कृपा कथा : एक शिष्य की कलम से । भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी वंदनीया माता जी के गीतों से
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई.." — मीराबाई की ये अमर पंक्तियाँ अनन्य कृष्ण-भक्ति, विरह और आत्मविसर्जन का साक्षात प्रतीक हैं। कहा जाता है कि मीरा जब गाती थीं, तो उनके भावों के वशीभूत होकर स्वयं नटवर नागर थिरकने लगते थे। युग बीत गए, आज भी ये भजन गाए जाते हैं, किंतु वह 'मीरा सा अंतस' और वह 'अगाध भाव' दुर्लभ हो गया है।
किंतु, मैं स्वयं को उन विरले सौभाग्यशाली व्यक्तियों में गिनता हूँ, जिन्हें साक्षात एक ऐसी दिव्य चेतना के समक्ष बैठने का अवसर मिला, जिनके हृदय से अपने आराध्य के लिए भक्ति की निर्झरिणी फूटती थी। वे थीं—परम वंदनीया माता जी।
उन दिनों मैं माता जी के 'प्रज्ञा-गीतों' की रिकॉर्डिंग करने वाली टीम का एक सदस्य था। जब माता जी रिकॉर्डिंग के लिए गीत की पंक्तियाँ गुनगुनाती थीं, तो वे केवल गाती नहीं थीं; वे उन शब्दों में पूर्णतः विलीन हो जाती थीं। उस क्षण ऐसा प्रतीत होता था मानो शब्द, स्वर और साधिका—तीनों का अस्तित्व मिटकर एक एकाकार ज्योति बन गया हो।
गीत गाते-गाते माता जी अपने इष्ट में इस कदर खो जाती थीं कि उन्हें देह का भान तक नहीं रहता था। उनके साथ बैठे संगीतकार और रिकॉर्डिंग टीम विस्मय में डूबी, स्तब्ध रह जाती थी। कई बार तो उनकी भाव-प्रगाढ़ता और अश्रु-पूरित नेत्रों को देख रिकॉर्डिंग रोकनी पड़ती थी, क्योंकि वहाँ संगीत नहीं, साक्षात 'भक्ति' प्रवाहित हो रही होती थी। इस पर वंदनीया माता जी कहतीं "लल्लु, मैं कोई गायिका थोड़े ही हूँ; मैं तो केवल अपने प्रभु, अपने भगवान के लिए गाती हूँ।"
मीरा अपने द्वारा रचे पदों को गाते-गाते गोविंद में खो जाती थीं ऐसा सुना था, किंतु वंदनीया माता जी को अपने भगवान के लिए गाते हुए, उन्हीं भावों में डूबते और स्वयं को विसर्जित करते मैंने अपनी आँखों से देखा है।
मुझ जैसे अकिंचन पर उनकी यह असीम अनुकंपा रही कि मैं उन दिव्य क्षणों का साक्षी बना, जिन्हें प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े तपस्वी और योगी अनंत जन्मों तक प्रतीक्षा करते हैं। वह संगीत नहीं, एक आत्मा का परमात्मा में विलय होने का उत्सव होता था। -एक शिष्य
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