JSS
कृपा-कथा : एक शिष्य की कलम से परम वंदनीया माता जी जगन्माता माँ जगदंबा हैं
परम वंदनीया माता जी मेरे लिए केवल एक श्रद्धेय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि साक्षात् जगन्नमाता—मां जगदंबा की अवतारी चेतना हैं। यह मेरा अटूट, अडिग और जीवनानुभव से उपजा विश्वास है। हमारा विराट गायत्री परिवार परम वंदनीया माता जी की ममत्वमयी गोद और वात्सल्यपूर्ण छाया में ही पला-बढ़ा है। उन्हीं के करुणामय प्रेम के कारण आज लगभग पंद्रह करोड़ साधक, संसार के कोने-कोने में रहते हुए भी, प्रेम और आत्मीयता की एक अदृश्य डोर से बंधे हुए हैं। यह कोई भावनात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्य है, जिसे असंख्य जीवनों ने अनुभूत किया है।
यह प्रसंग मेरे जीवन के उस कालखंड का है, जब मैं स्नातक के अंतिम वर्ष में अध्ययन कर रहा था। मेरा परिवार पहले से ही गायत्री परिवार से जुड़ा हुआ था। घर के लोग श्रद्धा और निष्ठा के साथ ...
कृपया कथा : एक शिष्य की कलम से गुरुदेव ने कहा - तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेगी।
मेरे नाना जी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाते थे, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर आसनसोल जेल में बंदी बना दिया गया।
जेल के बैरक में प्रवेश करते ही एक दुबला-पतला किंतु ऊँची कद-काठी वाला तेजस्वी युवक उनके पास आया। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति और नेत्रों में विलक्षण तेज था। वह हाथ में पानी का गिलास लिए हुए बोला—
“आओ मित्र, पानी पी लो।”
नाना जी ने पानी ग्रहण किया। कुछ क्षण बाद सहज जिज्ञासा से कहा—
“आपने मुझे मित्र कहा, जबकि मैं आपको जानता तक नहीं।”
युवक मंद मुस्कान के साथ बोला—
“तुम नहीं समझ पाओगे। तुम्हारी तो कई पीढ़ियाँ मेरा कार्य करेंगी।”
समय बीत गया। जेल से मुक्ति मिली, देश स्वतंत्र हुआ और जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता गया।
वर्ष 1953 में नाना जी को एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र में लिखा ...
कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से । भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी वंदनीया माता जी के गीतों से
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई.." — मीराबाई की ये अमर पंक्तियाँ अनन्य कृष्ण-भक्ति, विरह और आत्मविसर्जन का साक्षात प्रतीक हैं। कहा जाता है कि मीरा जब गाती थीं, तो उनके भावों के वशीभूत होकर स्वयं नटवर नागर थिरकने लगते थे। युग बीत गए, आज भी ये भजन गाए जाते हैं, किंतु वह 'मीरा सा अंतस' और वह 'अगाध भाव' दुर्लभ हो गया है।
किंतु, मैं स्वयं को उन विरले सौभाग्यशाली व्यक्तियों में गिनता हूँ, जिन्हें साक्षात एक ऐसी दिव्य चेतना के समक्ष बैठने का अवसर मिला, जिनके हृदय से अपने आराध्य के लिए भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी। वे थीं—परम वंदनीया माता जी।
उन दिनों मैं माता जी के 'प्रज्ञा-गीतों' की रिकॉर्डिंग करने वाली टीम का एक सदस्य था। जब माता जी रिकॉर्डिंग के लिए गीत की पंक्तियाँ गुनगुनाती थीं, तो वे केवल गा...
कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से चिकित्सा विज्ञान नतमस्तक हुआ माता जी की कृपया के आगे
वर्ष 1994 के आरंभ का समय था। शांतिकुंज के कैंटीन के समीप स्थित खुले मैदान में समयदानी भाई पूरे उत्साह से कबड्डी खेल रहे थे। वातावरण में युवापन, ऊर्जा और आत्मीयता घुली हुई थी। उन्हें खेलते देख मेरा मन भी उमंग से भर उठा और मैं भी सहज भाव से खेल में सम्मिलित हो गया। प्रारंभ में खेल आनंदपूर्वक चलता रहा, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
एक रेड के दौरान विपक्षी टीम ने मुझे घेर लिया। उसी संघर्षपूर्ण क्षण में किसी का पैर मेरे पैर पर आ पड़ा। अगले ही पल हड्डी टूटने की तीक्ष्ण और भयावह आवाज़ गूँज उठी। असहनीय पीड़ा के साथ मैं भूमि पर गिर पड़ा। अगले दिन BHEL अस्पताल में एक्स-रे कराया गया। चिकित्सक ने गंभीरता से बताया कि पैर की टिबिया और फिबुला—दोनों हड्डियाँ टूट चुकी हैं, और केवल टूटी ही नहीं, बल्कि ...
कृपा कथा: एक शिष्य की कलम से वंदनीया माता जी की कृपा का चमत्कार
परम वंदनीया माता जी की दिव्य वाणी से उद्घोषित देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत चलाए जा रहे अश्वमेध महायज्ञों की शृंखला गुजरात के वरोडा तक पहुँच गई। मैं और मेरे जैसे हजारों कार्यकर्ता इस महायज्ञ में सेवा को अपना सौभाग्य मानकर, अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर तत्परता से जुटे हुए थे।
महायज्ञ हेतु साधन जुटाने के लिए मैं बलसाड़ से वरोडा आता-जाता रहता था। मेरा परिवार भी वरोडा अश्वमेध में उपस्थित था। मेरी बड़ी बेटी भोजनालय में अचानक किसी कारणवश वह धक्का खाकर खौलते हुए कड़ाहे में गिर गई। तुरंत ही आसपास उपस्थित लोगों ने तत्परता दिखाते हुए उसे कड़ाहे से बाहर निकाला, लेकिन तब तक वह गंभीर रूप से जल चुकी थी।
मैं उस समय अश्वमेध के काम से बलसाड़ गया हुआ था। रात दो बजे जब मैं लौटा और बेटी की हालत देखी, तो मै...
पूज्य गुरुदेव की लेखनी साहित्य ही नहीं भाग्य भी रचती है
कुछ व्यक्तित्व केवल इतिहास नहीं रचते, वे जीवन गढ़ते हैं। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ऐसे ही दिव्य अवतारी पुरुष थे, जिनकी लेखनी, दृष्टि और आशीर्वाद से असंख्य जीवनों की धारा बदल गई। यह कथा मेरे जीवन की एक ऐसी ही अनुभूति है, जो आज भी श्रद्धा और कृतज्ञता से हृदय को भर देती है।
मेरे पति पहले से ही पूज्य गुरुदेव माता जी की सेवा में गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज में निवास कर रहे थे। मैं अपने छोटे बेटे और परिवार के साथ गाँव में रहती थी। कुछ समय बाद मैं और मेरा छोटा बेटा कुछ दिनों के लिए शान्तिकुंज आए। बेटे का मन अपने पिता के साथ रहने को बहुत करता था और जैसे ही वह शान्तिकुंज के दिव्य वातावरण में पहुँचा, उसका मन यहाँ गहराई से रम गया।
एक स्टीकर और एक बाल-हठ
एक दिन मेरा बेटा पूज्य गुरुदेव के सद...

.jpg)
