हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
बड़ी और कड़ी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर ही किसी की महिमा और गरिमा का पता चलता है। प्रतिस्पर्द्धाओं में उत्तीर्ण होने पर ही पदाधिकारी बना जाता है। खेलों में बाजी मारने वाले ही पुरस्कार पाते हैं। खरे सोने की पहचान अग्नि में तपाने और कसौटी पर कसने से ही होती है। हीरा इसीलिए कीमती माना जाता है कि वह साधारण आरी या रेती से कटता नहीं है। मोर्चे फतह करके लौटने वाले सेनापति ही सम्मान पाते और विजय श्री का वरण करते हैं।
चुनौतियाँ स्वीकार करने वाले ही साहसी कहलाते हैं। उन्हें अपनी वरिष्ठता भयानक कठिनाइयों को पार करके ही सिद्ध करनी पड़ती है। योगी, तपस्वी जान-बूझकर कष्टसाध्य-प्रक्रिया अपनाते हैं। कृष्ण की गरिमा को जिनने जाना, वे दुर्दांत उन्हें बरबाद करने के लिए आरंभ से ही अपनी आक्रामकता का प्रदर्शन करते रहे। बकासुर, अघासुर, कालिया सर्प, कंस आदि अनेकों के आघातों का सामना करना पड़ा। पूतना तो जन्म के समय ही विष देने आई थी। आगे भी जीवन भर उन्हें संघर्षों का सामना करना पड़ा। महानता का मार्ग ऐसा ही है, जिस पर चलने और बढ़ने वाले को पग-पग पर खतरे उठाने पड़ते हैं। दधीचि, भगीरथ, हरिश्चंद्र और मोरध्वज आदि की महिमा उनके तप-त्याग के कारण ही उजागर हुई।
भगवान जिसे सच्चे मन से प्यार करते हैं, उसे अग्नि-परीक्षाओं में होकर गुजारते हैं। भगवान का प्यार बाजीगरी जैसे चमत्कार देखने-दिखाने में नहीं है। मनोकामनाओं की पूर्ति भी वहाँ नहीं होती।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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