संवेदना की समस्या को कौन सुलझाएगा?
ज्ञान के दो पक्ष हैं— एक विचारणा, दूसरा संवेदना। विचार मस्तिष्क की देन हैं। वे बाहर से होते हैं; प्रशिक्षण एवं अनुभव के सहारे। भाव भीतर से उठते हैं। वे अंतःकरण के उत्पादन हैं। विचारों से जानकारी तो बढ़ती है और बुद्धि में परिपक्वता आती है, पर उनका प्रभाव अंतस् पर नहीं के बराबर पड़ता है। बहुत पढ़ने और बहुत सुनने से भी आंतरिक उत्कृष्टता उभरने का कोई निश्चय नहीं।
अंतस् तो भावों का भंडारगार है। वहाँ से निस्सृत होते हैं और वहीँ के चुंबकत्व से उन्हें बाह्य जगत में से आकर्षित एवं ग्रहण किया जाता है। विचार की गति, तर्क और तथ्य के सहारे होती है और वे बढ़ते-बढ़ते विज्ञान का स्वरुप धारण कर लेते हैं। विचार के आधार पर यह संसार— पदार्थ गुच्छक या गुलदस्ता मात्र है। अथवा विभिन्न प्रकार की तरंग-प्रवाह का अंधड़-क्षेत्र उसे कह सकते हैं। विद्युत-चुंबकीय लहरों से भरा-पूरा समुद्र भर यह संसार रह जाता है। ऐसे ही कुछ नाम और भी उसे दिए जा सकते हैं। मस्तिष्कीय चेतना पदार्थ ज्ञान पर अवलंबित है और वह अपनी सीमा उसी परिधि के अंतर्गत रखती है। यही उसकी मर्यादा है। उसके आगे की ऐसी कोई बात मस्तिष्क के आधार पर नहीं जानी या पाई जा सकती, जो ह्रदय से— अंतस् से संबंधित है।
भाव-संवेदना, अंतस् का उत्पादन है। धर्म को संवेदना का उद्गमस्त्रोत कह सकते हैं। वह उपदेश नहीं, उपचार है, जिसके सहारे दिव्य चक्षुओं पर चढ़ी हुई धुंध को दूर किया जा सकता है। उस धुंध के हटने पर पदार्थ के अंतराल में संव्याप्त सत्ता को देखा जाता है। उसी के सहारे ब्रह्मांडव्यापी चेतना की अनुभूति होती है, जिसे विश्वात्मा कहा जाता है और जिसका घटक आत्मा है। विचार से पदार्थ के गुण-कर्म-स्वभाव और उपयोग को जाना जाता है। धर्म से आत्मा का साक्षात्कार होता है और जीवन को आत्मा के अनुशासन में चलने के लिए प्रशिक्षित-अभ्यस्त किया जाता है।
“मन की कल्पनाशक्ति और बुद्धि की निर्णय-शक्ति के संयुक्त परिणाम को बुद्धि-कौशल कहते हैं। सूझ-बूझ, विद्वता और विशेषज्ञता इसी की परिणति है। इतने पर भी संवेदना पर इस सारी बुद्धिमत्ता का कोई असर नहीं है। धर्म अग्नि है, जिसका उद्गम आत्मा है। आत्मा के अंतराल से जो ज्योति प्रस्फुटित होती है; जिसका आलोक अंतःज्ञान के रूप में देखा जा सकता है, आत्मबोध यही है। इसी का प्रकट होना और आत्मसत्ता के समूचे क्षेत्र को प्रकाशवान कर देना यही आत्मसाक्षात्कार है। विचार-क्षेत्र शिक्षा कहलाता है। अंतःसंवेदनाओं के ऊहापोह को विद्या एवं ब्रह्मविद्या कहते हैं।” इतने पर भी सारे तर्कों का उल्लंघन करके कोई आंतरिक उमंग ऐसी उठती है और उच्चस्तरीय भाव-संवेदना की भूख बुझाने के लिए त्याग-बलिदान की माँग करती है और अनेक सद्भावसंपन्न उसकी पूर्ति भी करते हैं।
यह संवेदना ही अग्नि है। जब वह आदर्शों के अपनाए रहने की परिपक्वावस्था में होती है, तो उसे श्रद्धा कहते हैं। अपने लिए कल्याणकारी कर्त्तव्य यही है। इसका सुनिश्चित निर्धारण विश्वास कहलाता है। श्रद्धा को भवानी की और विश्वास को शंकर की उपमा दी गई है और कहा गया है कि इन्हीं दोनों की सहायता से अंतरात्मा में ओत-प्रोत परमात्मा का दिव्य दर्शन होता है। आदर्शवादी संवेदनाओं की यह समूची परिधि धर्मक्षेत्र के नाम से जानी जाती है। इसी की उमंगें कर्मक्षेत्र पर छाई रहती हैं। आस्थाओं की प्रेरणा से विचारतंत्र को दिशा मिलती है और विचारों की कर्म के रूप में परिणति होती है। इसी क्षेत्र में जब प्रखरता आती है, तो अतीद्रिंय ज्ञान जाग्रत होता है और दूरदर्शन, दूरश्रवण, प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन, भावी संभावनाएँ जैसी वे जानकारियाँ मिलती हैं, जो सामान्य इंद्रियक्षमता की पकड़ से बाहर हैं।
दर्शनशास्त्र को प्रत्यक्षवादियों द्वारा शब्दाडंबर, वाग्विलास, कल्पना, काव्य आदि व्यंग्य शब्दों से संबोधित किया गया है, पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं। विचार करने की अस्त-व्यस्त शैली को, क्रमबद्ध और दिशाबद्ध करने का महान प्रयोजन दार्शनिक शैली से ही हो सकना संभव है, अन्यथा उच्छृंखल गतिविधियाँ और अनगढ़ मान्यताओं का मिला-जुला स्वरुप ऐसा विचित्र बन जाएगा, जिससे किसी लक्ष्य तक न पहुँचा जा सकेगा। योजनाबद्ध चिंतन की भी उपयोगिता है। वह कार्य दार्शनिक रीति-नीति से ही संभव हो सकता है।
जीवन का यदि कोई दर्शन न हो, उसके साथ कुछ आस्थाएँ, मान्यताएँ जुड़ी न हों, किन्हीं सिद्धांतों का समावेश न हो, तो आदमी, आदमी न रहकर एक प्राणीमात्र रह जाता है। गुजारे भर का लक्ष्य लेकर चलने वाले अपनी योग्यता और तत्परता के अनुसार सुविधा-साधन तो न्यूनाधिक मात्रा में उपार्जित कर लेते हैं, किंतु कोई ऊँचा लक्ष्य सामने न रहने पर अंतरात्मा में जीवंत उत्साह नहीं सँजो पाते।
— पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, क्या धर्म अफीम की गोली है?, संवेदना की समस्या को कौन सुलझाएगा?, पृष्ठ 47-50, 53
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