना समर्थ है कि न केवल शारीरिक सुविधा की सामग्री, वरन् मानसिक प्रसन्नता की परिस्थिति भी स्वल्प प्रयत्न से प्रचुर मात्रा में प्...

