कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से चिकित्सा विज्ञान नतमस्तक हुआ माता जी की कृपया के आगे
वर्ष 1994 के आरंभ का समय था। शांतिकुंज के कैंटीन के समीप स्थित खुले मैदान में समयदानी भाई पूरे उत्साह से कबड्डी खेल रहे थे। वातावरण में युवापन, ऊर्जा और आत्मीयता घुली हुई थी। उन्हें खेलते देख मेरा मन भी उमंग से भर उठा और मैं भी सहज भाव से खेल में सम्मिलित हो गया। प्रारंभ में खेल आनंदपूर्वक चलता रहा, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
एक रेड के दौरान विपक्षी टीम ने मुझे घेर लिया। उसी संघर्षपूर्ण क्षण में किसी का पैर मेरे पैर पर आ पड़ा। अगले ही पल हड्डी टूटने की तीक्ष्ण और भयावह आवाज़ गूँज उठी। असहनीय पीड़ा के साथ मैं भूमि पर गिर पड़ा। अगले दिन BHEL अस्पताल में एक्स-रे कराया गया। चिकित्सक ने गंभीरता से बताया कि पैर की टिबिया और फिबुला—दोनों हड्डियाँ टूट चुकी हैं, और केवल टूटी ही नहीं, बल्कि मुड़ भी गई हैं। उनके मत में ऑपरेशन के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं था। प्राथमिक उपचार स्वरूप कच्चा प्लास्टर चढ़ाकर मुझे शांतिकुंज वापस लाया गया।
कुछ ही दिनों बाद परम वंदनीया माता जी ने मुझे अपने पास बुलाया। उनके समीप पहुँचते ही उन्होंने करुणा और वात्सल्य से पूछा—
“क्या हुआ लल्लू, हड्डी तुड़वा लाया?”
फिर स्नेहपूर्ण आश्वासन देते हुए बोलीं—
“कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा। पर एक बात का ध्यान रखना— ऑपरेशन नहीं कराना।”
मैंने संकोचपूर्वक चिकित्सकों की राय रखी, किंतु माता जी ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा—
“तेरी हड्डी मैं जोड़ूँगी। डॉक्टरों की बातों में मत आना।”
उस क्षण मुझे ऐसा अनुभव हुआ मानो किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे अपनी गोद में ले लिया हो। माता जी का यह वाक्य मात्र शब्द नहीं था, वह उनके संरक्षण का अमोघ संकल्प था।
घटना का समाचार पाकर परिजन शांतिकुंज पहुँचे। उन्होंने माता जी से मुझे पैतृक घर ले जाने की अनुमति माँगी। माता जी ने स्पष्ट कहा—
“अभी नहीं। जब जाना होगा, तब मैं स्वयं बताऊँगी।”
लगभग एक माह पश्चात् माता जी ने जाने की अनुमति दी। घर पहुँचने पर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज, लखनऊ, बुंदेलखंड और बनारस के अनेक प्रतिष्ठित चिकित्सकों को दिखाया गया। सभी का निष्कर्ष एक ही था— ऑपरेशन अनिवार्य है। किंतु मेरी श्रद्धा अडिग थी। माता जी की आज्ञा मेरे लिए चिकित्सा-विज्ञान से भी ऊपर थी। मैंने निश्चय कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में ऑपरेशन नहीं कराऊँगा।
समय धीरे-धीरे बीतता गया। पीड़ा, प्रतीक्षा और साधना के उस काल में माता जी का आशीर्वाद मेरी सबसे बड़ी शक्ति बना रहा। और अंततः, लगभग डेढ़ वर्ष पश्चात्, मैं पुनः अपने पैरों पर खड़ा हो सका। यह केवल शारीरिक उपचार नहीं था, यह माता जी की कृपाछाया में घटित हुआ एक चमत्कार था।
जब स्वस्थ होकर पुनः शांतिकुंज पहुँचा, तब तक परम वंदनीया माता जी अपनी सांसारिक लीलाएँ समेटकर महाप्रयाण कर चुकी थीं। उनके देहावसान का समाचार हृदय को विदीर्ण कर गया, किंतु साथ ही यह अनुभूति भी प्रगाढ़ हुई कि वे देह में न होकर भी सदा संरक्षण में हैं।
आज जब उस समय को स्मरण करता हूँ, तो स्पष्ट अनुभव होता है कि शांतिकुंज में एक माह तक रोकना और ऑपरेशन न कराने का उनका सख्त आदेश— दोनों ही मेरे जीवन में आने वाली किसी बड़ी अनहोनी से रक्षा करने के लिए था। वह उनके वात्सल्य, करुणा और दिव्य संरक्षण की ही अभिव्यक्ति थी।
जब-जब माता जी के सान्निध्य की वे पावन स्मृतियाँ हृदय-पटल पर उभरती हैं, नेत्र स्वतः ही अश्रुधारा बहाने लगते हैं। शब्द मौन हो जाते हैं और अंतःकरण केवल यही कह पाता है—
माता जी, आपकी कृपाछाया में जीवन स्वयं एक प्रसाद बन गया।
Recent Post
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 146): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक-एक लाख की पाँच शृंखलाएँ सँजोने का संकेत हुआ। उसका तात्पर्य है— कली से कमल बनने की तरह खिल पड़ना। अब हमें इस जन्म की पूर्णाहुति में पाँच हव्य सम्मिलित करने पड़ेंगे। वे इस प्रकार हैं—
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 145): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हमारे निजी जीवन में भगवत्कृपा निरंतर उतरती रही है। चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने का अत्यंत कठोर साधनाक्रम उन्हीं दिनों से लाद दिया गया जब दुधमुँही किशोरावस्था भी पूरी नहीं हो पाई थी। इसके बा...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी की महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्द्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले ही पुरस्कार पाते हैं। खरे...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 143): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
वर्तमान समस्याएँ एकदूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ संबंध है। चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव; बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएँ। एक को सुल...
विज्ञान की छलाँग मात्र शरीर तक ही क्यों?
बौद्धिक दृष्टि से आज का मानव प्राचीनकाल की तुलना में कई गुना आगे है। प्रतिभा के चमत्कार सर्वत्र दिखाई पड़ रहे हैं। एक सदी की वैज्ञानिक उपलब्धियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे मानवी प्रगति ने स...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 142): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
उपासना का वर्तमान चरण सूक्ष्मीकरण की सावित्री-साधना के रूप में चल रहा है। इस प्रक्रिया के पीछे किसी व्यक्तिविशेष की ख्याति, संपदा, वरिष्ठता या विभूति नहीं हैं। एक मात्र प्रयोजन यही है कि मानवीसत्ता...
आधुनिक तकनीक का मानव मूल्य से समन्वय:
विज्ञान का उपनयन संस्कार
विज्ञान मानव बुद्धि की महान उपलब्धि है। उसने प्रकृति के रहस्यों को उजागर कर जीवन को सुविधाजनक बनाया है। प्रारम्भिक काल में विज्ञान केवल सिद्धान्तों तक सीमित था,...
विज्ञान का उपनयन संस्कार कराया जाय
विज्ञान ऊर्जा का प्रतिनिधि है। उसके द्वारा मानव पंच महाभूतों पर स्वामित्व प्रस्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखता है। विज्ञान ने न्यूटन के काल तक मुख्यतः सैद्धान्तिक क्षेत्र में ही विचरण किया तब तक म...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 141): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
पत्रकारों और राजनीतिज्ञों के क्षेत्र में इस बार एक अत्यधिक चिंता यह संव्याप्त है कि इन दिनों जैसा संकट मनुष्य जाति के सामने है, वैसा मानवी उत्पत्ति के समय में कभी भी नहीं आया। शांति-परिषद् आदि अनेक...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 140): ‘विनाश नहीं सृजन’— हमारा भविष्यकथन
Read More

.jpg)
