समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर
प्रौढ़ता को प्राप्त करता हुआ विज्ञान अब उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, जिन पर सदियों पूर्व भारतीय तत्त्ववेत्ता ज्योतिर्विद् पहुँच चुके थे। समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है, जिसका प्रत्येक स्पंदन हर घटक को प्रभावित करता है, जिसमें पृथ्वी और संबंधित वातावरण, वनस्पति एवं जीवधारी भी सम्मिलित हैं। प्राचीनकाल में ज्योतिष विज्ञान इसी दिशा में अनुसंधान करने, प्रमाण जुटाने और अंतर्ग्रही तथ्यों की खोज-बीन करने में सचेष्ट था, जिसकी अनेकानेक उपलब्धियों से समय-समय पर मानवजाति लाभान्वित होती रहती थी। विज्ञान का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ और अंतर्ग्रही टोह लेने का सिलसिला आरंभ हुआ है। यह शुभ चिह्न है। फिर भी ज्योतिर्विज्ञान के बिना अंतरिक्षीय खोज-बीन करने में विज्ञान उतना सक्षम नहीं है। इस दिशा में प्राचीन भारतीय ज्ञान सहायक सिद्ध हो सकता है। इस विषय पर भारतीय प्राचीन ज्योतिर्विदों ने गहन अनुसंधान किए एवं निष्कर्ष निकाले हैं। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धांत, कालक्रियापाद, गोलपाद, सूर्य सिद्धांत और उस पर नारदेव, ब्रह्मगुप्त के संशोधन, परिवर्द्धन, भास्कर स्वामी का महाभास्करीय आदि दुर्लभ और अमूल्य ग्रंथ अनेकानेक रहस्यों एवं निष्कर्षों से भरे पड़े हैं। ज्योतिष सिद्धांत पुस्तक के प्रथम पाद में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के सिद्धांत समझाए गए है। मात्र तीस श्लोकों में दशमलव वर्ग, क्षेत्रफल, घनमूल, त्रिभुजाकार शंकु का घनफल निकालने जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों की जानकारी सूत्र रूप आबद्ध है। कालक्रियापाद में खगोलशास्त्र का विशद वर्णन है। इसी तरह उसका अंतिम पाद 50 श्लोकों का अध्याय ‘गोलपाद’ अपने में ज्योतिष विज्ञान के महत्त्वपूर्ण रहस्यों पर प्रकाश डालता है। अपने पंचसैद्धांतिक में बाराहमिहिर ने पोलिश, रोमक, वशिष्ठ, सौर और पितामह नामक पाँच ज्योतिर्सिद्धांतों का वर्णन किया है, जो ज्योतिर्विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डालते हैं। ज्योतिर्विज्ञान के शोधकर्त्ताओं के लिए अतीत के महान ज्योतिर्विदों द्वारा संग्रहित किया गया वह ज्ञानपथ प्रदर्शन कर सकता है।
— अखण्ड ज्योति, जनवरी 1999, समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर
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